राजनीति में रिश्तों का टूट रहा दम—स्वार्थ की आंच में जलती मानवीय संवेदनाएं

कैलाश सिंह

महराजगंज( राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय लोकतंत्र की जड़ें सामाजिक संबंधों, विश्वास और संवाद की संस्कृति पर टिकी रही हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां रिश्तों का दम टूटता जा रहा है। मित्रता,सहयोग, सम्मान और नैतिक संबंधों की जिस परंपरा ने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया था, वह अब निजी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ती दिख रही है। राजनीति का स्वरूप जितना विस्तार पा रहा है, उतना ही मानवीय रिश्तों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है।
आज की राजनीति में दल बदल, अवसरवाद, वादे तोड़ना, भरोसा तोड़ना और गठबंधन का बिखरना आम तस्वीरें बन चुकी हैं। रिश्ते अब विचारधारा पर नहीं, बल्कि सत्ता- समीकरणों पर आधारित होने लगे हैं। नेता एक-दूसरे के साथ वर्षों पुरानी निष्ठा को एक झटके में त्याग देते हैं, और राजनीतिक रिश्तों की यह नाजुकता लोकतंत्र की सेहत के लिए गंभीर संकेत है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनीति में रिश्तों का यह पतन केवल नेताओं तक सीमित नहीं,यह संस्कृति समाज तक भी पहुंच रही है। जहां कभी राजनीतिक मतभेद स्वस्थ्य बहस का माध्यम होते थे, वहीं आज वे सामाजिक कटुता और व्यक्तिगत वैमनस्यता का रूप ले रहे हैं। राजनीतिक दलों में विचारधारा से अधिक महत्व व्यक्ति-पूजा और हित-समूहों ने ले लिया है। ऐसे में रिश्ते टिकते नहीं, केवल निभाए जाते हैं—वह भी स्वार्थ पूर्ति की सीमा तक।
कभी राजनीति समाज का दर्पण होती थी, आज राजनीति समाज के विचारों को दिशा देने का बड़ा माध्यम है। जब राजनीतिक रिश्ते ही स्वार्थ की बलि चढ़ेंगे, तो समाज में भरोसा और संवाद का ताना- बाना कैसे सुरक्षित रह पाएगा? यह प्रश्न केवल राजनेताओं के लिए नहीं, हम सबके लिए है।
आज राजनीति को रिश्तों की गरिमा, मर्यादा और विश्वसनीयता को फिर से पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, यह संस्कृति, विश्वास और संवाद से चलता है। राजनीतिक रिश्तों को पवित्र न सही, पर कम से कम जिम्मेदार तो होना ही चाहिए।
आखिर राजनीति का उद्देश्य सेवा है, साजिश नहीं, समन्वय है, टूटन नहीं, और रिश्तों को तोड़ना नहीं, जोड़ना है।
यदि राजनीति यह मूलमंत्र भूल गई, तो सत्ता की सीढ़ियां भले ही चढ़ जाएं, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा धीरे-धीरे दम तोड़ती रहेंगी।

Editor CP pandey

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