Sunday, July 5, 2026
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छठ पूजा जाते समय सास-बहू और पोते को ट्रक ने कुचला, तीनों की दर्दनाक मौत से दहल उठा चंदौली

Chandauli Road Accident News: उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले से छठ पूजा की सुबह दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। अलीनगर थाना क्षेत्र के रेवसा गांव के पास एक तेज रफ्तार ट्रक ने सास, बहू और पोते को कुचल दिया। हादसे में तीनों की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद पूरे गांव में मातम पसर गया है।

मंगलवार की भोर करीब पांच बजे रेवसा गांव निवासी सुखराम की पत्नी कुमारी देवी (52), बहू चांदनी (27) और पोता सौरभ कुमार (7) छठ पूजा देखने निकले थे। तीनों हाईवे किनारे स्थित मेघा बाबा मंदिर में दर्शन करने के बाद पैदल ही आगे बढ़ रहे थे, तभी पीडीडीयू नगर की ओर से आ रहे एक अनियंत्रित ट्रक ने उन्हें रौंद दिया। ट्रक मंदिर और पास खड़ी बाइक को भी क्षतिग्रस्त करते हुए फरार हो गया।

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सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा। हादसे की खबर लगते ही परिजनों में कोहराम मच गया। बताया जा रहा है कि मृतक रंजीत कुमार की पत्नी चांदनी और बेटा सौरभ भी हादसे में मारे गए। रंजीत घर का इकलौता कमाने वाला सदस्य है और पेंटर का काम करता है, जबकि पिता सुखराम मजदूरी करते हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि जिस जगह हादसा हुआ है, वहां सर्विस रोड अब तक नहीं बनी है। इस मार्ग पर पहले भी आधा दर्जन लोगों की जान जा चुकी है। ग्रामीणों ने कई बार जिलाधिकारी और NHAI से शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

यह दर्दनाक हादसा न केवल एक परिवार बल्कि पूरे गांव के लिए गहरे दुख का कारण बन गया है।

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चरण स्पर्श से ऊँचा हृदय में

चरण स्पर्श से ऊँचा हृदय में
मान सम्मान व प्रेम होता है,
किसी को प्रणाम करने से
उसका आशीर्वाद मिलता है।

जो भी अच्छा करता है इंसान,
वही तो उसे वापस मिलता है,
मान करता है कोई किसी का,
उसको भी सम्मान मिलता है।

सदा सुखी रहो यह हृदय के
अंतस से ही कहा जाता है,
अपनो को ही नहीं, ग़ैरों को भी
सादर प्रणाम कहा जाता है।

स्त्री पुरुष सभी का हृदय में,
मान – सम्मान होना चाहिए,
बड़ों को सादर प्रणाम छोटों
को आशीर्वाद देना चाहिये।

यही है रीति भारत वर्ष की
और यही सद्यः सनातन है,
बड़ों को सादर प्रणाम व छोटों
को आदित्य का आशीर्वचन है।

  • डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र
    ‘आदित्य’

वार्ता में नतीजा नहीं, तनाव बरकरार: इस्तांबुल से खाली हाथ लौटे पाकिस्तान और अफगानिस्तान

“इस्तांबुल से बिना समाधान लौटी उम्मीदें: पाकिस्तान-अफगान शांति वार्ता फिर अधर में, सीमा पर बढ़ी गोलीबारी और अविश्वास की दीवारें”


इस्तांबुल (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चली तीन दिवसीय शांति वार्ता सोमवार को बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। तुर्की की मेज़बानी और क़तर की मध्यस्थता में हुई यह बातचीत दक्षिण एशिया के लिए उम्मीद की किरण मानी जा रही थी, पर अंततः यह उम्मीदें अधर में लटक गईं।

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इन वार्ताओं का उद्देश्य था 19 अक्टूबर को घोषित युद्धविराम को स्थायी बनाना और सीमा पर लगातार बढ़ रहे संघर्षों को रोकना। लेकिन चर्चाओं के बावजूद न तो कोई संयुक्त बयान जारी हुआ और न ही विश्वास की कोई नई इमारत खड़ी हो सकी।पाकिस्तानी अधिकारियों का आरोप है कि अफगान प्रतिनिधिमंडल बार-बार काबुल से निर्देश ले रहा था, जिससे वार्ता की गति धीमी पड़ गई। उन्होंने कहा कि अफगान पक्ष “निर्णय लेने की स्थिति” में नहीं था, जबकि पाकिस्तान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के खिलाफ ठोस कार्रवाई की मांग दोहराई।

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इसी बीच, पाकिस्तान सेना ने दावा किया कि बातचीत के दौरान ही सीमा पार दो बड़े घुसपैठ प्रयासों को नाकाम करते हुए 25 आतंकवादियों को मार गिराया गया। इस मुठभेड़ में पाँच पाकिस्तानी सैनिकों की भी मौत हुई, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मलेशिया में आयोजित आसियान शिखर सम्मेलन में इस संकट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह इसे “बहुत जल्द” सुलझाने की कोशिश करेंगे। उन्होंने इस्लामाबाद और काबुल के बीच चल रहे शांति प्रयासों की सराहना की और “स्थायी समाधान” की अपील की।

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तुर्की और क़तर, जिन्होंने इस वार्ता की मेज़बानी की, अब यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि संवाद पूरी तरह टूटे नहीं। क़तर के एक अधिकारी के मुताबिक, “यह प्रक्रिया कठिन है, लेकिन संवाद जारी रहना ही सबसे बड़ा संकेत है कि उम्मीद अभी जिंदा है।”विश्लेषकों के अनुसार, इस्तांबुल की वार्ता सिर्फ दो देशों के बीच संवाद नहीं थी, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता की परीक्षा थी। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों दशकों से आतंकवाद, अस्थिरता और सीमा विवादों में उलझे हैं।

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2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान को उम्मीद थी कि काबुल का रवैया उसके प्रति सहयोगी रहेगा। परंतु हुआ इसके उलट — अफगान धरती से टीटीपी के हमले और बढ़ गए, जिससे पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा फिर असुरक्षित हो गई।दोनों देशों की मांगें भी एक-दूसरे से टकराती दिखीं। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान-विरोधी आतंकवाद के लिए न होने दे, जबकि अफगान तालिबान ने पाकिस्तानी सीमा सुरक्षा के “मानवीय पहलू” पर सवाल उठाए।दरअसल, असली समस्या दोनों देशों के बीच गहरी “विश्वास की कमी” है। यही अविश्वास संवाद को आगे बढ़ने से रोकता है।

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इस बीच तुर्की और क़तर केवल मध्यस्थ नहीं, बल्कि इस्लामी दुनिया में नई कूटनीतिक धुरी के रूप में उभर रहे हैं। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि मुस्लिम राष्ट्र भी बिना पश्चिमी हस्तक्षेप के अपने मतभेद सुलझा सकते हैं।भारत के लिए यह स्थिति विशेष महत्व रखती है। एक ओर पाकिस्तान का पश्चिमी मोर्चा व्यस्त होने से पूर्वी सीमा पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन इतिहास बताता है कि पाकिस्तान अक्सर अपने आंतरिक संकटों का दोष भारत पर डालने की कोशिश करता है।

भारत ने पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान में भारी निवेश किया है — स्कूल, सड़कें, अस्पताल और संसद भवन तक। यदि अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही, तो भारत की “सॉफ्ट पावर” और मध्य एशिया तक पहुँच दोनों प्रभावित होंगी।वहीं चीन, CPEC (चीन-पाक आर्थिक गलियारा) के ज़रिए अपने प्रभाव को और मज़बूत कर रहा है और अफगानिस्तान में भी निवेश बढ़ा रहा है। इससे भारत के लिए एक नया सुरक्षा समीकरण बनता जा रहा है।

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टीटीपी और इस्लामिक स्टेट-खुरासान (IS-K) जैसे गुटों की गतिविधियाँ यदि अफगानिस्तान से नियंत्रित नहीं हुईं, तो यह भारत की सुरक्षा नीति के लिए गंभीर चुनौती होगी।इस्तांबुल संवाद का निष्कर्षहीन रहना यह दर्शाता है कि दक्षिण एशिया अभी भी पुराने अविश्वासों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं से मुक्त नहीं हो पाया है। पाकिस्तान-अफगान सीमा आज भी बारूद के ढेर पर बैठी है — बस एक चिंगारी पूरे क्षेत्र को हिला सकती है।

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भारत के लिए यही समय है कि वह संयम, कूटनीति और रणनीतिक सजगता से काम ले — न तो अति-प्रतिक्रिया, न ही निष्क्रियता।
शांति केवल वार्ता से नहीं आती, उसके लिए ईमानदारी, भरोसा और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता होती है।
इस्तांबुल संवाद भले ही निष्कर्षहीन रहा हो, लेकिन यह याद दिलाता है कि इस क्षेत्र की नियति अभी भी उसके अपने निर्णयों पर टिकी है।

जनता की अपेक्षाएँ बनाम ज़मीनी सच्चाई — 2025 का लोकतांत्रिक इम्तिहान

वादों की राजनीति से नीति की दिशा तक — बिहार की चुनौतियाँ

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के एक राज्य बिहार क़ा विधानसभा चुनाव 2025 सभी 243 सीट पर दो चरण में चुनाव होंगे। पहले चरण के लिए 6 नवंबर को और दूसरे चरण के लिए 11 नवंबर को वोटिंग होगी।वहीं, चुनाव के नतीजे 14 नवंबर को जारी किए जाएंगे, चुनाव का आयोजन ऐसे समय पर हो रहा है जब भारत का राजनीतिक- सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। राज्य में विगत दशकों से गरीबी, बेरोज़गारी, किसान समस्या, आधारभूत सुविधाओं की कमी, प्रवासन-मुद्रा जैसे कई प्रश्न बने हुए हैं।

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ऐसे में जब प्रमुख राजनीतिक दलों ने यह दावा किया है कि यदि उनकी सरकार बनेगी तो सत्ता में रहकर ‘समृद्धि -युग’ की तरह का शासन लागू करेंगे, तो यह दावा महज़ चुनावी वादा नहीं बल्कि एक रणनीतिक एवं प्रतीकात्मक प्रस्ताव भी बन गया है। इस लेख का उद्देश्य उन वादों को अंतरराष्ट्रीय अर्थों में देखना है कि ये वादे किस प्रकार समकालीन लोकतंत्र, विकास, सामाजिक न्याय तथा नीति क्रियान्वयन की चुनौतियों से टकरा रहे हैं; और उन्हें सफलता पूर्वक लागू होने की दृष्टि से कहाँ-कहाँ मुश्किलें हैं। इस बार बिहार में कुल २४३ सीटों वाली विधानसभा के लिए मतदान हो रहा है, जिसमें विभिन्न दल तथा गठबंधन बड़े पैमाने पर चुनावी मैदान में हैं।राज्य के भीतर विकास-प्रगति की पुरानी कहानियाँ भी हैं,लेकिन उन्हें अब तक पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता।

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ऐसे में जब राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं,जैसे पर्याप्त रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, घोषणाएँ पेंशन-भत्तों की, स्थानीय प्रतिनिधियों को सुविधा-आधार देना,यह महज घोषणाएँ नहीं बल्कि चुनावी विमर्श का केंद्र बन चुकी हैं। जब राजनीतिक दलों द्वारा यह कहा जाता है कि “हम ऐसा शासन लाएँगे कि ‘समृद्धि- युग जैसा होगा”, तो यह एक प्रतीकात्मक भाषा है जिसमें अपेक्षा है कि गरीबी और असमानताओं का अंत हो, सुशासन कायम हो, प्रत्येक नागरिक को अवसर मिले, सुरक्षित एवं सम्मानित जीवन मिले। भारतीय सार्वभौमिक मिथकों में,‘समृद्धि-युग उस युग को कहते हैं जहाँ धर्म, समता, न्याय पूर्ण रूप से थे। इसे राजनीतिक रंग में मोड़ना महत्वपूर्ण है,यह दर्शाता है कि दल चाहते हैं कि जनता उनसे सिर्फ सफ़ल शासन नहीं बल्कि एक प्रकार का “उत्कृष्ट शासन” अपेक्षित करती है। इस रूपक में वादों का स्वराहार है: “यदि हम सत्ता में आएँगे, तो राज्य हमारे तरीके से बदलेगा, व्यवस्था हमारी तरह बनेगी”।

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साथियों बात अगर हम चुनावी वादों क़े व्यावहारिक अर्थ को समझने की करें तो,वास्तव में, इन वादों के पीछे कुछ स्पष्ट नीतिगत बिंदु हैं,जैसे रोजगार सृजन, पंचायत सीटों का सशक्तिकरण,सामाजिक सुरक्षा, महिला -सशक्तिकरण, भूमि सुधार, शराब नीति की समीक्षा, आधारभूत सुविधाओं का विस्तार आदि। इससे यह स्पष्ट है कि प्रमुख दलों ने ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सकल विकास’ की भाषा को अपनाया है। इस अर्थ में इन वादों का स्वर अंतरराष्ट्रीय विकास व राजनीति-विज्ञान के संदर्भ से भी देखा जा सकता है,जिसमें ‘जन कल्याण’, ‘नीतिगत समावेशन’,‘भेदभाव न्यूनीकरण’ जैसे उद्देश्य शामिल हैं,हालाँकि वादे सुंदर लगते हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन सहज नहीं है। विकास-प्रबंधन, वित्तीय संसाधन की कमी, बुनियादी प्रशासनिक ढांचे की जटिलताएँ, चयन प्रक्रिया एवं भ्रष्टाचार- प्रवृत्तियाँ, राजनीतिक बदलता गठबंधन- परिस्थितियाँ ये सभी अवरोध हैं। उदाहरण स्वरूप, बिहार में अब तक विकास के वादे किए गए, लेकिन राज्य लगातार सुस्त विकास दर, उच्च प्रवासन दर व अर्थव्यवस्था की कमजोरियों से जूझ रहा है। जब एक राजनीतिक दल कहता है कि “हर परिवार को सरकारी नौकरी मिलेगी”तो यह बजट- संसाधन,भर्ती-नीति, प्रशिक्षण- संस्थान, पारदर्शिता व निष्पादन की चुनौतियों को सामने लाता है। इसी तरह, बड़ी सामाजिक-निति घोषणाएँ जैसे ‘भूमिहीनों को भूमि’ या ‘65 % आरक्षण’ केवल घोषणा ही नहीं, बल्कि विस्तृत क़ानूनी, आर्थिक, प्रशासनिक तैयारी और संभवतः संवैधानिक चुनौतियों का सटीक सामना करती हैं।

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साथियों बात अगर हम चुनावी वादों के अंतरराष्ट्रीय- सापेक्ष रूप में विश्लेषण की करें तो,दुनियाँ के विभिन्न लोकतंत्रों में भी पार्टियों द्वारा बड़े वादे करना आम बात है जैसे ‘सर्वस्व रोजगार’,‘समान अवसर’, ‘सामाजिक कल्याण राज्य’ इत्यादि। लेकिन अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दिखाता है कि वादों और वास्तविक परिणामों के बीच अक्सर एक खाई होती है।अन्तरराष्ट्रीय विश्लेषण से यह भी निकलता है कि जब कोई सरकार बड़े वायदे करती है, तो उसे ‘प्रदर्शन योग्य संकेत’ पारदर्शिता, जवाबदेही तथा समय-बद्धता की आवश्यकता होती है। उदाहरण स्वरूप, यदि घोषणाएँ इसकी समयसीमा या मापदंडों के साथ नहीं हों तो वे मात्र चुनावी घोषणा रह जाती हैं। इस दृष्टि से, बिहार के वादों को मापने योग्य लक्ष्य-रीति के साथ देखना होगा।वस्तुतः,इन वादों के माध्यम से राजनीतिक दल चुनाव में दो प्रमुख रणनीतिक धारणाएँ ले चले हैं: (१)चहुँ-मुखी कल्याण – वाद अर्थात् प्रत्यक्ष लाभ-वाद तथा (२) पहचान-वाक्य, उदाहरण के लिए ‘बिहारियत गौरव’, ‘गरीब-वर्ग की आवाज’, ‘पिछड़े/दलित/ओबीसी वर्ग का अधिकार’। यह रणनीति सिर्फ स्थानीय चुनावी भूगोल तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो “वोटोबेस की उम्मीदों का प्रबंधन”कहलाती है। जब एक दल कहता है कि यदि हम आएँगे तो राज्य का चित्र बदल जाएगा, तो यह न केवल एक राजनीतिक वादा होता है बल्कि एक प्रतीकात्मक प्रस्ताव होता है कि ‘आपका जीवन बदलेगा, आप अगली कड़ी के विकास-युग में होंगे’,इसके साथ ही, इस प्रकार के वादे यह संकेत देते हैं कि राज्य-प्रशासन, सरकार-यंत्रणा, सार्वजनिक- नीति को पुनः स्थापित किया जाएगा। अर्थात्, यह सिर्फ नया स्कीम व योजना नहीं, बल्कि ‘राजनीति-सेवा’ के स्वरूप का परिवर्तन है। उपरोक्त रूपक में “उत्कृष्ट शासन बनाना” दरअसल एक भाषा है जो कहती है: “हम पुरानी राजनीति को खत्म करेंगे, हम नया मॉडल लाएँगे”।

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साथियों बात अगर हम वादा- भाषा में “ कुशल से उत्कृष्ट शासन” की रूपक उत्तेजक है इसको समझने की करें तो, सामाजिक विज्ञान में यह देखा गया है कि बहुत ऊँची उम्मीदें एवं कम परिणाम सामाजिक -राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। इसलिए इस रूपक- उपयोग में यह सावधानी जरूरी है कि घोषणा- वाक्य के साथ कार्यान्वयन-योजना भी हो, इस पर बिहार की जनता ने जरूर ध्यान देना चाहिए। बिहार की सामाजिक-आर्थिकवास्तविकताएँ वादों की परछाई से बहुत जटिल हैं। उदाहरणार्थ: राज्य में उच्च प्रवासन दर है; युवा रोजगार पर्याप्त नहीं हैं; इसीलिए ही एक पार्टी के संस्थापक ने कहा है क़ि हमें सस्ता डेटा नहीं, अपना बेटा चाहिए, जो बाहर में नौकरियां कर रहे हैं और अभी बिहार में छठ पूजा मनाने ट्रेनों में भारी भरकम भीड़ में टॉयलेट पर बैठकर सोकर आए हैं हम उन्हें रोजगार देंगे उन्होंने उनको आव्हान किया है कि 14 तारीख तक यही रहे और हमारी पार्टी आ गई तो फैक्ट्री मालिक को संदेश भेज दें कि हमें यहां रोजगार मिल जाएगा हमें वापस नहीं आएंगे परंतु उसका कुछ रोड मैप बताया नहीं गया है।कृषि- निर्भरता अभी भी बहुत अधिक है;शिक्षा-स्वास्थ्य- आधारभूत सुविधाओं में कमी है, इन परिस्थितियों में जब वादे,जैसे “हर परिवार को नौकरी”, “भूमिहीन को भूमि”, “पंचायती प्रतिनिधि को पेंशन/बीमा” दिए जा रहे हैं, तो यह जरूरी है कि राज्यों की वित्तीय स्थिति, केंद्र-राज्य संबंध, राज्य-प्रशासन की दक्षता और निजी-क्षेत्र की भागीदारी पर गंभीर विचार किया जाए।उदाहरण स्वरूप, सरकारी नौकरी देने का वादा तभी व्यवहार्य होगा जब राज्य-सरकार योग्य संसाधन जुटा सके, भर्ती- प्रक्रिया पारदर्शी हो,और सरकारी पदों की संख्या पर्याप्त हो। इन सबमें समय,संसाधन,प्रशासनिक इच्छाशक्ति और निगरानी-यंत्रणा महत्वपूर्ण है।

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साथियों बात अगर हम ‘यदि’-का प्रश्न को लेकर इसका विश्लेषण करें तो, जितना वादा किया गया है, उतनी ही बड़ी चुनौतियाँ भी सामने हैं। यदि क्रियान्वयन में चूक हुई, तो यह वादे जनता- विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं। नीचे कुछ ‘यदि’-प्रश्न दिए जा सकते हैं,(1)यदि पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं मिले, तब कौन-से वादे प्राथमिकता के आधार पर पूरे होंगे?,(2)यदि भर्ती-नीति या भूमि- वितरण में समय-अवरोध, कानूनी चुनौतियाँ या भ्रष्टाचार हुआ, तो परिणाम क्या होंगे?,(3)यदि आर्थिक परिस्थितियाँ, जैसे वैश्विक मंदी, राजस्व-घाटा, बजट- दबाव बिगड़ गईं,तब योजनाएँ कैसे टिकेंगी?(4)यदि निगरानी तथा जवाबदेही की व्यवस्था कमजोर रही, तब जनता को भरोसा कैसे बना रहेगा? (5) यदि वादों के पूरा न होने पर राजनीतिक असंतोष बढ़ा, तो राज्य-स्थिरता पर क्या प्रभाव होगा? इसलिए हमें सार्वभौमिक तत्व एवं वैश्विक स्तरपर ध्यान देने की आवश्यकता है कि वैश्विक राजनीति -विज्ञान से हमें यह सीख मिलती है कि वादों का असर तभी दीर्घकालीन होता है जब वे संस्था-निर्माण, जवाबदेही सुधार,संसाधन संकलन एवं परिचालन दक्षता-वर्धन के साथ हों। उदाहरण स्वरूप,कई विकासोन्मुख देशों में कल्याण- राज नीतियों ने सफलता पाई है क्योंकि उन्होंने वित्तीय व प्रशासनिक स्थिरता बनाई। उसी तरह, जब किसी राज्य सरकार ने बड़े वादे किए हैं लेकिन प्रशासनिक पूर्वप्रत्यय न था, तो परिणाम कम-रूचि वाले रहे हैं। इस दृष्टि से, बिहार के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि वादे विधान-न्याय,संसाधन-वित्त,प्रशासन -सुधार और निगरानी-यंत्रणा से बंधे हों।

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अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के संदर्भ में राजनीतिक दलों द्वारा किये जा रहे वादे “उत्कृष्ट शासन” का रूपक अपनाते हुए, उन्हें केवल वादा-स्तर पर नहीं छोड़ना होगा,बल्कि उन्हें व्यवहार में लाना होगा संसाधनों, संस्था- निर्माण,उत्तरदायित्व एवं समय- बद्धता के साथ।यदि यह हुआ, तो वाकई बिहार समाज-व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा होगा। लेकिन यदि यह नहीं हुआ, तो वादों की खाली प्रतिज्ञाएँ जन उम्मीदों को निराशा में बदल सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से यह ध्यान देने योग्य है कि लोकतंत्रों में वादे-वाद और परिणाम-दान के बीच संतुलन बनाए रखना ही बड़ी भूमिका निभाता है। बिहार-विकास के इस युग में, यदि दल अपने वादों को सत्य-परक नीति-ऊर्जा में बदल दें,तो यह ‘सतयुग’ का “उत्कृष्ट शासन”अनुभव हो सकता है,नहीं तो यह सिर्फ वादा-युग ही रह जाएगा।

संकलनकर्ता लेखक-कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

500 वर्षों का इंतजार हुआ पूरा: भव्य राम मंदिर बनकर तैयार, 25 नवंबर को पीएम मोदी करेंगे ध्वजारोहण

अयोध्या (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में 500 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो गया है। अब 25 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मंदिर के मुख्य शिखर पर ध्वजारोहण करेंगे। यह वही मंदिर है, जिसका भूमि पूजन पीएम मोदी ने 5 अगस्त 2020 को किया था और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को संपन्न हुई थी।

ध्वजारोहण समारोह में आरएसएस प्रमुख भी होंगे शामिल
इस ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद रहेंगे। यह आयोजन अयोध्या में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का प्रतीक बनने जा रहा है।

नागर शैली में बना भव्य पत्थर का मंदिर
राम मंदिर का पूरा निर्माण नागर स्थापत्य शैली में पत्थरों से किया गया है। भूतल पर भगवान श्रीरामलला विराजमान हैं, जबकि प्रथम तल पर राम परिवार की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के चारों ओर 800 मीटर लंबा और 14 फीट चौड़ा परकोटा बनाया गया है, जिसमें शिवलिंग, गणपति, सूर्यदेव और माता भगवती की प्रतिमाएं स्थापित हैं।

हनुमान, अन्नपूर्णा और तुलसीदास के भी मंदिर
मंदिर परिसर की दक्षिण दिशा में हनुमान जी और उत्तर दिशा में माता अन्नपूर्णा के मंदिर बन चुके हैं। इसके अलावा परिसर में महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य, निषादराज, माता शबरी और माता अहिल्या के भी मंदिर बनाए गए हैं। तुलसीदास जी का मंदिर भी निर्माणाधीन भाग में शामिल है।

भक्तों के लिए सुविधाएं पूरी, सड़क और लैंडस्केपिंग जारी
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधाओं से जुड़ा लगभग सारा काम पूरा हो चुका है। केवल कुछ संपर्क मार्ग, लैंडस्केपिंग, और पंचवटी क्षेत्र का काम शेष है, जिसे लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और जीवर संस्था तेजी से पूरा कर रही हैं।

तीन मुख्य द्वार बन चुके, चार गेट निर्माणाधीन
मंदिर परिसर में कुल सात द्वार बनाए जा रहे हैं। तीन का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि चार पर कार्य जारी है। श्रद्धालुओं के लिए शौचालय परिसर, अतिथि गृह, ट्रस्ट ऑफिस, सभागार जैसी सभी सुविधाएं तैयार हैं।

यह ध्वजारोहण न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ऐतिहासिक है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक बनने जा रहा है।

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बिहार और बंगाल दोनों जगह वोटर लिस्ट में हैं जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर? रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार विधानसभा चुनाव के बीच जन सुराज आंदोलन के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) को लेकर बड़ा दावा सामने आया है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत किशोर न सिर्फ बिहार बल्कि पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में भी शामिल हैं।

दो राज्यों में वोटर होने का दावा
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशांत किशोर का नाम पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में भी दर्ज है। रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल में उनका पता 121 कालीघाट रोड, कोलकाता बताया गया है, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विधानसभा क्षेत्र भवानीपुर में स्थित तृणमूल कांग्रेस (TMC) का कार्यालय है।

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चुनावी हलकों में मचा हलचल
यह खुलासा ऐसे समय हुआ है जब प्रशांत किशोर बिहार में अपनी पार्टी जन सुराज के साथ सक्रिय रूप से चुनाव प्रचार कर रहे हैं। अब इस रिपोर्ट के सामने आने से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है।

प्रशांत किशोर की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल प्रशांत किशोर या उनकी पार्टी की ओर से इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, कोई व्यक्ति एक समय में केवल एक ही राज्य का मतदाता हो सकता है।

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छठ घाट पर “पोस्टर पूजा” जब भक्ति और राजनीति ने साथ लिया डुबकी

