Wednesday, June 24, 2026
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खाद संकट से जूझ रहे किसान, पीक सीजन में समितियां खाली

बलिया( राष्ट्र की परम्परा)आलू व गेहूं की बुवाई के पीक सीजन में विकास खण्ड बैरिया एवं मुरली छपरा की किसी भी साधन सहकारी समिति पर डीएपी व यूरिया खाद उपलब्ध नहीं है। खाद की भारी मांग के बावजूद समितियों पर स्टॉक शून्य होने से क्षेत्र के किसान गहरी परेशानी का सामना कर रहे हैं। समय पर खाद न मिलने से फसलों की बुवाई और बढ़वार प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
किसानों का कहना है कि वे कई दिनों से समितियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर जगह उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है। मजबूरन किसान निजी बाजारों से डीएपी और यूरिया ऊंचे दामों पर खरीदने को विवश हैं। जहां सरकारी दर पर मिलने वाली खाद सुलभ होती, वहीं बाजार में मनमाने दाम वसूले जा रहे हैं, जिससे किसानों की लागत लगातार बढ़ती जा रही है।

नए साल पर रेल यात्रियों को बड़ा झटका या राहत? 107 ट्रेनों का बदला टाइम


क्षेत्रीय किसानों ने आरोप लगाया कि खाद की कालाबाजारी पर रोक लगाने के लिए प्रशासन द्वारा ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। निजी दुकानदारों द्वारा निर्धारित दर से अधिक मूल्य वसूला जा रहा है, फिर भी निगरानी के अभाव में यह सिलसिला जारी है। किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही समितियों पर पर्याप्त मात्रा में खाद की आपूर्ति नहीं कराई गई, तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। किसानों ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से मांग की है कि बैरिया व मुरली छपरा की सभी साधन सहकारी समितियों पर अविलंब डीएपी और यूरिया उपलब्ध कराई जाए, साथ ही कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि किसानों को राहत मिल सके।

नए साल पर रेल यात्रियों को बड़ा झटका या राहत? 107 ट्रेनों का बदला टाइम

1 जनवरी 2026 से NER की 107 ट्रेनों की समय-सारणी बदली, यात्रा से पहले जरूर जांचें नया टाइम टेबल

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)नए साल 2026 की शुरुआत के साथ ही पूर्वोत्तर रेलवे (NER) के लाखों यात्रियों के लिए एक बड़ा बदलाव लागू होने जा रहा है। रेलवे प्रशासन ने 1 जनवरी 2026 से 107 ट्रेनों की समय-सारणी में संशोधन करने का फैसला किया है। यह बदलाव खासतौर पर गोरखपुर, वाराणसी, बरेली और लखनऊ रेल मंडल से यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए बेहद अहम है। यदि आप इन रूटों पर सफर की योजना बना रहे हैं, तो टिकट बुक कराने से पहले नया टाइम टेबल देखना जरूरी हो गया है।
पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पंकज कुमार सिंह के अनुसार, यह संशोधन परिचालन सुगमता और यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया है। नई समय-सारणी के तहत कई ट्रेनों के आगमन और प्रस्थान समय में 5 मिनट से लेकर 1 घंटे तक का अंतर आया है। रेलवे का मानना है कि इससे ट्रेनों की समयपालन क्षमता बेहतर होगी और भीड़भाड़ वाले सेक्शनों पर संचालन आसान बनेगा।

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गोरखपुर जंक्शन से गुजरने वाली ट्रेनों में बदलाव
गोरखपुर जंक्शन, जो पूर्वोत्तर रेलवे का सबसे व्यस्त स्टेशन माना जाता है, वहां से गुजरने और प्रस्थान करने वाली कई प्रमुख एक्सप्रेस ट्रेनों के समय बदले गए हैं।
जैसे अमृतसर–सहरसा एक्सप्रेस, ग्वालियर–बरौनी एक्सप्रेस, गोमती नगर–छपरा एक्सप्रेस, दिल्ली–सीतामढ़ी एक्सप्रेस और आनंद विहार–मुजफ्फरपुर एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों का समय पहले से कुछ मिनट पहले कर दिया गया है। इससे यात्रियों को प्लेटफॉर्म पर पहुंचने की योजना नए सिरे से बनानी होगी।
वाराणसी, बनारस और वाराणसी सिटी स्टेशन
काशी नगरी वाराणसी से गुजरने वाली ट्रेनों में भी अहम बदलाव हुए हैं। बनारस–पटना एक्सप्रेस, उधना–दानापुर एक्सप्रेस, प्रयागराज–मुजफ्फरपुर एक्सप्रेस और वाराणसी सिटी–अहमदाबाद एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों का नया समय लागू किया गया है। श्रद्धालुओं और लंबी दूरी के यात्रियों के लिए यह जानकारी खास मायने रखती है।
पहाड़ी और सीमावर्ती सेक्शन भी प्रभावित
टनकपुर, काठगोदाम और रामनगर सेक्शन में चलने वाली ट्रेनों के शेड्यूल में भी बदलाव किया गया है। दिल्ली–टनकपुर एक्सप्रेस, रामनगर–आगरा फोर्ट एक्सप्रेस और रामनगर–चंडीगढ़ एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों का समय बदला गया है, जो पर्यटन और स्थानीय यात्रियों दोनों के लिए जरूरी रूट माने जाते हैं।
पैसेंजर और MEMU सेवाओं में भी संशोधन
सिर्फ एक्सप्रेस ही नहीं, बल्कि पैसेंजर, MEMU और DEMU ट्रेनों की टाइमिंग में भी बदलाव हुआ है। इससे रोजाना सफर करने वाले यात्रियों को अपनी दिनचर्या के अनुसार समय को दोबारा सेट करना पड़ेगा।
यात्रियों के लिए जरूरी सलाह
रेलवे प्रशासन ने यात्रियों से अपील की है कि यात्रा से पहले IRCTC वेबसाइट, NTES ऐप या रेलवे हेल्पलाइन से अपनी ट्रेन की नई समय-सारणी जरूर जांच लें। नए साल में यात्रा को सुगम और तनावमुक्त बनाने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।

