बैंक खाते में लाखों हों, फिर भी परिवार परेशान? कोमा के बाद मौत के मामले में हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

पति की मौत के बाद भी बैंक खाते से नहीं मिल रहे पैसे! हाई कोर्ट सख्त, केंद्र और RBI से मांगा जवाब


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। किसी परिवार में कमाने वाले सदस्य की मौत हो जाए तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। ऐसे में यदि मृतक के बैंक खाते में जमा रकम हासिल करने के लिए भी कानूनी अड़चनों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, तो परिवार की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। इसी गंभीर समस्या पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने सवाल उठाया है कि आखिर ऐसी असाधारण परिस्थितियों में आश्रितों को राहत देने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?
मामला कानपुर नगर की परवीन जहां की याचिका से जुड़ा है। उनके पति शमशाद अली कोमा में चले गए थे और बाद में उनका निधन हो गया। पति के भारतीय स्टेट बैंक (SBI) खाते में जमा धनराशि प्राप्त करने में परेशानी सामने आई। इसके बाद यह मामला अदालत पहुंचा और बैंक खाते में जमा रकम तक पहुंच बनाने की कानूनी प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो गए।
कोमा में गए पति की मौत, पत्नी के सामने खड़ी हुई आर्थिक चुनौती
याचिका की सुनवाई के दौरान परवीन जहां के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनके पति की गंभीर स्थिति के दौरान कानूनी अभिभावक घोषित किए जाने की मांग उठी थी। इसके लिए उन्होंने जुलाई में मल्टीपल डिसेबिलिटी एक्ट, 1999 के तहत याचिका दाखिल की थी। हालांकि, पति की मृत्यु के बाद बैंक खाते में जमा धनराशि प्राप्त करने का सवाल नए रूप में सामने आ गया।
इस मामले ने एक बड़ी व्यावहारिक समस्या को उजागर किया है। यदि कोई व्यक्ति कोमा में चला जाता है और बाद में उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को बैंक खाते में जमा रकम प्राप्त करने के लिए किन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा? विशेषकर उस स्थिति में, जब परिवार को इलाज, घरेलू खर्च और अन्य जरूरी जरूरतों के लिए तत्काल धन की आवश्यकता हो।
हाई कोर्ट ने कहा—ऐसे मामलों में स्पष्ट व्यवस्था जरूरी
न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आश्रितों की परेशानी पर चिंता जताई। अदालत ने माना कि ऐसी असाधारण परिस्थितियों में परिवार का असहाय हो जाना गंभीर विषय है। बैंक खाते में जमा रकम तक पहुंच का स्पष्ट रास्ता नहीं होने से प्रभावित परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
अदालत ने संकेत दिया कि इस समस्या के समाधान के लिए सक्षम विधायिका कानून बनाने पर विचार कर सकती है। इसके अलावा, भारतीय रिजर्व बैंक भी राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की संभावनाओं पर विचार कर सकता है। ऐसी व्यवस्था से यह निर्धारित करने में मदद मिल सकती है कि खाताधारक की गंभीर चिकित्सकीय स्थिति और बाद में मृत्यु होने पर उसके आश्रितों को धनराशि किस प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कराई जाए।
केंद्र सरकार और RBI को देना होगा जवाब
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से अलग-अलग हलफनामे दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या ऐसी विशेष एवं आपात परिस्थितियों से निपटने के लिए कोई प्रस्ताव, कानून या दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं।
अदालत ने याची को RBI के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर (बैंकिंग रेगुलेशन) और वित्त मंत्रालय के सचिव को मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश भी दिया है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से ठोस समाधान के साथ हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित समय में राज्य सरकार की ओर से समाधान पेश नहीं किए जाने पर मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया जा सकता है। इसी तरह, केंद्र सरकार और RBI की ओर से हलफनामा दाखिल नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों की उपस्थिति पर भी विचार किया जा सकता है।
केरल हाई कोर्ट के फैसले पर भी नजर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को केरल हाई कोर्ट के शोभा गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों पर विचार करने का सुझाव दिया है। इस फैसले का उल्लेख उमा मित्तल मामले में भी किया गया है।
फिलहाल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परवीन जहां को अपने दिवंगत पति शमशाद अली के SBI खाते में जमा धनराशि प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकार की प्रक्रिया अपनाने की छूट दी है। मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर को निर्धारित की गई है।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या बनेगा नया नियम?
इस मामले में केंद्र सरकार, RBI और उत्तर प्रदेश सरकार के जवाब से यह स्पष्ट हो सकेगा कि कोमा जैसी गंभीर स्थिति के बाद खाताधारक की मृत्यु होने पर आश्रितों को बैंक में जमा रकम उपलब्ध कराने के लिए कोई विशेष व्यवस्था बनाई जा सकती है या नहीं।
अदालत की यह पहल केवल एक परिवार की परेशानी तक सीमित नहीं है। इसका संबंध उन तमाम परिवारों से है, जिन्हें किसी अपने की मृत्यु के बाद आर्थिक संकट के बीच बैंकिंग और उत्तराधिकार संबंधी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है। यदि इस दिशा में स्पष्ट नियम बनते हैं, तो भविष्य में ऐसे परिवारों को राहत मिलने का रास्ता खुल सकता है।
नोट: मामले में अंतिम निर्णय और सरकारों की ओर से प्रस्तावित समाधान अभी सामने आना बाकी है।