Thursday, July 16, 2026
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अकबरपुर में नवनिर्मित सीवर टैंक बना मौत का कुंआ, जहरीली गैस से तीन की मौत, एक गंभीर

कानपुर देहात (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) जिले के अकबरपुर क्षेत्र में रविवार को दर्दनाक हादसा हो गया। एक नवनिर्मित सीवर टैंक में जहरीली गैस के प्रभाव से तीन युवकों की मौत हो गई, जबकि एक अन्य युवक की हालत नाजुक बनी हुई है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा ले रहे हैं।

जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) अरविंद मिश्रा ने बताया कि अकबरपुर में सीवर टैंक के अंदर जहरीली गैस भर जाने से यह हादसा हुआ। टैंक में काम कर रहे चार लोग बेहोश हो गए थे। सूचना मिलते ही पुलिस और स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे और उन्हें बाहर निकाला। इनमें से तीन युवकों को अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया, जबकि एक अन्य की हालत गंभीर बनी हुई है। उसका उपचार जारी है।

एसपी मिश्रा ने कहा कि घटना की जांच की जा रही है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, सीवर टैंक के अंदर पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम किए बिना मजदूर उतरे थे। टैंक में जहरीली गैस की मौजूदगी के कारण उनका दम घुट गया और हादसा हो गया।

हादसे के बाद इलाके में शोक की लहर है। मृतकों के परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को हर संभव मदद का आश्वासन दिया है।

अखिलेश यादव का भाजपा पर हमला, बोले– “चीन पर बढ़ती निर्भरता से देश में बढ़ रही बेरोजगारी”

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रविवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘स्वदेशी’ जैसे दावों के विपरीत देश में चीन से आयातित सामानों पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा असर भारतीय उद्योग-धंधों और छोटे व्यापारियों पर पड़ रहा है।

अखिलेश यादव ने ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, “यही है तथाकथित आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और चीनी सामान के बहिष्कार के भाजपाई जुमलों का चिंताजनक सच।”

उन्होंने विस्तार से समझाते हुए लिखा, “चीन से आने वाले सामानों पर जिस तरह भारत की निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है, उसका बुरा असर हमारे उद्योगों, कारखानों और दुकानों के कामकाज पर पड़ा है। कारोबार घट रहा है और बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ रही है।”

सपा प्रमुख ने भाजपा को आगाह करते हुए कहा कि उसे “चीनी चाल की क्रोनोलॉजी” समझनी होगी। अखिलेश ने व्यंग्य करते हुए कहा, “पहले चीन अपना माल भारत के बाजारों में भर देगा, जिससे भारत उसकी निर्भरता में इतना उलझ जाएगा कि उसकी हर गलत हरकत को भाजपा सरकार नजरअंदाज करने के लिए मजबूर हो जाएगी।”

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार की नीतियों ने घरेलू उद्योगों को कमजोर कर दिया है और चीन को मजबूत। अखिलेश ने सवाल उठाया कि जब हर मुद्दे पर स्वदेशी का नारा दिया जाता है, तब चीनी सामानों का बढ़ता आयात भाजपा के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।

सपा प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में आयात-निर्यात और बेरोजगारी को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष भाजपा सरकार पर “बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने और छोटे व्यापारियों को नुकसान पहुंचाने” का आरोप लगाता रहा है।

उत्तर प्रदेश में आठ आईपीएस अफसरों के तबादलेकानपुर देहात और श्रावस्ती के एसपी सहित कई जिलों में फेरबदल

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) उत्तर प्रदेश शासन ने देर रात पुलिस महकमे में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया। सरकार ने आठ आईपीएस अफसरों के तबादले कर दिए हैं। इनमें कानपुर देहात और श्रावस्ती के पुलिस अधीक्षक सहित कई जिलों के कप्तान व अधिकारी शामिल हैं।

जारी आदेश के अनुसार, कानपुर देहात के पुलिस अधीक्षक को हटा दिया गया है और उनकी जगह नए एसपी की तैनाती की गई है। इसी तरह श्रावस्ती के एसपी को भी स्थानांतरित कर दिया गया है। वहीं शामली के डिप्टी एसपी को भी हटा दिया गया है।

सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में कानून-व्यवस्था और विभागीय कार्यप्रणाली को लेकर सरकार ने यह कदम उठाया है। तबादलों का मकसद जिलों में पुलिसिंग व्यवस्था को और प्रभावी बनाना है।

गृह विभाग द्वारा जारी सूची में अन्य पाँच आईपीएस अफसरों के भी तबादले शामिल हैं। इन अधिकारियों को नई जगहों पर पदस्थापित कर संबंधित जिलों में तत्काल कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए हैं।

इस प्रशासनिक फेरबदल को आने वाले त्योहारी सीजन और पंचायत उपचुनावों की दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।