लोकतंत्र के साहसी प्रहरी राज नारायण: सत्ता के सामने सत्य और साहस के प्रतीक

पुनीत मिश्र

राज नारायण भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे, जिनके लिए सत्ता साध्य नहीं, बल्कि जनता की सेवा का माध्यम थी। उनका जन्म 17 नवंबर 1917 को वाराणसी में हुआ और बचपन से ही वे सामाजिक अन्याय और विषमताओं के प्रति संवेदनशील थे। समाजवादी विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीति को परिवर्तन का साधन बनाया। उनके लिए समाजवाद केवल नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था, जिसमें किसान, मजदूर और वंचित वर्ग केंद्र में थे। राज नारायण की सबसे बड़ी पहचान सत्ता से निर्भीक टकराव की रही। उन्होंने उस दौर में भी सत्ता को चुनौती दी, जब ऐसा करना राजनीतिक आत्महत्या माना जाता था। 1971 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा और हार के बाद भी चुप नहीं बैठे। उन्होंने चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं था, बल्कि सत्ता के अहंकार के खिलाफ था। इसी संघर्ष की परिणति आपातकाल और उसके बाद जनता के राजनीतिक जागरण के रूप में सामने आई। राज नारायण का यह संघर्ष यह साबित करता है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा पद संविधान और जनता की शक्ति का होता है। राज नारायण का जीवन सादगी और जनसरोकार का उदाहरण था। वे सत्ता में रहते हुए भी आम आदमी की तरह जीवन जीते थे। उनके भाषणों में अलंकार नहीं, बल्कि जमीन की सच्चाई बोलती थी। संसद में हों या सड़क पर, उनकी चिंता एक ही थी। जनता की आवाज़ को बुलंद करना। आज के राजनीतिक माहौल में राज नारायण का स्मरण इसलिए जरूरी है क्योंकि वे राजनीति को मूल्य और नैतिकता से जोड़ते थे। उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सत्ता के करीब जाकर भी वे जनता के पक्ष में और सत्ता के विरोधी बने रहे। 31 दिसंबर 1986 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी जीवित हैं। राज नारायण हमें यह सिखाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सतत संघर्ष और सजग नागरिकता से मजबूत होता है। वे केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि लोकतंत्र के पहरेदार थे, जिन्होंने यह साबित किया कि अकेला व्यक्ति भी साहस और सत्य के साथ खड़ा होकर सत्ता की सबसे ऊंची दीवारों को हिला सकता है।

मैट्रिमोनियल साइट पर डॉक्टर बनकर ठगी, पहली मुलाकात में युवती की स्कूटी और जेवर लेकर फरार

आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। ऑनलाइन मैट्रिमोनियल साइट्स के जरिए ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आगरा के न्यू आगरा थाना क्षेत्र में एक युवक ने खुद को डॉक्टर बताकर युवती से दोस्ती की और पहली ही मुलाकात में उसकी स्कूटी, आभूषण और नकदी लेकर फरार हो गया। पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी की तलाश शुरू कर दी है।

शादी डॉट कॉम पर हुई दोस्ती

शाहगंज के दौरेठा की रहने वाली युवती ने पुलिस को बताया कि उसने विवाह के उद्देश्य से Shaadi.com पर प्रोफाइल बनाई थी। इसी दौरान डॉ. शिव कुमार शर्मा नाम की प्रोफाइल से उसका मैच हुआ। बातचीत बढ़ने के बाद युवक ने मिलने का प्रस्ताव रखा।

रेस्टोरेंट में मुलाकात, फिर रची साजिश

आरोपी ने दिल्ली हाईवे स्थित एसआरके मॉल के बर्गर किंग रेस्टोरेंट में मिलने बुलाया। कुछ देर बातचीत के बाद उसने अपने दोस्त और भाभी से मिलने चलने की बात कही। युवती उसकी बातों में आ गई और अपनी स्कूटी पर उसे बैठाकर चल दी।

पार्किंग स्लिप के बहाने हुआ फरार

रास्ते में आरोपी ने मॉल पहुंचने की बात कहकर स्कूटी मोड़ ली। जैसे ही युवती पार्किंग स्लिप लेने उतरी, आरोपी स्कूटी लेकर फरार हो गया। स्कूटी की डिक्की में युवती का पर्स, आभूषण और नकदी रखी थी।

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पुलिस जांच में जुटी

इंस्पेक्टर न्यू आगरा ने बताया कि प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और आरोपी की तलाश की जा रही है। मॉल और आसपास के इलाकों के CCTV फुटेज खंगाले जा रहे हैं।

बदलता अपराध का तरीका

डीसीपी सिटी सैयद अली अब्बास ने बताया कि पहले ऑनलाइन खरीद-फरोख्त के नाम पर ठगी होती थी, लेकिन अब अपराधी मैट्रिमोनियल साइट्स और सोशल एप्स के जरिए लोगों का भरोसा जीतकर वारदात को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि किसी अनजान व्यक्ति के साथ निजी जानकारी साझा करने से बचें और सतर्क रहें।

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बीए छात्रा की मौत, फुफेरे भाई पर दुष्कर्म का आरोप; सुसाइड नोट से खुलासा

