राँची (राष्ट्र की परम्परा) लगातार घाटे में चल रहा एचईसी अपनी खाली पड़ी जमीन पर कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स और मॉल विकसित करने जा रहा है। इस परियोजना के लिए प्रस्तावित स्मार्ट सिटी के बगल में लगभग 28 एकड़ भूमि को चिह्नित किया जा रहा है। इस प्रस्ताव को लेकर सोमवार को एचईसी प्रबंधन और एनबीसीसी के अधिकारियों के बीच एक बैठक भी हुई, जिसमें परियोजना की संभावनाओं और कार्ययोजना पर विस्तृत चर्चा की गई।एचईसी प्रबंधन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, योजना के तहत एनबीसीसी को निर्माण कार्य के लिए भूमि क्षेत्र उपलब्ध कराने पर विचार किया जा रहा है। प्रस्तावित परियोजना में एचईसी खुद मॉल या कॉमर्शियल स्पेस का निर्माण कर सकती है अथवा एनबीसीसी के सहयोग से इसे डेवलप किया जाएगा। इससे एचईसी को नियमित आय का नया स्रोत मिलने की उम्मीद है।
यातायात जागरूकता अभियान: कोहरे में सुरक्षित सफर का दिया गया संदेश
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सड़क दुर्घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने और आमजन को सुरक्षित यातायात के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से महराजगंज पुलिस द्वारा कस्बा क्षेत्र में व्यापक यातायात जागरूकता अभियान चलाया गया। यह अभियान बुधवार को पुलिस अधीक्षक महराजगंज सोमेन्द्र मीना के निर्देशन तथा अपर पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ के मार्गदर्शन में प्रभारी यातायात एवं उनकी टीम द्वारा संचालित किया गया।
अभियान के दौरान शीतकाल में बढ़ते कोहरे और धुंध को विशेष रूप से ध्यान में रखते हुए रोडवेज बसों, निजी बसों, टेंपो, ट्रैक्टर-ट्रॉली, पिकअप सहित अन्य वाहनों की सघन जांच की गई। यातायात पुलिस ने वाहनों में फॉग लाइट की स्थिति को परखा और जहां कमी पाई गई, वहां तत्काल फॉग लाइट व रिफ्लेक्टर टेप लगवाए गए। वाहन चालकों को समझाया गया कि कोहरे में दृश्यता कम हो जाती है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है, ऐसे में फॉग लाइट और रिफ्लेक्टर उनकी तथा अन्य राहगीरों की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इसके साथ ही यातायात टीम ने चालकों को निर्धारित गति सीमा का पालन करने, हेलमेट व सीट बेल्ट के अनिवार्य उपयोग, गलत साइड से वाहन न चलाने तथा नशे की हालत में वाहन न चलाने जैसे महत्वपूर्ण यातायात नियमों की जानकारी दी। नियमों की अनदेखी करने वाले वाहनों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई भी की गई।
यातायात पुलिस ने आमजन से अपील की कि वे स्वयं यातायात नियमों का पालन करें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें, ताकि सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सके। पुलिस के इस अभियान की स्थानीय लोगों ने सराहना करते हुए इसे जनहित में एक सराहनीय पहल बताया।
कोहरे का कहर, ट्रेलर-ट्रैक्टर टक्कर में एक की मौत
घने कोहरे में ट्रेलर-ट्रैक्टर की भीषण टक्कर, ट्रैक्टर चालक की मौत; चालक फरार
मऊ (राष्ट्र की परम्परा)।उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में गुरुवार सुबह घने कोहरे के कारण एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। कोपागंज थाना क्षेत्र के शहरोज गांव के पास तमसा नदी के निकट तेज रफ्तार ट्रेलर और ट्रैक्टर की आमने-सामने की टक्कर में ट्रैक्टर चालक की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के बाद क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई और बड़ी संख्या में स्थानीय लोग घटनास्थल पर जमा हो गए।
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प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुबह करीब साढ़े पांच बजे कोहरे की वजह से दृश्यता बेहद कम थी। इसी दौरान तेज गति से आ रहे ट्रेलर ने सामने से आ रहे ट्रैक्टर को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि ट्रैक्टर चालक गंभीर रूप से घायल हो गया। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने एंबुलेंस की मदद से घायल को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कोपागंज भेजा, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
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मृतक की पहचान बब्बन यादव (45 वर्ष), पुत्र सूबेदार यादव, निवासी सलाहाबाद मोड़, थाना कोतवाली, जनपद मऊ के रूप में हुई है। बब्बन यादव रोजमर्रा के काम से ट्रैक्टर लेकर निकले थे, लेकिन घने कोहरे और तेज रफ्तार ने उनकी जान ले ली।
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हादसे के बाद ट्रेलर चालक वाहन को मौके पर छोड़कर फरार हो गया। पुलिस ने ट्रेलर को कब्जे में ले लिया है और फरार चालक की तलाश शुरू कर दी गई है। कोपागंज थानाध्यक्ष रविन्द्रनाथ राय ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया है।
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यह मऊ सड़क हादसा एक बार फिर कोहरे के मौसम में सावधानी से वाहन चलाने की जरूरत को उजागर करता है। प्रशासन ने वाहन चालकों से अपील की है कि कम दृश्यता के दौरान गति नियंत्रित रखें और यातायात नियमों का पालन करें।
