Categories: कविता

नदी न पिए पानी

दूसरे के चेहरे पर हँसी, जीवन में
ख़ुशी लाने की जो सोच रखता है,
वह व्यक्ति स्वयं भी खुश रहता है,
और दूसरों को भी खुश रखता है।

ईश्वर उसके जीवन में कभी हँसी
और ख़ुशी कम नहीं होने देता है,
वह अपने जीवन में सफलता की
हर ऊँचाई को प्राप्त कर लेता है।

प्रकृति अपनी संपदा अपने लिए नहीं,
अपने परिवेश में रहने वाले प्राणियों
के हित के लिए विकसित करती है,
और सारे जग को संरक्षित रखती है।

नदी न अपना जल स्वयं पीती है,
वृक्ष नहीं अपने फल ख़ुद खाते हैं,
रवि रश्मियाँ प्रकाशित जग करती हैं,
फूलों की महक चहुँ ओर बिखरती है।

एक दूसरे के हित जीवन जीना है,
यही हमारी प्रकृति का नियम भी है,
आदित्य हमेशा यही याद रखना है,
औरों के लिये समर्पण भाव रखना है।

  • डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
Karan Pandey

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