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चीन को झटका या बांग्लादेश की बड़ी रणनीति? बंदरगाहों पर डेनमार्क की एंट्री से भारत की बढ़ीं उम्मीदें, हिंद महासागर में क्या बदलेगा समीकरण!


ढाका (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच बांग्लादेश ने अपने समुद्री बंदरगाहों को लेकर ऐसी रणनीति अपनाई है, जिसने दक्षिण एशिया के सामरिक समीकरणों पर नई बहस छेड़ दी है। अब बंदरगाहों के विकास और संचालन में चीन के साथ-साथ डेनमार्क, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों की कंपनियों की भी भागीदारी बढ़ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बांग्लादेश अपने बंदरगाहों के जरिए चीन के प्रभाव को सीमित करना चाहता है? और इस बदलते घटनाक्रम का भारत की समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय रणनीति पर क्या असर पड़ सकता है? बांग्लादेश के बंदरगाह केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। बंगाल की खाड़ी में उनकी भौगोलिक स्थिति उन्हें रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। भारत के पूर्वी तट और हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा के लिहाज से भी यहां होने वाले बदलावों पर नई दिल्ली की नजर रहना स्वाभाविक है। डेनमार्क की कंपनी के साथ 30 साल का करार बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह स्थित लल्दिया कंटेनर टर्मिनल को लेकर डेनमार्क की शिपिंग कंपनी एपी मोलर-मार्स्क समूह की इकाई एपीएम टर्मिनल्स के साथ 30 साल के समझौते की खबर सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना में लगभग 55 करोड़ डॉलर के निवेश की संभावना है। इसके तहत कंपनी टर्मिनल की डिजाइनिंग, वित्तपोषण, निर्माण और संचालन की जिम्मेदारी संभालेगी। इस समझौते का अहम पहलू यह है कि बंदरगाह का मालिकाना हक बांग्लादेश के पास ही रहेगा। विदेशी कंपनी को टर्मिनल के विकास और संचालन की जिम्मेदारी दी जाएगी। यानी बांग्लादेश विदेशी निवेश और विशेषज्ञता का इस्तेमाल करते हुए अपने बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। क्या चीन के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश है? चीन लंबे समय से दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में बुनियादी ढांचे तथा समुद्री संपर्क परियोजनाओं के जरिए अपनी मौजूदगी मजबूत करने में जुटा है। बांग्लादेश भी चीन के साथ विभिन्न आर्थिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सहयोग करता रहा है। ऐसे में बंदरगाहों के विकास में अन्य देशों की कंपनियों को शामिल करना ढाका के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय विकल्प बढ़ाने का एक रास्ता हो सकता है। डेनमार्क के अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की कंपनियों की भागीदारी भी इस व्यापक तस्वीर का हिस्सा है। इससे संकेत मिलता है कि बांग्लादेश अपने बंदरगाह विकास के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग निवेशकों और साझेदारों के साथ काम करने की नीति अपना सकता है। हालांकि, केवल विदेशी कंपनियों को ठेके देने के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि बांग्लादेश ने चीन को रणनीतिक रूप से पीछे धकेलने का फैसला कर लिया है। बंदरगाहों का व्यावसायिक संचालन, उनका वास्तविक स्वामित्व और सैन्य उपयोग की अनुमति अलग-अलग विषय हैं। इन सभी पहलुओं को समझे बिना किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचना उचित नहीं होगा। भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव? भारत के लिए बंगाल की खाड़ी का क्षेत्र व्यापार, समुद्री संपर्क और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश के बंदरगाहों में विविध देशों की भागीदारी से क्षेत्र में आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। साथ ही, इससे भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापारिक संपर्क तथा क्षेत्रीय सहयोग के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। लेकिन भारत के लिए असली सवाल यह होगा कि इन परियोजनाओं का संचालन किस तरह होता है, उनमें किस देश का कितना प्रभाव रहता है और भविष्य में उनका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है। केवल किसी यूरोपीय या खाड़ी देश की कंपनी के शामिल होने से रणनीतिक चिंताएं अपने आप खत्म नहीं हो जातीं। भारत को इस पूरे घटनाक्रम का आकलन बंदरगाहों की वास्तविक क्षमता, निवेश की शर्तों, समुद्री गतिविधियों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर करना होगा। बांग्लादेश की रणनीति का असली संदेश बांग्लादेश के हालिया बंदरगाह संबंधी फैसलों को चीन के प्रभाव के खिलाफ सीधी कार्रवाई के बजाय निवेश और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी में विविधता लाने की कोशिश के रूप में देखना अधिक उचित होगा। ढाका के लिए यह आर्थिक विकास, बेहतर बंदरगाह प्रबंधन और अलग-अलग देशों के साथ संबंध मजबूत करने का अवसर है। भारत के लिए भी यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों लेकर आती है। यदि बांग्लादेश अपने बंदरगाहों को आधुनिक बनाने के साथ क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता देता है, तो भारत को व्यापार और संपर्क बढ़ाने का लाभ मिल सकता है। वहीं, बंगाल की खाड़ी में किसी भी देश का बढ़ता रणनीतिक प्रभाव भारत के लिए सतर्कता की मांग करता रहेगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बांग्लादेश के बंदरगाहों को लेकर बदलती साझेदारियां दक्षिण एशिया की समुद्री राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम हैं। चीन का प्रभाव कितना घटेगा और भारत को कितना रणनीतिक लाभ मिलेगा, इसका जवाब आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के वास्तविक संचालन और क्षेत्रीय नीतियों से ही सामने आएगा।
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