पिता की बहादुरी: बेटी को बचाने 60 फीट गहरे बोरवेल में कूदा
अहमदाबाद (राष्ट्र की परम्परा)। अहमदाबाद के चांदलोडिया इलाके से साहस और इंसानियत की एक मिसाल सामने आई है। 15 दिसंबर की रात गजराज सोसायटी में जैन देरासर के पास एक पिता ने अपनी बेटी की जान बचाने के लिए 60 फीट गहरे पानी से भरे बोरवेल कुएं में छलांग लगा दी। समय पर रेस्क्यू होने से पिता और बेटी—दोनों की जान बच गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, देर रात एक बच्ची का पैर फिसल गया और वह खुले बोरवेल कुएं में गिर गई। बेटी को डूबता देख पिता ने बिना देर किए कुएं में छलांग लगा दी। घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई और लोग मदद के लिए जुट गए, लेकिन गहराई और पानी के कारण बाहर निकालना संभव नहीं हो पाया।
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सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची और रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। करीब 20 मिनट की कड़ी मशक्कत के बाद पिता और बेटी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। रेस्क्यू के तुरंत बाद दोनों को सोल सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है। डॉक्टरों के अनुसार समय पर कार्रवाई से बड़ा हादसा टल गया।
यह घटना एक पिता के निस्वार्थ प्रेम और साहस को दर्शाती है, साथ ही खुले और असुरक्षित बोरवेल कुओं को लेकर प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे देखकर लोग पिता की बहादुरी की सराहना कर रहे हैं।
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ग्लोबल साउथ में भारत की बढ़ती भूमिका का प्रतीक बना इथियोपिया का सम्मान
इथियोपिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत-अफ्रीका मित्रता को मिला वैश्विक सम्मान
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक और ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ है। अफ्रीकी महाद्वीप के प्राचीन और सम्मानित राष्ट्र इथियोपिया ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया” से सम्मानित किया है। यह सम्मान केवल किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि भारत-इथियोपिया के सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों, साझा संघर्षों और भविष्य की साझेदारी को समर्पित माना जा रहा है।
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इथियोपिया की राजधानी पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का भव्य और आत्मीय स्वागत किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. अबी अहमद अली एयरपोर्ट पर उन्हें रिसीव करने पहुंचे। इसके बाद पीएम मोदी ने फ्रेंडशिप पार्क और साइंस म्यूजियम का भ्रमण किया, जो दोनों देशों के सांस्कृतिक और तकनीकी सहयोग का प्रतीक माने जाते हैं। प्रधानमंत्री ने इस पूरे अनुभव को “अविस्मरणीय” बताते हुए इथियोपियाई जनता के प्रेम और अपनत्व के लिए आभार व्यक्त किया।
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सम्मान स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह पुरस्कार उन अनगिनत भारतीयों का सम्मान है जिन्होंने वर्षों से भारत-इथियोपिया संबंधों को मजबूत किया। उन्होंने 1896 के ऐतिहासिक संघर्ष में सहयोग देने वाले गुजराती व्यापारियों, इथियोपिया की स्वतंत्रता के लिए लड़े भारतीय सैनिकों, तथा शिक्षा और निवेश के क्षेत्र में योगदान देने वाले भारतीय शिक्षकों और उद्योगपतियों का विशेष उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह सम्मान इथियोपिया के उन नागरिकों का भी है जिन्होंने भारत पर विश्वास किया।
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प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मित्र प्रधानमंत्री अबी अहमद के नेतृत्व की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आज जब पूरी दुनिया ग्लोबल साउथ की ओर देख रही है, तब इथियोपिया की स्वाभिमान, स्वतंत्रता और आत्मगौरव की परंपरा सभी देशों के लिए प्रेरणा है। पर्यावरण संरक्षण, समावेशी विकास और विविधता में एकता जैसे विषयों पर इथियोपिया के प्रयासों को उन्होंने वैश्विक उदाहरण बताया।
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प्रधानमंत्री ने शिक्षा को किसी भी राष्ट्र की आधारशिला बताते हुए कहा कि भारत और इथियोपिया के रिश्तों में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम रही है। भारतीय शिक्षकों ने इथियोपिया की कई पीढ़ियों के निर्माण में योगदान दिया है, जो दोनों देशों के संबंधों की मजबूत नींव है।
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यह सम्मान न केवल प्रधानमंत्री मोदी की वैश्विक नेतृत्व छवि को और सुदृढ़ करता है, बल्कि भारत-अफ्रीका सहयोग को भी नई ऊंचाई प्रदान करता है।
बक्सर को 43.38 करोड़ का मेगा स्पोर्ट्स स्टेडियम, युवाओं के सपनों को मिलेगी उड़ान
43.38 करोड़ की सौगात: बक्सर को मिलेगा अत्याधुनिक राज्य स्तरीय स्टेडियम, खेल उपेक्षा का होगा अंत
