जीवन में प्रचंड चक्रवात, तूफान
का आना भी अति आवश्यक है,
तभी हमें पता चलता है कि कौन
हमारा हाथ पकड़ कर चलता है।
दुनिया स्वार्थ में अन्धी होती है,
अक्सर लोग साथ छोड़ जाते हैं,
संस्कारहीनता सामाजिक बुराई,
भौतिक आधुनिकता के धन्धे हैं।
पेड़, पौधे, नदियाँ पूजी जाती हैं,
उनका अनादर अनर्थकारी होता है,
इस अनादर का परिणाम किसी न
किसी को तो भुगतना ही पड़ता है।
अहंकार मन मस्तिष्क में रखकर
कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता है,
समर्पण की श्रद्धांजलि बनाकर
कुछ प्राप्त किया जा सकता है।
शब्द और जीवन व्यवस्थित हों,
तभी अर्थ है, वरना सब व्यर्थ हैं,
आदित्य किसी हार का कोई भी
अर्थ नहीं, हम विजयी जन्मे हैं।
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