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। लखनऊ के पारा थाना क्षेत्र से एक बेहद गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आया है, जहां बीए की छात्रा ने कथित तौर पर फुफेरे भाई द्वारा दुष्कर्म से आहत होकर अपनी जान दे दी। पीड़िता का इलाज के दौरान बलरामपुर अस्पताल में निधन हो गया। उसके मोबाइल फोन और कपड़ों से मिले सुसाइड नोट ने पूरे मामले को झकझोर कर रख दिया है।

गांव जाने के बाद बिगड़ी हालत

मूल रूप से हरदोई की रहने वाली छात्रा अपने परिवार के साथ लखनऊ के पारा इलाके में रहती थी। पिता सब्जी विक्रेता हैं और बेटी गांव के एक निजी डिग्री कॉलेज से बीए प्रथम वर्ष की पढ़ाई कर रही थी।

परिजनों के अनुसार, 15 दिसंबर को पिता परिवार के साथ गांव चले गए थे, जबकि छात्रा पारा स्थित घर में नानी के साथ थी। इसी दौरान आरोपी फुफेरा भाई, जो पिछले छह वर्षों से उनके घर में रहकर ई-रिक्शा चलाता था, कथित रूप से वारदात को अंजाम देकर फरार हो गया।

सुसाइड नोट से सामने आया सच

18 दिसंबर को छात्रा अचानक गांव पहुंची, लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। 25 दिसंबर को उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उसे पहले निजी अस्पताल और फिर बलरामपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई।

मौत के बाद जब परिजनों ने उसका मोबाइल फोन चेक किया तो उसमें सुसाइड नोट की फोटो मिली। इसके अलावा कपड़ों से भी एक सुसाइड नोट बरामद हुआ। नोट में छात्रा ने साफ लिखा कि उसकी मौत के लिए उसके माता-पिता या परिवार नहीं, बल्कि उसका फुफेरा भाई जिम्मेदार है। उसने यह भी उल्लेख किया कि विरोध करने पर आरोपी ने पिता की हत्या की धमकी दी थी।

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पुलिस कार्रवाई की तैयारी

डीसीपी पश्चिम विश्वजीत श्रीवास्तव ने बताया कि मामला संज्ञान में है। परिजनों से तहरीर मिलने के बाद मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि आरोपी फरार है और उसकी तलाश की जा रही है।

पिता का दर्द

पीड़िता के पिता ने कहा कि जिस व्यक्ति को उन्होंने अपने घर में रहने की जगह दी, उसी ने उनके भरोसे को तोड़ दिया। परिवार सदमे में है और आरोपी को सख्त सजा की मांग कर रहा है।

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घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के बाद टीम इंडिया में शमी की वापसी संभव, BCCI की बदली रणनीति

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खेल (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के चयनकर्ता तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी को लेकर बड़ा यू-टर्न लेने के मूड में नजर आ रहे हैं। लंबे समय से फिटनेस और भविष्य को लेकर चल रही अटकलों के बीच अब शमी एक बार फिर टीम इंडिया में वापसी की दहलीज पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। खास बात यह है कि 2027 वनडे वर्ल्ड कप को ध्यान में रखते हुए चयनकर्ता उनके अनुभव को नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं हैं।

चयनकर्ताओं की सोच में आया बदलाव

एनडीटीवी से बातचीत में बीसीसीआई से जुड़े एक सूत्र ने संकेत दिया कि शमी अब चयन की दौड़ से बाहर नहीं हैं। घरेलू क्रिकेट में उनके प्रदर्शन पर लगातार नजर रखी जा रही है। सूत्र के मुताबिक, न्यूजीलैंड के खिलाफ आगामी वनडे सीरीज में अगर शमी का नाम टीम में शामिल हो जाए तो इसे चौंकाने वाला नहीं माना जाएगा। चयनकर्ताओं का मानना है कि शमी जैसे गेंदबाज की सबसे बड़ी ताकत विकेट निकालने की काबिलियत है, जबकि फिटनेस अब एकमात्र चिंता का विषय रह गई है।

आंकड़े जो शमी के पक्ष में बोलते हैं

शमी के हालिया आंकड़े उनकी वापसी की मजबूत दावेदारी पेश करते हैं।

• पिछले 6 घरेलू मैचों में 17 विकेट

• विजय हजारे ट्रॉफी और सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में प्रभावशाली प्रदर्शन

• मौजूदा रणजी ट्रॉफी सीजन में 4 मैचों में 20 विकेट

ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि 35 वर्षीय तेज गेंदबाज की धार अब भी बरकरार है।

फिटनेस रही सबसे बड़ी चुनौती

2023 वर्ल्ड कप के बाद से मोहम्मद शमी को टखने और घुटने की चोटों से जूझना पड़ा। सर्जरी और लंबे रिहैब ने उनकी लय को जरूर प्रभावित किया, लेकिन घरेलू क्रिकेट में नियमित खेलकर उन्होंने अपनी फिटनेस को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दिया है। शमी कई बार सार्वजनिक रूप से यह दावा कर चुके हैं कि वह पूरी तरह फिट हैं।

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चयनकर्ताओं और शमी के बयान

ऑस्ट्रेलिया दौरे से बाहर रहने पर शमी के सार्वजनिक बयान के बाद चयनकर्ताओं की प्रतिक्रिया भी सामने आई थी। चयन समिति के अध्यक्ष अजीत अगरकर ने साफ कहा था कि अगर शमी पूरी तरह फिट होते तो वह निश्चित रूप से टीम इंडिया का हिस्सा होते। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चयनकर्ता घरेलू क्रिकेट में उनके प्रदर्शन और फिटनेस पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

