किसी का पद उसकी श्रेष्ठता
निश्चित नहीं कर सकता है,
पर उसका आचार व्यवहार ही
उसकी श्रेष्ठता तय करता है।
प्रशंसा सभी को प्रिय होती है,
पर कोई नहीं समझ पाता है,
कि यह महान विष के समान है,
यह सारे अहंकार की जननी है।
प्रशंसा उर्वरक का काम करती है,
इससे हमारी कुराह शुरू होती है,
प्रशंसा बिन कोई प्रसन्न नहीं होता
झूठ के बिना प्रशंसा नहीं होती है।
जीवन में किसी के आने का एक
उद्देश्य होता है, कुछ आजमाते हैं,
कुछ सिखाते हैं, उपयोग करते हैं,
तो कुछ जीवन का अर्थ बताते हैं।
आदित्य झूठ फ़रेब का जमाना है,
झूठ बोलकर शर्मिंदा नहीं होते हैं,
सच को भी झूठ साबित कर देते हैं,
अब अर्थ का अनर्थ निकाल लेते हैं।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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