मानव जनित स्वभाव विचित्र है,
जो व्यक्ति उसे अच्छा लगता है,
उसकी सब बुराइयाँ भूल जाता है,
बुरा बर्ताव अच्छा लगने लगता है।
और जो व्यक्ति उसे बुरा लगता है,
उसकी अच्छाइयाँ भी भूल जाता है,
नफ़रत की ज्वाला में सुलगता है,
उसकी भलमंसाहत भूल जाता है।
मनोविकार होना मानव स्वभाव है,
उनका परिमार्जन जीवन लक्ष्य है,
यह विकार पैदाइशी नहीं होते हैं,
संगति व परिस्थिति वश होते हैं।
निंदा और प्रशंसा स्वाभाविक हैं,
इन पर सद्विवेक सबसे अपेक्षित है,
ये दोनों मानव गुण चरित्र बनाते हैं,
हम सबको सुधरने का मौक़ा देते हैं।
निंदा आत्म निरीक्षण करवाती है,
प्रशंसा आत्ममुग्धि जनित होती है,
आदित्य विवेकवान को दोनों ग्राह्य हैं,
पर विवेकहीनता दिग्भ्रमित करती है।
डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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