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छठ पर्व भारतीय जनमानस की सबसे पवित्र, अनुशासित और सादगीपूर्ण उपासना। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सूर्य के प्रति श्रद्धा, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और परिवार के प्रति निष्ठा का पर्व है। परंतु इस वर्ष की छठ पूजा के दृश्य देखकर यही प्रश्न उठता है कि क्या हमारी भक्ति अब भी निष्कलंक रही है, या वह भी राजनीति की परछाई में रंग चुकी है?
इस बार घाटों पर सूरज देव से पहले प्रत्याशी देवता को अर्घ्य चढ़ाया जा रहा है। पूजा की थालियों से ज्यादा चमक अब बैनर और पोस्टरों की है। कहीं लिखा है। “चौथी विनाश के लिए हमें चुनो”, तो कहीं । “दलालों से साठगांठ चाहिए तो हमें वोट दो।” अब लगता है कि मतपत्र की सुगंध भी अब घाटों तक पहुँच चुकी है। भागलपुर से लेकर देवरिया तक, हर घाट पर चुनावी माहौल का उत्सव चल रहा है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे चुनाव आयोग ने घाटों को नॉमिनेशन सेंटर घोषित कर दिया हो।
फल, फूल, प्रसाद और दूध की जगह अब बैनर, झंडे और प्रचार सामग्री ने ले ली है। कुछ प्रत्याशी तो नाव पर DJ के साथ “उग जा सूरज देव” की जगह “वोट दे तू मेरे नाम का” बजाते हुए प्रचार यात्रा निकाल रहे हैं। वहीं, दूसरे प्रत्याशी ऐसी शोभायात्रा कर रहे हैं कि जनता भ्रमित हो जाए कि यह कोई बारात है या चुनावी रैली। फर्क बस इतना कि वहां दूल्हा प्रत्याशी है और बाराती आम जनता।
स्थानीय लोगों का कहना है कि घाटों पर अब “भक्ति” नहीं, “बाहुबलीता” का मुकाबला दिख रहा है। “जिसका पोस्टर बड़ा, वही नेता पक्का” नया नारा बन गया है। गरीब प्रत्याशियों के पोस्टर तो टिकने भी नहीं दिए जाते। जगहें अब “रिज़र्व” हो गई हैं। साठगांठ और रसूखदार उम्मीदवारों के नाम पर। छठ की पवित्रता के बीच यह राजनीतिक प्रदूषण हमारी सामाजिक चेतना के लिए एक गंभीर संकेत है।
व्रतियों के सिर पर जहां गन्ना और दूध होना चाहिए, वहां अब प्रत्याशियों की तस्वीरें लटक रही हैं। घाटों की शांति अब शोरगुल में बदल गई है। भक्ति का मौन भाव अब माइक की गर्जना में दब गया है। यह दृश्य न सिर्फ हमारी आस्था का उपहास है, बल्कि यह उस लोकसंस्कृति की भी हत्या है जो सादगी और समर्पण पर टिकी थी।
फिर भी, इस विडंबना में एक व्यंग्यात्मक सच्चाई छिपी है। “लोकतंत्र की जागरूकता अब घाट तक पहुँच गई है।” जनता अब हर मंच पर राजनीति को पहचानने लगी है, चाहे वह संसद हो या पूजा स्थल। परंतु डर यही है कि जिस दिन छठ घाट पर सूरज देव के बगल में वोटिंग बूथ लग गया, उस दिन आस्था और राजनीति का फर्क सदा के लिए मिट जाएगा।
छठ पर्व हमें निस्वार्थ भाव, संयम और शुद्धता सिखाता है। यह पर्व हमें जोड़ता है न कि बांटता। इसलिए आवश्यकता है कि इस पवित्र उत्सव को राजनीतिक प्रदूषण से मुक्त रखा जाए। भक्ति को प्रचार से, श्रद्धा को स्वार्थ से और आस्था को आकर्षण से अलग रखा जाए। तभी घाटों पर फिर वही दिव्यता लौट सकेगी। जहां सूर्य की किरणों में सच्ची आस्था झलके, न कि पोस्टरों की चकाचौंध।

प्रदीप कुशवाहा -(भागलपुर)

मुरादाबाद में हैरान कर देने वाली वारदात: पत्नी ने झगड़े के बाद ब्लेड से काटा पति का गुप्तांग, हालत गंभीर

मुरादाबाद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के मझोला थाना क्षेत्र से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहां एक महिला ने झगड़े के दौरान अपने पति का गुप्तांग ब्लेड से काट दिया। लहूलुहान हालत में पति को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने पत्नी, बेटे और पुत्रवधू के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।

झगड़े के बाद दिया वारदात को अंजाम
जानकारी के अनुसार, 55 वर्षीय व्यक्ति स्थानीय फर्म में काम करता है। 24 अक्तूबर की रात करीब साढ़े 11 बजे घर पर पत्नी, बेटा और बहू से किसी बात को लेकर विवाद हो गया। आरोप है कि तीनों ने मिलकर उसकी पिटाई की और जेब से पैसे निकाल लिए। इसके बाद पत्नी उसे कमरे में खींचकर ले गई और ब्लेड से उसका गुप्तांग काट दिया।

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चीख सुनकर पहुंचे पड़ोसी, पुलिस को दी सूचना
घटना के बाद पीड़ित व्यक्ति दर्द से चीखने लगा। शोर सुनकर पड़ोसी मौके पर पहुंचे और तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने घायल व्यक्ति को जिला अस्पताल में भर्ती कराया, जहां उसकी हालत गंभीर बनी हुई है।

पुलिस ने दर्ज किया केस, जांच शुरू
एसपी सिटी कुमार रण विजय सिंह ने बताया कि पीड़ित की तहरीर पर पत्नी, बेटे और बहू के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया है। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और आरोपियों से पूछताछ की जा रही है।

घटना के बाद क्षेत्र में दहशत का माहौल
इस दर्दनाक घटना से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है। स्थानीय लोग इस घटना को पारिवारिक विवाद का नतीजा बता रहे हैं।

जब देश ने खो दिए अपने युगद्रष्टा और प्रतिभा के प्रतीक

इतिहास के पन्नों में 28 अक्टूबर का दिन केवल तिथियों का जोड़ नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जब भारत और विश्व ने कई ऐसी महान आत्माओं को खोया जिन्होंने अपने जीवन से समाज, साहित्य, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी। इन विभूतियों का निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक युग की समाप्ति था। आइए जानते हैं उन महान हस्तियों के जीवन, योगदान और उनके प्रेरणास्रोत कार्यों के बारे में—