सेनापति जिले में पुष्प महोत्सव कवर कर रहे टीवी पत्रकार पर गोलीबारी

सांकेतिक फोटो

इंफाल/कोहिमा (राष्ट्र की परम्परा) मणिपुर के सेनापति जिले में शनिवार शाम एक टीवी पत्रकार पर जानलेवा हमला हुआ। नगालैंड स्थित ‘हॉर्नबिल टीवी’ के पत्रकार दीप सैकिया पुष्प महोत्सव की कवरेज कर रहे थे, तभी उन पर गोली चला दी गई। पुलिस के अनुसार, घटना लाई गांव में हुई, जो नगा बहुल क्षेत्र है।

गोलीबारी में सैकिया के हाथ और पैरों में चोटें आईं। उन्हें पहले सेनापति जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए नगालैंड रेफर कर दिया गया।

पुलिस ने बताया कि हमलावर को मौके पर ही स्थानीय लोगों ने पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। उसके पास से एक एयर गन बरामद हुई है। अभी तक हमले के पीछे की मंशा स्पष्ट नहीं हो सकी है। पुलिस मामले की जांच में जुटी है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले नगालैंड के उपमुख्यमंत्री यानथुंगो पैटन ने वोखा जिले में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान सैकिया की रिपोर्टिंग को लेकर आलोचना की थी।

हमले की निंदा करते हुए ‘हॉर्नबिल टीवी’ के संपादक जुथोनो मेक्रो ने कहा कि यह घटना प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है। उन्होंने मणिपुर और नगालैंड की सरकारों से निष्पक्ष एवं त्वरित जांच की मांग की है।

जस्टिस रेड्डी संवैधानिक नैतिकता और हाशिये की आवाज़ों के रक्षक

इंडिया गठबंधन द्वारा उपराष्ट्रपति पद के लिए जस्टिस सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाने का निर्णय न केवल सराहनीय है, बल्कि मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा होने का प्रतीक भी है।

वे भले ही सुप्रीम कोर्ट की बेंच से सबसे चर्चित नामों में न रहे हों, लेकिन उनकी न्यायशास्त्रीय दृष्टि और फ़ैसले उनकी गहरी संवैधानिक चेतना के गवाह हैं। ख़ासकर हाशिये पर पड़े वर्गों की सुरक्षा और कार्यपालिका की मनमानी पर रोक लगाने में उनके निर्णय अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। सलवा जुडूम का फ़ैसला आज भी भारतीय संवैधानिक कानून का मील का पत्थर माना जाता है, जहाँ अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य की जवाबी कार्रवाई मौलिक अधिकारों की क़ीमत पर नहीं हो सकती।

न्यायपालिका को राजनीति से दूर रखने की आस्था

1948 में जन्मे जस्टिस रेड्डी ने हैदराबाद के लॉ कॉलेज से विधि की पढ़ाई की। छात्र जीवन से ही उनमें संवैधानिक मूल्यों, न्याय और सामाजिक सरोकार के प्रति गहरी निष्ठा दिखने लगी थी। 1971 में वकालत शुरू करने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक मामलों व जनहित याचिकाओं में बेख़ौफ़ दलीलें रखीं।

1995 में उन्हें आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया और 2007 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। उनके फ़ैसले संविधान के प्रति गहरी निष्ठा, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और पारदर्शी शासन की प्रतिबद्धता दर्शाते हैं। वे नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के अध्यक्ष भी रहे और आम नागरिकों तक न्याय की पहुँच सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएँ शुरू कीं।

बेबसों के लिए ढाल

2007 से 2011 तक सुप्रीम कोर्ट में उनका कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन उसमें सलवा जुडूम फ़ैसले जैसी गूंजती हुई मिसाल शामिल है।

2011 में नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में उनके नेतृत्व वाली पीठ ने सलवा जुडूम आंदोलन को असंवैधानिक ठहराया। यह राज्य-समर्थित अर्धसैनिक अभियान था, जिसमें विशेष पुलिस अधिकारियों के रूप में अनपढ़-नासमझ आदिवासी युवकों को हथियार थमा दिए गए थे। फ़ैसले में कहा गया कि यह व्यवस्था न केवल अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है, बल्कि संविधानिक दायित्व से पलायन भी है।

जस्टिस रेड्डी ने साफ़ शब्दों में कहा कि नागरिकों को हथियारबंद कर हिंसक संघर्ष में झोंकना, राज्य का “संवैधानिक जिम्मेदारी से पलायन” है। यह फ़ैसला न केवल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला था, बल्कि इसने यह मानक भी स्थापित किया कि कोई भी सुरक्षा नीति संविधान की चौखट से बाहर नहीं हो सकती। इसे भारतीय न्यायिक इतिहास में “न्यायिक मानवतावाद” का उज्ज्वल उदाहरण माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश (2007–2011) जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी ने सलवा जुडूम मामले के ऐतिहासिक फ़ैसले के ज़रिए भारतीय संविधान में अमूल्य योगदान दिया। इस निर्णय में उन्होंने आदिवासी समुदायों की रक्षा की और संवैधानिक मर्यादाओं को सुदृढ़ किया। न्याय और नैतिकता के प्रति उनका समर्पण केवल अदालत की बेंच तक सीमित नहीं रहा — लोकायुक्त और पर्यावरण निगरानी जैसे दायित्वों में भी उन्होंने संस्थागत ईमानदारी और भ्रष्टाचार-विरोधी तंत्र को मजबूत करने का प्रयास किया।

