मिशन डेमोग्राफी: अवैध घुसपैठ, आईएमडीटी एक्ट और भारत की बदलती जनसांख्यिकीय चुनौती
भारत में जनसांख्यिकीय परिवर्तन अब केवल आबादी का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतंत्र और संवैधानिक संतुलन का मुद्दा बन चुका है
✍️ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र
भारत में अवैध घुसपैठ, सीमाई सुरक्षा और जनसंख्या संरचना में हो रहे बदलावों को लेकर बहस कोई नई नहीं है, लेकिन वर्ष 2026 में यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया है। केंद्र सरकार ने “मिशन डेमोग्राफी” के तहत जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा कर स्पष्ट संकेत दिया है कि अब अवैध प्रवासन को केवल कानून-व्यवस्था या मानवीय समस्या के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संतुलन, सीमा प्रबंधन, संसाधनों पर दबाव और सामाजिक स्थिरता से जुड़ी व्यापक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा “अननेचुरल डेमोग्राफिक चेंज” की चर्चा के बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी गठित की है। इस समिति का उद्देश्य अवैध आप्रवास, सीमाई घुसपैठ, मतदाता पहचान, फर्जी दस्तावेज, सीमा प्रबंधन और जनसंख्या असंतुलन जैसे विषयों का व्यापक अध्ययन करना है।
आईएमडीटी एक्ट 1983 क्यों बना विवाद का केंद्र
भारत में अवैध प्रवासन का प्रश्न विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम से जुड़ा रहा है। वर्ष 1970 और 1980 के दशक में बांग्लादेश से कथित अवैध घुसपैठ को लेकर व्यापक जन आंदोलन हुआ, जिसे “असम आंदोलन” कहा गया। आंदोलनकारियों का आरोप था कि बड़ी संख्या में बाहरी लोगों के आने से स्थानीय संस्कृति, भाषा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में वर्ष 1983 में “इललीगल माइग्रेंट्स (डिटरमिनेशन बाय ट्रिब्यूनल्स) एक्ट” यानी आईएमडीटी एक्ट लागू किया गया। यह कानून केवल असम में लागू था। इसका उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना बताया गया, लेकिन बाद में यही कानून सबसे अधिक विवादों का कारण बना।
आईएमडीटी एक्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि किसी व्यक्ति को विदेशी साबित करने की जिम्मेदारी राज्य और शिकायतकर्ता पर डाली गई थी। जबकि भारत के अन्य हिस्सों में लागू फॉरेनर्स एक्ट 1946 के तहत संदेहास्पद व्यक्ति को स्वयं साबित करना पड़ता था कि वह भारतीय नागरिक है।
आलोचकों का कहना था कि इस प्रावधान ने अवैध घुसपैठियों की पहचान लगभग असंभव बना दी। शिकायतकर्ता को विस्तृत प्रमाण प्रस्तुत करने पड़ते थे और प्रशासनिक प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि अधिकांश मामलों में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाती थी। यही कारण रहा कि कई राष्ट्रवादी और क्षेत्रीय संगठनों ने इसे “घुसपैठियों को संरक्षण देने वाला कानून” बताया।
जनसांख्यिकी और लोकतंत्र का जुड़ाव
असम में जनसंख्या परिवर्तन को लेकर उठी चिंता केवल आबादी की संख्या तक सीमित नहीं थी। स्थानीय संगठनों का आरोप था कि अवैध प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने से चुनावी समीकरण बदल रहे हैं और स्थानीय समुदायों का राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ रहा है।
दूसरी ओर आईएमडीटी एक्ट के समर्थकों का तर्क था कि असम में रहने वाले अनेक बंगाली भाषी मुसलमानों और गरीब नागरिकों को मनमाने तरीके से विदेशी घोषित किए जाने का खतरा था। इसलिए यह कानून मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द किया आईएमडीटी एक्ट
वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने आईएमडीटी एक्ट को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह कानून अवैध घुसपैठ रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुआ और इससे विदेशी नागरिकों की पहचान की प्रक्रिया अत्यधिक कठिन हो गई।
सुप्रीम कोर्ट ने असम की जनसांख्यिकीय स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसके प्रतिकूल प्रभाव का भी उल्लेख किया। इसके बाद असम में भी विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए फॉरेनर्स एक्ट के नियम लागू किए गए।
यह फैसला एक वर्ग द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से ऐतिहासिक माना गया, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने आशंका जताई कि इससे निर्दोष नागरिकों को परेशान किए जाने का खतरा बढ़ सकता है।
मिशन डेमोग्राफी 2026: सरकार की नई रणनीति
वर्ष 2026 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया “मिशन डेमोग्राफी” इसी ऐतिहासिक बहस का नया चरण माना जा रहा है। सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति को देश के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक और साक्ष्य-आधारित अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई है।
समिति निम्न प्रमुख विषयों पर अध्ययन करेगी—
अवैध आप्रवास और सीमाई घुसपैठ
फर्जी दस्तावेज और मतदाता पहचान
असामान्य बसावट पैटर्न
सीमा प्रबंधन की कमजोरियाँ
धार्मिक और सामाजिक समुदायों में संरचनात्मक परिवर्तन
अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन की प्रक्रिया
समिति को एक वर्ष के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है।
डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट: सरकार की 3D नीति
सरकार की नई रणनीति “3D नीति” पर आधारित बताई जा रही है—
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