छपकर बिकते थे कभी, सच के थे अख़बार,अब तो बिककर छप रहे, कलम है शर्मसार॥
✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ सच की कीमत लग गई, बोली लगे बाज़ार,ख़बरों के भी दाम हैं, बिकता हर विचार।इश्तहारों के तले, दबे जन सरोकार—छपकर बिकते थे कभी, सच के थे…
निष्पक्ष खबर, सशक्त विचार
✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ सच की कीमत लग गई, बोली लगे बाज़ार,ख़बरों के भी दाम हैं, बिकता हर विचार।इश्तहारों के तले, दबे जन सरोकार—छपकर बिकते थे कभी, सच के थे…
✍️ डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र‘आदित्य’ बन्द मुट्ठी सवा लाख की,खुल गयी तो ख़ाक की,कहावत कितनी प्रसिद्ध है,अपने आप से यह सिद्ध है। बन्द मुट्ठी में जो कुछ भी होता है,इंसान…
चर्म औ अस्थि की देह को ही बनाया है घर।तो अपनी आत्मा को इसका मेहमान मानिए।। छल प्रपंचों में ही नित लगे हो सदा।फिर भी मां औ पिता को वरदान…
✍️ – संजय एम. तराणेकर जहाँ दिल ‘पत्थर’ के हो जाते हैं,वहाँ पे सोना भी पिघलता नहीं।आँखों का पानी सूख जाता है,दर्द फिर बाहर निकलता नहीं। जब शब्दों में कड़वाहट…
सच है, सत्य मानो जैसे पाताल में खो गया हो,अब तो झूठ ही जगत पर छाया हुआ प्रतीत होता है।पुरानी कहावत भी आज सच लगती है—“दो टके की पगड़ी, छ:…
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर राजकीय बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर, क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र गोरखपुर एवं गोरखपुर लिटरेरी सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में 18 अप्रैल 2026 को…
श्रीराम जय राम, जय जय राम,है अवध पुरी अति पावन धाम,रघुकुल रीति ही जहाँ की शान,प्राण जायँ पर वचन की आन। भरत, शत्रुघन, लक्ष्मण भाईममता मयी हैं कौशल्या माई,माँ कैकेयी,…
उन दीवारों से पूछो वो ‘रातें’ कैसी थीं,जब ‘रोटी’ भी छुप-छुप के खाती थी।उनके आँसू भी ‘आवाज़’ न करें कहीं,इस डर से हर ‘पीड़ा’ दबाई जाती थी।नन्ही-सी उम्र में सपने…
गर्दन को झुकाकर मोबाइल में यदिअजनबी रिश्तों से हम जुड़ सकते हैं,हकीकत के रिश्तों में गर्दन झुकाकरएक दूसरे को भी हम समझ सकते हैं। सर झुका ट्विटर ट्विटर सब कर…
-डॉ. प्रियंका सौरभ नन्हा बच्चा साइकिल चलाए,धीरे-धीरे आगे जाए। पीले-पीले फूल खिले,देख उन्हें वो खुश हो मिले। छोटी-छोटी आँखें हँसती,मस्ती में हर बात है बसती। हवा संग वो गुनगुनाए,खुशियों के…
✍️ डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’ मैया शैलसुता ब्रह्मचारिणी माँ,चंद्रघंटा देवी कुशमांडा माता,स्कन्दमाता कात्यायिनी माता,कालरात्रि, महागौरी सिद्धिदात्रीमाता का आवाहन करिये करिये। युग पाणि जुड़े हैं विनती में,हे मातु दया करिये…
परिचय अपने ही देश में बेघर दर्द झेलना और शरणार्थी जैसा जीवन जीना आज की सबसे बड़ी विडंबना बनता जा रहा है। प्रस्तुत विडंबना कविता समाज के उस सच को…
— डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’ आदित्य मति खोजि-खोजि,गूगल-ऊगल में सर्च करत,झूठ और साँच का भेद सबै,कवित्त रचना लिखावतो। सीता-राम, राधा-कृष्ण,शिव-शिवा, शंकर-सती,देव-दनुज, नर और नारी,सबकी महिमा बतावतो। तुलसीकृत रामचरित मानस,गीता,…
सीट सामान्य भई जब सेदस-पंद्रह सोच भई है सयानीभौजिक पांव गहे महतारीतुंही अब लाज बचाओ भवानीकेहुक है रुपया परदेसिककेहुक जेवर भैंस बिकानीजीति जो जाब बोलेरो लयाइबऐस तिजोरी भई परधानी। बाभन-ठाकुर…
डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र‘आदित्य’ शतरंज के खिलाड़ी हों या प्यादे,अच्छे लोग सदा ही सस्ते होते हैं,बस मीठा बोल बना लो अपना,यद्यपि वह लोग अनमोल होते हैं। शायद इसीलिए हम लोग…