Categories: कविता

छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार,अब तो बिककर छप रहे, कलम है शर्मसार॥

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

सच की कीमत लग गई, बोली लगे बाज़ार,
ख़बरों के भी दाम हैं, बिकता हर विचार।
इश्तहारों के तले, दबे जन सरोकार—
छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार॥

मालिक की मर्ज़ी चले, लिखे वह समाचार,
जो दिखना है वह दिखे, बाकी सब बेकार।
शीर्षक में तूफ़ान है, भीतर खोखला सार—
छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार॥

चंद दलालों के हुए, अब सारे अख़बार,
सच की कश्ती डूबती, बीच भँवर मझधार॥
झूठों के उत्सव में, सच होता लाचार—
छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार॥

सत्ता की छाया तले, झुकती हर दरकार,
कलमों की नीलामियां, बिके हुए अख़बार।
लोकतंत्र के नाम पर, होता अब व्यापार—
छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार॥

जागो अब पाठक सभी, खोलो अपनी आँख,
सच को पहचानो स्वयं, तोड़े झूठी शाख।
जनमत जागेगा तभी, बदलेगा व्यवहार—
छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार॥

Karan Pandey

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