बक्सर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) जिले के खिलाड़ियों और खेलप्रेमियों के लिए एक ऐतिहासिक खबर सामने आई है। वर्षों से खेल सुविधाओं की अनदेखी झेल रहे बक्सर को अब राज्य सरकार ने बड़ी सौगात दी है। 43.38 करोड़ रुपये की लागत से बक्सर के आईटीआई मैदान में एक अत्याधुनिक राज्य स्तरीय स्टेडियम के निर्माण का प्रस्ताव मंजूरी के अंतिम चरण में है। यह स्टेडियम न केवल जिले के खिलाड़ियों के सपनों को पंख देगा, बल्कि बक्सर को बिहार के प्रमुख खेल केंद्रों में स्थापित करेगा।
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प्रस्तावित मेगा स्टेडियम का निर्माण बिहार स्टेट बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, स्टेडियम का डिजाइन आधुनिक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। इसमें ट्रैक एंड फील्ड के साथ-साथ क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी, वॉलीबॉल जैसे लोकप्रिय खेलों के लिए अलग-अलग सुविधाएं होंगी।
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खिलाड़ियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्टेडियम परिसर में हॉस्टल, अत्याधुनिक फिटनेस सेंटर, फ्लडलाइट सिस्टम और अंडरग्राउंड ड्रेनेज की व्यवस्था की जाएगी, ताकि किसी भी मौसम में खेल गतिविधियां बाधित न हों। मुख्यमंत्री की हालिया प्रगति यात्रा के दौरान उठी स्टेडियम की मांग अब धरातल पर उतरती दिख रही है।
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परियोजना की अंतिम रूपरेखा तैयार है और बिडिंग प्रक्रिया जारी है। टेंडर पूरा होते ही निर्माण कार्य तेज़ी से शुरू होने की संभावना है। इस स्टेडियम के बनने से बक्सर के उभरते खिलाड़ियों को अपने जिले में ही उच्च स्तरीय प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं का अवसर मिलेगा, जिससे उन्हें बाहर पलायन नहीं करना पड़ेगा।
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खेल आयोजनों के जरिए बक्सर में खेल पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। बाहर से आने वाले खिलाड़ियों, दर्शकों और अधिकारियों से स्थानीय होटल, परिवहन और व्यवसाय को नई गति मिलेगी। यह स्टेडियम बक्सर के खेल इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा और जिले को नई पहचान दिलाएगा।
आत्महत्या मामले में आर्थिक दबाव की भूमिका की पड़ताल तेज
मुजफ्फरपुर आत्महत्या मामला: CID जांच शुरू, गुंडा बैंक व अवैध वसूली एंगल पर फोकस
मुजफ्फरपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)मुजफ्फरपुर जिले के सकरा थाना क्षेत्र अंतर्गत नवलपुर मिश्रौलिया में सामने आए हृदयविदारक सामूहिक आत्महत्या कांड ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। अमरनाथ राम और उनकी तीन बेटियों द्वारा आत्महत्या किए जाने के मामले की जांच अब CID ने अपने हाथ में ले ली है। पुलिस महानिदेशक विनय कुमार के निर्देश पर सीआईडी की विशेष टीम को मुजफ्फरपुर भेजा गया है, जिसने घटनास्थल पहुंचकर जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
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CID की यह टीम डीएसपी स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में काम कर रही है। जांच केवल घटनास्थल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पीड़ित परिवार की सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों की भी गहन पड़ताल की जाएगी। पुलिस यह जानने की कोशिश कर रही है कि परिवार पर किसी तरह का कर्ज, मानसिक दबाव, अवैध वसूली या सूदखोरी तो नहीं थी।
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डीजीपी विनय कुमार ने स्पष्ट किया है कि यह भी जांच का अहम हिस्सा होगा कि पीड़ित परिवार को केंद्र या राज्य सरकार की किसी कल्याणकारी योजना का लाभ मिला था या नहीं। साथ ही, मुजफ्फरपुर जिला पुलिस को सीआईडी जांच में पूर्ण सहयोग देने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि किसी भी स्तर की लापरवाही या आपराधिक भूमिका सामने आने पर सख्त कार्रवाई की जा सके।
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इस घटना के बाद राज्य सरकार ने गुंडा बैंक और अवैध सूदखोरी के खिलाफ अपने सख्त रुख को दोहराया है। गृह मंत्री सम्राट चौधरी पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि बिहार से गुंडा बैंक का खात्मा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। सरकार का मानना है कि ऐसी अवैध गतिविधियां गरीब और कमजोर वर्ग को मानसिक व आर्थिक रूप से तोड़ देती हैं।
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नवलपुर मिश्रौलिया की इस घटना ने प्रशासन को और अधिक सतर्क कर दिया है। अब सबकी नजर CID की जांच रिपोर्ट पर टिकी है, जिससे इस दर्दनाक मामले की असल वजह सामने आ सके।
कोहरे की मार से दिल्ली-हावड़ा रूट सबसे ज्यादा प्रभावित
घने कोहरे का असर: दिल्ली-एनसीआर में ट्रेन सेवाएं चरमराईं, 25 से ज्यादा गाड़ियां घंटों लेट
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)दिल्ली-एनसीआर ट्रेन लेट खबर
दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत में सर्दी के साथ बढ़ते कोहरे का सीधा असर रेल यातायात पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। भले ही दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से कोहरा अपेक्षाकृत कम रहा हो, लेकिन पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में घना कोहरा अभी भी ट्रेनों की रफ्तार पर ब्रेक लगाए हुए है। इसी कारण दिल्ली से चलने वाली और दिल्ली आने वाली 25 से अधिक ट्रेनें अपने निर्धारित समय से घंटों देरी से चल रही हैं।
