खगड़िया/बिहार (राष्ट्र की परम्परा)
प्यार चाहे कितना भी गहरा हो,
पर बात जब
आत्मसम्मान कि हो,
अपने स्वाभिमान की हो,
अपमान और सम्मान की हो ,
तो मैं अक्सर थम जाता हूँ।
फिर अपने आप में रम जाता हूँ ।
चाहे वो चाँद का टुकड़ा हो,
परियों के ही मुखड़ा हो,
पर उन मासूका के
मासूमियत पे मैं,
ज़रा भी तरस न खाता हूँ।
ऐसा अक्सर होता है –
जब कोई आत्मसम्मान
को खोता है,
तो सचमुच दूसरों से,
कोई एतराज न होता,
पर चाह के भी खुद से,
प्यार न होता,
खुद से इस नराजगी से कोई ,
अंदर से टूट जाता है।
तो इंसान दूसरों से नहीं ,
बल्कि खुद से रूठ जाता है।
जब खुद से ही रूठ जाए,
ऊपर से सपनें उनके टूट जाए ।
तो फिर किये वो वादें क्या?
गैरों के नेक इरादे क्या ?
सबकुछ आँखों के सामने,
यूँ ही धूमिल हो जाता है,
सब मिट्टी में मिल जाता है।
तब बच जाता बस एक सहारा ,
कान्हा के चरणों की छाया।
जिस छाया में कितने फले-फूले,
कितनें पापी पवित्र हुए ।
दागिल सा यह दिल भी ,
आखिर यह तो समझ गया ।
जिसको भी समझा अपना ,
सच में वह तो पराया है।
आखिर में यह पता चला ,
यह बस केशव की माया है l
आदित्य राज
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