अनशन से सरकारें झुका चुके हैं गांधी से सोनम वांगचुक तक, फिर विपक्ष क्यों नहीं चला रहा यह दांव?
सआईआर के मुद्दे पर विपक्ष की रणनीति पर उठ रहे सवाल

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) देश की राजनीति में विरोध-प्रदर्शन, धरना और आंदोलन कोई नई बात नहीं है। भारतीय इतिहास गवाह है कि जब आंदोलनों के साथ नैतिक बल, जनसमर्थन और त्याग जुड़ता है, तो सत्ता पर दबाव बढ़ता है। महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और सोनम वांगचुक के विरोध प्रदर्शन तक, अनशन कई बार जनभावनाओं को आवाज देने का प्रभावी माध्यम बना है। ऐसे में मौजूदा राजनीतिक प्रदर्शनों के बीच एक सवाल तेजी से चर्चा में है कि जब विपक्ष चुनावी पारदर्शिता और एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेर रहा है, तो अनशन जैसे शांतिपूर्ण और नैतिक दबाव वाले रास्ते से दूरी क्यों बनाई जा रही है? अक्टूबर की शुरुआत से ही देश के अलग-अलग हिस्सों में धरने और विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। कांग्रेस, उसके सहयोगी दलों, विभिन्न छात्र संगठनों और अन्य राजनीतिक समूहों की ओर से कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं। इसके बावजूद इन प्रदर्शनों का प्रभाव वैसा व्यापक जनचर्चा वाला नहीं दिखाई दे रहा, जैसा किसी बड़े जनांदोलन से अपेक्षा की जाती है। आलोचकों का मानना है कि केवल सड़क पर उतरना पर्याप्त नहीं है; आंदोलन की विश्वसनीयता, नेतृत्व का आचरण और उसके पीछे की नैतिक प्रतिबद्धता भी जनता का भरोसा जीतने में अहम भूमिका निभाते हैं। अनशन की ताकत केवल भूखे रहने में नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्धता, संयम और सार्वजनिक जवाबदेही में होती है। जब कोई नेता किसी मांग को लेकर अनशन पर बैठता है, तो वह अपने शरीर को ही विरोध का माध्यम बनाता है। इससे आंदोलन को भावनात्मक और नैतिक आधार मिल सकता है। हालांकि, हर अनशन सफल हो या हर सरकार दबाव में आ जाए, यह जरूरी नहीं है। आंदोलन की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि मांग कितनी स्पष्ट है, जनसमर्थन कितना व्यापक है और संबंधित पक्ष समाधान के लिए कितना तैयार है। भारतीय राजनीति में महात्मा गांधी ने अनशन को अहिंसक प्रतिरोध के महत्वपूर्ण साधन के रूप में स्थापित किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक एकता के लिए भी उपवास का सहारा लिया। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन ने सामाजिक परिवर्तन के लिए नैतिक अपील का उदाहरण प्रस्तुत किया। पोट्टि श्रीरामुलु का आमरण अनशन आंध्र राज्य के गठन की मांग से जुड़ा था, जबकि इरोम शर्मिला ने मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के विरोध में लंबे समय तक अनशन किया। मेधा पाटकर ने विस्थापन और नर्मदा घाटी से जुड़े मुद्दों पर अनशन को आंदोलन का हिस्सा बनाया। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भी अनशन ने व्यापक जनचर्चा पैदा की। हाल के वर्षों में लद्दाख के पर्यावरण, संवैधानिक संरक्षण और स्थानीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सोनम वांगचुक के आंदोलनों ने भी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा। उनके विरोध प्रदर्शनों ने यह दिखाया कि किसी क्षेत्रीय मुद्दे को लगातार और संगठित तरीके से उठाकर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि, किसी आंदोलन के परिणाम को केवल अनशन का नतीजा मानना सही नहीं होगा। जनदबाव, राजनीतिक परिस्थितियां, संवाद और सरकार के फैसले भी इसमें भूमिका निभाते हैं। अब सवाल कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की रणनीति को लेकर है। कांग्रेस खुद को महात्मा गांधी की विचारधारा का अनुयायी बताती है। राहुल गांधी समेत पार्टी के वरिष्ठ नेता चुनावी प्रक्रिया, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में आलोचकों का सवाल है कि यदि इन मुद्दों को लेकर विपक्ष गंभीर है, तो वह किसी स्पष्ट मांग के साथ अनुशासित, शांतिपूर्ण और नैतिक दबाव वाला बड़ा आंदोलन खड़ा करने की दिशा में कितनी गंभीरता दिखा रहा है? इसी तरह, कोकरोच जनता पार्टी सहित अन्य राजनीतिक समूहों और छात्र संगठनों के प्रदर्शन को लेकर भी बहस हो रही है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहा है। ऐसे में विपक्ष के सामने चुनौती केवल आरोप लगाने की नहीं, बल्कि अपने दावों के समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत करने, कथित अनियमितताओं के प्रमाण सामने लाने और सुधार के लिए स्पष्ट मांग रखने की भी है। यदि विपक्ष किसी मांग को लेकर अनशन का रास्ता चुनता है, तो उसे आंदोलन की पारदर्शिता, अहिंसा और जवाबदेही भी सुनिश्चित करनी होगी। यहां एक अहम सवाल यह भी है कि क्या किसी आंदोलन की सफलता का पैमाना केवल सरकार का झुकना होना चाहिए? लोकतंत्र में विरोध का उद्देश्य सत्ता परिवर्तन भर नहीं, बल्कि नीतियों में सुधार, संस्थाओं की जवाबदेही और जनता की समस्याओं का समाधान भी है। अनशन तभी सार्थक माना जा सकता है, जब वह किसी स्पष्ट जनहित के मुद्दे से जुड़ा हो और संवाद तथा समाधान के रास्ते खोले। केवल राजनीतिक सुर्खियां बटोरने के लिए किया गया प्रदर्शन लंबे समय तक जनता का विश्वास नहीं जीत सकता। बदलते दौर में आंदोलनों का स्वरूप भी बदल रहा है। सोशल मीडिया, जनसभाएं, न्यायिक हस्तक्षेप, तथ्यपरक अभियान और व्यापक जनसंपर्क अब विरोध के अहम माध्यम बन चुके हैं। इसके बावजूद अनशन की प्रासंगिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। उसकी असली ताकत तब सामने आती है, जब आंदोलनकारी अपनी मांगों को लेकर दृढ़ रहें, विरोध शांतिपूर्ण हो और जनता को यह भरोसा हो कि आंदोलन किसी व्यक्तिगत या राजनीतिक स्वार्थ के बजाय व्यापक हित के लिए किया जा रहा है। विपक्ष के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती जनता के बीच विश्वसनीयता कायम करने की है। यदि उसे चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर आपत्तियां हैं, तो उसे केवल बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय तथ्यों, कानूनी विकल्पों और प्रभावी जनआंदोलन के जरिए अपनी बात रखनी होगी। अनशन इसका एक विकल्प हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में किसी समस्या के समाधान की गारंटी नहीं है। आखिरकार, लोकतंत्र में आंदोलन की ताकत भीड़ के आकार से ही नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, नेतृत्व की विश्वसनीयता और जनता के प्रति जवाबदेही से तय होती है। गांधी से लेकर समकालीन आंदोलनों तक का अनुभव यही बताता है कि नैतिक बल विरोध को नई दिशा दे सकता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि विपक्ष अनशन क्यों नहीं कर रहा, बल्कि यह भी है कि क्या उसके पास जनता को भरोसे में लेने वाली स्पष्ट रणनीति और ठोस कार्ययोजना है?
