
पथरदेवा में ठेके-पट्टों पर संग्राम! EO विवाद में गिरफ्तारी, हथियारों और फायरिंग के आरोपों से गरमाई सियास

अनूप तिवारी व परवीन की रिपोर्ट

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के पथरदेवा में नगर पंचायत के अधिशासी अधिकारी (EO) हिमांशु प्रताप सिंह से जुड़ा विवाद अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। ठेके-पट्टों के आवंटन में कथित 17 प्रतिशत कमीशन को लेकर शुरू हुआ विवाद, अधिकारी को जबरन ले जाने की कोशिश, हथियार लहराने, मारपीट और फायरिंग के आरोपों तक पहुंच गया है। 8 अक्टूबर की रात हुई घटना को लेकर दोनों पक्षों की ओर से थाना तरकुलवा में अलग-अलग तहरीर दिए जाने के बाद मामला और उलझ गया है।
एक पक्ष अधिकारी को अगवा करने की कोशिश का आरोप लगा रहा है, तो दूसरे पक्ष का दावा है कि हथियारबंद भीड़ ने उन्हें घेरकर जान से मारने की धमकी दी और फायरिंग की। मामले में गिरफ्तारी और फरार आरोपियों की तलाश की चर्चाओं के बीच अब सबकी निगाहें पुलिस जांच पर टिकी हैं।
नगर पंचायत पथरदेवा के अध्यक्ष कमलेश सिंह की ओर से दी गई तहरीर के मुताबिक, 8 अक्टूबर को EO हिमांशु प्रताप सिंह किसी काम से देवरिया गए थे। वहां कुछ अनजान लोगों द्वारा पीछा किए जाने की बात सामने आने पर अधिकारी ने उन्हें इसकी जानकारी दी। इसके बाद चेयरमैन ने उन्हें पथरदेवा स्थित अपने घर आने के लिए कहा। तहरीर में बताया गया है कि रात करीब 11 बजे EO उनके घर पहुंचे।
रात लगभग 12 बजे जब कमलेश सिंह घर पहुंचे, तो अधिकारी डरे-सहमे दिखाई दिए। चेयरमैन का आरोप है कि इसी दौरान विकास नाम के व्यक्ति का फोन आया और वह बार-बार उन्हें पथरदेवा चौराहे पर बुला रहा था। इसके बाद वह EO को लेकर चौराहे पर पहुंचे, जहां तीन-चार चारपहिया वाहन खड़े थे। तहरीर में एक वाहन का नंबर UP52CC 2242 बताया गया है। आरोप है कि वाहनों से धीरज सिंह, करुणेश मिश्र, विकास समेत 10 से 12 लोग उतरे और गाली-गलौज करते हुए EO को जबरन अपने साथ ले जाने की कोशिश करने लगे। इसी दौरान अधिकारी के चोटिल होकर बेहोश होने का भी आरोप लगाया गया है। कमलेश सिंह की तहरीर में यह भी दावा किया गया है कि संबंधित लोग हथियारों से लैस थे। उन्होंने कथित तौर पर बंदूकें लहराकर जान से मारने की धमकी दी। घटना की सूचना पुलिस को दिए जाने के बाद मौके पर पहुंची पुलिस को देखकर लोगों के भागने की बात भी तहरीर में कही गई है। चेयरमैन के मुताबिक, पुलिस ने मौके से दो लोगों को पकड़ लिया, जिनकी पहचान निलेश शुक्ला और विवेक दुबे के रूप में बताई गई है। उन्होंने घटना के बाद बाजार में भय का माहौल पैदा होने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की। दूसरी ओर, धीरज सिंह, करुणेश मिश्र, विकास मिश्र और गंगेश्वर कुमार मिश्र की ओर से भी थाना तरकुलवा में प्रार्थना पत्र दिया गया है। दूसरे पक्ष ने खुद को सरकारी योजनाओं के टेंडर और ठेकेदारी से जुड़े कार्यों में संलग्न बताते हुए अपनी शिकायत में अलग घटनाक्रम पेश किया है। उनकी तहरीर के अनुसार, 8 अक्टूबर को शाम करीब छह बजे EO से फोन पर कामकाज की प्रगति को लेकर बातचीत हुई थी। इसके बाद अधिकारी के कहने पर वे पथरदेवा पहुंचे और EO कार्यालय के बाहर इंतजार करते रहे। दूसरे पक्ष का दावा है कि EO ने उन्हें नगर पंचायत अध्यक्ष कमलेश सिंह उर्फ क्रांति सिंह से मिलकर आने की बात बताई थी। तहरीर के मुताबिक, करीब दो घंटे बाद सामने से 40 से 50 लोगों की भीड़ आती दिखाई दी। आरोप है कि भीड़ में शामिल लोगों के पास लाठी-डंडे, लोहे की रॉड और धारदार हथियार थे, जबकि कुछ लोगों के हाथों में बंदूक और पिस्टल थीं। दूसरे पक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें धमकाया गया और जान बचाकर भागने के दौरान उनकी ओर फायरिंग की गई। किसी तरह वहां से निकलने के बाद पुलिस को सूचना देने की बात भी कही गई है। इस तरह एक ही घटनाक्रम को लेकर दोनों पक्षों के दावे एक-दूसरे के विपरीत हैं। एक पक्ष EO को जबरन ले जाने की कोशिश और मारपीट का आरोप लगा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष हथियारबंद भीड़, धमकी और फायरिंग की बात कह रहा है। ऐसे में घटनास्थल पर मौजूद लोगों की भूमिका, कथित हथियारों के इस्तेमाल और घटना की वास्तविक परिस्थितियों की पड़ताल बेहद अहम हो गई है। मामले को लेकर ठेके-पट्टों के आवंटन में कथित 17 प्रतिशत कमीशन का विवाद भी चर्चा में है। सांसद शशांक मणि के प्रतिनिधि धीरज सिंह की गिरफ्तारी और उनके करीबी करुणेश मिश्र को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने की खबरों के बीच विकास मणि समेत अन्य आरोपियों की तलाश में एसटीएफ और एसओजी की दबिश की बात सामने आई है। हालांकि, इन सभी पहलुओं पर पुलिस की आधिकारिक पुष्टि और जांच के निष्कर्ष सामने आना जरूरी है। किसी व्यक्ति का नाम आरोप में आने मात्र से उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाता। इस पूरे मामले में कथित क्रॉस एफआईआर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं, सोशल मीडिया पर सांसद शशांक मणि के साथ बताए जा रहे कुछ लोगों की तस्वीरें प्रसारित होने की चर्चा है। हालांकि, तस्वीरों के आधार पर किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता साबित नहीं होती। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच के तथ्यों के सामने आने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित होगा। फिलहाल पथरदेवा का यह विवाद केवल दो पक्षों की आपसी शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें सरकारी अधिकारी की सुरक्षा, टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता, कथित कमीशनखोरी और कानून-व्यवस्था जैसे गंभीर सवाल जुड़े हैं। यदि सरकारी ठेकों में अनुचित दबाव या कमीशन की मांग हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी पक्ष पर हथियारों के इस्तेमाल, फायरिंग या अपहरण के प्रयास के आरोप हैं, तो साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 8 अक्टूबर की रात पथरदेवा में वास्तव में क्या हुआ था? क्या EO को जबरन ले जाने की कोशिश की गई या दूसरे पक्ष के दावे के मुताबिक हथियारबंद भीड़ ने उन पर हमला किया? इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि निष्पक्ष पुलिस जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों से ही सामने आएगा। फिलहाल पूरे मामले में आगे की पुलिस कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।
