Category: लेख

निंदा से डरे बिना काम करते रहना चाहिए: सावित्रीबाई फुले

मराठी कवयित्री, भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन की नायिका, भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, शोषितों-वंचितों एवं पिछड़ गए लोगों की सशक्त आवाज, नारी शिक्षा को समर्पित सावित्रीबाई फुले जी की…

हिन्दी साहित्य के मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार जैनेन्द्र कुमार: विचार, संघर्ष और रचना-दृष्टि

पुनीत मिश्र हिन्दी साहित्य के इतिहास में जैनेन्द्र कुमार का नाम एक ऐसे रचनाकार के रूप में स्थापित है, जिन्होंने कथा-साहित्य को बाह्य घटनाओं की दुनिया से निकालकर मनुष्य के…

डिजिटल युग, युवा भारत और स्वभाव की राजनीति: अधिकारों से आगे मानवता का मार्ग

व्यक्ति से विश्व-मानवता तक सफ़लता का शाश्वत दर्शन – स्वभाव ही जीवन की दिशा तय करता है गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मनुष्य का जीवन केवल उसकी शिक्षा, धन या पद…

बिना प्रशिक्षण के शिक्षक, अधूरी शिक्षा: क्या दांव पर है बच्चों का भविष्य?

डिजिटल शिक्षा और बदलती शिक्षा व्यवस्था ✍️ सोमनाथ मिश्रा, (राष्ट्र की परम्परा) देश की शिक्षा व्यवस्था तेजी से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है। स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ई-कंटेंट…

सरकारी शिक्षा व्यवस्था : अब सिर्फ सुधार नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत

डॉ. सतीश पाण्डेयमहराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। देश की रीढ़ कही जाने वाली सरकारी शिक्षा व्यवस्था आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। कागजों में करोड़ों के बजट, योजनाओं…

महादेव देसाई: गांधी के शब्द, संघर्ष की आत्मा और राष्ट्रवाद वाहक

✍️ पुनीत मिश्र महादेव देसाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अनन्य सिपाहियों में थे, जिनका योगदान मंच से कम और संघर्ष की अंतर्धारा में अधिक दिखाई देता है। वे केवल…

आत्ममंथन का समय: क्या सरकारी योजनाएं हकदारों तक पहुँच रही हैं या अपात्रों की ढाल बन चुकी हैं?

राहत या राजनीति?- क्या सरकारी राहत वास्तव में पात्रों तक पहुँच रही है?या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में व्यवस्था खोखली हो रही है? गोंदिया – वैश्विक स्तरपर नव वर्ष 2026 केवल कैलेंडर…

पद्मविभूषण सत्येन्द्रनाथ बोस: जब भारतीय मेधा ने विश्व भौतिकी की दिशा बदली

✍️ नवनीत मिश्र भारतीय विज्ञान के इतिहास में सत्येन्द्रनाथ बोस का स्थान एक ऐसे वैज्ञानिक का है, जिसने सीमित साधनों और औपनिवेशिक दौर की बाधाओं के बीच भी विश्व-विज्ञान को…

गायत्री मानव चेतना के जागरण का सनातन सूत्र

कैलाश सिंहमहराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय सनातन परंपरा की आत्मा यदि किसी एक शब्द में समाहित दिखाई देती है, तो वह है गायत्री। यह केवल एक मंत्र, देवी या धार्मिक…

श्रीलाल शुक्ला: ‘रागदरबारी’ के जरिए भारतीय व्यवस्था की तीखी पड़ताल

नवनीत मिश्र हिन्दी साहित्य में श्रीलाल शुक्ला ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने कल्पना के आवरण में नहीं, बल्कि यथार्थ की कठोर ज़मीन पर खड़े होकर लेखन किया। उनका चर्चित उपन्यास रागदरबारी…

2026 का संकल्प: व्यक्तिगत सफलता नहीं, सामूहिक राष्ट्रीय उत्थान का वर्ष

नववर्ष 2026-व्यक्तिगत आकांक्षाओं से राष्ट्रीय संकल्प तक-वैश्विक जिम्मेदारी की ओर बढ़ता भारत- करना है ऐसा धमाल- दुनियाँ कहे वाह रे भारत माता के लाल! गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत सहित…

AI और शिक्षा: शिक्षक का विकल्प या सीखने का सशक्त सहायक?

सोमनाथ मिश्र की कलम से(राष्ट्र की परम्परा)।डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) शिक्षा व्यवस्था में तेजी से प्रवेश कर रही है। स्मार्ट क्लासरूम, पर्सनलाइज्ड लर्निंग ऐप्स, ऑटोमैटिक मूल्यांकन और वर्चुअल…

दुष्यंत कुमार: असहमति, संवेदना और समय की आवाज

नवनीत मिश्र दुष्यंत कुमार हिन्दी कविता और ग़ज़ल की परंपरा में वह सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने शब्दों को सौंदर्य की सीमा से निकालकर सामाजिक संघर्ष का माध्यम बनाया। उनकी रचनाएँ…

शिक्षा में असमानता: सपनों पर भारी होती अमीरी-गरीबी की खाई

(शिक्षा डेस्क – राष्ट्र की परम्परा)शिक्षा को किसी भी समाज की प्रगति और समानता की सबसे सशक्त आधारशिला माना जाता है। यही वह माध्यम है, जो व्यक्ति को उसकी सामाजिक-आर्थिक…

रामानंद सागर: टेलीविजन पर संस्कृति और संस्कारों के अमिट हस्ताक्षर

पुनीत मिश्र भारतीय टेलीविजन के इतिहास में रामानंद सागर का नाम उस सृजनात्मक क्रांति का प्रतीक है, जिसने छोटे परदे को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक…