सत्ता की सियासत, बयानबाजी और लोकतंत्र के दोहरे मापदंड पर तीखा व्यंग्य

किसने किसको क्या कहा, किसने किसको घेरा,
बयानबाजी की आँधी में, ‘गुम’ हो गया है सवेरा।
कभी राम के नाम वोट, कभी शिवाजी की शान,
कभी मंदिर तो कभी महापुरुष, बनते चुनावी अभियान।
महापुरुषों ने देश की खातिर स्वयं सर्वस्व लुटाया,
नेताओं ने उनके नाम पर अपना कुनबा खूब बढ़ाया!
हार मिली तो आयोग गलत, जीत मिली तो वाह!
अपनी गलती मानने की, किसे पड़ रही परवाह?
कुर्सी छूटी तो संविधान पर संकट नज़र है आता,
कुर्सी मिलते ही इन्हें वही संविधान बड़ा सुहाता!
सड़कों पर जो भीड़ दिखे, उसे बताया जाए ख़ास,
विरोधी की भीड़ ‘अराजक’, अपनी भीड़ जनविश्वास।
भई, अपनी रैली तो लोकतंत्र है, उनकी रैली शोर,
सत्ता के इस खेल में, ‘सत्य’ हो गया है कमजोर।
रामजी भी सोच रहे होंगे, यह कैसी लीला न्यारी,
मेरे नाम पर चलती रहती, हर रोज़ नई तैयारी।
रचनाकार का परिचय
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इन्दौर – 452011, मध्य प्रदेश
मोबाइल: 98260 25986
कविता का भावार्थ: लोकतंत्र में हार और जीत को देखने का नजरिया, चुनाव आयोग पर उठते सवाल, संविधान के प्रति राजनीतिक दलों का रवैया और महापुरुषों के नाम पर होने वाली राजनीति—इन सभी विषयों पर यह कविता व्यंग्यात्मक सवाल खड़े करती है।
