अपनी प्यारी मातृभाषा हिंदी के
आलिंगन से हम दूर चले आये हैं।
इसके मूल रूप से बहकते हुये,
अंग्रेज़ी के प्रभाव में भरमाये हैं ।
इतनी सुंदर देवनागरी लिपि को
छोड़ रोमन में लिखना सीख गये,
दूर निकल आये इतने कि हम सब,
मूल रूप में हिंदी लिखना भूल गये।
शिक्षा पद्धति मैकाले की थोपी गई,
गुरूकुल की पाठशालायें बंद हुईं,
ब्रिटिश प्रणाली छल बल से देकर,
सामाजिक महिमा मर्यादा ध्वस्त हुईं।
आज ज़रूरी है मूल रूप फिर पाने का,
अपनी भाषा अपनी हिन्दी अपनाने का,
अभी भी चूके महत्व इसका हम भूले,
तो मिट जाएगा प्रयत्न 75 सालों का।
इन शब्दों में है कोई अतिरेक नहीं,
भाषा भाव सभी अव्यक्त व्यक्त हैं,
सधे हुये है, शायद कोई मतभेद नहीं,
राजभाषा हिंदी किसी को त्यक्त नहीं।
करूँ प्रशंसा कैसे हिंदी है अपनी माँ,
माँ की ममता, असमंजस में होठ बंद,
आदित्य देश व्यापी तो हो जाये हिंदी,
भारत का सम्मान विश्वभाषा हो हिंदी।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
कुशीनगर।(राष्ट्र की परम्परा) जनपद के दिव्यांगजनों के लिए राहत भरी खबर है। उत्तर प्रदेश शासन…
देवरिया रेलवे स्टेशन पर चला सघन सुरक्षा अभियान, डॉग स्क्वाड व बम निरोधक दस्ते ने…
निचलौल रेफर के बाद जिला अस्पताल ले जाते समय रास्ते में तोड़ा दम, रेस्क्यू टीम…
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) में शनिवार को जनसंचार एवं पत्रकारिता…
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की विद्या परिषद ने भूगोल विषय की…
बभनान/बस्ती(राष्ट्र की परम्परा)उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि मंत्री एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भाजपा सूर्य प्रताप…