दवाइयों के भरोसे जीवन बिता रहे बुजुर्ग: क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था सच में तैयार है?

भारत तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार, आने वाले वर्षों में देश की बड़ी आबादी वरिष्ठ नागरिकों की होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था इस ज़िम्मेदारी के लिए पूरी तरह तैयार है? आज देश के करोड़ों बुजुर्ग नियमित दवाइयों के सहारे अपने जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं, पर उनकी यह जंग केवल बीमारी से नहीं, बल्कि एक असंवेदनशील और अव्यवस्थित सिस्टम से भी है।

बुजुर्गों की सबसे बड़ी चुनौती है—निरंतर चिकित्सा सुविधा और सस्ती दवाइयों की उपलब्धता। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अस्थि-क्षय समेत कई बीमारियाँ उन्हें जीवनभर घेरती रहती हैं। ऐसे में हर महीने दवाइयों पर खर्च बढ़ता जा रहा है, जबकि पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक सहयोग कमजोर पड़ता जा रहा है। निजी अस्पताल आम आदमी की पहुँच से बाहर हो चुके हैं और सरकारी अस्पतालों में दवाइयों की भारी किल्लत बनी रहती है।

गांवों और छोटे कस्बों की स्थिति और भी चिंताजनक है। वहाँ न तो विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही पर्याप्त दवाइयां। आयुष्मान भारत और अन्य वरिष्ठ नागरिक योजनाएं जरूर मौजूद हैं, लेकिन उनकी जानकारी का अभाव और जटिल प्रक्रिया उन्हें जरूरतमंदों से दूर कर देती है। कई बुजुर्ग ऑनलाइन आवेदन या दस्तावेज़ी प्रक्रिया पूरी करने में असमर्थ होते हैं, जिससे वे सरकारी लाभ से वंचित रह जाते हैं।

परिवार का ताना-बाना भी बदल रहा है। संयुक्त परिवार अब अपवाद बनते जा रहे हैं। युवा करियर की दौड़ में शहरों की ओर जा चुके हैं और गांवों में माता-पिता अकेले संघर्ष कर रहे हैं। सोशल और इमोशनल सपोर्ट के बिना बुजुर्गों का जीवन और ज्यादा कठिन हो गया है। उनकी शारीरिक स्थिति से ज्यादा, मानसिक स्थिति कमजोर हो रही है। अकेलापन और उपेक्षा उन्हें भीतर से तोड़ रही है।

यह समस्या सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए ज़रूरी है कि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर नियमित रूप से दवाइयां उपलब्ध हों। हर ब्लॉक में बुजुर्गों के लिए अलग हेल्पडेस्क हो, जहाँ उन्हें न केवल दवाई बल्कि सही मार्गदर्शन भी मिले। साथ ही मेडिकल इंश्योरेंस की प्रक्रिया को सरल करना और घर-घर जागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है।

इसके साथ-साथ परिवारों और समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि अनुभव और संस्कारों का जीवंत स्रोत हैं। उनकी देखभाल केवल दया नहीं, बल्कि हमारा नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है।

जब तक सरकार, समाज और परिवार मिलकर बुजुर्गों के लिए एक मजबूत स्वास्थ्य ढांचा तैयार नहीं करेंगे, तब तक “सबका साथ, सबका विकास” का नारा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा।

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