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रेलवे अधिकारियों के अनुसार, सबसे अधिक प्रभावित रूट दिल्ली–हावड़ा रेल मार्ग है, जहां दृश्यता कम होने के कारण ट्रेनों की गति सीमित रखनी पड़ रही है। इसी वजह से रीवा आनंद विहार एक्सप्रेस, न्यू दिल्ली तेजस राजधानी, फरक्का एक्सप्रेस और कैफियत एक्सप्रेस जैसी प्रमुख ट्रेनें 5 से 9 घंटे तक लेट हो चुकी हैं। ऊंचाहार एक्सप्रेस करीब 9 घंटे की देरी से चल रही है, जबकि फरक्का और कैफियत एक्सप्रेस भी लगभग 8 घंटे पीछे हैं।
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यात्रियों को सबसे ज्यादा परेशानी लंबी दूरी की सुपरफास्ट और मेल एक्सप्रेस ट्रेनों में हो रही है। रेलवे ने सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई सेक्शन में फॉग सेफ्टी डिवाइस और स्पीड कंट्रोल लागू किया है, जिससे देरी और बढ़ गई है। मौसम विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों तक उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में कोहरे की स्थिति बनी रह सकती है, ऐसे में ट्रेन संचालन पर असर जारी रहने की संभावना है।
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रेलवे ने यात्रियों से अपील की है कि स्टेशन पहुंचने से पहले ट्रेन का लेटेस्ट स्टेटस जरूर चेक करें और अतिरिक्त समय लेकर ही यात्रा की योजना बनाएं।
गुमशुदा बालक को 4 घंटे के भीतर बरामद किया गया
कोतवाली पुलिस की तत्परता से परिजनों को सकुशल सौंपा गया बच्चा
गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)
कोतवाली थाना क्षेत्र में गुमशुदा हुए 15 वर्षीय बालक को पुलिस ने महज चार घंटे के भीतर सकुशल बरामद कर उसके परिजनों को सौंप दिया। पुलिस की त्वरित कार्रवाई से परिजनों ने राहत की सांस ली और कोतवाली पुलिस की कार्यशैली की सराहना की।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 16 दिसंबर 2025 को शाम करीब 5:30 बजे थाना कोतवाली पर सूचना मिली कि एक 15 वर्षीय बालक सुबह करीब 10:30 बजे अपने घर से बिना बताए कहीं चला गया है। परिजनों द्वारा काफी खोजबीन किए जाने के बावजूद जब बालक का कोई पता नहीं चला तो पुलिस को सूचना दी गई।
सूचना मिलते ही प्रभारी निरीक्षक कोतवाली छत्रपाल सिंह ने पुलिस टीम के साथ तत्काल कार्रवाई शुरू की। आसपास के क्षेत्रों में तलाश, संभावित स्थानों पर पूछताछ और सक्रिय खोज के परिणामस्वरूप पुलिस टीम ने गुमशुदा बालक को महज चार घंटे के भीतर सकुशल बरामद कर लिया।
बरामदगी के बाद बालक को उसके परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया। बच्चे को सुरक्षित पाकर परिजनों ने पुलिस का आभार व्यक्त किया। पुलिस की तत्परता और संवेदनशीलता से एक परिवार को बड़ी राहत मिली है।
घना कोहरा बना चुनौती, यातायात ठप
दृश्यता 10 मीटर तक घटी, किसानों के लिए वरदान बना मौसम
सलेमपुर/देवरिया।
बुधवार सुबह सलेमपुर नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में अचानक घने कोहरे ने दस्तक दी, जिससे पूरा इलाका कोहरे की मोटी चादर में लिपटा नजर आया। कोहरे की तीव्रता इतनी अधिक रही कि सड़कों पर दृश्यता घटकर महज 10 मीटर तक सीमित हो गई। हालात ऐसे थे कि सामने चल रहे वाहन भी मुश्किल से दिखाई दे रहे थे, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
मौसम विभाग के अनुसार, बुधवार सुबह जिले का न्यूनतम तापमान 8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। साथ ही विभाग ने अगले तीन दिनों तक घने कोहरे की संभावना को देखते हुए अलर्ट जारी किया है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पछुआ हवाओं के कमजोर पड़ने और नमी बढ़ने के कारण कोहरे का असर और बढ़ सकता है।
घने कोहरे का सबसे अधिक असर यातायात व्यवस्था पर देखने को मिला। राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य मार्गों तथा प्रमुख संपर्क सड़कों पर वाहन रेंगते नजर आए। वाहन चालकों को अत्यधिक सतर्कता बरतनी पड़ी। दुर्घटनाओं से बचाव के लिए अधिकांश चालकों ने डिपर, इंडिकेटर और फॉग लाइट का सहारा लिया। कई स्थानों पर दृश्यता शून्य के करीब होने के कारण चालकों ने वाहनों को सड़क किनारे रोकना ही सुरक्षित समझा, जिससे कुछ समय के लिए आवागमन भी बाधित हुआ।
वहीं दूसरी ओर, इस घने कोहरे से ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों में खुशी की लहर देखी गई। किसानों का कहना है कि यह मौसम गेहूं की फसल के लिए बेहद अनुकूल है। किसान शशिकांत मिश्र, रामप्रवेश यादव, निखिल द्विवेदी, गोरखनाथ द्विवेदी, सच्चिदानंद द्विवेदी और बीरबल गौण सहित अन्य किसानों ने बताया कि कोहरे की नमी से खेतों में पर्याप्त आद्रता बनी रहती है, जिससे गेहूं के कल्लों का बेहतर विकास होता है। इससे पैदावार बढ़ने की उम्मीद भी प्रबल होती है।
कुल मिलाकर, जहां घना कोहरा आम जनजीवन और यातायात के लिए परेशानी का सबब बना, वहीं किसानों के लिए यह प्राकृतिक वरदान साबित हो रहा है। प्रशासन और यातायात विभाग ने लोगों से अपील की है कि कोहरे के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचें और बेहद सावधानी के साथ वाहन चलाएं।
