मनुष्य ने जब आग और पहिए की खोज की, वह सभ्यता की शुरुआत थी। जब उसने विज्ञान से दोस्ती की, उसने चमत्कार रचे। लेकिन इस चमत्कारों की अंधी दौड़ में हमने एक ऐसा आविष्कार कर लिया, जिसने अब जीवन के हर क्षेत्र को जकड़ लिया है और वह है प्लास्टिक। जो दिखने में बेगुनाह लगता है, वह अब इस पृथ्वी पर सबसे खतरनाक ज़हर बन चुका है और सबसे डरावनी बात यह है कि यह ज़हर अमर है।
धरती का हर तत्व प्रकृति के चक्र में प्रवेश कर विलीन हो जाता है। लेकिन प्लास्टिक…? प्लास्टिक सदियों तक जीवित रहता है, न सड़ता है, न गलता है, न मिटता है। एक छोटी सी थैली जो केवल 10 मिनट हमारे हाथों में रहती है, वह 500 साल तक मिट्टी में सड़ने के बजाय वहां ज़हर घोलती रहती है।
आज समुद्र में जितनी मछलियाँ नहीं, उससे अधिक प्लास्टिक है। हर साल 1 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक समुद्रों में डाला जाता है। मछलियाँ इसे खाना समझती हैं, पक्षी अपने बच्चों को प्लास्टिक खिला देते हैं, और अंततः यह ज़हर हमारी थालियों में लौट आता है। क्या हमने कभी सोचा है कि हम अपने ही शरीर को धीरे-धीरे प्लास्टिक खिला रहे हैं? आज शिशुओं के दूध में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया जा रहा है। हवा में, पानी में, यहां तक कि मानव शरीर के रक्त में भी प्लास्टिक के अंश मिल चुके हैं।
हमें प्लास्टिक से प्रेम नहीं, आलस्य से प्रेम है। हमें कपड़े का थैला उठाने में शर्म आती है, मिट्टी का कुल्हड़ भारी लगता है, केले के पत्ते पर खाना “पुराना ज़माना” लगता है। लेकिन क्या कभी सोचा है सुविधा के नाम पर हम क्या खो रहे हैं? हम वो ज़हर गले लगा बैठे हैं, जो हमारी नसों में घुलता जा रहा है।
भारत में हर दिन लगभग 26,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से आधा रिसाइक्लिंग तक नहीं पहुंचता। यह न केवल प्राकृतिक संसाधनों का हनन है, बल्कि आर्थिक क्षति भी है लाखों रुपये सफाई, रिसाइकलिंग और स्वास्थ्य समस्याओं में झोंके जा रहे हैं।
नीति निर्माण :– सरकार ने सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर रोक तो लगाई है, पर पालन का अभाव है।
स्थायी विकल्प :– कपड़े के थैले, बांस के ब्रश, स्टील की बोतलें, मिट्टी के बर्तन।
शिक्षा और जागरूकता :– स्कूलों, मीडिया और पंचायतों तक जागरूकता की क्रांति शुरू करनी होगी।
व्यक्तिगत संकल्प :– हर नागरिक को पूछना होगा – “क्या मैं प्लास्टिक मुक्त जीवन जी सकता हूँ?”
यह सिर्फ एक प्रदूषण की लड़ाई नहीं, यह हमारी आत्मा की लड़ाई है। अगर आज हमने अपने स्वार्थ को त्याग कर धरती का साथ नहीं दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। प्लास्टिक अमर है, लेकिन हमारा भविष्य नहीं। अगर हमने अभी नहीं जागरूकता दिखाई, तो वह दिन दूर नहीं जब प्लास्टिक तो बचा रहेगा, लेकिन हम नहीं।
आइए, आज संकल्प लें- “कम से कम एक प्लास्टिक छोड़ें, और एक पेड़ लगाएं।”
“प्रकृति को धन्यवाद देने का सबसे अच्छा तरीका है, उसे नुकसान पहुँचाना बंद करना।

कमलेश डाभी -पाटन गुजरात

Editor CP pandey

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