2027 वर्ल्ड कप की तैयारी में अहम कड़ी

अब हालात शमी के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। नियमित विकेट, बेहतर फिटनेस और अनुभव उन्हें फिर से टीम इंडिया के लिए उपयोगी विकल्प बनाते हैं। 2027 वनडे वर्ल्ड कप की तैयारी कर रही भारतीय टीम के लिए बड़े टूर्नामेंट में एक भरोसेमंद विकेट-टेकर की भूमिका बेहद अहम होगी—और मोहम्मद शमी इस भूमिका में फिट बैठते हैं।

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साल के आखिरी दिन घने कोहरे और शीत दिवस से कांपेगा आधा यूपी

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। साल 2025 की विदाई और नए वर्ष 2026 के स्वागत से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में मौसम ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। उत्तर प्रदेश मौसम अलर्ट 31 दिसंबर 2025 के तहत भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने राज्य के 22 जिलों में अत्यंत घने कोहरे का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है, जबकि गोरखपुर, बस्ती समेत कई इलाकों में ‘शीत दिवस’ (Cold Day) की चेतावनी दी गई है।

मौसम विभाग के अनुसार, बर्फीली उत्तर-पश्चिमी हवाओं और नमी के मेल से प्रदेश के बड़े हिस्से में सुबह और रात के समय दृश्यता बेहद कम रहने की संभावना है। कई स्थानों पर विजिबिलिटी 50 मीटर से भी नीचे जा सकती है, जिससे सड़क, रेल और हवाई यातायात पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।


कोहरे का सबसे अधिक असर कौशाम्बी, प्रयागराज, फतेहपुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, लखनऊ, कानपुर नगर, उन्नाव, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, आगरा, फिरोजाबाद सहित आसपास के जिलों में देखा जाएगा। इन क्षेत्रों में सुबह के समय वाहन चालकों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

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वहीं, गोरखपुर और बस्ती मंडल में दिन का तापमान सामान्य से काफी नीचे रहने के कारण शीत दिवस की स्थिति बनी रहेगी। ठंडी हवाओं के कारण गलन बढ़ेगी और बुजुर्गों, बच्चों तथा बीमार व्यक्तियों को खास सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि अनावश्यक यात्रा से बचें, वाहन चलाते समय फॉग लाइट का प्रयोग करें और ठंड से बचाव के सभी उपाय अपनाएं। नए साल की पूर्व संध्या पर जश्न मनाते समय भी मौसम को ध्यान में रखकर सावधानी बरतना जरूरी होगा।

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‘3 इडियट्स’ का सीक्वल बनेगा या नहीं? रूमर्स पर आर माधवन और आमिर खान ने तोड़ी चुप्पी

मनोरंजन (राष्ट्र की परम्परा)। बॉलीवुड की आइकॉनिक फिल्म ‘3 इडियट्स’ के सीक्वल को लेकर लंबे समय से चर्चाएं चल रही हैं। सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि निर्देशक राजकुमार हिरानी फिल्म के दूसरे भाग पर काम कर सकते हैं और फिल्म की ओरिजनल स्टारकास्ट आमिर खान, आर माधवन और शरमन जोशी वापसी के लिए तैयार है।

हालांकि अब इन अटकलों पर खुद आर माधवन और आमिर खान ने अपनी प्रतिक्रिया देकर स्थिति साफ कर दी है।

माधवन बोले – सीक्वल बनाना थोड़ा अटपटा लगेगा

बॉलीवुड हंगामा के लिए सुभाष के झा को दिए इंटरव्यू में आर माधवन ने ‘3 इडियट्स’ के सीक्वल को लेकर अपनी शंका जाहिर की। उन्होंने कहा,
“थ्री इडियट्स का सीक्वल बनाना सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन यह थोड़ा अजीब भी होगा। हम तीनों अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां कहानी को आगे ले जाना आसान नहीं होगा। हमारी जिंदगी अब किस मोड़ पर होगी, यह सोचना दिलचस्प है, लेकिन एक मजबूत सीक्वल के लिहाज से यह शायद सही नहीं है।”

माधवन ने आगे कहा कि वह राजकुमार हिरानी के साथ फिर से काम करना जरूर चाहेंगे, लेकिन ‘3 इडियट्स’ का सीक्वल बनाना उन्हें व्यावहारिक नहीं लगता।

आमिर खान ने क्या कहा सीक्वल पर?

वहीं, आमिर खान ने सीक्वल की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह ‘3 इडियट्स’ का सीक्वल करना चाहेंगे, लेकिन अब तक उनसे इस बारे में किसी ने संपर्क नहीं किया है।

आमिर ने कहा,
“उस फिल्म को बनाते वक्त हमें बहुत मज़ा आया था। रैंचो मेरा अब तक का सबसे पसंदीदा किरदार है। लोग आज भी रैंचो को याद करते हैं। अगर मौका मिला तो मैं सीक्वल जरूर करना चाहूंगा, लेकिन अभी तक कोई बातचीत नहीं हुई है।”

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‘3 इडियट्स’ की ऐतिहासिक सफलता

साल 2009 में रिलीज हुई ‘3 इडियट्स’ भारतीय सिनेमा की सबसे सफल फिल्मों में शामिल है। यह दुनिया भर में 400 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी थी। लंबे समय तक यह भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म रही।

टीवी और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बार-बार प्रसारण के चलते फिल्म की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। फिल्म में बोमन ईरानी, करीना कपूर, ओमी वैद्य और मोना सिंह ने भी अहम भूमिकाएं निभाई थीं।

