आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक रुख: जनसुरक्षा बनाम पशु अधिकार बहस में नया अध्याय
भारत में बढ़ते डॉग बाइट मामलों, रेबीज संक्रमण और सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर वर्षों से चल रही बहस को 19 मई 2026 को निर्णायक मोड़ मिला, जब भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
यह फैसला केवल आवारा कुत्तों के पुनर्वास या नसबंदी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों के भयमुक्त और सुरक्षित जीवन के अधिकार तथा पशु संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने वाला ऐतिहासिक निर्णय बन गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों, खेल परिसरों और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों की अनियंत्रित मौजूदगी को सामान्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए राज्य सरकारों और नगर निकायों को कड़ी जिम्मेदारी निभाने के निर्देश दिए।
डॉग बाइट मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
सर्वोच्च अदालत के समक्ष रखे गए आंकड़ों ने स्थिति की भयावहता को उजागर किया। राजस्थान के श्रीगंगानगर में मात्र 30 दिनों में 1084 डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए, जबकि तमिलनाडु में चार महीनों के भीतर दो लाख से अधिक डॉग बाइट केस सामने आए।
अदालत ने टिप्पणी की कि यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति का संकेत है। न्यायालय ने कहा कि जब छोटे बच्चों के चेहरे नोचे जा रहे हों, बुजुर्गों पर झुंड बनाकर हमले हो रहे हों और लोग रेबीज के भय में जी रहे हों, तब अदालत जमीनी वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकती।
फैसले का पहला भाग: एबीसी नियमों और राज्यों की विफलता पर चिंता
फैसले के पहले भाग में सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों, एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) रूल्स 2023 तथा भारतीय पशु कल्याण बोर्ड द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की समीक्षा की।
अदालत ने पाया कि अधिकांश राज्यों में नसबंदी, टीकाकरण, पुनर्वास और शेल्टर प्रबंधन की स्थिति बेहद कमजोर है। कई राज्यों में एंटी-रेबीज वैक्सीन की भारी कमी, प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों का अभाव तथा नगर निकायों के बीच समन्वय की कमी सामने आई।
न्यायालय ने कहा कि यदि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों का समय पर और प्रभावी पालन किया गया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं बनती।
दूसरा भाग: पशु अधिकार बनाम नागरिक सुरक्षा
डॉग लवर्स और पशु अधिकार संगठनों ने अदालत में तर्क दिया कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उसी स्थान पर वापस छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 51A(जी) का हवाला देते हुए पशुओं के प्रति करुणा को नागरिकों का मौलिक कर्तव्य बताया।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि पशु संरक्षण महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा उससे कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।
न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं देता, बल्कि भयमुक्त और सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी प्रदान करता है। यदि कोई बच्चा स्कूल जाते समय डर में जी रहा है या बुजुर्ग सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तो राज्य का संवैधानिक दायित्व है कि वह नागरिकों की रक्षा करे।
तीसरा भाग: सार्वजनिक स्थानों से कुत्तों को हटाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों, खेल परिसरों, रेलवे स्टेशनों, बस डिपो, एयरपोर्ट और अन्य भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक क्षेत्रों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर नहीं छोड़ा जाएगा।
अदालत ने राज्यों और नगर निकायों को निर्देश दिए कि पर्याप्त संख्या में आधुनिक शेल्टर होम्स स्थापित किए जाएं, जहां भोजन, चिकित्सा, नसबंदी और टीकाकरण की समुचित व्यवस्था हो।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि रेबीज संक्रमित या अत्यधिक आक्रामक व्यवहार वाले कुत्तों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें आवश्यक परिस्थितियों में इच्छामृत्यु भी शामिल हो सकती है।
सर्वोच्च अदालत की यह टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही कि —
“लोगों की जान सबसे पहले है।”
राज्यों को चेतावनी और सख्त निर्देश
अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नए एनिमल बर्थ कंट्रोल केंद्र स्थापित करने तथा पर्याप्त मात्रा में एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
साथ ही न्यायालय ने कहा कि केवल कुत्तों को पकड़कर स्थानांतरित कर देना समाधान नहीं है। वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी, टीकाकरण, पुनर्वास और जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम चलाना आवश्यक है।
सुप्रीम Court ने नवंबर 2025 के आदेश का सही पालन न होने पर नाराजगी जताई और भविष्य में लापरवाही होने पर अवमानना कार्रवाई की चेतावनी भी दी।
मेनका गांधी की प्रतिक्रिया और व्यावहारिक चुनौतियां
पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि देशभर में पर्याप्त शेल्टर होम्स और पुनर्वास केंद्र बनाने के लिए लगभग तीन लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में बेहद कठिन दिखाई देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि रेबीज संक्रमित या अत्यधिक बीमार कुत्तों को इच्छामृत्यु देने का प्रावधान पहले से कानून में मौजूद है, लेकिन उसकी प्रक्रिया अत्यंत जटिल और कठोर नियमों से नियंत्रित है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती
भारत में करोड़ों की संख्या में मौजूद आवारा कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर, पशु चिकित्सालय, प्रशिक्षित स्टाफ और वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है।
नगर निकाय पहले से ही कचरा प्रबंधन, जल निकासी और शहरी अव्यवस्था जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में व्यापक स्तर पर डॉग शेल्टर प्रणाली खड़ी करना केवल न्यायिक आदेश से संभव नहीं होगा। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित नीति, भारी बजटीय निवेश और दीर्घकालिक शहरी नियोजन की आवश्यकता होगी।
अंतरराष्ट्रीय मॉडल और भारत की स्थिति
यूरोप के कई देशों में अनिवार्य पंजीकरण, व्यापक शेल्टर प्रणाली और पालतू पशुओं पर कठोर नियम लागू हैं। कुछ देशों में आक्रामक और संक्रमित कुत्तों के इच्छामृत्यु की स्पष्ट नीति भी है।
भारत की स्थिति इन मॉडलों के बीच फंसी हुई दिखाई देती है, जहां पशु अधिकार, धार्मिक-सांस्कृतिक संवेदनाएं, शहरी अव्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा एक-दूसरे से टकराती रहती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी जटिल संतुलन को स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है।
19 मई 2026 का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में केवल “डॉग बाइट केस” नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या, सार्वजनिक सुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाले ऐतिहासिक फैसले के रूप में याद किया जाएगा।
यदि राज्यों ने अदालत के निर्देशों के अनुरूप आधुनिक शेल्टर होम्स, प्रभावी नसबंदी कार्यक्रम, व्यापक टीकाकरण और वैज्ञानिक पुनर्वास नीति विकसित की, तो भारत में पहली बार आवारा कुत्तों की समस्या को समन्वित सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के रूप में देखा जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि अदालत न तो पशुओं के खिलाफ है और न ही पशु प्रेमियों की भावनाओं के विरोध में, लेकिन जब प्रश्न नागरिकों की जान, बच्चों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य का हो, तब राज्य की पहली जिम्मेदारी मनुष्यों के जीवन की रक्षा करना है।
✍️ लेखक : एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया महाराष्ट्र
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