वारि मथे बरु होई घृत,
सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिय
यह सिद्धांत अपेल॥
एक शिष्य ने अपने गुरुदेव से पूछा,
वजन बढ़े तो क्या करना चाहिये,
उत्तर था तन का बढ़े, व्यायाम करें,
यदि मन का बढ़े, थोड़ा ध्यान करें।
धन का बढ़े तो दान करना चाहिए,
और प्रेम करने से प्रेम ही फैलता है,
यही तो जीवन के क़र्म और धर्म हैं,
मानव जीवन के ये ही सदाचरण हैं।
जीवन एक पुस्तक की तरह है,
जिसमें प्रतिदिन जुड़ जाता है,
एक पन्ना और मानव जीवन के
अच्छे बुरे का यही लेखाजोखा है।
हर बार एक नया किस्सा, कभी धूप
की तपिश जैसी परेशानी का, कभी
खुशियों के आनन्द का प्रतिदिन एक
पन्ना इस पुस्तक में जुड़ता रहता है।
किसी ने मुझसे पूछा कि अहिंसा
अहिंसा रटने वाले का ऐसा अन्त
क्यों हुआ श्रीमन ? इस पर ज़रा
अपनी कविता में प्रकाश डालते।
मैने कहा साहब आपको पता तो
होगा ही, तो आप ही बता दीजिए,
वैसे तो अभी कल ही सारे देश सारी
सरकारों ने, गांधी की सराहना की है।
माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जी
मुख्यमंत्री से लेकर संतरी तक सभी
ने कहा है कि रामराज्य के लिए गांधी
का दिखाया मार्ग ही सबसे अच्छा है।
और आज आप उन गांधी की बातों
का विरोध कर रहे, जिनके श्रीमुख से
हे ! राम निकला था जब हत्यारे की
गोलियाँ चीर गई थीं उनके सीने को।
तुलसी दास ने भी यही कहा था,
और आज मैं फिर कह रहा हूँ कि,
सुर नर मुनि सब जतन कराहीं।
अंत राम मुख आवत नाहीं ॥
आदित्य भारत के कृतज्ञ देशवासियों,
ऐसा था अंत महात्मा गांधी जी का,
उनकी सत्य अहिंसा का और उनके
हत्यारे की गोलियों की बौछारों का।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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