संविधान मानव की रचना, परमात्मा सृष्टि का आधार
कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मानव सभ्यता के इतिहास में जब भी समाज ने संगठित रूप लेना शुरू किया, तब नियम, आचार और नैतिकता की आवश्यकता महसूस हुई। इसी आवश्यकता से संविधान का जन्म हुआ, जबकि नैतिकता और जीवन-मूल्यों की जड़ें परमात्मा की अवधारणा में निहित मानी जाती हैं। संविधान और परमात्मा—दोनों मानव जीवन के मार्गदर्शक हैं, किंतु दोनों की प्रकृति, भूमिका और प्रभाव-क्षेत्र भिन्न हैं। जहां संविधान मानव की बुद्धि, अनुभव और सामाजिक जरूरतों की रचना है, वहीं परमात्मा उस सृष्टि का आधार है, जिसे मानव न तो बना सकता है और न ही पूर्ण रूप से परिभाषित कर सकता है। संविधान किसी भी राष्ट्र की शासन-व्यवस्था की रीढ़ होता है। यह सत्ता के स्वरूप और उसकी सीमाओं को निर्धारित करता है तथा नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन स्थापित करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान जनता को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का आश्वासन देता है। समय के साथ समाज बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और नई चुनौतियां सामने आती हैं। ऐसे में संविधान में संशोधन की व्यवस्था उसे जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखती है। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यह भी सत्य है कि संविधान मानव निर्मित है और मानवीय समझ की सीमाओं के भीतर ही कार्य करता है। इसके विपरीत परमात्मा की अवधारणा किसी लिखित दस्तावेज या विधायी प्रक्रिया से उत्पन्न नहीं हुई। वह आस्था, अनुभूति और चेतना का विषय है। सृष्टि की उत्पत्ति, जीवन की निरंतरता, प्रकृति का संतुलन और नैतिकता के मूल सिद्धांत परमात्मा से जुड़े माने जाते हैं। जहां संविधान समाज के बाहरी ढांचे को नियंत्रित करता है, वहीं परमात्मा मनुष्य की अंतरात्मा को दिशा देता है। कानून दंड और पुरस्कार के माध्यम से व्यवहार को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन परमात्मा का विचार व्यक्ति के भीतर विवेक, आत्म-संयम और उत्तरदायित्व की भावना जगाता है। यह कहना गलत होगा कि संविधान और परमात्मा परस्पर विरोधी हैं। वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। संविधान भले ही धर्मनिरपेक्ष हो, पर उसके मूल में निहित न्याय, समानता, स्वतंत्रता, करुणा और मानव गरिमा जैसे मूल्य किसी न किसी रूप में आध्यात्मिक चेतना से ही प्रेरित हैं। वहीं परमात्मा की अवधारणा मनुष्य को सत्यनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ और सहिष्णु बनने की प्रेरणा देती है, जिससे संविधान द्वारा स्थापित व्यवस्था और अधिक मजबूत होती है।आधुनिक समय में संकट तब पैदा होता है, जब इस संतुलन को बिगाड़ दिया जाता है। कभी संविधान को ही अंतिम और सर्वोच्च सत्य मानकर नैतिकता की उपेक्षा की जाती है, तो कभी परमात्मा या धर्म के नाम पर संविधान और कानून को चुनौती दी जाती है। दोनों ही स्थितियां समाज के लिए घातक हैं। एक स्वस्थ, समरस और प्रगतिशील समाज वही है, जहां संविधान शासन और प्रशासन का मार्गदर्शक बने, और परमात्मा मानव की नैतिक चेतना का आधार। अंततः संविधान हमें यह सिखाता है कि समाज कैसे चले, जबकि परमात्मा यह बोध कराता है कि हमें कैसा इंसान बनना चाहिए। जब व्यवस्था और विवेक, कानून और करुणा, अधिकार और कर्तव्य—इन सबके बीच संतुलन स्थापित होता है, तभी समाज स्थिर, न्यायपूर्ण और मानवीय बनता है। यही संतुलन राष्ट्र की वास्तविक शक्ति और सभ्यता की पहचान है।
पत्तों की भाषा में जीवन का मंत्र, वनस्पतियों और मानव का सनातन रिश्ता
डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जब शब्द थक जाते हैं और सभ्यता मौन हो जाती है, तब प्रकृति बोलती है। उसकी यह भाषा न किसी लिपि में बंधी होती है, न किसी पुस्तक में—यह पत्तों की सरसराहट, फूलों की सुगंध और वृक्षों की छाया में महसूस की जाती है। मानव और वनस्पतियों का रिश्ता केवल उपयोग या आवश्यकता का नहीं, बल्कि अस्तित्व, संवेदना और सह- अस्तित्व का सनातन संबंध है, जो सृष्टि की पहली सांस से आज तक अनवरत चला आ रहा है। मानव सभ्यता का आरंभ ही वनस्पतियों की गोद में हुआ। आदिमानव ने जब चलना सीखा, तो पेड़ों की छाया में विश्राम पाया। जब भूख लगी, तो फल-फूल बने सहारा। जब रोगों ने घेरा, तो जड़, छाल और पत्तियों ने औषधि बनकर जीवन बचाया। आज की आधुनिक चिकित्सा पद्धति भी कहीं न कहीं उन्हीं वनौषधियों के ज्ञान पर आधारित है। इस दृष्टि से वनस्पतियां केवल प्रकृति का सौंदर्य नहीं, बल्कि मानव जीवन की मौन गुरु रही हैं। भारतीय संस्कृति में वनस्पतियों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि सजीव सत्ता के रूप में देखा गया है। पीपल, बरगद, तुलसी, नीम जैसे वृक्ष धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक—तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माने गए। पूजा-पाठ, पर्व-त्योहार, जन्म से मृत्यु तक के संस्कारों में वनस्पतियों की उपस्थिति यह संदेश देती है कि प्रकृति और मानव अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही जीवन-चक्र के हिस्से हैं। यह दृष्टिकोण हमें उपभोग नहीं, संरक्षण की सीख देता है। आज का समय इस सनातन रिश्ते के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। विकास की अंधी दौड़ में जंगलों का अंधाधुंध कटान हो रहा है, नदियां सिमटती जा रही हैं और हवा दिन-प्रतिदिन विषैली होती जा रही है। हम यह भूल गए हैं कि हर पत्ती की हरियाली हमारी सांसों की सुरक्षा है। जब जंगल उजड़ते हैं, तब केवल पेड़ नहीं कटते—मानव का भविष्य भी खतरे में पड़ जाता है। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापवृद्धि और प्राकृतिक आपदाएं इसी टूटते रिश्ते का परिणाम हैं।वनस्पतियां हमें धैर्य, सहनशीलता और निस्वार्थ भाव से देना सिखाती हैं। वे न शोर मचाती हैं, न शिकायत करती हैं, फिर भी निरंतर ऑक्सीजन, फल, छाया और जीवन देती रहती हैं। आज जब समाज स्वार्थ, उपभोग और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में फंसा है, तब पत्तों की यह मौन भाषा हमें संतुलन और संयम का पाठ पढ़ाती है। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीति या औपचारिक अभियान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक जिम्मेदारी है। एक पौधा लगाना मात्र प्रतीकात्मक कार्य नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा दायित्व है। यदि मानव ने वनस्पतियों के साथ अपने इस सनातन रिश्ते को समझ लिया, तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन संभव है। अंततः जीवन का सत्य किसी ग्रंथ के पन्नों में नहीं, बल्कि पत्तों की हरियाली में लिखा है। जो इसे पढ़ लेता है, वही जान पाता है कि मानव का भविष्य जंगलों से कटकर नहीं, बल्कि उनसे जुड़कर ही सुरक्षित और समृद्ध रह सकता है।
“मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ”: राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का अमर संदेश
काकोरी ट्रेन एक्शन अमर शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को स्मरण करते हुए नवनीत मिश्र का आलेख
भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास केवल तिथियों और घटनाओं का क्रम नहीं है, वह उन आत्माओं की गाथा है जिन्होंने हँसते-हँसते मृत्यु को गले लगाया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ सिर उठाकर जी सकें। ऐसे ही विरले क्रांतिकारियों में एक नाम है, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी। उनका जीवन, उनका संघर्ष और उनका बलिदान यह सिखाता है कि आज़ादी कोई दान नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों से उपजी चेतना है।
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी उस पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिसने याचना नहीं, प्रतिकार का मार्ग चुना। वे जानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें केवल भाषणों से नहीं हिलेंगी, उसके लिए साहसिक कार्रवाई आवश्यक है। काकोरी एक्शन इसी क्रांतिकारी सोच की परिणति था। यह केवल सरकारी खजाने की लूट नहीं थी, बल्कि उस व्यवस्था को खुली चुनौती थी जो भारत की संपदा से ही भारत को गुलाम बनाए हुए थी। इस एक्शन ने अंग्रेजी शासन को यह स्पष्ट संदेश दिया कि अब भारत में डर नहीं, दृढ़ संकल्प जन्म ले चुका है।
काकोरी के बाद दमन का चक्र तेज हुआ। गिरफ्तारी, मुकदमे और कठोर सजाएँl यह सब उस साम्राज्य की हताशा का प्रमाण था जो अपने अंत को महसूस करने लगा था। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को भी गिरफ्तार किया गया और अंततः मृत्यु-दंड सुनाया गया। लेकिन अंग्रेज यह समझ नहीं पाए कि वे किसी देह को फाँसी दे सकते हैं, विचार को नहीं।
गोंडा जेल में फाँसी से पहले का उनका आचरण भारतीय इतिहास के सबसे उज्ज्वल क्षणों में से एक है। जहाँ सामान्य मनुष्य भय से टूट जाता है, वहाँ लाहिड़ी हँसते थे। उनकी मुस्कान किसी भ्रम की उपज नहीं थी, वह उस अटूट विश्वास की अभिव्यक्ति थी कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। “मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ” यह वाक्य केवल शब्द नहीं, स्वतंत्रता के भविष्य का घोष था।
राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का बलिदान हमें यह याद दिलाता है कि आज़ादी केवल राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि आत्मसम्मान और स्वाभिमान की पुनर्प्राप्ति है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि जब राष्ट्र सर्वोपरि बन जाए, तब मृत्यु भी पराजय नहीं होती, बल्कि इतिहास में अमरता का प्रवेश-द्वार बन जाती है।
आज उनके बलिदान दिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करना है। जब भी राष्ट्र के सामने संकट आए, जब भी नैतिक साहस की परीक्षा हो, तब राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे क्रांतिकारी हमें मार्ग दिखाते हैंl निडर होकर, बिना समझौते के, सत्य और स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े होने का मार्ग।
वे सचमुच मरे नहीं। वे स्वतंत्र भारत की चेतना में, उसकी आत्मा में, उसकी हर साँस में पुनर्जन्म लेते रहे हैं और लेते रहेंगे।
भाषा की दीवार और सपनों की उड़ान?
