निंदा से डरे बिना काम करते रहना चाहिए: सावित्रीबाई फुले

मराठी कवयित्री, भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन की नायिका, भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, शोषितों-वंचितों एवं पिछड़ गए लोगों की सशक्त आवाज, नारी शिक्षा को समर्पित सावित्रीबाई फुले जी की जयंती पर स्मरण कर रहे हैं- पुनीत मिश्र

भारतीय समाज के इतिहास में सावित्रीबाई फुले का नाम उस क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक है, जिसने अंधकार, अज्ञान और भेदभाव के विरुद्ध शिक्षा का दीप जलाया। वे केवल एक संवेदनशील कवयित्री ही नहीं थीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सशक्त वाहक भी थीं। उनका जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का अनुपम उदाहरण है।
उन्नीसवीं सदी का भारत रूढ़ियों, जातिगत भेदभाव और स्त्री-वंचना से जकड़ा हुआ था। ऐसे कठिन समय में सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जब तक स्त्री और वंचित वर्ग शिक्षित नहीं होंगे, तब तक समाज की प्रगति अधूरी रहेगी। इसी सोच के साथ उन्होंने बालिकाओं और दलित समाज के बच्चों के लिए विद्यालयों की स्थापना की, जो उस दौर में एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम था।
सावित्रीबाई फुले का संघर्ष आसान नहीं था। समाज ने उनका तीखा विरोध किया, अपमानित किया और उनके मार्ग में अनेक बाधाएं खड़ी कीं। विद्यालय जाते समय उन पर कीचड़ और गोबर फेंका गया, लेकिन वे विचलित नहीं हुईं। वे अपने साथ अतिरिक्त साड़ी रखती थीं और हर अपमान को सहते हुए भी शिक्षा का कार्य निरंतर करती रहीं। यही कारण है कि उनका कथन कि “निंदा से डरे बिना काम करते रहना चाहिए।”आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
वे एक जागरूक कवयित्री भी थीं। उनकी कविताओं में सामाजिक असमानता के विरुद्ध तीखा प्रतिरोध, स्त्री चेतना और मानवीय गरिमा की पुकार स्पष्ट दिखाई देती है। उनके विचार विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह विरोध और छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ समाज को झकझोरते हैं।
नारी शिक्षा के क्षेत्र में सावित्रीबाई फुले का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने सिद्ध किया कि शिक्षित नारी केवल स्वयं का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का भविष्य संवार सकती है। आज महिला सशक्तिकरण, समान अधिकार और सामाजिक न्याय की जो चेतना दिखाई देती है, उसकी जड़ें सावित्रीबाई फुले के संघर्ष और विचारों में ही निहित हैं।
सावित्रीबाई फुले की जयंती हमें केवल उनके व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं देती, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का संदेश भी देती है। उनका जीवन यह सिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन के मार्ग में आलोचना और विरोध अवश्य आते हैं, लेकिन यदि लक्ष्य मानवता, समानता और शिक्षा हो, तो निडर होकर निरंतर कर्म करते रहना ही सच्ची श्रद्धांजलि है।

rkpNavneet Mishra

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