
लेखक: पंडित सुधीर तिवारी ‘अंतिम बाबा’
हरतालिका तीज हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र एवं आस्थापूर्ण व्रत है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य प्रेम, अटूट विश्वास, त्याग, तपस्या और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु एवं सुखमय दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनोवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं।
हरतालिका तीज की कथा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि सच्ची श्रद्धा, धैर्य और दृढ़ संकल्प से जीवन के कठिन मार्ग पर भी आगे बढ़ा जा सकता है। आइए जानते हैं माता पार्वती की कठोर तपस्या, उनके ‘अपर्णा’ नाम और हरतालिका व्रत की पौराणिक कथा।
माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कितने वर्षों तक की तपस्या?
पौराणिक ग्रंथों और प्रचलित धार्मिक कथाओं में माता पार्वती की तपस्या का वर्णन अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मिलता है। हालांकि, उनकी तपस्या की कुल अवधि को लेकर सभी ग्रंथों में एक समान संख्या नहीं मिलती। इसलिए यह निश्चित रूप से कहना उचित नहीं होगा कि माता पार्वती ने केवल इतने ही वर्षों तक तपस्या की थी।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर साधना की। उन्होंने राजमहल के सुख-सुविधापूर्ण जीवन का त्याग कर वन में तपस्या की और अपने मन को पूर्णतः महादेव की आराधना में लगा दिया। उनकी साधना का मूल आधार अटूट विश्वास, अनन्य भक्ति और अपने संकल्प के प्रति पूर्ण समर्पण था।
माता पार्वती की तपस्या यह दर्शाती है कि सच्चा प्रेम केवल इच्छा का नाम नहीं, बल्कि त्याग, धैर्य और निष्ठा की भी परीक्षा है।
सती से पार्वती बनने की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती अपने पूर्वजन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री माता सती थीं। भगवान शिव के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा थी। पिता दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने से व्यथित होकर माता सती ने यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए।
इसके बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय और माता मैना के घर पुत्री के रूप में पुनर्जन्म लिया। यही दिव्य स्वरूप आगे चलकर माता पार्वती कहलाया।
बाल्यकाल से ही माता पार्वती का मन भगवान शिव की भक्ति में रमा रहता था। देवर्षि नारद के मार्गदर्शन और अपनी आध्यात्मिक निष्ठा के बल पर उन्होंने महादेव को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प लिया। इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने कठिन तपस्या का मार्ग चुना।
कंद-मूल से निराहार तपस्या तक का कठिन मार्ग
प्रचलित पौराणिक कथाओं में माता पार्वती की तपस्या के विभिन्न चरणों का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उन्होंने धीरे-धीरे अपने आहार का त्याग करते हुए साधना को और कठोर बनाया।
पहला चरण: कंद-मूल और फलों का सेवन
तपस्या के प्रारंभिक चरण में माता पार्वती वन में उपलब्ध कंद-मूल और फलों का सेवन करते हुए भगवान शिव का ध्यान करती थीं। उनका संपूर्ण मन महादेव की आराधना में लगा रहता था।
दूसरा चरण: सूखे पत्तों का आहार
मान्यता है कि समय बीतने के साथ उन्होंने फल खाना भी छोड़ दिया और पेड़ों से गिरे सूखे पत्तों पर निर्भर रहकर तपस्या जारी रखी। उनकी साधना की कठिनता निरंतर बढ़ती गई, लेकिन उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ।
तीसरा चरण: आहार का पूर्ण त्याग
कथा के अनुसार, तपस्या के अंतिम चरण में माता पार्वती ने सूखे पत्तों का सेवन भी छोड़ दिया। इसी कारण उन्हें ‘अपर्णा’ कहा गया। ‘अपर्णा’ नाम का धार्मिक अर्थ उस देवी से जोड़ा जाता है, जिन्होंने तपस्या के दौरान पत्तों तक का त्याग कर दिया।
यह प्रसंग उनकी अटूट साधना और आत्मसंयम का प्रतीक है। इसे धार्मिक आख्यान के रूप में समझना चाहिए, न कि सामान्य जीवन में उपवास के दौरान शरीर को कष्ट देने की सलाह के रूप में।
हरतालिका तीज की पौराणिक कथा
हरतालिका तीज की प्रचलित कथा के अनुसार, माता पार्वती के पिता पर्वतराज हिमालय उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। लेकिन माता पार्वती भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं।
माता पार्वती की मनोकामना जानने वाली उनकी एक सखी उन्हें वन में ले गई, ताकि वे अपनी इच्छा के अनुसार तपस्या कर सकें। मान्यता है कि सखी द्वारा उन्हें वन में ले जाकर सुरक्षित रखने के कारण इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ पड़ा।
‘हरतालिका’ शब्द की एक प्रचलित व्याख्या ‘हरत’ अर्थात हरण करके ले जाना और ‘आलिका’ अर्थात सखी से जुड़ी है। इसी कारण इस व्रत की कथा में सखी की भूमिका विशेष मानी जाती है।
वन में माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन बालू से शिवलिंग का निर्माण किया। उन्होंने भगवान शिव की पूजा-अर्चना की और दिन-रात उनकी आराधना में लीन रहीं। प्रचलित कथा के अनुसार, उन्होंने निर्जला व्रत रखकर रात्रि जागरण किया और महादेव को पति रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना की।
माता पार्वती की अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए तथा उनकी मनोकामना स्वीकार करते हुए उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिव और पार्वती का दिव्य मिलन हुआ।
हरतालिका तीज की पूजा का धार्मिक महत्व
हरतालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा दांपत्य सुख, पारिवारिक मंगल और अखंड सौभाग्य की कामना से की जाती है। धार्मिक परंपराओं में इस दिन व्रत, पूजन, शिव-पार्वती की कथा श्रवण और रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है।
पूजा की विधि परिवार, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सामान्यतः स्वच्छ स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा अथवा शिवलिंग स्थापित कर श्रद्धापूर्वक पूजन किया जाता है। पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और उपलब्ध पूजन सामग्री अर्पित कर शिव-पार्वती का स्मरण किया जाता है। इसके बाद हरतालिका तीज की कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा है।
व्रत का उद्देश्य केवल मनोकामना की पूर्ति नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म में पवित्रता, संयम और सद्भाव को बढ़ावा देना भी है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर निर्जला उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
माता पार्वती की तपस्या से मिलने वाली प्रेरणा
माता पार्वती की कथा हमें सिखाती है कि जीवन में किसी श्रेष्ठ उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए धैर्य, निष्ठा और आत्मविश्वास आवश्यक हैं। उनका चरित्र नारी शक्ति, आत्मसम्मान और अपने संकल्प के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देता है।
हरतालिका तीज का वास्तविक संदेश यह है कि दांपत्य जीवन प्रेम, विश्वास, सम्मान और परस्पर सहयोग से मजबूत होता है। भगवान शिव और माता पार्वती का संबंध इसी आदर्श का प्रतीक माना जाता है।
इस पावन पर्व पर हमें अपने परिवार में प्रेम, सद्भाव और एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए। माता पार्वती की भक्ति और भगवान शिव की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति और मंगल का संचार हो।
हर-हर महादेव! जय माता पार्वती!
लेखक: पंडित सुधीर तिवारी ‘अंतिम बाबा’
