Friday, July 17, 2026
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भारतीय दृष्टि से लिखा जाए इतिहास, औपनिवेशिक सोच से बाहर निकलने का समय: डॉ. बालमुकुंद पांडे

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय इतिहास को विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और औपनिवेशिक इतिहासकारों के नजरिए तक सीमित रखना देश के गौरवशाली अतीत के साथ अन्याय है। समय की मांग है कि इतिहास का पुनर्पाठ भारतीय दृष्टिकोण, भारतीय स्रोतों और सांस्कृतिक परंपराओं के आधार पर किया जाए। यह विचार अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने व्यक्त किए।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग, सतीश चंद्र मित्तल शोध संस्थान तथा भारतीय इतिहास संकलन समिति, गोरक्ष प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “भारतीय इतिहास लेखन में नए बदलाव एवं चुनौतियाँ” विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में इतिहास लेखन के बदलते प्रतिमानों, औपनिवेशिक इतिहास दृष्टि की समीक्षा तथा भारतीय परिप्रेक्ष्य से इतिहास के पुनर्लेखन पर गंभीर मंथन हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं पुष्पांजलि के साथ हुआ। इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. मनोज कुमार तिवारी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और आत्मबोध का आधार है। इसलिए भारतीय दृष्टि से इतिहास का अध्ययन और लेखन आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कला संकायाध्यक्ष एवं प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो. राजवंत राव ने कहा कि राजनीतिक स्वतंत्रता के दशकों बाद भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था औपनिवेशिक मानसिकता के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक ज्ञान-पद्धति ने योजनाबद्ध तरीके से भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को हाशिये पर धकेलने का प्रयास किया। भारतीय इतिहास और संस्कृति की सही समझ के लिए इस मानसिकता से बाहर निकलना आवश्यक है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. एस.एन. चौबे ने कहा कि इतिहास लेखन तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने चौरी-चौरा के उदाहरण का उल्लेख करते हुए बताया कि लंबे समय तक इसे “चौरी-चौरा कांड” कहा गया, जबकि बाद के शोधों ने इसे “चौरी-चौरा घटना” के रूप में स्थापित किया। यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि इतिहास को देखने की दृष्टि का परिवर्तन है।
इतिहास विभाग की वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. निधि चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण अध्याय वर्षों तक उपेक्षित रहे। भारतीय इतिहास संकलन योजना ने लोक परंपराओं, पुरातात्विक साक्ष्यों, अभिलेखों और भारतीय स्रोतों को सामने लाकर इतिहास की अनेक रिक्तियों को भरने का कार्य किया है।
मुख्य वक्ता डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि नवस्थापित सतीश चंद्र मित्तल शोध संस्थान भारतीय दृष्टि से इतिहास अध्ययन और शोध का प्रमुख केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत के गौरवशाली अतीत को विकृत कर अंग्रेज़ी दृष्टिकोण को इतिहास लेखन पर आरोपित किया। परिणामस्वरूप भारतीय सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियां इतिहास के मुख्य विमर्श से बाहर हो गईं। उन्होंने शोधार्थियों से भारतीय स्रोतों, भारतीय ज्ञान परंपरा और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को आधार बनाकर शोध करने का आह्वान किया।
संगोष्ठी के प्रश्नोत्तर सत्र में शोधार्थियों ने इतिहास लेखन, स्रोतों की प्रामाणिकता और भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने विस्तार से उत्तर दिया।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. सुनीता ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रो. आशीष कुमार सिंह, प्रो. श्वेता सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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