Thursday, April 16, 2026
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बलूचिस्तान में चीनी सेना की आशंका, भारत के लिए क्यों है बड़ा खतरा?

चीन की नजर बलूचिस्तान पर? मीर यार बलोच की चेतावनी से बढ़ी भारत की रणनीतिक चिंता

सांकेतिक

इस्लामाबाद /नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई है। बलूच नेता मीर यार बलोच द्वारा भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को लिखे गए एक खुले पत्र ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। पत्र में मीर यार बलोच ने आशंका जताई है कि यदि हालात यूं ही बने रहे तो आने वाले कुछ महीनों में चीन बलूचिस्तान में अपनी सैन्य टुकड़ियां तैनात कर सकता है, जो न सिर्फ बलोच जनता बल्कि भारत की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा होगा।

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मीर यार बलोच ने साफ शब्दों में कहा है कि छह करोड़ बलोच लोगों की सहमति के बिना बलूचिस्तान की धरती पर चीनी सेना की मौजूदगी एक अकल्पनीय चुनौती बन सकती है। उनका तर्क है कि पाकिस्तान पहले से ही बलूच आंदोलन को दबाने के लिए सैन्य दमन का रास्ता अपनाता रहा है और यदि चीन भी प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुआ, तो यह संघर्ष और असमान हो जाएगा।
भू-रणनीतिक दृष्टि से बलूचिस्तान बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। इसके उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान, पश्चिम में ईरान और दक्षिण में अरब सागर स्थित है। यही नहीं, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिसका भारत पहले से विरोध करता रहा है क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर निकलती है।

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इतिहास पर नजर डालें तो 1948 तक बलूचिस्तान एक स्वतंत्र राजशाही के रूप में अस्तित्व में था और ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं था। मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जे के बाद से ही बलोच समाज लगातार प्रतिरोध करता आ रहा है। बीते 75 वर्षों में हजारों बलोच नागरिकों के मारे जाने के आरोप पाकिस्तानी सेना पर लगते रहे हैं।
मीर यार बलोच ने हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत सरकार की सराहना भी की और कहा कि भारत और बलूचिस्तान दोनों के सामने खतरे वास्तविक हैं, इसलिए संबंध भी केवल नैतिक समर्थन तक सीमित न रहकर ठोस रणनीति पर आधारित होने चाहिए। उन्होंने इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर नई दिल्ली में बलूचिस्तान का दूतावास खोलने की मांग भी की थी।

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मई 2025 में मीर यार बलोच द्वारा पाकिस्तान से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता की घोषणा और संयुक्त राष्ट्र से मान्यता की अपील ने इस मुद्दे को और वैश्विक बना दिया है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि भारत इस घटनाक्रम पर क्या रुख अपनाता है।

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