विधायिका और न्यायपालिका की सीमाएं

फ़ैसले के बाद कई बार इसे दरकिनार करने की कोशिशें हुईं। लेकिन 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा स्पष्ट किया कि इस विषय पर नया कानून बनाना अवमानना नहीं होगा, पर मूल फ़ैसले की संवैधानिक आत्मा को बदला नहीं जा सकता। इस तरह जस्टिस रेड्डी द्वारा खींची गई संवैधानिक रेखा शासन और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन की कसौटी बनी रही।

सेवानिवृत्ति के बाद भी संवैधानिक सेवाएं

सेवानिवृत्ति के बाद भी जस्टिस रेड्डी ने संवैधानिक मूल्यों को जिया। 2013 में वे गोवा के पहले लोकायुक्त बने। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के खनन प्रभाव क्षेत्रों के लिए पर्यावरणीय योजना की निगरानी का ज़िम्मा उन्हें सौंपा। यह उनके निष्पक्ष प्रशासनिक कौशल और पर्यावरणीय न्याय के प्रति भरोसे का प्रमाण था।

“हमारा संविधान हमारा है”

हाल ही में एक पुस्तक “संविधान की प्रस्तावना” के विमोचन अवसर पर उन्होंने उन बुद्धिजीवियों की आलोचना की, जो कहते हैं कि भारतीय संविधान वास्तव में भारत का नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि संविधान निर्माण के दिन ऑर्गेनाइज़र पत्र ने तिरंगे और संविधान दोनों को अस्वीकार किया था।

इस संदर्भ में उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के उत्तर को दोहराया कि यदि संविधान ने कई वैश्विक स्रोतों से अच्छे विचार अपनाए, तो इसमें शर्म कैसी — “अच्छे विचार चाहे जहाँ से मिलें, उन्हें अपनाना ही बुद्धिमानी है।” उन्होंने गांधीजी का कथन उद्धृत किया — “मेरे घर की सभी खिड़कियाँ खुली हैं, ताकि हर दिशा से अच्छे विचार भीतर आ सकें।”

उन्होंने यह भी कहा कि कृत्रिम रूप से गांधी और अम्बेडकर के बीच टकराव दिखाने की कोशिश करना बौद्धिक बेईमानी है।

नेहरू की दृष्टि और संघीयता

जस्टिस रेड्डी ने पंडित नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव की भी चर्चा की, जिसे उन्होंने 31 अप्रैल 1946 को पेश किया था। इसमें राज्यों को अधिक अधिकार और केंद्र को केवल आवश्यक शक्तियाँ देने की कल्पना की गई थी। उन्होंने आलोचकों से सवाल किया कि जो लोग नेहरू के योगदान को छोटा करते हैं, क्या वे उनकी बौद्धिक गहराई को समझते भी हैं?

न्यायपालिका का मानवीय चेहरा

जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी आज न्यायिक नैतिकता, मानवाधिकार और संवैधानिक नैतिकता के प्रतीक के रूप में खड़े हैं। उनकी उम्मीदवारी केवल एक संवैधानिक पद के लिए नामांकन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों को बचाए रखने का संकल्प भी है। सलवा जुडूम फ़ैसला उनका स्थायी न्यायिक धरोहर है, जिसने दिखाया कि क़ानून महज़ शासन का उपकरण नहीं, बल्कि न्याय और करुणा का साधन भी हो सकता है।

एम. श्रीधर आचार्युलु हैदराबाद क़ानून के प्रोफ़ेसर हैं

राधा अष्टमी पर मुख्यमंत्री योगी समेत प्रमुख नेताओं ने दी शुभकामनाएं

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) उत्तर प्रदेश में रविवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ राधा अष्टमी पर्व मनाया गया। इस अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने प्रदेशवासियों को बधाई दी और राधारानी के चरणों में नमन किया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर पोस्ट करते हुए लिखा—
“पावन पर्व ‘राधा अष्टमी’ की सभी श्रद्धालुओं एवं प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई! निष्काम प्रेम, करुणा व भक्ति की साक्षात स्वरूप श्री राधा रानी जी की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति व समृद्धि का संचार हो, यही प्रार्थना है। जय श्री राधे!”

वहीं, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी एक्स पर शुभकामनाएं दीं। उन्होंने लिखा—
“पावन पर्व राधा अष्टमी की सभी श्रद्धालुओं एवं प्रदेशवासियों को अनंत शुभकामनाएं! प्रेम, भक्ति और करुणा की अविनाशी ज्योति श्री राधारानी जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन। उनकी कृपा से हम सभी के जीवन में शांति, सुख एवं समृद्धि का प्रवाह बना रहे। जय श्री राधे!”

