बलिया (राष्ट्र की परम्परा)15 अक्टुबर..
जिस प्रकार सुखी होने के लिए अन्त:करण मे शांति आवश्यक है बिना शांति के सुखी होना असम्भव है। ठीक उसी प्रकार से राष्ट्र को सुखी होने के लिए समय समय पर क्रांति आवश्यक है बिना क्रांति के समाज सुखी नही हो सकता ।इस लिए समय -समय पर राष्ट्र हित मे वैचारिक क्रांति होनी चाहिए।
उक्त बातें पूर गांव मे चल रही भागवत कथा के पंचम दिवस पर पं.श्री प्रमोद शास्त्री जी ने कही। कथा के दौरान आपने बताया कि श्री कृष्ण पहले तो शांतिदूत बनते है यदि शांति से काम बन जाए पांडवों के साथ पूरा समाज सुखी हो जाए तो अच्छा है इस लिए वे स्वयं शांतिदूत बनकर दुर्योधन के पास जाते हैं।परन्तु दुर्योधन नही मानता तो सम्यक् क्रांति शंखनाद भी श्री कृष्ण ही करते हैं । अर्जुन के मोह ग्रसित हो जाने फर गीता का उपदेश देकर युद्ध हेतु प्रेरित करते हैं, यही है वैचारिक क्रांति। नंद महोत्सव, पूतना उद्धार, शकटासुर तृणावर्त आदि का उद्धार बाललीला की आनंददाई कथाओं का आध्यात्मिक रहस्य समझाते हुए आपने बताया कि पूतना हमारे जीवन की अविद्या है, शकटासुर मोह है व तृणावर्त रजोगुण है। बिना इन तीनों के समाप्त हुए जीवन में मक्खन की तरह कोमलता और मिठास नही आ सकती और परमात्मा हमे नही अपना सकता। जब उरोक्त तीनो दोष अविद्या, मोह और रजोगुण समाप्त हो जाएगा तो हमारा मन मक्खन की तरह निर्मल कोमल निर्लेप हो जाएगा। तब परमात्मा हमें अपनाएंगे तथा हमारी संसाराशक्ति रुपी दही की मटकी भगवान स्वयं तोड देंगे।
कथा के पूर्व यजमान अशोक सिंह ने ग्रंथ पूजन एवं व्यास पूजन किया।
संवाददाता बलिया..
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