  1. डॉ. माधवन कृष्णन नायर (2021) – कैंसर चिकित्सा के प्रणेता
    केरल राज्य के निवासी डॉ. माधवन कृष्णन नायर भारत के प्रसिद्ध ऑन्कोलॉजिस्ट थे, जिन्होंने कैंसर उपचार के क्षेत्र में अपनी असाधारण सेवाओं से देश को गौरवान्वित किया। वे क्षेत्रीय कैंसर केंद्र (Regional Cancer Centre, तिरुवनंतपुरम) के संस्थापक निदेशक रहे।
    उनका जन्म केरल के एक साधारण परिवार में हुआ, लेकिन उन्होंने अपनी शिक्षा चिकित्सा विज्ञान में उच्च स्तर तक पूरी की। एमबीबीएस और ऑन्कोलॉजी में विशेष प्रशिक्षण के बाद उन्होंने कैंसर रोगियों के लिए अत्याधुनिक उपचार सुविधाएँ विकसित कीं।
    उनके निर्देशन में आरसीसी देश का एक अग्रणी कैंसर उपचार संस्थान बना, जहां सैकड़ों मरीजों को नई जिंदगी मिली। उन्होंने न केवल चिकित्सा विज्ञान को आगे बढ़ाया बल्कि स्वास्थ्य सेवा के मानवीय मूल्यों को भी नई परिभाषा दी। 2021 में उनके निधन से चिकित्सा जगत ने एक सच्चा मार्गदर्शक खो दिया।
  2. शशिकला काकोदकर (2016) – गोवा की जननायिका
    शशिकला काकोदकर, गोवा की दूसरी मुख्यमंत्री थीं और भारतीय राजनीति में महिलाओं के नेतृत्व की मिसाल बनीं। उनका जन्म 14 जनवरी 1935 को पोंडा, गोवा में हुआ। वे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भावा साहेब काकोदकर की पुत्री थीं, जिनसे उन्हें देशभक्ति और जनसेवा की प्रेरणा मिली।
    उन्होंने गोवा की राजनीति में मराठी भाषा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1973 से 1979 तक मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने शिक्षा, पर्यटन और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में दूरगामी निर्णय लिए।
    उनकी नीतियाँ आज भी गोवा के विकास का आधार मानी जाती हैं। 28 अक्टूबर 2016 को उनके निधन के साथ गोवा ने एक ऐसी नेत्री खो दी, जिसने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया।
  3. राजेंद्र यादव (2013) – हिंदी साहित्य के संवेदनशील शिल्पकार
    हिंदी साहित्य के आधुनिक दौर के प्रमुख नाम राजेंद्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वे “हंस” पत्रिका के संपादक रहे और उन्होंने हिंदी कहानी को नए आयाम दिए।
    उनका उपन्यास “सारा आकाश” ने स्वतंत्रता के बाद के समाज में युवाओं की जद्दोजहद और रिश्तों की जटिलता को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया।
    राजेंद्र यादव न केवल कथाकार थे, बल्कि उन्होंने स्त्री विमर्श और दलित साहित्य को भी नई पहचान दिलाई।
    2013 में उनके निधन के बाद हिंदी जगत ने वह स्वर खो दिया जो सामाजिक बदलाव की चेतना को शब्द देता था। उनकी लेखनी आज भी सामाजिक समानता की मशाल जलाए हुए है।
  4. श्रीलाल शुक्ल (2011) – व्यंग्य के महारथी
    श्रीलाल शुक्ल का नाम आते ही “राग दरबारी” की याद आती है, जो हिंदी साहित्य का क्लासिक व्यंग्य उपन्यास है। उनका जन्म 31 दिसंबर 1925 को लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वे प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी सामाजिक विसंगतियों पर तीखी कलम चलाते रहे।
    “राग दरबारी” में उन्होंने भारतीय समाज की नौकरशाही, राजनीति और ग्रामीण जीवन के विडंबनापूर्ण यथार्थ को व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया।
    उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, और पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 28 अक्टूबर 2011 को उनके निधन के साथ हिंदी व्यंग्य साहित्य का स्वर्ण युग मानो थम गया।
  5. मैक्स मूलर (1900) – भारत संस्कृति के सेतु
    जर्मनी में जन्मे फ्रेडरिक मैक्स मूलर का जन्म 6 दिसंबर 1823 को डेसाऊ, जर्मनी में हुआ था। वे एक महान संस्कृतवेत्ता, प्राच्यविद्या विशेषज्ञ और लेखक थे।
    उन्होंने भारत की वैदिक संस्कृति और उपनिषदों को पश्चिमी जगत से परिचित कराने का कार्य किया। उनके संपादित “Rigveda” के अनुवाद ने यूरोप में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान और जिज्ञासा बढ़ाई।
    ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहते हुए उन्होंने भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई।
    28 अक्टूबर 1900 को उनके निधन के साथ भारतविद्या के एक युग का अंत हुआ। उनका जीवन भारत और पश्चिम के बीच सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक था।
    28 अक्टूबर केवल एक तिथि नहीं, बल्कि इतिहास के उन पन्नों में दर्ज दिन है, जब समाज ने अपने विचारक, नेता, वैज्ञानिक और लेखक खोए। इन सभी व्यक्तित्वों ने अपने-अपने क्षेत्र में ऐसी पहचान बनाई जो समय के साथ और भी प्रखर होती जा रही है। आज भी इनकी स्मृतियाँ हमें सेवा, सृजन और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।

जानें किस मूलांक के सितारे चमकेंगे आज

पंडित सुधीर तिवारी की भविष्यवाणी

अंक ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति का भविष्य उसके मूलांक (Birth Root Number) पर निर्भर करता है, जो जन्म तिथि से ज्ञात होता है। आज का दैनिक अंक राशिफल आपके दिनभर की सफलता, रिश्ते, करियर, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति का संकेत देता है। तो आइए जानते हैं — 28 अक्टूबर 2025 का अंक ज्योतिष आपके लिए क्या संदेश लेकर आया है।

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🔢 कैसे जानें अपना मूलांक
अगर आपका जन्म 23 अप्रैल को हुआ है, तो 2+3 = 5 आपका मूलांक होगा।
अगर जन्मतिथि 11 है, तो 1+1 = 2 होगा।
जन्म तिथि, माह और वर्ष का योग भाग्यांक कहलाता है।
जैसे – 22/04/1996 → 2+2+0+4+1+9+9+6 = 33 → 3+3 = 6 (भाग्यांक 6)
🌞 आज का अंक राशिफल — 28 अक्टूबर 2025

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मूलांक 1 (1, 10, 19, 28 जन्म वाले)
दिन नई शुरुआतों के लिए अनुकूल रहेगा। अतीत की कोई बात फिर सामने आ सकती है। काम का दबाव घटेगा। धैर्य बनाए रखें।
शुभ अंक: 5 | शुभ रंग: हरा
मूलांक 2 (2, 11, 20, 29)
भाग्य का साथ मिलेगा। निवेश से लाभ होगा, जिससे कोई नया वाहन या संपत्ति खरीद सकते हैं। रिश्तों में संतुलन बनाए रखें।
शुभ अंक: 22 | शुभ रंग: ग्रे

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मूलांक 3 (3, 12, 21, 30)
प्रेम जीवन में मधुरता बढ़ेगी। यात्रा लाभदायक रहेगी। छात्रों को शुभ समाचार मिल सकता है।
शुभ अंक: 15 | शुभ रंग: पीला
मूलांक 4 (4, 13, 22, 31)
विवाह में रुकावटें खत्म होंगी। पुराना मित्र पुनः संपर्क में आ सकता है। काम और परिवार में तालमेल रखें।
शुभ अंक: 22 | शुभ रंग: ग्रे

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मूलांक 5 (5, 14, 23)
करियर को लेकर थोड़ी चिंता रहेगी, लेकिन आत्मविश्वास बनाए रखें। सेहत पर ध्यान देना जरूरी है।
शुभ अंक: 27 | शुभ रंग: क्रीम
मूलांक 6 (6, 15, 24)
व्यापार में मंदी से तनाव रहेगा। घर-परिवार का साथ मिलेगा। खर्च बढ़ सकता है। सहकर्मियों से तालमेल बनाकर चलें।
शुभ अंक: 12 | शुभ रंग: हरा