प्रदेश के विभिन्न मंदिरों में रविवार को भक्तों की भीड़ उमड़ी। खासकर वृंदावन, बरसाना और मथुरा के मंदिरों में राधा रानी के जन्मोत्सव पर विशेष पूजा-अर्चना और भजन-संध्या का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने राधा-कृष्ण के दर्शन कर सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की।

राधा अष्टमी को प्रेम, भक्ति और आत्मसमर्पण का पर्व माना जाता है। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधारानी का प्राकट्य हुआ था। इस दिन राधा-कृष्ण की आराधना से जीवन में आनंद और संतोष की प्राप्ति होती है।

शिक्षा का बाज़ार और कोचिंग की बढ़ती निर्भरता

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जब विद्यालय शिक्षण का केंद्र नहीं रहते, तो शिक्षा व्यापार बन जाती है

हर तीसरा स्कूली छात्र प्राइवेट कोचिंग ले रहा है। शहरी परिवार औसतन 3988 रुपये सालाना कोचिंग पर खर्च कर रहे हैं। ग्रामीण परिवार औसतन 1793 रुपये सालाना खर्च करते हैं। विद्यालयों की शिक्षण गुणवत्ता कमजोर होने से अभिभावक मजबूर हैं। कोचिंग से शिक्षा असमानता और रटंत संस्कृति बढ़ रही है।
आज शिक्षा का स्वरूप केवल कक्षा-कक्ष तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह एक विशाल बाज़ार का रूप ले चुका है। हाल ही में आए सर्वेक्षण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हर तीसरा स्कूली छात्र प्राइवेट कोचिंग की ओर बढ़ रहा है। यह स्थिति केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गाँवों और कस्बों तक फैल चुकी है। शिक्षा, जो कभी घर-परिवार और समाज की साझा जिम्मेदारी मानी जाती थी, अब पूरी तरह बाज़ारीकरण और व्यवसायीकरण की चपेट में आ चुकी है।

कोचिंग संस्थानों का इतना व्यापक चलन इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारे विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है। शिक्षक-छात्र अनुपात असंतुलित है, स्थायी शिक्षकों की भारी कमी है और सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का अभाव है। यही कारण है कि अभिभावक अतिरिक्त खर्च उठाकर भी अपने बच्चों को कोचिंग क्लासेज़ भेजने के लिए मजबूर हैं। शिक्षा पर खर्च किसी परिवार के लिए केवल आर्थिक दबाव ही नहीं, बल्कि मानसिक बोझ भी है।

कोचिंग पर खर्च बढ़ने के पीछे कई सामाजिक कारण भी हैं। प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में बढ़ती होड़, नौकरी की असुरक्षा और उच्च शिक्षा में प्रवेश की कठिनाइयाँ बच्चों को प्रारंभिक स्तर से ही अतिरिक्त पढ़ाई की ओर धकेल देती हैं। शहरों में यह प्रवृत्ति और अधिक है क्योंकि वहाँ प्रतियोगिता तीव्र है, वहीं गाँवों में भी धीरे-धीरे यह चलन गहराता जा रहा है।

यह प्रश्न केवल निजी खर्च का नहीं, बल्कि शिक्षा की दिशा और दशा का है। जब बच्चे स्कूल जाकर भी पर्याप्त ज्ञान अर्जित नहीं कर पाते और उन्हें वही विषय दोबारा कोचिंग में पढ़ना पड़ता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि विद्यालयों की शिक्षण पद्धति में गंभीर खामियाँ हैं। शिक्षक यदि प्रेरक हों, पाठ्यपुस्तकें उपयोगी हों और वातावरण सकारात्मक हो तो बच्चों को स्कूल से बाहर कोचिंग की आवश्यकता ही न पड़े।

सर्वेक्षण यह भी दर्शाता है कि ग्रामीण परिवार औसतन 1793 रुपये सालाना कोचिंग पर खर्च कर रहे हैं, जबकि शहरी परिवारों का यह खर्च लगभग 3988 रुपये सालाना है। यह अंतर केवल आय स्तर का ही नहीं, बल्कि शिक्षा तक पहुँच की असमानता का भी द्योतक है। शहरों में कोचिंग उद्योग संगठित रूप में कार्य कर रहा है, जबकि गाँवों में यह अधिकतर व्यक्तिगत ट्यूशन तक ही सीमित है।

एक और गंभीर पहलू यह है कि शिक्षा पर यह अतिरिक्त बोझ गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को गहरे संकट में डाल देता है। उच्च वर्ग के बच्चे महंगी कोचिंग और ट्यूशन से अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ा लेते हैं, लेकिन गरीब परिवारों के बच्चे इसी कारण पीछे छूट जाते हैं। यह शिक्षा के लोकतांत्रिक स्वरूप पर आघात है, क्योंकि शिक्षा समान अवसर प्रदान करने का माध्यम होनी चाहिए, न कि असमानता को और बढ़ाने का कारण।

सरकार ने कई बार दावा किया है कि विद्यालयों में शिक्षा का स्तर बेहतर किया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कक्षा-कक्षों में शिक्षण की गुणवत्ता उस स्तर तक नहीं पहुँच पा रही है कि छात्र आत्मनिर्भर हो सकें। विद्यालयों को केवल परीक्षाओं में उत्तीर्ण कराने वाली संस्थाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें विद्यार्थियों में जिज्ञासा, आलोचनात्मक सोच और आत्मविश्वास विकसित करने वाली प्रयोगशालाओं के रूप में विकसित करना चाहिए।

कोचिंग पर निर्भरता एक और संकट खड़ा कर रही है – यह विद्यार्थियों को रटंत संस्कृति की ओर धकेल रही है। कोचिंग संस्थान सामान्यतः परीक्षा परिणाम पर केंद्रित रहते हैं, वहाँ सृजनात्मकता या जीवन मूल्यों की शिक्षा नहीं दी जाती। इस प्रकार विद्यार्थी केवल अंक प्राप्त करने की मशीन बनते जा रहे हैं, न कि संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण कर रहे हैं।

समाधान के रूप में सबसे पहले विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। शिक्षक पदों की रिक्तियाँ तत्काल भरी जानी चाहिएँ, विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता होनी चाहिए और शिक्षण पद्धति को अधिक व्यावहारिक तथा छात्र-केंद्रित बनाया जाना चाहिए। जब तक विद्यालयों में विश्वास नहीं बनेगा, तब तक कोचिंग का यह बाजार यूँ ही बढ़ता जाएगा।

यह भी आवश्यक है कि शिक्षा नीतियों में इस प्रवृत्ति को ध्यान में रखा जाए। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को समग्र शिक्षा प्रदान करना है, लेकिन यदि कोचिंग का दबाव लगातार बढ़ता गया तो यह नीति भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएगी। शिक्षा को व्यावसायिक बनाने के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।

आज समय की मांग है कि शिक्षा का बोझ बच्चों से कम किया जाए। उन्हें कोचिंग संस्थानों की दीवारों के बीच कैद करने के बजाय खुले वातावरण में सीखने का अवसर दिया जाए। प्रतिस्पर्धा की भावना अच्छी है, लेकिन जब यह केवल आर्थिक सामर्थ्य पर आधारित हो जाए तो यह समाज में गहरी खाई पैदा करती है।

शिक्षा का बाज़ार लगातार फैल रहा है और यह हमारी शिक्षा प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। यदि विद्यालयों में शिक्षा का स्तर सुधारा गया, शिक्षकों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय की गई, और अभिभावकों का विश्वास वापस लाया गया, तभी हम कोचिंग पर निर्भरता कम कर पाएँगे। अन्यथा, हर तीसरा नहीं बल्कि हर दूसरा बच्चा भी कोचिंग की ओर भागता नज़र आएगा।

डॉ प्रियंका सौरभ

कांग्रेस कार्यालय पर भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा हमले की कड़ी निंदा – जयदीप त्रिपाठी

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा )
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य एवं पूर्व कार्यवाहक जिलाध्यक्ष जयदीप त्रिपाठी ने बिहार के पटना में कांग्रेस कार्यालय पर भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा हमला किये जाने की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने लोकतंत्र को कलंकित किया है, जिसका जवाब बिहार की जनता देगी। उन्होंने कहा कि पटना का कांग्रेस कार्यालय सदाकत आश्रम यहां से स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी निकली थी, जहां देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने अंतिम सांस ली थी उस पवित्र धरती को भाजपाईयों ने हिंसा से अपवित्र कर दिया। कार्यकर्ताओं पर हमला हुआ प्रशासन मुख दर्शक बना रहा जो साबित करता है कि पूरा घटनाक्रम भाजपा और जदयू के संरक्षण में हुआ। बिहार मे राहुल गांधी संविधान और मताधिकार की रक्षा के लिये निकले हैं जिसमें उमड़े जनसैलाब से भाजपायी बौखला गये हैं, उन्हें शायद यह पता नहीं है कि यह वहीं कांग्रेस है जो अंग्रेजों के सामने नहीं झुकी, इनकी क्या बिसात है। उन्होंने कहा कांग्रेस पार्टी ने अहिंसा का रास्ता अपनाकर देश का निर्माण किया। इसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं है। इनको जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी बिहार में सभी विधानसभाओं में जा करके यह साबित कर दिया है कि यह पार्टी अंग्रेजों से लड़ करके देश को आजाद कराया था। उन्होंने कहा था कि राहुल गांधी की लोकप्रियता 101 प्रतिशत देश में बढ़ रही है। आने वाले समय में इस आधी को कोई रोक नहीं पायेगा और बिहार विधानसभा मे इंडिया गठबंधन की जीत होगी।

