इंडोनेशिया,ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सफ़ल त्रि-राष्ट्र यात्रा तथा ईरान -अमेरिका संघर्ष के बीच भारत की आर्थिक रणनीति
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारतीय विदेश नीति,वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के दृष्टिकोण से 11 जुलाई 2026 एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन के रूप में दर्ज किया जाएगा। एक ओर भारतीय प्रधानमंत्री की छह दिवसीय इंडोनेशिया,ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा 6 से 11 जुलाई 2026 छह दिवसीय यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हुई,जिसमें अनेक रणनीतिक समझौते,निवेश साझेदारियां, रक्षा सहयोग,क्रिटिकल मिनरल्स, मुक्त व्यापार और तकनीकी सहयोग से जुड़े एमओयू हुए।दूसरी ओर,पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच समझौता टूटने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य हमले तेज होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार,समुद्री व्यापार, निवेशकों की धारणा और अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई।इन दोनों घटनाओं को यदि एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि विश्व अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक तरफ युद्ध से उत्पन्न जोखिम हैं तो दूसरी ओर भारत के लिए नए आर्थिक अवसर भी तेजी से उभर रहे हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र वित्तीय दृष्टिकोण से बताना चाहूंगा कि भारतीय पीएम की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा केवल एक राजनयिक दौरा नहीं थी बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक नीति का महत्वपूर्ण विस्तार थी। इंडोनेशिया के साथ रक्षा उत्पादन,समुद्री सुरक्षा तथा लगभग 5,400 करोड़ रूपए के रक्षा सहयोग,ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स, लिथियम, दुर्लभ खनिज, शिक्षा,ऊर्जा तथा सेमीकंडक्टर सहयोग और न्यूजीलैंड के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते ने यह संकेत दिया कि भारत केवल व्यापार नहीं बढ़ाना चाहता बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में एक निर्णायक भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।इससे भारत के विनिर्माण,निर्यात,रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन एनर्जी और हाई-टेक उद्योगों को सटीकता से नई गति मिलने की संभावना है।
साथियों भारतीय शेयर बाजार के दृष्टिकोण से देखें तो इन समझौतों का सबसे अधिक लाभ रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स सेमीकंडक्टर,खनन,नवीकरणीय ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, पोर्ट, जहाजरानी और निर्यात आधारित कंपनियों को मिलने की संभावना है। निवेशकों की सोच सामान्यतः भविष्य की संभावनाओं पर आधारित होती है।जब किसी देश के साथ दीर्घकालिक व्यापारिक समझौते होते हैं,तब विदेशी निवेशकों का विश्वास मजबूत होता है।यही कारण है कि ऐसे कूटनीतिक समझौते अक्सर बाजार को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान करते हैं,भले ही अल्पकाल में वैश्विक घटनाओं के कारण सटीकता से उतार- चढ़ाव बना रहे।
साथियों, न्यूजीलैंड के साथ रिकॉर्ड समय में संपन्न मुक्त व्यापार समझौता,40 साल का सूखा खत्म! 35000 करोड़ का होगा ट्रेड, समझौते हुए?- भारत -न्यूजीलैंड ने तैयार किया विजन 2030, भारतीय कृषि,डेयरी, फार्मास्यूटिकल्स,आईटी सेवाओं वस्त्र उद्योग,खाद्य प्रसंस्करण तथा इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए नए अवसर लेकर आया है। यदि दोनों देशों के बीच व्यापार 2030 तक दोगुना होता है तो भारत के निर्यातकों, बंदरगाहों, कंटेनर लॉजिस्टिक्स बैंकिंग और बीमा क्षेत्र को भी अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा। इससे भारतीय रुपये की स्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
