• • नवनीत मिश्र

फागुन आया तो लगा
जैसे सरसों के खेतों ने
पीली धूप ओढ़ ली हो।

आम की बौरों से टपकती
मंद-मंद गंध,
जैसे किसी ने
हवा में चुपके से
मधुर गीत घोल दिया हो।

टेसू के फूल
धधकते अंगारों से लगें,
धरती की हथेली पर
रखे हुए छोटे-छोटे सूरज।

गुलाल उड़ा तो लगा
आकाश ने भी
लालिमा का तिलक लगा लिया हो।

यमुना-सा बहता अबीर,
लहरों-सा हँसता रंग,
पिचकारी जैसे
इंद्रधनुष की पतली धारा।

राधा की चुनरी
भोर की लाली जैसी,
कान्हा की हँसी
कोयल की पहली कूक।

बरसाने की गलियों में
ढोल की थाप,
मानो धरती का हृदय
धड़क रहा हो।

हर चेहरा
खिलता पलाश बन जाए,
हर मन
भीगी मिट्टी की खुशबू-सा महके।

हँसी के छींटे
चाँदी-सी चमकें,
पलकों पर ठहरे रंग
ओस की बूँद जैसे दमकें।

जब शाम ढले
तो लगे,
दिन भर का उत्सव
सिंदूरी सूर्यास्त बन
क्षितिज पर ठहर गया है।

और रात की चाँदनी
रंगों को धीरे-धीरे
सपनों में बदल रही है।

ऐसी हो होली, जहाँ हर बिंब
प्रेम की रेखा से खिंचा हो,
और हर रंग मन के कैनवास पर
एक अमिट चित्र बन जाए।

रंगोंत्सव के इन जीवंत बिंबों संग शुभ होली।