नए साल में योगी कैबिनेट का विस्तार, BJP के कई नेताओं को मिल सकता है बड़ा तोहफा

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए साल की शुरुआत के साथ ही योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। 30 दिसंबर की शाम हुई बीजेपी कोर ग्रुप बैठक के बाद संकेत मिले हैं कि खरमास समाप्त होते ही कैबिनेट विस्तार किया जा सकता है। वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह कदम बेहद अहम माना जा रहा है।

योगी मंत्रिमंडल में खाली हैं 6 पद

वर्तमान में योगी सरकार में कुल 54 मंत्री हैं, जबकि संवैधानिक रूप से मंत्रिमंडल में अधिकतम 60 मंत्री शामिल किए जा सकते हैं। ऐसे में लगभग छह नए चेहरों की एंट्री और कई मंत्रियों के विभागों में फेरबदल की पूरी संभावना है।

सरकार के साथ संगठन में भी होगा बदलाव

सूत्रों के अनुसार, मंत्रिमंडल विस्तार के साथ-साथ बीजेपी प्रदेश संगठन में भी बड़ा बदलाव किया जा सकता है। सरकार और संगठन के विस्तार के बीच लगभग एक महीने का अंतर रह सकता है। पार्टी नेतृत्व इस कवायद के जरिए क्षेत्रीय, सामाजिक और जातीय संतुलन साधने की कोशिश में है।

बताया जा रहा है कि छह से अधिक मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं, वहीं कुछ मौजूदा मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाकर संगठन में अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।

इन नेताओं को मिल सकता है बड़ा प्रमोशन

मंत्रिमंडल विस्तार में जिन नेताओं के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें शामिल हैं—

• भूपेंद्र चौधरी – कद बढ़ने की पूरी संभावना

• अशोक कटारिया – पश्चिम यूपी के बड़े गुर्जर नेता

गोविंद नारायण शुक्ला – बीजेपी प्रदेश महामंत्री और एमएलसी

अशोक कटारिया योगी सरकार 1.0 में परिवहन मंत्री रह चुके हैं। दूसरे कार्यकाल में अस्वस्थता के कारण उन्हें मौका नहीं मिल पाया था, लेकिन अब पूरी तरह सक्रिय होने के बाद उनका नाम फिर मजबूती से सामने आया है।

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सामाजिक संतुलन पर खास फोकस

राज्य मंत्री बलदेव औलख को कैबिनेट मंत्री बनाए जाने की चर्चा तेज है। वह योगी सरकार में सिख समाज से इकलौते मंत्री हैं, ऐसे में प्रतिनिधित्व के लिहाज से उनका प्रमोशन अहम माना जा रहा है।

इसके अलावा समाजवादी पार्टी से आए 7 बागी विधायकों में से 2-3 को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। इनमें पूजा पाल और ब्राह्मण चेहरे के रूप में मनोज पांडेय का नाम चर्चा में है।

साध्वी निरंजन ज्योति और सहयोगी दलों को भी मौका

साध्वी निरंजन ज्योति को कैबिनेट में शामिल कर बड़ा मंत्रालय दिए जाने की संभावना है। वह निषाद समाज से आती हैं और बीजेपी की मजबूत हिंदुत्व चेहरा मानी जाती हैं।

इसके साथ ही पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह का नाम भी संभावित सूची में है।
सहयोगी दलों की बात करें तो राष्ट्रीय लोकदल (RLD) और अपना दल कोटे से एक-एक राज्य मंत्री पद बढ़ाए जाने की भी चर्चा जोरों पर है।

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मुकल्ला पर बमबारी के बाद यूएई का बड़ा फैसला, सऊदी अरब से सैनिक हटाने की घोषणा

यमन के रणनीतिक बंदरगाह शहर मुकल्ला पर सऊदी अरब की बमबारी के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव और गहरा गया है। इस घटनाक्रम के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने बड़ा फैसला लेते हुए सऊदी अरब से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा की है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब ने यूएई पर यमन भेजे गए एक जहाज के जरिए हथियार सप्लाई करने का आरोप लगाया था।

सुरक्षा कारणों और आतंकवाद-रोधी अभियानों का हवाला

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएई के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि सुरक्षा कारणों और आतंकवाद-रोधी अभियानों की प्रभावशीलता को ध्यान में रखते हुए अपने शेष सैन्य कर्मियों को स्वेच्छा से वापस बुलाया जा रहा है। वहीं, यूएई के विदेश मंत्रालय ने यमन में हथियार भेजने के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

यूएई का कहना है कि मुकल्ला पहुंचे जहाज में हथियार नहीं, बल्कि वहां तैनात यूएई सैनिकों के उपयोग के लिए वाहन थे। मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि यूएई यमन की संप्रभुता का सम्मान करता है और वैध सरकार की बहाली व आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का समर्थन करता रहेगा।

यमन के भविष्य पर यमनी पक्षों का अधिकार: यूएई

यूएई पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि यमन की शासन व्यवस्था और क्षेत्रीय अखंडता का फैसला यमनी पक्षों को स्वयं करना चाहिए, न कि बाहरी शक्तियों को। मंगलवार को यूएई के फुजैरा बंदरगाह से रवाना हुआ एक जहाज यमन के मुकल्ला पहुंचा था, जिसके तुरंत बाद सऊदी अरब ने वहां हवाई हमला किया।

सऊदी अरब का आरोप है कि यह खेप अबू धाबी समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) को हथियार देने के लिए भेजी गई थी।

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STC और यमनी सेना के बीच बढ़ता टकराव

अप्रैल 2017 से STC दक्षिणी यमन में अलग संप्रभुता की मांग कर रहा है। इसके विपरीत यमनी सेना हद्रामौत ट्राइबल एलायंस के साथ खड़ी है, जिसे सऊदी अरब का समर्थन प्राप्त है। हाल के हफ्तों में दोनों गुटों के बीच टकराव तेज हो गया है।