अंग्रेज़ी शिक्षा के दबाव में ग्रामीण छात्रों की असली परीक्षा
शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा की समस्या का विवेचन करती सोमनाथ मिश्रा की विशेष रिपोर्ट
(राष्ट्र की परम्परा शिक्षा डेस्क)l ग्रामीण भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ प्रतिभा और अवसर के बीच सबसे बड़ी खाई भाषा बनती जा रही है। अंग्रेज़ी को सफलता, प्रतिष्ठा और करियर की अनिवार्य शर्त मान लिया गया है। ऐसे में वे छात्र, जिनकी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा में हुई है, प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा की दौड़ में खुद को हाशिए पर महसूस करते हैं। प्रश्न यह नहीं है कि ग्रामीण छात्र काबिल हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या अंग्रेज़ी भाषा योग्यता का अंतिम पैमाना होनी चाहिए?
ग्रामीण छात्रों पर अंग्रेज़ी शिक्षा का प्रभाव: जड़ में क्या है समस्या?
ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश स्कूलों में आज भी संसाधनों की भारी कमी है। प्रशिक्षित अंग्रेज़ी शिक्षकों का अभाव, आधुनिक लाइब्रेरी और भाषा-अनुकूल वातावरण की कमी छात्रों को शुरू से ही कमजोर स्थिति में डाल देती है। जब यही छात्र आगे चलकर UPSC, SSC, बैंकिंग, NEET, JEE या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, तो उन्हें विषय से पहले भाषा से जूझना पड़ता है।
कई बार छात्र गणित, विज्ञान या सामान्य अध्ययन की अवधारणाएँ समझ लेते हैं, लेकिन अंग्रेज़ी में पूछे गए प्रश्नों की जटिल भाषा उनका आत्मविश्वास तोड़ देती है। नतीजा—कम अंक, चयन से वंचित होना और भीतर ही भीतर यह भावना कि “शायद हम इस सिस्टम के लिए बने ही नहीं हैं।”
अंग्रेज़ी वर्चस्व और मानसिक दबाव
अंग्रेज़ी माध्यम का दबाव केवल अकादमिक नहीं, बल्कि मानसिक भी है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए छात्र अक्सर शहरी और अंग्रेज़ी माध्यम के छात्रों के बीच खुद को कमतर आंकने लगते हैं। यह हीनभावना परीक्षा हॉल तक पहुँचते-पहुँचते प्रदर्शन पर सीधा असर डालती है। कई प्रतिभाशाली छात्र केवल भाषा के डर से इंटरव्यू या मुख्य परीक्षाओं में पिछड़ जाते हैं।
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी: ग्रामीण छात्रों के लिए व्यावहारिक रणनीतियाँ
भाषा की यह दीवार स्थायी नहीं है। सही रणनीति और निरंतर प्रयास से ग्रामीण छात्र भी इसे पार कर सकते हैं।
- द्विभाषी अध्ययन सामग्री का समझदारी से चयन
हिंदी–अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध किताबें, नोट्स और गाइड्स का उपयोग करें। इससे कॉन्सेप्ट स्पष्ट होते हैं और साथ ही अंग्रेज़ी शब्दावली भी धीरे-धीरे मजबूत होती है। - रोज़ाना सीमित लेकिन निरंतर अंग्रेज़ी अभ्यास
दिन में 30–40 मिनट अंग्रेज़ी के लिए तय करें। अख़बार के छोटे लेख, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े पैराग्राफ और पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र पढ़ना बेहद उपयोगी है। - स्मार्ट टाइम मैनेजमेंट अपनाएँ
अपनी पढ़ाई को तीन हिस्सों में बाँटें—
विषय की समझ (Concept Building)
भाषा अभ्यास (Vocabulary & Comprehension)
रिवीजन और मॉक टेस्ट
यह तरीका मानसिक दबाव कम करता है और आत्मविश्वास बढ़ाता है। - डिजिटल प्लेटफॉर्म का सही इस्तेमाल
आज कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल हिंदी में कठिन विषयों को सरल अंग्रेज़ी के साथ समझाते हैं। ग्रामीण छात्रों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं। वीडियो देखकर अपने शब्दों में नोट्स बनाना सीखने की गति बढ़ाता है।
- कमजोरी स्वीकारें, खुद पर भरोसा रखें
अंग्रेज़ी कमजोर है—इस सच्चाई को स्वीकार करना हार नहीं है। धीरे-धीरे सुधार ही स्थायी समाधान है। निरंतर अभ्यास से भाषा भी मित्र बन सकती है।