दलहनी-तिलहनी बीज मिनीकिट के लिए 25 सितम्बर तक करें ऑनलाइन आवेदन

बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

उप कृषि निदेशक मनीष कुमार सिंह ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित निःशुल्क दलहन एवं तिलहन बीज मिनीकिट वितरण एवं प्रसार कार्यक्रम के अंतर्गत रबी वर्ष 2025-26 में चना (16 किग्रा.), मटर (20 किग्रा.) तथा मसूर (08 किग्रा.) के बीज मिनीकिट कृषकों को निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि लाभार्थियों का चयन जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय समिति द्वारा ई-लाटरी पद्धति से पारदर्शी रूप से किया जाएगा। योजना का लाभ उठाने के लिए इच्छुक कृषकों को दर्शन 2.0 पोर्टल https://agridarshan.up.gov.in पर अनिवार्य रूप से आवेदन/बुकिंग करनी होगी।
ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया 01 सितम्बर से शुरू होकर 25 सितम्बर तक चलेगी। केवल कृषि विभाग के पोर्टल पर पंजीकृत कृषक ही आवेदन करने के पात्र होंगे। एक कृषक को केवल एक ही मिनीकिट का लाभ मिलेगा। विकासखंड स्तर पर यदि लक्ष्य से अधिक आवेदन आते हैं तो ई-लाटरी द्वारा चयन किया जाएगा।
उप कृषि निदेशक ने जनपद के समस्त किसानों से अपील की है कि वे निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन कर इस योजना का लाभ अवश्य उठाएं।

बिहार में कांग्रेस की नई जंग: राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से जमीनी पकड़ बनाने की कोशिश

पटना(राष्ट्र की परम्परा डेस्क) आजादी से लेकर 80 के दशक तक बिहार की राजनीति में कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन मंडल राजनीति के बाद पार्टी लगातार हाशिए पर चली गई। तीन दशक से अधिक समय से कांग्रेस अपना जनाधार खो चुकी है। अब राहुल गांधी इसे वापस पाने की कवायद में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने 17 अगस्त से सासाराम से “वोटर अधिकार यात्रा” की शुरुआत की, जो 16 दिन तक बिहार की सड़कों पर जनसंवाद का माध्यम बनी।

देसी अंदाज से जुड़ाव

यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने पूरी तरह देसी अंदाज अपनाया। कभी बुलेट मोटरसाइकिल पर सवार होकर गांव-गांव पहुंचे, तो कभी खेतों में जाकर किसानों से बातचीत की। वह गमछा लहराकर लोगों से जुड़ते नजर आए। उनके साथ तेजस्वी यादव भी विभिन्न पड़ावों में मौजूद रहे। दोनों नेताओं ने मतदाता सूची से नाम काटने और वोट चोरी जैसे मुद्दों को बड़े पैमाने पर उठाया।

प्रियंका गांधी की एंट्री

यात्रा के बीच में प्रियंका गांधी ने भी मोर्चा संभाला। खासतौर पर महिलाओं और ब्राह्मण बहुल मिथिला क्षेत्र में कांग्रेस को मजबूत करने की उनकी कोशिश स्पष्ट दिखी। उन्होंने अलग-अलग सभाओं में महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय पर जोर देकर समर्थन जुटाने का प्रयास किया।

रणनीतिक रोडमैप

इस यात्रा का रोडमैप बेहद सोचा-समझा है। यह अभियान बिहार के 23 जिलों से गुजरते हुए पटना तक पहुंचेगा। कांग्रेस ने इसके जरिए दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटरों को साधने पर जोर दिया है। राहुल गांधी का प्रयास है कि लंबे समय से बिखरे हुए कांग्रेस समर्थक सामाजिक समूहों को एक साझा मंच पर लाया जाए।

हालिया चुनौतियां

फिलहाल कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में पार्टी का वोट शेयर 10 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच पाया। लोकसभा चुनावों में भी उसका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। बावजूद इसके, राहुल गांधी ने प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव कर दलित और पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व देकर कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार किया है।

आगे की राह

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि “वोटर अधिकार यात्रा” कांग्रेस के लिए सिर्फ एक प्रचार अभियान नहीं, बल्कि संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय करने का प्रयास है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह पहल कांग्रेस को बिहार की राजनीति में दोबारा मजबूत उपस्थिति दिला पाएगी या यह केवल एक और प्रयोग बनकर रह जाएगी।

“मोदी-शी वार्ता: सात साल बाद चीन यात्रा, रिश्तों में नई गर्माहट”

बीजिंग/नई दिल्ली(राष्ट्र की परम्परा डेस्क) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने रविवार को बीजिंग में द्विपक्षीय वार्ता की। यह मुलाकात कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि सात साल के लंबे अंतराल के बाद मोदी चीन पहुंचे हैं। दो दिवसीय इस यात्रा के दौरान उनका स्वागत बेहद गर्मजोशी और पारंपरिक अंदाज़ में किया गया।

