मैं क्या हूं यह मैं जानता हूं ।
रहूं महलों में तनिक चाह नहीं हम में हैं।।
रहूं पड़ा चाहे सड़कों पर
या रहूं गली कूचों में तनिक फर्क नही हम में हैं ।।
निज भाव ये जो हममें हैं यह ही हैं मेरे “मैं” जिसे खुद में जीना भी जानता,,,,???
आप भी खुद से पूछो तो सही।
क्या मेरे “मैं” से समानता तुझमें भी हैं।
या फिर केवल मैं ही निज “मैं” को जानता हूं।।
रखता मैं समानता सब में
सुन सबकी सबके मदद में खुद से हाथ बटाना भी जानता हुं।
क्यों कि मैं खुद को खुद से पहचानता हूं
खुद को ही जो जानते नहीं हमें क्या वे पहचानें सिवाय गलत बयानी के फिर भी उसे “मैं” पहचानता हुं ।मैं क्या हूं यह मैं जानता हुं।।
दुर देश को जाऊं अपना देश अपनी मिट्टी की पहचान
बताना और बनाना भी जानता हुं।
फिर भी देखने में दिखता औरों के जैसे औरों से ही रखता भी समानता हुं।
मैं क्या हूं यह निज “मैं” को जानता हूं ।।
जाता जहां भी हट कर अलग औरों स्वतः सम्मान मिले रखता समानता हुं।
अलग हट कर जब जब भी सम्मान मिलें हकदार जिसे अपने देश अपनी माटी को मानता हूं।
मैं क्या हूं निज “मैं” को जानता हुं।।
उठा लूं धरती आसमां को संभव तो नहीं,,,,,
पर एक छलांग भी पाने को आसमां अगर न लगा लूं फिर इसे भी गलत मानता हुं ।
पा लूं आसमां को इस कोशिश में कुछ एक छलांगें भी जब हमारी लगेंगी।
फिर हम सफल चाहें न हों पर,,,,
पर इन असफल छलांगों से भी सफलता की अगर एक माला
भी ना बना लूं “तो” इसे भी गलत मानता हूं।।
सफलता की मंजिल अपने हर असफलता की माला से खुद हम न बना लें तो इसे भी गलत मैं मानता हुं।
मैं क्या हूं यह मैं जानता हूं ।।
लेखक
बृजेश मिश्र/पत्रकार/एवं कवि
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