दौलत की अंधी दौड़ में टूटते रिश्ते, बदलती जीवनशैली से बिखर रहा पारिवारिक ताना-बाना

मोबाइल, पैसा और दिखावे की दुनिया ने कम किया अपनों के बीच संवाद

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आधुनिक जीवनशैली और भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ ने समाज के पारिवारिक ढांचे को गहराई से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। बदलते सामाजिक परिवेश में रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है और लोग अपने ही परिवार से भावनात्मक रूप से दूर होते नजर आ रहे हैं। कभी संयुक्त परिवार, प्रेम, त्याग और अपनापन भारतीय समाज की पहचान हुआ करते थे, लेकिन अब मोबाइल, पैसा और दिखावे की संस्कृति ने रिश्तों की नींव को कमजोर कर दिया है।

आज का व्यक्ति सुबह से रात तक धन कमाने, बेहतर जीवनशैली दिखाने और सामाजिक प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की दौड़ में व्यस्त है। आर्थिक सफलता को ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मान लिया गया है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि परिवार के सदस्यों के बीच संवाद लगातार कम होता जा रहा है। लोग एक ही घर में रहते हुए भी मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में खोए हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली का सबसे अधिक प्रभाव पारिवारिक रिश्तों पर पड़ा है। वृद्ध माता-पिता अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर हैं। नौकरी और व्यवसाय के कारण युवा महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे गांव और घर खाली होते जा रहे हैं। वहीं भाई-भाई के बीच जमीन और संपत्ति को लेकर विवाद बढ़ते जा रहे हैं। पति-पत्नी के रिश्तों में भी विश्वास, धैर्य और संवाद की कमी देखने को मिल रही है।

बढ़ती महत्वाकांक्षा और दिखावे की संस्कृति मानसिक तनाव को भी बढ़ा रही है। सोशल मीडिया पर खुशहाल और सफल दिखने की होड़ ने लोगों को वास्तविक जीवन की सच्ची खुशियों से दूर कर दिया है। लोग परिवार के साथ समय बिताने की बजाय मोबाइल स्क्रीन पर अधिक समय व्यतीत कर रहे हैं।
पहले ग्रामीण क्षेत्रों में संयुक्त परिवारों की मजबूत परंपरा थी। गांवों में लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे और बुजुर्गों का सम्मान समाज को जोड़े रखता था। लेकिन अब ग्रामीण समाज भी तेजी से बदल रहा है। छोटी-छोटी बातों पर परिवार टूट रहे हैं और संपत्ति विवाद अदालतों तक पहुंच रहे हैं।

समाजशास्त्रियों का कहना है कि आर्थिक विकास जरूरी है, लेकिन यदि विकास के साथ रिश्तों की संवेदनाएं समाप्त हो जाएं तो समाज में असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है। धन जीवन की जरूरतें पूरी कर सकता है, लेकिन सच्चा अपनापन, भावनात्मक सहारा और पारिवारिक सुख नहीं खरीद सकता।

विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि वे व्यस्त जीवन से थोड़ा समय परिवार और समाज के लिए भी निकालें। बच्चों के साथ समय बिताना, बुजुर्गों का सम्मान करना और रिश्तों में संवाद बनाए रखना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।

बदलते दौर में यह आवश्यक हो गया है कि लोग आधुनिकता के साथ-साथ पारिवारिक मूल्यों को भी महत्व दें। रिश्तों में प्रेम, विश्वास और संवेदनाएं ही समाज को मजबूत बनाती हैं। जीवन की अंतिम यात्रा में धन नहीं, बल्कि अपनों का साथ ही सबसे बड़ा सहारा होता है।

Karan Pandey

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