जहां कबीर ने तोड़ा था अंधविश्वास, वहीं अब पर्यटन लिख रहा विकास की नई इबारत, मगहर से बखिरा तक बदल रहा संत कबीर नगर

स्थापना दिवस पर विशेष: पुनीत मिश्र

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। कभी जिस मगहर को लेकर लोगों के मन में डर और अंधविश्वास की कहानियां थीं, आज वही धरती श्रद्धा, संस्कृति और पर्यटन का बड़ा केंद्र बन रही है। संत कबीर की निर्वाण स्थली से लेकर बखिरा की झील में अठखेलियां करते प्रवासी पक्षियों तक, संत कबीर नगर की तस्वीर तेजी से बदल रही है। मंदिरों की घंटियां, कबीर की वाणी, सूफी परंपरा और प्रकृति की खूबसूरती मिलकर इस जिले को पर्यटन का ऐसा रंग दे रही हैं, जिसमें इतिहास भी है और रोमांच भी।
पर्यटकों के बढ़ते कदम इस बदलाव की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। वर्ष 2024 में करीब 13.68 लाख पर्यटक संत कबीर नगर पहुंचे थे। वर्ष 2025 में यह संख्या बढ़कर 14.21 लाख हो गई। यानी एक साल में ही पर्यटकों की संख्या में करीब 53 हजार का इजाफा हुआ।

संत कबीर ने जिस मगहर को चुना, आज वही बना आकर्षण का केंद्र

संत कबीरदास ने अपने जीवन के अंतिम समय में मगहर को चुना था। उस दौर में काशी को मोक्ष की नगरी और मगहर को अपवित्र मानने की धारणा प्रचलित थी। मान्यता थी कि मगहर में मृत्यु होने पर मोक्ष नहीं मिलता।
संत कबीर ने इसी सोच को चुनौती दी। उन्होंने संदेश दिया कि इंसान की मुक्ति किसी स्थान विशेष से नहीं, बल्कि उसके कर्म और विचारों से जुड़ी है। वर्ष 1518 में मगहर में उनके निर्वाण के बाद यहां हिंदू और मुस्लिम अनुयायियों ने एक-दूसरे के करीब समाधि और मजार का निर्माण कराया। यही दृश्य आज मगहर को सांप्रदायिक सौहार्द और आध्यात्मिक पर्यटन का अनूठा केंद्र बनाता है।

एक जिले में इतिहास भी, आस्था भी और प्रकृति भी
संत कबीर नगर की खासियत यह है कि यहां पर्यटकों को एक ही सफर में अलग-अलग अनुभव मिलते हैं। मगहर में कबीर की स्मृतियां और आध्यात्मिक वातावरण है तो बखिरा में प्रकृति का अद्भुत संसार।
बखिरा पक्षी अभयारण्य पक्षी प्रेमियों के लिए खास आकर्षण है। यहां आने वाले पर्यटकों को विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों को देखने का अवसर मिलता है। दूसरी ओर समय माता मंदिर और तमेश्वरनाथ मंदिर श्रद्धालुओं के प्रमुख आस्था केंद्र हैं। काजी खैली-उर-रहमान का किला क्षेत्र के ऐतिहासिक अतीत की कहानी सुनाता है।
यानी यहां आने वाला पर्यटक चाहे तो कबीर की वाणी में डूब सकता है, मंदिरों में आस्था जगा सकता है या फिर प्रकृति के बीच कुछ सुकून के पल बिता सकता है।

बौद्ध यात्राओं की कहानी भी छिपी है इस धरती में
जिले की कहानी केवल संत कबीर तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र को प्राचीन बौद्ध परंपरा से भी जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि पुराने समय में बौद्ध भिक्षु इस क्षेत्र से होकर कपिलवस्तु, लुंबिनी और कुशीनगर जैसे प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थलों की ओर जाते थे।
इस लिहाज से यह क्षेत्र आध्यात्मिक और विरासत पर्यटन के लिहाज से कई परतें अपने भीतर समेटे हुए है।

2864 लाख की परियोजनाओं से पर्यटन को मिलेगी रफ्तार
जिले के पर्यटन स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने के लिए सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य योजना के तहत 2864.22 लाख रुपये की पर्यटन विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी है।
महाभारतकालीन बाबा तामेश्वरनाथ मंदिर के पर्यटन विकास के लिए सबसे अधिक 2441.49 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इसके अलावा हनुमानगढ़ी एवं राम-जानकी मंदिर के लिए 86.80 लाख, ठाकुर जी मंदिर के लिए 143.46 लाख, बाबा बैजूनाथ धाम के लिए 91.55 लाख और सिद्धपीठ रामकोठ मंदिर के लिए 100.92 लाख रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल मंदिरों और धार्मिक स्थलों का सुंदरीकरण नहीं, बल्कि वहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना भी है।

1997 में बना जिला, अब पर्यटन के नक्शे पर बढ़ा रहा कदम
संत कबीर नगर का गठन 5 सितंबर 1997 को हुआ था। बस्ती मंडल के इस जिले की सीमाएं गोरखपुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर और अंबेडकर नगर से लगती हैं।
प्रशासनिक रूप से अपेक्षाकृत नया जिला होने के बावजूद यहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत सदियों पुरानी है। यही पुराना इतिहास अब आधुनिक पर्यटन विकास के साथ नई पहचान बना रहा है।
पर्यटन केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं रहता। पर्यटक आते हैं तो होटल, रेस्टोरेंट, वाहन, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार से जुड़े लोगों की कमाई भी बढ़ती है।
जिले में पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी उम्मीद जगाई है। आने वाले दिनों में यदि पर्यटन स्थलों पर सुविधाओं का विस्तार और प्रचार-प्रसार इसी गति से जारी रहा तो जिले में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

संत कबीर की वाणी से बखिरा के पक्षियों तक… यही है संत कबीर नगर की नई पहचान
एक तरफ मगहर की धरती कबीर के संदेश को दुनिया तक पहुंचाती है, दूसरी तरफ बखिरा प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचता है। बीच में मंदिर, ऐतिहासिक स्थल और लोक आस्था के केंद्र इस पर्यटन यात्रा को और खास बनाते हैं।
यही विविधता संत कबीर नगर को दूसरे जिलों से अलग करती है। संत कबीर की आध्यात्मिक विरासत और बखिरा की प्राकृतिक खूबसूरती के बीच अब पर्यटन विकास की नई कहानी लिखी जा रही है।

rkpNavneet Mishra

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