साथियों,ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स साझेदारी भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य की अर्थव्यवस्था इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स,सौर ऊर्जा,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर उद्योग पर आधारित होगी। लिथियम, कोबाल्ट तथा अन्य दुर्लभ खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति भारत को चीन पर निर्भरता कम करने का अवसर देती है। इससे मेक इन इंडिया,आत्मनिर्भर भारत और उच्च मूल्य विनिर्माण को नई गति मिलने की संभावना है।इंडोनेशिया के साथ रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा समझौते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करते हैं। ब्रह्मोस जैसे रक्षा निर्यात भारतीय रक्षा उद्योग के लिए वैश्विक बाजार खोल सकते हैं। रक्षा निर्यात में वृद्धि का सीधा लाभ सार्वजनिक और निजी दोनों रक्षा कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और सहायक उद्योगों को मिलेगा। इससे रोजगार, उत्पादन और निर्यात आय में सटीकता से वृद्धि होगी।
साथियों, इन सकारात्मक संकेतों के बीच पश्चिम एशिया से आने वाली खबरें वैश्विक बाजारों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। ईरान और अमेरिका के बीच समझौता टूटने तथा दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने वैश्विक निवेशकों को जोखिम से बचने की रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है। जब भी विश्व में युद्ध या बड़े भू- राजनीतिक तनाव उत्पन्न होते हैं, तब निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों जैसे सोना, अमेरिकी डॉलर और सरकारी बॉन्ड की ओर रुख करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उभरते बाजारों से विदेशी निवेश का अस्थायी बहिर्वाह शुरू हो सकता है।भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है।यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बना रहता है और तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची रह सकती हैं। इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव आ सकता है तथा घरेलू महंगाई में वृद्धि की आशंका बनेगी। पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, उर्वरक, प्लास्टिक, रसायन तथा परिवहन लागत बढ़ने से लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।भारतीय शेयर बाजार में ऐसे समय सबसे अधिक दबाव विमानन, ऑटोमोबाइल, पेंट, टायर, सीमेंट, रसायन और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों पर दिखाई देता है क्योंकि इनकी उत्पादन लागत ऊर्जा पर काफी निर्भर करती है। दूसरी ओर तेल एवं गैस उत्पादन,रक्षा, ऊर्जा अवसंरचना तथा कुछ कमोडिटी आधारित कंपनियों को अपेक्षाकृत लाभ मिल सकता है।यही कारण है कि युद्धकालीन परिस्थितियों में सेक्टर रोटेशन तेजी से देखने को मिलता है।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के प्रमुख बाजार युद्ध संबंधी समाचारों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। यदि संघर्ष लंबा चलता है तो वैश्विक विकास दर प्रभावित हो सकती है, समुद्री मालभाड़ा बढ़ सकता है, बीमा लागत बढ़ सकती है और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव आ सकता है। इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लाभ पर असर पड़ सकता है।हालांकि भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष यह भी है कि विश्व की अनेक कंपनियां अब अपनी आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण करना चाहती हैं। चीन-प्लस-वन रणनीति, हिंद- प्रशांत साझेदारी और भारत के साथ बढ़ते व्यापारिक समझौते भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने का अवसर प्रदान कर रहे हैं।यदि भारत समय पर अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स श्रम सुधार और उत्पादन क्षमता को मजबूत करता है तो वह युद्ध से उत्पन्न वैश्विक पुनर्संतुलन का वास्तव में बहुत बड़ा लाभ उठा सकता है।
साथियों, विदेशी संस्थागत निवेशकों की दृष्टि से भारत आज भी सबसे आकर्षक उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है।मजबूत घरेलू मांग,डिजिटलअर्थव्यवस्था युवा कार्यबल, तेज बुनियादी ढांचा विकास, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं और स्थिर वित्तीय प्रणाली भारत को अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश गंतव्य बनाती हैं। यही कारण है कि अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बावजूद दीर्घकालिक निवेशकों का विश्वास बना रह सकता है।भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती महंगाई नियंत्रण और विकास दर के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो मौद्रिक नीति, राजकोषीय प्रबंधन और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ेगी। साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू गैस उत्पादन का महत्व और बढ़ जाएगा।