नीति और व्यवस्था में बदलाव की ज़रूरत
ग्रामीण छात्रों पर अंग्रेज़ी शिक्षा का प्रभाव केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि नीतिगत चुनौती भी है। सरकार और शिक्षा संस्थानों को चाहिए कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा को बाधा नहीं, बल्कि माध्यम बनाया जाए। प्रश्नपत्रों की भाषा सरल हो, क्षेत्रीय भाषाओं के विकल्प मजबूत हों और मूल्यांकन में विषय ज्ञान को प्राथमिकता दी जाए।
जब तक ग्रामीण छात्रों को समान अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक “शिक्षा में समानता” केवल एक नारा बनकर रह जाएगी।
भाषा नहीं, प्रतिभा बने पहचान
अंग्रेज़ी का ज्ञान आज के दौर में आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन इसे प्रतिभा का एकमात्र पैमाना बना देना लाखों ग्रामीण छात्रों के सपनों के साथ अन्याय है। सही मार्गदर्शन, सुलभ संसाधन और सकारात्मक सोच के साथ ग्रामीण छात्र भी हर मंच पर अपनी क्षमता साबित कर सकते हैं।
जब भाषा की दीवार गिरेगी, तभी सपनों को असली उड़ान मिलेगी।
रहीमदास: नीति, भक्ति और मानवीय करुणा का शाश्वत स्वर
पुनीत मिश्र
“जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥”
यह दोहा केवल काव्य-सौंदर्य नहीं, बल्कि मनुष्य के चरित्र का दार्शनिक उद्घोष है। चन्दन की सुगंध जैसे सर्प के विष से दूषित नहीं होती, वैसे ही उत्तम प्रकृति वाला व्यक्ति कुसंग में पड़कर भी अपनी मूल पहचान नहीं खोता। यही जीवन-दृष्टि रहीम की कविता और व्यक्तित्व का केन्द्रीय सूत्र है।
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना, लोकप्रिय रूप में रहीमदास अकबर के नौरत्नों में एक थे। वे सेनापति थे, प्रशासक थे, विद्वान थे; पर इन सबसे ऊपर वे मनुष्य थे। सत्ता के शिखर पर रहते हुए भी उनकी दृष्टि जीवन के सूक्ष्म सत्य पर टिकी रही। यही कारण है कि उनकी कविता दरबार की शोभा बनकर नहीं रह गई, बल्कि लोक-हृदय में बस गई।
रहीम का काव्य लोकभाषा की सहजता और जीवनानुभव की गहराई से जन्मा है। उनके दोहे नीति की कठोरता को करुणा की कोमलता से संतुलित करते हैं। वे मनुष्य को मनुष्य के निकट लाते हैं, अहंकार से सावधान करते हैं, विनय का महत्व समझाते हैं और संबंधों की नाजुकता का बोध कराते हैं। “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय” जैसे दोहे आज भी रिश्तों की पाठशाला हैं।
भक्ति के क्षेत्र में रहीम का स्थान विशिष्ट है। वे श्रीकृष्ण के अनन्य साधक थे। उनकी भक्ति में संप्रदाय का संकुचित आग्रह नहीं, बल्कि प्रेम का विराट विस्तार है। कृष्ण उनके लिए आराध्य ही नहीं, जीवन-सखा हैं, ऐसा सखा जो मनुष्य की दुर्बलताओं को समझता है और उसे प्रेम से उबारता है। यही भक्ति रहीम को उदार बनाती है, उनके काव्य को समन्वयी बनाती है।
श्रृंगार की अभिव्यक्ति में भी रहीम संयमित और सुसंस्कृत हैं। उनका श्रृंगार भोग नहीं, भाव हैl आकर्षण नहीं, अनुराग है। यह संतुलन उन्हें कालजयी बनाता है। वे जीवन के तीनों आयाम, नीति, भक्ति और श्रृंगार को इस तरह साधते हैं कि कोई भी पक्ष अतिरंजित नहीं होता।
रहीम का जीवन संघर्षों से अछूता नहीं था। सत्ता का वैभव क्षणभंगुर सिद्ध हुआ, व्यक्तिगत दुखों ने उन्हें भीतर तक झकझोरा। पर इन अनुभवों ने उनके काव्य को कड़वा नहीं, बल्कि और अधिक मानवीय बनाया। शायद इसी कारण उनके शब्द आज भी सांत्वना देते हैं, दिशा दिखाते हैं।
रहीमदास की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि सच्ची महानता पद या शक्ति में नहीं, प्रकृति की शुद्धता में है। जब समय शोर से भरा हो, तब रहीम की वाणी मौन में उतरकर हमें मनुष्य बने रहने की शिक्षा देती है। यही उनकी अमरता हैl लोक में, भाषा में और मनुष्यता में।
