ऊँची जितनी दुकान होती है,
मिठास उतनी फीकी होती है,
ऊँच निवास नीचि करतूती,
देखि न सकहिं पराई विभूती।
रिश्ते, प्रेम और मित्रता,
हर जगह में पाये जाते हैं,
सम्मान जहाँ मिलता है,
ये ठहर वहीं पर जाते हैं।
सलीका भी तो होता है,
भीगी आँखें पढ़ लेने का,
किसी के बहते आंसुओं,
से भी बातें कर लेने का।
ऐसी वाणी बोलिये,
मन का आपा खोय,
औरों को शीतल करे,
आपहु शीतल होय।
सलीका भी है और समझ भी है,
किसी का दुःख दर्द समझने का,
ढाई अक्षर प्रेम के बोल देता हूँ,
किसी को अन्यथा नहीं लेने का।
संभलते, बिखरते आये, फिर संभले हम,
जीवन की हर राह पे कुछ सिमट गये हम,
जमाने की क्या बात करें, इससे बचा हूँ,
प्रेम के ढाई अक्षर से पर मजबूर मैं हूँ।
प्यार की इस डोर को सम्भाल कर रखना,
ज़माना बदलता रहता है भरोसा न रखना,
संभलना, बिखरना दुनिया का दस्तूर है,
आदित्य ज़िंदगी छोटी है, सम्भाले रखना।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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