न्यूज एजेंसी एएनआई द्वारा जारी वीडियो में दोनों नेताओं की मुलाकात का नज़ारा साफ देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया, मुस्कुराते हुए बातचीत की और मीडिया कैमरों के लिए साथ में तस्वीरें भी खिंचवाईं। इस मुलाकात का माहौल पूरी तरह सकारात्मक नजर आया।

प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक के दौरान कहा कि “पिछले साल कजान में हुई हमारी बातचीत बहुत सफल रही थी, जिससे भारत और चीन के रिश्तों को सकारात्मक दिशा मिली। अब जबकि सीमा पर तनाव खत्म हो चुका है, शांति और स्थिरता का वातावरण बना है। यह दोनों देशों के लिए नए अवसर खोलता है।”

विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इस यात्रा से न सिर्फ द्विपक्षीय रिश्तों में नई गर्माहट आएगी, बल्कि व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर भी अहम समझौते हो सकते हैं। बीजिंग में भारतीय प्रतिनिधिमंडल और चीनी अधिकारियों के बीच भी कई दौर की वार्ताएँ निर्धारित की गई हैं।

मोदी की इस यात्रा को दक्षिण एशिया में भारत-चीन संबंधों की दिशा बदलने वाला अहम कदम माना जा रहा है। दोनों नेताओं की केमिस्ट्री और संवाद ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में रिश्तों का नया अध्याय लिखा जा सकता है।

जम्मू-कश्मीर के गांदेरबल में दुर्घटनावश गोली लगने से जवान शहीद

गांदेरबल (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जम्मू-कश्मीर गांदेरबल जिले में एक दर्दनाक घटना में सेना के राष्ट्रीय राइफल्स (RR) के एक जवान की मौत हो गई। अधिकारियों के अनुसार, यह हादसा शनिवार देर रात उस समय हुआ जब कांस्टेबल छोटू कुमार एक ट्रक से उतर रहे थे।

सूत्रों ने बताया कि मध्य कश्मीर जिले के मानसबल इलाके में तैनाती के दौरान जवान जब ट्रक से कूद रहे थे, तभी उनकी सर्विस राइफल का ट्रिगर गलती से दब गया और गोली चल गई। यह गोली उनकी ठोड़ी पर लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

उन्हें तुरंत नज़दीकी सैन्य अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
अधिकारियों ने बताया कि मामले की विस्तृत जांच की जा रही है और आवश्यक औपचारिकताएँ पूरी की जा रही हैं।

कांस्टेबल छोटू कुमार की असामयिक मृत्यु से उनके यूनिट तथा क्षेत्र में शोक की लहर है।

डीडीयूजीयू और महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के बीच शैक्षणिक सहयोग का समझौता

गोरखपुर (राष्ट की परम्परा)। शैक्षणिक सहयोग और ज्ञान के आदान–प्रदान की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय तथा महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आज़मगढ़ के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। डीडीयूजीयू परिसर में आयोजित इस समारोह ने उच्च शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत का संकेत दिया।
इस समझौता ज्ञापन के अंतर्गत संयुक्त शोध परियोजनाओं का संचालन किया जाएगा। शिक्षक और छात्र विनिमय कार्यक्रम के माध्यम से अकादमिक अनुभव बढ़ाया जाएगा। शैक्षणिक संसाधनों का साझा उपयोग होगा, जिसमें पुस्तकालय, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और प्रयोगशालाएँ शामिल हैं। कौशल-आधारित कार्यक्रम विद्यार्थियों की रोजगार क्षमता और नवाचार को बढ़ावा देंगे। इसके साथ ही, संयुक्त सेमिनार, कार्यशालाएँ और सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे, जिससे अनुसंधान नेटवर्क मज़बूत होंगे।
यह साझेदारी बहुविषयक शोध, पाठ्यक्रम विकास तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय शैक्षणिक मानकों को सुदृढ़ करने की दिशा में नए अवसर प्रदान करेगी।
इस अवसर पर डीडीयूजीयू की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने अंतर–विश्वविद्यालय सहयोग के महत्व पर बल देते हुए कहा कि ऐसे उपक्रम शैक्षणिक तंत्र को सुदृढ़ करते हैं, सीखने के नए क्षितिज खोलते हैं और विद्यार्थियों को विकास, नवाचार एवं समाज से सार्थक जुड़ाव के अवसर उपलब्ध कराते हैं।
एमओयू पर हस्ताक्षर प्रो. अजय सिंह, निदेशक, आईक्यूएसी, डॉ. रामवंत गुप्ता, निदेशक, अंतरराष्ट्रीय प्रकोष्ठ, तथा दोनों विश्वविद्यालयों के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में किए गए।
कार्यक्रम का समापन शिक्षण, अनुसंधान और सामुदायिक विकास में सामूहिक प्रयासों की प्रतिबद्धता के साथ हुआ, जिसने उत्कृष्टता की साझा दृष्टि को और भी मज़बूत किया।

डीडीयूजीयू में अंतिम वर्ष स्नातक के छात्रों के लिए विशेष बैक पेपर परीक्षा, बचेगा साल

