Wednesday, July 1, 2026
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नवजात शिशु देखभाल पर जागरूकता जरूरी : सीएमओ

15 से 21 नवंबर तक मनाया जा रहा नवजात शिशु देखभाल सप्ताह

देवरिया, (राष्ट्र की परम्परा)
जनपद में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को कम करने तथा माताओं एवं परिवारों में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 15 से 21 नवंबर तक नवजात शिशु देखभाल सप्ताह मनाया जा रहा है। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग की ओर से जनपदभर में विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. अनिल कुमार गुप्ता ने बताया कि यह सप्ताह हर वर्ष 15 से 21 नवंबर के बीच मनाया जाता है। इसका उद्देश्य नवजात देखभाल के महत्व को समाज तक पहुँचाना है, ताकि बच्चों की जीवन दर में सुधार हो सके और उनके समग्र विकास की संभावनाएं बढ़ें। उन्होंने बताया कि जनपद में नवजात देखभाल के लिए फैसिलिटी बेस्ड और कम्युनिटी बेस्ड दोनों स्तरों पर कार्यक्रम प्राथमिकता से संचालित किए जा रहे हैं। इसमें संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, प्रसव कक्ष में नवजात की देखभाल, समयपूर्व जन्मे या कम वजन वाले शिशुओं के लिए एसएनसीयू व एनबीएसयू की सुविधाएं तथा सामुदायिक स्तर पर एचबीएनसी कार्यक्रम शामिल हैं।

सीएमओ ने जानकारी दी कि इस वर्ष नवजात शिशु देखभाल सप्ताह की थीम “नवजात देखभाल : प्रत्येक स्पर्श, प्रत्येक क्षण, प्रत्येक शिशु” रखी गई है। थीम के अनुरूप जनपद की विभिन्न चिकित्सा इकाइयों में विशेष गतिविधियाँ व जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

पहले 28 दिन होते हैं बेहद नाजुक : डिप्टी सीएमओ डिप्टी सीएमओ एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अश्वनी पाण्डेय ने बताया कि नवजात के जीवन के पहले 28 दिन सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। इस दौरान संक्रमण से बचाव और विशेष देखभाल अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रसव हमेशा चिकित्सालय में ही कराएं और प्रसव के बाद 48 घंटे तक माँ और शिशु को अस्पताल में ही निगरानी में रखें।
नवजात को तुरंत न नहलाकर केवल साफ कपड़े से शरीर पोछकर गर्म कपड़े पहनाने चाहिए। जन्म के एक घंटे के भीतर माँ का गाढ़ा, पीला दूध (कोलोस्ट्रम) अवश्य पिलाना चाहिए तथा छह महीने तक केवल स्तनपान ही कराना सबसे अच्छा है। जन्म के तुरंत बाद नवजात का वजन लेना और विटामिन-के का इंजेक्शन देना आवश्यक है।

स्वास्थ्य विभाग ने जनपदवासियों से अपील की है कि वे नवजात शिशुओं की देखभाल को गंभीरता से लें और स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा दी जा रही सलाह का पालन कर अपने शिशुओं का सुरक्षित व स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करें।

खरीद–दरौली घाट पर पीपा पुल निर्माण कार्य शुरू, जल्द मिलेगा आवागमन का सहज मार्ग

सिकंदरपुर /बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाले खरीद–दरौली घाट पर इस वर्ष पीपा पुल निर्माण कार्य शुरू हो गया है। पुल का निर्माण ठेकेदार सुनील कुमार राय की देखरेख में कराया जा रहा है। लगभग 32 लाख रुपये की अनुमानित लागत से बनाया जा रहा यह पुल क्षेत्रवासियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्माण कार्य में मजदूर लगातार जुटे हुए हैं, जो पीपा पहुंचाने, बोरी में बालू भरने तथा अन्य तकनीकी प्रक्रियाओं को गति दे रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, पीपा पुल तैयार होने से दोनों राज्यों के बीच आवागमन पहले की तरह सुगम हो जाएगा। शादी–विवाह सहित अन्य सामाजिक आयोजनों में लोगों को आवाजाही में काफी राहत मिलेगी। इसके साथ ही व्यापार और दैनिक गतिविधियों में भी गति आने की उम्मीद जताई जा रही है।पुल निर्माण का कार्य 15 अक्टूबर से शुरू होना प्रस्तावित था, लेकिन घाघरा नदी में पानी अधिक होने तथा मशीनरी व सामग्री पहुँचाने में तकनीकी बाधाओं के कारण प्रक्रिया में देरी हुई। नदी के तीन पाटन में बहने की स्थिति ने निर्माण कार्य को और प्रभावित किया। अब पानी का स्तर कम होने के बाद कार्य दोबारा तेज गति से शुरू कर दिया गया है। निर्माण एजेंसी के अनुसार, आगामी 15–20 दिनों के भीतर पीपा पुल तैयार होने की संभावना है। पुल शुरू होते ही उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच इस मार्ग पर आवागमन फिर से सुचारु हो जाएगा। स्थानीय लोगों में पुल के शीघ्र निर्माण को लेकर उत्साह देखा जा रहा है।

मोटरसाईकिल की डिक्की से डेढ़ लाख की चोरी का पुलिस ने किया बड़ा खुलासा

मुख्य आरोपी गिरफ्तार, नकदी व बाइक बरामद — दो साथी अब भी फरार

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा )। घुघली कस्बे में मोटरसाईकिल की डिक्की से डेढ़ लाख रुपये चोरी के मामले में महराजगंज पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। महज छः दिन में पुलिस ने मामले का पर्दाफाश करते हुए मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। उसकी निशानदेही पर चोरी की रकम में से ₹16,700 और घटना में प्रयुक्त बाइक भी बरामद कर ली गई है।
घटना 11 नवंबर की है, जब घुघली कस्बे में एक व्यक्ति की बाइक की डिक्की से ₹1.50 लाख नकद गायब हो गए। पीड़ित की तहरीर के बाद थाना घुघली में मुकदमा दर्ज हुआ। पुलिस अधीक्षक सोमेंद्र मीना के निर्देशन में टीम ने तकनीकी और मानवीय खुफिया सूचनाओं पर काम शुरू किया।
सोमवार को सुबह मुखबिर से मिली सूचना पर घुघली पुलिस ने ग्राम खजुरिया,मछली गांव रोड से मुख्य आरोपी जिलाजीत पुत्र रामचन्द्र, उम्र 38 वर्ष, निवासी सोहना टोला पुरैना,थाना वजीरगंज, गोंडा को पकड़ लिया।
उसके कब्जे से ₹16,700 नकद, हीरो सुपर स्प्लेंडर बाइक UP-43 Y 4279
बरामद हुई। जिलाजीत के खिलाफ रायबरेली, अयोध्या, श्रावस्ती और महराजगंज जिलों में चोरी और एनडीपीएस एक्ट के 5 मुकदमे पहले से दर्ज हैं। पुलिस के मुताबिक वह पेशेवर अपराधी है और कई जिलों में सक्रिय रहा है‌। इस मामले में दो अन्य आरोपी रामबचन पुत्र भगवती, निवासी बल्दू पुरवा तथा राजेन्द्र पुत्र महंगू,निवासी मुण्डा डीह, थाना धानेपुर, गोंडा अब भी फरार हैं।
पुलिस ने बताया कि दोनों की गिरफ्तारी और बाकी रकम की बरामदगी के लिए लगातार दबिशें दी जा रही हैं। पुलिस अधीक्षक पुलिस सोमेंद्र मीना ने घुघली पुलिस टीम की इस त्वरित कार्रवाई की प्रशंसा की। उन्होंने आम जनता से अपील की कि किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत 112 या स्थानीय थाने पर दें।
थानाध्यक्ष घुघली गौरव सिंह का कहना है कि अपराधियों के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहेगा। शांति एवं सुरक्षा के लिए हर स्तर पर सख्ती बरती जा रही है।

कटाई में नई मुश्किलें, पराली से निपटने की समस्या— धान की जड़ ने बढ़ाई किसान की चिंता, खेती का भविष्य सवालों में