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मूलांक 7 (7, 16, 25)
छात्रों को नई जगह घूमने का अवसर मिलेगा। पुराने परिचितों से भेंट होगी। कार्य में लापरवाही से बचें।
शुभ अंक: 42 | शुभ रंग: गोल्डन
मूलांक 8 (8, 17, 26)
दिन शुभ समाचार से आरंभ होगा। नई नौकरी या प्रमोशन का संकेत मिल सकता है। व्यापार में विस्तार के अवसर हैं।
शुभ अंक: 7 | शुभ रंग: गुलाबी

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मूलांक 9 (9, 18, 27)
कार्यस्थल पर अनुशासन जरूरी रहेगा। अति उत्साह से बचें। रिश्तों में मिठास बनाए रखें।
शुभ अंक: 4 | शुभ रंग: केसरिया

🕉️ पंडित सुधीर तिवारी कहते हैं:
“अंक शास्त्र हमें यह समझने में मदद करता है कि किस दिशा में हमारे सितारे हमारा साथ दे रहे हैं। उचित निर्णय लेने से भाग्य भी आपके पक्ष में आ सकता है।”

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⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer):
यह अंक ज्योतिष विश्लेषण सामान्य गणनाओं और मान्यताओं पर आधारित है। यह किसी भी धार्मिक या वैज्ञानिक प्रमाण का दावा नहीं करता। अपने व्यक्तिगत भविष्यफल के लिए किसी योग्य ज्योतिष या कुंडली विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

जीव विज्ञान में सफलता का श्रेयकर मंत्र: कब और कैसे करें तैयारी, जानिए परीक्षा की जीत का सही तरीका

परीक्षा नजदीक आते ही विद्यार्थियों के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यही रहता है — “कैसे करें जीव विज्ञान की तैयारी, किस विषय से शुरुआत करें और कब पढ़ना होगा ताकि अच्छे अंक मिल सकें?”
जीव विज्ञान (Biology) एक ऐसा विषय है जिसमें केवल रटना नहीं, बल्कि समझना, याद रखना और लिखना — तीनों का संतुलन आवश्यक है। सही समय पर, सही रणनीति के साथ पढ़ाई शुरू करना ही सफलता का श्रेयकर मार्ग है।


🔹 कब करें शुरुआत

जीव विज्ञान की तैयारी परीक्षा से कम से कम तीन महीने पहले शुरू करनी चाहिए। इस समयावधि में विद्यार्थी पूरे सिलेबस को चरणबद्ध तरीके से पूरा कर सकते हैं। शुरुआत में मूलभूत अध्यायों को ध्यान से पढ़ें और धीरे-धीरे कठिन विषयों की ओर बढ़ें।
अगर विद्यार्थी प्रतिदिन 2 से 3 घंटे नियमित रूप से जीव विज्ञान के लिए समय निकालते हैं, तो परीक्षा के समय दबाव नहीं बनता और दोहराव (Revision) के लिए भी पर्याप्त समय बचता है।


🔹 किस विषय से करें शुरुआत

शुरुआत हमेशा आधारभूत विषयों से करें — जैसे कोशिका संरचना (Cell Structure), वर्गीकरण (Classification of Organisms), आनुवंशिकी (Genetics) और पर्यावरण विज्ञान (Ecology)।
इसके बाद धीरे-धीरे मानव शरीर क्रिया विज्ञान (Human Physiology), पादप शरीर विज्ञान (Plant Physiology) और सूक्ष्मजीव विज्ञान (Microbiology) जैसे विस्तार वाले विषयों को शामिल करें।
हर अध्याय के साथ आरेख (Diagrams) को बार-बार बनाकर अभ्यास करें — यह न केवल याददाश्त मजबूत करता है बल्कि उत्तर पुस्तिका को आकर्षक बनाता है।


🔹 कैसे करें पढ़ाई श्रेयकर तरीके से

  1. समझें, रटें नहीं: प्रत्येक टॉपिक को जीवन से जोड़कर समझने की कोशिश करें।
  2. पिछले वर्ष के प्रश्नपत्रों का अभ्यास करें: इससे परीक्षा पैटर्न और प्रश्नों की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।
  3. रीविजन टाइम-टेबल बनाएं: हर हफ्ते एक बार पुराना पाठ दोहराएं।
  4. सुबह का समय चुनें: सुबह के समय पढ़ाई करने से दिमाग तरोताज़ा रहता है और याददाश्त बेहतर होती है।

🔹 समय प्रबंधन है सफलता की चाबी

हर दिन के 24 घंटों में से कम से कम 3 घंटे जीव विज्ञान को दें — जिसमें 2 घंटे पढ़ाई और 1 घंटा आरेख या प्रश्न अभ्यास के लिए रखें।
हर रविवार को छोटा टेस्ट लें — इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा और कमजोरियों का पता चलेगा।

“सफलता का मंत्र: परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए कब और कैसे करें पढ़ाई की शुरुआत”

📚 राष्ट्र की परम्परा ।
परीक्षा का नाम सुनते ही हर विद्यार्थी के मन में उत्साह और हल्की-सी घबराहट दोनों एक साथ जाग उठती हैं। हर छात्र चाहता है कि वह अच्छे अंक लाकर अपने परिवार, शिक्षकों और खुद का नाम रोशन करे। लेकिन सवाल यह उठता है — पढ़ाई की शुरुआत कब करें और तैयारी कैसे करें ताकि सफलता निश्चित हो?

परीक्षा में अच्छे अंक लाने का कोई जादुई तरीका नहीं होता, बल्कि इसके पीछे होती है समय पर तैयारी, अनुशासन, और सही रणनीति। आइए जानते हैं वे महत्वपूर्ण कदम, जो हर छात्र को अपनाने चाहिए 👇

🕒 1. सही समय पर करें शुरुआत

परीक्षा की तैयारी आखिरी समय में नहीं बल्कि पूरे सत्र के दौरान निरंतर की जानी चाहिए। जो छात्र सत्र के पहले महीने से ही रोज़ाना 2 से 3 घंटे विषयवार पढ़ाई शुरू करते हैं, वे परीक्षा से पहले सिर्फ पुनरावृत्ति (Revision) में अपना समय लगा पाते हैं। इससे तनाव भी कम रहता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

📘 2. विषयवार योजना बनाएं

हर विषय की अपनी अलग प्रकृति होती है —

गणित और विज्ञान: रोज़ाना अभ्यास जरूरी।

हिंदी और अंग्रेज़ी: व्याकरण और लेखन पर ध्यान दें।

सामाजिक विज्ञान: तारीख़ें और घटनाएँ याद रखने के लिए चार्ट बनाएं।
हर विषय के लिए साप्ताहिक लक्ष्य तय करें और उसे पूरा करने की आदत डालें।

📑 3. नोट्स और पिछले साल के प्रश्नपत्रों का उपयोग करें

स्वयं के बनाए हुए संक्षिप्त नोट्स सबसे प्रभावी साधन होते हैं। साथ ही, पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र हल करने से यह अंदाज़ा मिलता है कि किस टॉपिक पर ज़्यादा प्रश्न पूछे जाते हैं।

⏰ 4. समय प्रबंधन सीखें

परीक्षा के दौरान कई छात्र जानकार होते हुए भी समय के अभाव में अच्छा नहीं लिख पाते। मॉक टेस्ट देकर अपनी स्पीड और लेखन क्षमता का अभ्यास करें।