इस महीने की शुरुआत में STC ने हद्रामौत और महरा प्रांतों के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण हासिल कर लिया, जिनमें तेल प्रतिष्ठान भी शामिल हैं। इसके बाद से क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है।

रणनीतिक क्षेत्र में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव

सऊदी अरब और यूएई यमन में अलग-अलग राजनीतिक और सैन्य गुटों का समर्थन कर रहे हैं। यह क्षेत्र वैश्विक शिपिंग मार्गों और मध्य पूर्व के प्रमुख ऊर्जा निर्यात क्षेत्रों के नजदीक स्थित होने के कारण रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है।

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विश्लेषकों के अनुसार, हाल में किए गए सऊदी हवाई हमले अलगाववादी ताकतों को चेतावनी देने के लिए थे कि वे आगे बढ़ना रोकें और हद्रामौत व महरा से पीछे हटें। मौजूदा हालात में STC की स्थिति और मजबूत हुई है, जिससे भविष्य में यमन संकट पर होने वाली किसी भी बातचीत में उसका प्रभाव बढ़ सकता है।

कड़ाके की ठंड से मजदूर मंडियों में पसरा सन्नाटा, रोजी-रोटी पर संकट

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। पिछले एक सप्ताह से पड़ रही कड़ाके की ठंड ने दिहाड़ी मजदूरों की कमर तोड़ दी है। ठंड के चलते निर्माण कार्य, मरम्मत व अन्य खुले कार्य लगभग ठप हो गए हैं, जिससे मजदूर मंडियों में मायूसी छाई हुई है। हालात ऐसे हैं कि प्रतिदिन काम की आस में पहुंच रहे मजदूरों में से मात्र 25 से 30 प्रतिशत लोगों को ही काम मिल पा रहा है, जबकि शेष को घंटों इंतजार के बाद बैरंग लौटना पड़ रहा है।
बुधवार की सुबह शहर के रामपुर आईटीआई चौराहा, चित्तू पांडेय चौराहा, बहेरी, गुदरी बाजार दुर्गा मंदिर और कदम चौराहा स्थित मजदूर मंडियों का जायजा लिया गया। हर जगह मजदूर अलाव के सहारे ठंड से बचने की कोशिश करते नजर आए। गांवों से काम की तलाश में आए मजदूरों ने बताया कि ठंड के बावजूद घर बैठना संभव नहीं है, क्योंकि परिवार का भरण-पोषण दिहाड़ी पर ही निर्भर है। मजदूरों का कहना है कि ठेकेदार और मकान मालिक ठंड के कारण काम शुरू कराने से कतरा रहे हैं। कई स्थानों पर आधा दिन इंतजार करने के बाद भी कोई बुलाने नहीं आता। इससे रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। मजदूरों ने प्रशासन से मांग की है कि ठंड के मौसम में उनके लिए अस्थायी रोजगार की व्यवस्था की जाए तथा मजदूर मंडियों में अलाव, गर्म पानी व अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। कुल मिलाकर कड़ाके की ठंड ने पहले से जूझ रहे दिहाड़ी मजदूरों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। यदि जल्द राहत के उपाय नहीं किए गए तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।

श्रीलाल शुक्ला: ‘रागदरबारी’ के जरिए भारतीय व्यवस्था की तीखी पड़ताल

नवनीत मिश्र

हिन्दी साहित्य में श्रीलाल शुक्ला ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने कल्पना के आवरण में नहीं, बल्कि यथार्थ की कठोर ज़मीन पर खड़े होकर लेखन किया। उनका चर्चित उपन्यास रागदरबारी भारतीय समाज और व्यवस्था की उन परतों को खोलता है, जिन्हें अक्सर सलीके से ढक दिया जाता है। यह कृति केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश की प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक संरचना का सूक्ष्म अध्ययन है।
श्रीलाल शुक्ला ने सत्ता और समाज को बहुत नज़दीक से देखा। प्रशासनिक सेवा के अनुभवों ने उन्हें यह समझ दी कि व्यवस्था भीतर से कैसे काम करती है और बाहर से कैसी दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में आदर्शवाद नहीं, बल्कि व्यवहारिक सच्चाई प्रमुख है। रागदरबारी में गाँव लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई बनकर सामने आता है, जहाँ विकास, शिक्षा और राजनीति सब निजी स्वार्थों के इर्द-गिर्द घूमते हैं।
इस उपन्यास का व्यंग्य हल्का-फुल्का नहीं, बल्कि गहरी चोट करने वाला है। श्रीलाल शुक्ला सत्ता की भाषा, उसके चरित्र और उसकी चालाकियों को इतने सहज ढंग से सामने रखते हैं कि पाठक हँसते-हँसते असहज हो उठता है। यहाँ शिक्षा व्यवस्था ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि प्रभाव जमाने का औज़ार बन जाती है और लोकतंत्र जनसेवा नहीं, बल्कि गुटबाजी का मंच।
श्रीलाल शुक्ला की लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा है। वे न तो भाषण देते हैं और न ही उपदेश। आम बोलचाल की भाषा में वे व्यवस्था की जटिल सच्चाइयों को इस तरह रख देते हैं कि पाठक स्वयं निष्कर्ष पर पहुँच जाता है। उनके पात्र किसी काल्पनिक दुनिया से नहीं, बल्कि हमारे आसपास के जीवन से उठकर आते हैं, इसलिए वे आज भी उतने ही विश्वसनीय लगते हैं।
रागदरबारी की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। बदलते समय और तकनीकी विकास के बावजूद सत्ता की प्रवृत्तियाँ बहुत अधिक नहीं बदली हैं। अवसरवाद, भ्रष्टाचार, दिखावटी नैतिकता और आम आदमी की उपेक्षा। ये सब आज भी हमारे सामाजिक ढांचे का हिस्सा हैं। इसी कारण यह उपन्यास हर पीढ़ी के पाठक से संवाद करता है।
श्रीलाल शुक्ला को उनके साहित्यिक योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके व्यक्तित्व से अधिक उस निर्भीक साहित्यिक दृष्टि का सम्मान था, जिसने सत्ता और समाज दोनों को कटघरे में खड़ा किया।
श्रीलाल शुक्ला की जयंती पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि साहित्य का काम केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि व्यवस्था से सवाल करना भी है। रागदरबारी के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि जब कलम ईमानदार होती है, तो वह सत्ता से भी अधिक ताक़तवर हो जाती है।

