दर्पण नहीं मुखौटे बदलते रहते हैं,
लोकतंत्र में संविधान नहीं साँसद,
विधायक व मंत्री बदलते रहते हैं,
संत्री से लेकर सचिव वही रहते हैं।
दर्पण टूटकर कई टुकड़े हो जाते हैं,
जितने टुकड़े उतने मुखड़े दिखाते हैं,
पर दर्पण का काम तो वही रहता है
मुखड़े अलग अलग रूप दिखाते हैं।
भारतीय राजनीति में नेता बदलते हैं,
पर कुर्सी और पदनाम वही रहता है,
काम और कारनामे बदल जाते हैं,
परंतु जनता का हाल वही रहता है।
यहाँ ग़रीब और ग़रीब हो जाता है,
अमीर का धन वैभव बढ़ जाता है,
जो सेवक बनकर वोट माँगता है,
चुनाव जीत माननीय हो जाता है।
दल कोई भी हो दल बदल करता है,
दल बदल कर दल दल बढ़ाता है,
आदित्य लोकतंत्र और संविधान,
दोनों का दर्पण रूप दिख जाता है।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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