साथियों, विश्व अर्थव्यवस्था के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो वर्तमान समय दो विपरीत धाराओं का संगम है। पहली धारा युद्ध, ऊर्जा संकट,महंगाई और अनिश्चितता की है।दूसरी धारा तकनीकी निवेश,हरित ऊर्जा,डिजिटल परिवर्तन,रक्षा आधुनिकीकरण और नए व्यापारिक गठबंधनों की है। भारत की त्रि-राष्ट्र यात्रा दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करती है,जबकि ईरान-अमेरिका संघर्षपहली धारा का। आने वाले वर्षों में जो देश इन दोनों चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित कर पाएंगे, वही वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दौड़ में आगे रहेंगे।
साथियों, भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह आज केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि एक विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार, रक्षा सहयोगी,तकनीकी भागीदार और विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भूमिका, मुक्त व्यापार समझौते,रक्षा निर्यात, क्रिटिकल मिनरल्स साझेदारी और वैश्विक निवेश आकर्षित करने की क्षमता भारत को आने वाले दशक में विश्व अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास इंजन के रूप में सटीकता से स्थापित कर सकती है।
साथियों,11 जुलाई 2026 शाम हुई भारतीय पीएम के त्रि-राष्ट्रीय छह दिवसीय दौरे में भारत- न्यूजीलैंड का विजन 2030 दोनों देशों के रिश्तों में नई शुरुआत जैसा है, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था व शेयर बाजारों मैं दूरगामी सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकता है।40 साल बाद हुई इस पहल से उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच व्यापार और सहयोग नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा, भारत और न्यूजीलैंड के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. करीब 40 साल बाद न्यूजीलैंड के किसी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच हुई अहम बातचीत ने व्यापारिक रिश्तों के लिए नए रास्ता खोल दिए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने मिलकर ‘विजन 2030’ का रोडमैप तैयार किया है, जिसका मकसद दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना है. दोनों देशों की कोशिश है कि आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को करीब 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाया जाए.भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से अच्छे कूटनीतिक संबंध रहे हैं, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के बीच व्यापार की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाई थी. अब दोनों देशों ने इस अंतर को कम करने के लिए विजन 2030 तैयार किया है. ट्रेड डील लागू होने के बाद पहले दिन से ही न्यूजीलैंड के 57 प्रतिशत निर्यात को भारत में बिना टैरिफ के एंट्री मिलेगी. इससे न्यूजीलैंड के कृषि, फूड प्रोसेसिंग, डेयरी के सामान को भारतीय बाजार में पहुंच बनाने में मदद मिलेगी. वहीं, भारत को भी न्यूजीलैंड के बाजार में अपने उत्पादों के लिए बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद है. इस समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारतीय पीएम की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा भारत की आर्थिक कूटनीति को नई ऊंचाई देने वाली सिद्ध हो सकती है,जबकि ईरान- अमेरिका संघर्ष विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम प्रस्तुत करता है। अल्पकाल में शेयर बाजारों में अस्थिरता,महंगाई और ऊर्जा लागत का दबाव बना रह सकता है,किंतु यदि भारत अपने सुधारों,व्यापारिक साझेदारियों, ऊर्जा सुरक्षा और निवेश वातावरण को मजबूत बनाए रखता है, तो वह इस वैश्विक संकट को भी अवसर में बदल सकता है।यही कारण है कि आज भारत के सामने चुनौती जितनी बड़ी है, संभावना उससे कहीं अधिक व्यापक है। आने वाले वर्षों में भारतीय शेयर बाजार, भारतीय उद्योग और भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य केवल घरेलू नीतियों पर नहीं बल्कि भारत की सक्रिय वैश्विक कूटनीति, रणनीतिक साझेदारियों और बदलते विश्व आर्थिक संतुलन को अवसर में बदलने की क्षमता पर भी निर्भर करेगा।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट
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