मोबाइल स्क्रीन तक सीमित शिक्षा: ग्रामीण छात्रों के लिए डिजिटल एजुकेशन—हकीकत या भ्रम?

एजुकेशन डेस्क(राष्ट्र की परम्परा)। इंटरनेट युग में शिक्षा एक क्लिक दूर बताई जाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुविधा देश के गांवों तक बराबरी से पहुँच पाई है?
डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन एजुकेशन के बढ़ते दावों के बीच ग्रामीण छात्रों की स्थिति आज भी बहस का विषय बनी हुई है। स्मार्ट क्लास, ई-लर्निंग और वर्चुअल पढ़ाई शहरों में सामान्य हो चुकी है, जबकि ग्रामीण भारत में यह अब भी संघर्ष और प्रतीक्षा का नाम है।
डिजिटल शिक्षा: संभावनाओं से भरा नया अध्याय
डिजिटल एजुकेशन ने शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव किया है।
ग्रामीण छात्रों के लिए इसके कई सकारात्मक पहलू हैं—
घर बैठे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी
बड़े शिक्षण संस्थानों के ऑनलाइन लेक्चर
कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री
बार-बार देखने योग्य रिकॉर्डेड क्लासेस
यदि संसाधन उपलब्ध हों, तो डिजिटल शिक्षा ग्रामीण प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिला सकती है।
जमीनी सच्चाई: सुविधाओं की भारी कमी
हकीकत यह है कि आज भी अधिकांश गांवों में—
तेज और स्थिर इंटरनेट कनेक्शन का अभाव
स्मार्टफोन/लैपटॉप सभी छात्रों के पास नहीं
बिजली आपूर्ति अनियमित
डिजिटल प्लेटफॉर्म की समुचित जानकारी नहीं
इन कारणों से ऑनलाइन पढ़ाई कई ग्रामीण छात्रों के लिए मजबूरी नहीं, बल्कि असंभव चुनौती बन जाती है।

शहरी-ग्रामीण डिजिटल खाई: बढ़ती असमानता
डिजिटल शिक्षा ने जहां शहरी छात्रों को आगे बढ़ने का मौका दिया, वहीं ग्रामीण छात्र पीछे छूटते जा रहे हैं।
यह डिजिटल डिवाइड केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के रोजगार, कौशल और आत्मनिर्भरता को भी प्रभावित कर रही है।

सरकारी योजनाएं: उम्मीद तो है, असर अधूरा
सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाएं जैसे—
डिजिटल इंडिया
पीएम ई-विद्या
दीक्षा (DIKSHA)
भारत नेट परियोजना
सही दिशा में कदम हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर कमजोर क्रियान्वयन इनके प्रभाव को सीमित कर देता है।

समाधान क्या हो सकता है?

ग्रामीण छात्रों के लिए डिजिटल एजुकेशन को सशक्त बनाने हेतु—
हर गांव तक तेज और सस्ता इंटरनेट
सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास और डिजिटल लैब
शिक्षकों एवं छात्रों के लिए डिजिटल साक्षरता प्रशिक्षण
स्थानीय भाषा में ई-कंटेंट उपलब्धता
NGO और CSR की सक्रिय भागीदारी
ग्रामीण छात्रों के लिए डिजिटल एजुकेशन न पूरी तरह सपना है, न ही पूरी सच्चाई। यह एक ऐसी संभावना है, जो सही नीति और ईमानदार प्रयासों से वास्तविकता बन सकती है।
यदि डिजिटल खाई को समय रहते नहीं पाटा गया, तो शिक्षा में समानता केवल नारा बनकर रह जाएगी।

हर जनवरी में नई तारीखें, वही पुराने धोखे

फोकस:नया साल, पुरानी व्यवस्थाटैग:संपादकीय नया साल व्यवस्था धोखे राजनीति समाज आत्ममंथन