💡 5. मनोबल और स्वास्थ्य रखें मजबूत

अच्छे अंक लाने के लिए सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और शारीरिक स्वास्थ्य भी उतने ही ज़रूरी हैं। पर्याप्त नींद लें, पौष्टिक आहार खाएं और नियमित व्यायाम करें।

🎯 निष्कर्ष

अच्छे अंक लाने का रहस्य सिर्फ “किताबें रटना” नहीं बल्कि “स्मार्ट स्टडी” करना है। जो छात्र अपनी पढ़ाई को नियमित, योजनाबद्ध और आत्मविश्वास के साथ करते हैं, सफलता उन्हीं के कदम चूमती है।

ATS की बड़ी कार्रवाई: संदिग्ध आतंकी जुबेर हंगरकर UAPA के तहत गिरफ्तार

पुणे (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। महाराष्ट्र एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने आतंकी गतिविधियों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए पुणे से संदिग्ध आतंकी जुबेर हंगरकर को गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी 27 अक्टूबर को की गई और आरोपी पर गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम – UAPA, 1967 के तहत केस दर्ज किया गया है।

सूत्रों के अनुसार, जुबेर हंगरकर की गिरफ्तारी 9 अक्टूबर 2025 को पुणे के कोंडवा इलाके में हुई एटीएस की बड़ी छापेमारी से जुड़े मामले में हुई है। उस दौरान एटीएस ने कई ठिकानों पर एक साथ सर्च ऑपरेशन चलाया था, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, संदिग्ध दस्तावेज और कट्टरपंथी साहित्य बरामद किया गया था।

छापेमारी से मिले अहम सुराग
एटीएस अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान बरामद डिजिटल सबूतों और दस्तावेजों से कई महत्वपूर्ण सुराग मिले, जिनसे जुबेर हंगरकर की भूमिका सामने आई। जांच में उसके संपर्क संदिग्ध पाए जाने के बाद उसे गिरफ्तार किया गया।

पूछताछ में जुटी एटीएस टीम
एटीएस अब आरोपी से पूछताछ कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वह किसी आतंकी संगठन से जुड़ा है या नहीं। अधिकारियों को शक है कि हंगरकर के अंतरराष्ट्रीय या देश के अंदर किसी कट्टरपंथी नेटवर्क से संबंध हो सकते हैं।

सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर
इस गिरफ्तारी के बाद पुणे समेत पूरे महाराष्ट्र में सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड में आ गई हैं। एटीएस की यह कार्रवाई राज्य में आतंकी साजिशों को शुरुआती स्तर पर ही नाकाम करने की दिशा में बड़ी कामयाबी मानी जा रही है।

भारत का ‘MUM-T’ परीक्षण सफल, दुश्मन पाकिस्तान में मचा हड़कंप! त्रिशूल युद्धाभ्यास से पहले वायुसेना ने दिखाई ताकत

Indian Army: भारत ने अपनी रक्षा क्षमता में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। भारतीय वायुसेना और डीआरडीओ ने मिलकर अरब सागर में एडवांस्ड “MUM-T” (Manned-Unmanned Teaming) का सफल परीक्षण किया है। यह परीक्षण त्रिशूल युद्धाभ्यास से ठीक पहले हुआ है, जिससे पाकिस्तान के खेमे में खलबली मच गई है।

‘इंडियन डिफेंस न्यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस हाई-टेक युद्धाभ्यास में स्वदेशी फाइटर जेट तेजस ने दो अनमैन्ड एयर व्हीकल्स (UAVs) के साथ मिलकर टारगेट को सटीकता से तबाह किया। यह पहली बार है जब भारत ने इतनी उन्नत मैन्ड-अनमैन्ड नेटवर्किंग तकनीक का सफल प्रदर्शन किया है।

कैसे हुई MUM-T की सफलता

इस एक्सरसाइज की सबसे बड़ी खासियत रही कि तेजस और यूएवी के बीच रियल-टाइम नेटवर्किंग और ऑटोनोमस कंट्रोल सिस्टम ने बेहतरीन तालमेल दिखाया। एक ही कमांड और कंट्रोल सिस्टम से निर्देश मिलते ही फाइटर जेट और ड्रोन ने समन्वित तरीके से लक्ष्य को ध्वस्त कर दिया। यह तकनीक भविष्य के AI-आधारित युद्ध अभियानों के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

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त्रिशूल युद्धाभ्यास से पहले भारत का दम

30 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा ‘त्रिशूल युद्धाभ्यास’ 12 दिनों तक चलेगा। इसमें भारतीय थल सेना, वायुसेना और नौसेना एक साथ भाग लेंगी। यह अभ्यास पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान बॉर्डर) के पास रेगिस्तानी और क्रीक क्षेत्रों में होगा। इस अभ्यास का उद्देश्य तीनों सेनाओं के बीच संयुक्त संचालन क्षमता को मजबूत करना है।

भारत का संदेश पाकिस्तान को

भारत पहले भी ऑपरेशन सिंदूर जैसे मिशनों के जरिए पाकिस्तान को करारा जवाब दे चुका है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद इस ऑपरेशन में 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए थे और 9 आतंकी ठिकाने तबाह किए गए थे। अब MUM-T परीक्षण और त्रिशूल अभ्यास यह संदेश दे रहे हैं कि भारत हर मोर्चे पर तैयार है और कोई भी दुश्मन उसकी तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकता।

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4000 एकल विद्यालयों में जल्द तैनात होंगे शिक्षक, बेसिक शिक्षा विभाग ने शासन को भेजा प्रस्ताव

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग ने प्रदेश के 4000 एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में नए शिक्षकों की तैनाती के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा है। विभाग का उद्देश्य है कि किसी भी प्राथमिक विद्यालय में सिर्फ एक शिक्षक न रहे।

शिक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यूपी में 9508 एकल शिक्षक वाले स्कूल हैं, जबकि 81 विद्यालयों में शून्य नामांकन दर्ज किया गया है। यह आंकड़े शैक्षणिक सत्र 2024-25 के हैं। विभाग का कहना है कि पिछले वर्ष तीन चरणों में हुए शिक्षक तबादला और समायोजन अभियान के बाद कई विद्यालयों में शिक्षकों की तैनाती कर दी गई थी।

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वर्तमान में लगभग चार हजार विद्यालय ही एकल शिक्षक वाले बचे हैं। इन स्कूलों में अब जिलों के सरप्लस शिक्षकों को समायोजित किया जाएगा। इसके लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की जाएगी, जो शिक्षकों की तैनाती की प्रक्रिया को पूरा करेगी।

विभाग का कहना है कि इस योजना के तहत शिक्षामित्रों को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि प्रत्येक विद्यालय में कम से कम एक नियमित शिक्षक का होना अनिवार्य है। वहीं, जिन विद्यालयों में तबादले के कारण शिक्षक संख्या कम हुई है, वहां पुनः तैनाती की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

इस कवायद का उद्देश्य प्रदेश के हर विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना और शिक्षक-छात्र अनुपात को संतुलित करना है।

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