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने सत्र 2024-25 के अंतिम वर्ष के स्नातक विद्यार्थियों के लिए विशेष बैक पेपर परीक्षा आयोजित करने की घोषणा की है। इस परीक्षा के माध्यम से विद्यार्थी शेष पाठ्यक्रमों को उत्तीर्ण कर अपने वर्ष को सुरक्षित कर सकते हैं।
परीक्षा में सम्मिलित होने वाले विद्यार्थियों में माइनर के 2019 विद्यार्थी, प्रायोगिक के 712 विद्यार्थी और सिद्धांत (Theory) के 3394 विद्यार्थी शामिल हैं, जिससे कुल संख्या 6125 है।
आयोजित बैक पेपर की संख्या माइनर में 30, प्रायोगिक में 52 और सिद्धांत में 151 है, कुल मिलाकर 233 बैक पेपर आयोजित किए जाएंगे। परीक्षाएं सितंबर के दूसरे सप्ताह से प्रारंभ होने की संभावना है।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा, “विद्यार्थियों का एक वर्ष बचाने के लिए उन्हें यह विशेष अवसर प्रदान किया जा रहा है। साथ ही विश्वविद्यालय बैक पेपर प्रणाली में आवश्यक सुधारों पर कार्य कर रहा है, जिससे यह और अधिक पारदर्शी, छात्रहितैषी एवं परिणामोन्मुख हो सके।”
विश्वविद्यालय का यह कदम विद्यार्थियों की शैक्षणिक उत्कृष्टता सुनिश्चित करने और उनके भविष्य को सुरक्षित बनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

घर पर बनाएं अदरक-लहसुन का पेस्ट: सेहत और स्वाद का परफेक्ट कॉम्बिनेशन

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)आजकल व्यस्त जीवनशैली में हर किसी को किचन में आसान और फटाफट बनने वाले विकल्प चाहिए। खासकर वर्किंग वूमेन के लिए ऑफिस से लौटकर रोज-रोज अदरक और लहसुन छीलना व पीसना मुश्किल काम होता है। यही वजह है कि मार्केट में रेडीमेड अदरक-लहसुन का पेस्ट खूब बिकता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन पैकेट्स में लंबे समय तक टिकाए रखने के लिए प्रिज़र्वेटिव और केमिकल्स मिलाए जाते हैं? ये न सिर्फ स्वाद को बिगाड़ते हैं बल्कि सेहत पर भी बुरा असर डाल सकते हैं।

यही कारण है कि एक्सपर्ट्स घर पर ही अदरक-लहसुन का पेस्ट बनाने की सलाह देते हैं। घर का बना पेस्ट पूरी तरह ऑर्गेनिक और हेल्दी होता है, जिसे आप आराम से एक हफ्ते तक स्टोर कर सकती हैं।
घर पर ऐसे बनाएं अदरक-लहसुन का पेस्ट
सामग्री
अदरक – 250 ग्राम
लहसुन की कलियां – 250 ग्राम
नमक – 1 छोटा चम्मच (नेचुरल प्रिज़र्वेटिव के लिए)
तेल – 2 से 3 बड़े चम्मच (पेस्ट को खराब होने से बचाने के लिए)
विधि

  1. सबसे पहले अदरक को अच्छी तरह धोकर छील लें।
  2. लहसुन की कलियों का छिलका उतार लें।
  3. अब मिक्सर में अदरक और लहसुन डालकर बारीक पीस लें।
  4. इसमें नमक और तेल डालकर फिर से एक बार ब्लेंड कर लें।
  5. पेस्ट को एयरटाइट ग्लास जार में भरकर फ्रिज में स्टोर करे।
    फायदे
    बिना केमिकल्स: इसमें किसी भी तरह का प्रिज़र्वेटिव या हानिकारक केमिकल नहीं होता।
    समय की बचत: हफ्ते भर के लिए तैयार किया गया पेस्ट रोज़मर्रा के कुकिंग टाइम को आसान बना देता है।
    स्वाद और सुगंध बरकरार: घर के पेस्ट से बना खाना अधिक स्वादिष्ट और ताज़ा लगता है।
    हेल्थ बेनिफिट्स: अदरक और लहसुन दोनों ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और पाचन को दुरुस्त करने में मददगार हैं।
    स्टोर करने के टिप्स
    हमेशा साफ और सूखे चम्मच से ही पेस्ट निकालें।
    जार को अच्छी तरह बंद करके रखें।
    चाहें तो लंबे समय तक स्टोर करने के लिए पेस्ट को छोटे-छोटे हिस्सों में फ्रीज भी कर सकती हैं।

👉 कुल मिलाकर, घर पर बना अदरक-लहसुन का पेस्ट आपके किचन का हेल्दी और भरोसेमंद साथी है। यह न सिर्फ आपकी रोज़मर्रा की कुकिंग को आसान बनाता है बल्कि आपको सेहतमंद भी रखता है।