साल बदला है, सच नहीं। दीवार पर नया कैलेंडर टंग गया है, तारीखें चमक रही हैं, पर देश-समाज की तस्वीर वही धुंधली है। हर जनवरी हमें यह भ्रम देती है कि कुछ नया शुरू होगा, कुछ बदलेगा, मगर कुछ ही दिनों में यह भ्रम टूट जाता है। तारीखें आगे बढ़ जाती हैं, पर सच्चाई अपनी जगह जमी रहती है।
हर साल सत्ता नए वादों के साथ आती है। विकास, पारदर्शिता, सुशासन शब्द बदलते हैं, स्क्रिप्ट वही रहती है। योजनाएँ घोषणाओं में जन्म लेती हैं और फाइलों में दम तोड़ देती हैं। जनता से हर साल ‘सब्र’ माँगा जाता है, मगर सब्र की सीमा कब पार हो गई, इसका हिसाब कोई नहीं देता। बेरोज़गारी आंकड़ों में छिपा दी जाती है, महंगाई को हालात का नाम देकर टाल दिया जाता है और असफलताओं पर चुप्पी ओढ़ ली जाती है।
साल दर साल व्यवस्था अपनी नाकामियों को नए पैकेज में परोसती है। पुराने वादों पर नया कवर चढ़ा दिया जाता है। सवाल पूछने वालों को हतोत्साहित किया जाता है और असहमति को अव्यवस्था बताकर किनारे कर दिया जाता है। जनवरी आते ही भाषणों में उम्मीद जगाई जाती है, और दिसंबर आते-आते वही उम्मीदें थकी हुई नज़र आती हैं।
समाज भी इस धोखे में बराबर का साझेदार बन चुका है। हम हर नए साल पर नैतिकता, सहिष्णुता और एकता की बातें करते हैं, लेकिन व्यवहार में नफ़रत और स्वार्थ को बढ़ावा देते हैं। हम बदलाव चाहते हैं, पर जिम्मेदारी से बचते हैं। गलती ‘सिस्टम’ की बताते हैं, जबकि चुप्पी हमारी अपनी होती है।
मीडिया से लेकर मंचों तक, हर जगह नया साल ‘उत्सव’ बनकर आता है। सवालों की जगह जश्न ले लेता है। समीक्षा की जगह सेलिब्रेशन परोसा जाता है। जाते हुए साल की विफलताओं पर गंभीर बहस के बजाय, आने वाले साल की खोखली उम्मीदें बेच दी जाती हैं।
फिर भी, पूरी तस्वीर अंधेरी नहीं है। इसी समाज में कुछ लोग हर साल वही तारीखें नहीं दोहराते, वे वही धोखे स्वीकार नहीं करते। वे चुपचाप व्यवस्था से सवाल करते हैं, ईमानदारी निभाते हैं और बदलाव की ज़िद पकड़े रहते हैं। असली नया साल उन्हीं के भीतर शुरू होता है।
सवाल सिर्फ़ इतना है कि क्या यह जनवरी भी सिर्फ़ तारीखें बदलेगी, या हम धोखों से हिसाब माँगने का साहस करेंगे? अगर जवाब दूसरा नहीं है, तो मान लेना चाहिए कि अगली जनवरी में भी हम यही लिखेंगे, हर जनवरी में नई तारीखें, वही पुराने धोखे।
हर साल की यही कहानी है, कैलेंडर नया है और कील पुरानी है…
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं!

सामाजिक समस्या विकास की राह में सबसे बड़ी चुनौती

डॉ सतीश पाण्डेय

महराजगंज ( राष्ट्र की परम्परा)। आज समाज अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। ऊपर से देखने पर ये समस्याएं अलग-अलग प्रतीत होती हैं—बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध, नशाखोरी, पारिवारिक विघटन, नैतिक पतन और सामाजिक असमानता। लेकिन गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि इन सबके पीछे एक साझा कारण छिपा है—मूल्यबोध और सामाजिक चेतना का क्षय। यही वह समस्या है, जो समाज की जड़ में बैठकर उसे भीतर से खोखला कर रही है।
आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार में भौतिक सफलता को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लिया गया है। नैतिकता, संवेदना और कर्तव्य बोध पीछे छूटते जा रहे हैं। जब लाभ ही सर्वोपरि हो जाता है, तब सही-गलत का भेद मिटने लगता है। इसी मानसिकता से भ्रष्टाचार जन्म लेता है, अपराध को बढ़ावा मिलता है और रिश्तों में स्वार्थ हावी हो जाता है। यह स्थिति किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज में फैल चुकी है।
परिवार, जो कभी संस्कारों की पहली पाठशाला हुआ करता था, आज स्वयं संकट में है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, संवाद की जगह टकराव ने ले ली है। बच्चों को सुविधा तो मिल रही है, लेकिन दिशा नहीं। जब बचपन से ही नैतिक शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध नहीं कराया जाता, तो आगे चलकर वही पीढ़ी समाज के लिए समस्या बन जाती है।
शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण से हटकर केवल डिग्री और रोजगार तक सीमित हो गया है।
परिणामस्वरूप शिक्षित युवा तो बढ़ रहे हैं, लेकिन संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक कम होते जा रहे हैं। यही कारण है कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी कई बार सामाजिक कुरीतियों का हिस्सा बनता दिखाई देता है। सामाजिक असमानता और अन्याय भी समाज की जड़ को कमजोर कर रहे हैं। जब कुछ लोग सुविधाओं और संसाधनों पर एकाधिकार जमाए रखते हैं और बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करती है, तो असंतोष और विद्रोह जन्म लेते हैं। यह स्थिति सामाजिक एकता को खंडित करती है और व्यवस्था के प्रति अविश्वास को बढ़ाती है।समाधान की बात करें तो केवल कानून या प्रशासनिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। समाज की जड़ में बैठी समस्या का समाधान सामूहिक आत्ममंथन से ही संभव है। परिवार को फिर से संस्कारों का केंद्र बनाना होगा, शिक्षा में नैतिक और सामाजिक मूल्यों को स्थान देना होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना होगा।
अंततः यह समझना होगा कि समाज कोई बाहरी संरचना नहीं, बल्कि हम सबका प्रतिबिंब है। जब व्यक्ति सुधरेगा, तभी समाज सुधरेगा। यदि आज भी हम चेत नहीं पाए, तो यह जड़ में बैठी समस्या आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी गंभीर संकट बन सकती है। इसलिए समय की मांग है कि हम केवल समस्याओं पर चर्चा न करें, बल्कि समाधान का हिस्सा बनें—क्योंकि स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव होता है।