जब तक गंगा यमुना में पानी है,
तब तक जीवन की ज़िम्मेदारी हैं,
इंतज़ार करोगे पानी रुके कब तक
कब आयेगी ख़ुशियों की बारी हैं।
पानी का बहना नहीं रुकेगा कभी,
ज़िम्मेदारी न ख़त्म होने वाली कभी,
जीवन की हर ख़ुशियाँ जी लेना है,
हर तीरथ की यात्रा पूरी कर लेना है।
नदिया में पानी बहता है तो बहने दो,
पार करो बहती नदी की धारा को,
उत्तरदायित्व निभाओ ख़ूब अपना,
पर जी लो अपने जीवन का सपना।
जीवन का वक्त बहुत कम है,
हर जीवन में ख़ुशी और ग़म हैं,
जिसने जल धारा की थाह पाई है,
उसने ग़म की धारा की पार पाई है।
जो रहा किनारे बैठा धारा रुकने तक,
उसके दुखों व ग़मों का पारावार नहीं,
जो डूबने के डर से साहिल पर बैठा हो,
उसको पार ले जाने वाला कोई नहीं।
जीवन की नैय्या में सोच समझ
कर अपनी पतवार सम्भालनी है,
बिना पतवार सम्भाले किनारा नहीं,
और डूबने लगे तो फिर सहारा नहीं।
किनारा तभी मिलता है जब डूबने से
बचने के लिये तैरना सीख लिया जाय,
हौसला तभी बढ़ता है जीवन में जब,
असफलताओं से भी जंग लड़ी जाय।
कुदरती सहारा पर हर पल मिलता है,
चाहे हाथ और साथ दोनो छूट जायँ,
उसी का करिश्मा है कि ज़रूरत पर,
आदित्य उँगली पकड़ने वो आ जाय।
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