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। धान की कटाई का सीजन शुरू होते ही पराली की समस्या एक बार फिर किसानों की चिंता को बढ़ाने लगी है। इस बार परेशानी केवल पराली जलाने के विकल्पों की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि धान की जड़ें खेत में लगभग छह से आठ इंच तक बनी रह जा रही हैं, जिससे अगली फसल की तैयारी और भी कठिन हो गई है। हार्वेस्टर मशीनों की कटिंग ऊंचाई बढ़ने से यह समस्या और गहरी होती जा रही है।
कटाई अधूरी जड़ें पूरी—समस्या दोगुनी किसान बताते हैं कि जहां पहले हार्वेस्टर लगभग जड़ तक कटाई कर देता था, वहीं अब मशीनें ऊपर की ओर काट रही हैं। इससे खेत में बचे ठूंठ इतने बड़े हैं कि हल, रोटावेटर, कल्टीवेटर समेत कोई भी उपकरण उन्हें आसानी से गला नहीं पा रहा। ऐसे में अगली फसल—विशेषकर आलू, मटर और गेहूं—की बुवाई समय से कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। देरी से बोवाई सीधे उपज पर असर डालती है। पराली जलाने की मजबूरी बढ़ी
सरकार द्वारा पराली न जलाने के कड़े निर्देश और जुर्माने के बावजूद किसानों के सामने विकल्प सीमित हैं। खेत में बची लंबी जड़ें और भारी मात्रा में पराली को निपटाने के लिए कम्पोस्ट बनाने की व्यवस्था नहीं सरकारी मशीनें सीमित और कई जगह समय पर उपलब्ध नहीं
इन सब कारणों से किसान पराली जलाने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या भी बढ़ती जा रही है किसान की पीड़ा: ऐसे कैसे होगी खेती किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत, महंगे डीज़ल और मशीनों के किराए के बीच अगर कटाई सही से न हो, तो उनकी मेहनत और भविष्य दोनों दांव पर लग जाते हैं।
एक किसान ने कहा—कटाई ऊपर- ऊपर हो रही है, पराली ज्यादा बच रही है, जमीन में ठूंठ खड़े हैं… ऐसे कैसे चलेगी खेती?
समाधान कहां?
हार्वेस्टर की कटिंग हाइट का मानकीकरण।
सरकारी स्तर पर स्ट्रॉ मैनेजमेंट मशीनों की उपलब्धता बढ़ें।
पराली प्रबंधन के लिए सब्सिडी वाले उपकरण हर गांव तक पहुंचे।
जैविक अपघटन के उपयोग पर प्रशिक्षण और जागरूकता
अगली फसल दांव पर ,धान की कटाई में हो रही तकनीकी गड़बड़ियां केवल एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि खेती के पूरे चक्र को प्रभावित करने वाला संकट बन चुकी हैं। अगर जड़ों की कटाई में सुधार और पराली प्रबंधन के ठोस उपाय नहीं हुए, तो किसान का संकट बढ़ता जाएगा और कृषि उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा।

पिकप और बाइक की जोरदार भिड़ंत में दो युवकों की मौत, चालक समेत दो

मंसूरगंज चौकी के पास रात में हुआ भीषण हादसा, गांव में छाया मातम

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। परतावल– पिपराइच मुख्य मार्ग पर रविवार देर रात मंसूरगंज चौकी के समीप हुए दर्दनाक सड़क हादसे में दो युवकों की जान चली गई, जबकि पिकप चालक समेत दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना की सूचना मिलते ही गांव में कोहराम मच गया। परिजन रोते-बिलखते घटनास्थल और अस्पतालों में पहुंचे तो माहौल गमगीन हो गया।
मिली जानकारी के अनुसार करन गुप्ता 19 वर्ष, संजय चौहान उर्फ बिरजू 21 वर्ष और सतीश गुप्ता 20 वर्ष तीनों निवासी ग्राम पंचायत मोहद्दीपुर बनकटिया, रविवार देर शाम किसी कार्य से लौट रहे थे। जैसे ही उनकी बाइक मंसूरगंज चौकी के पास पहुंची, सामने से आ रही तेज रफ्तार महिंद्रा पिकप ने उनकी बाइक में जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर इतनी भीषण थी कि बाइक पर सवार तीनों युवक सड़क पर दूर तक जा गिरे, जबकि पिकप चालक ईश्वर 45 वर्ष निवासी छपिया, थाना भिटौली भी गंभीर रूप से घायल हो गया।
हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई।
स्थानीय लोगों ने तत्काल डायल 108 एंबुलेंस को सूचना दी, लेकिन घायलों को एक ही वाहन में ले जाने को लेकर ग्रामीणों और एंबुलेंस चालक के बीच तीखी नोक-झोंक भी हुई। विरोध के बाद सभी घायलों को सीएचसी परतावल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने करन गुप्ता को मृत घोषित कर दिया। गंभीर रूप से घायल सतीश, संजय चौहान और पिकप चालक ईश्वर को प्राथमिक उपचार के बाद बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर रेफर कर दिया गया।मेडिकल कॉलेज पहुंचते ही संजय चौहान उर्फ बिरजू ने भी दम तोड़ दिया। संजय की मौत की खबर मिलते ही गांव में मातम पसर गया और परिवारों में चीख-पुकार मच गई।
घटना की जानकारी मिलते ही श्यामदेउरवां थाने की पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने क्षतिग्रस्त बाइक और पिकप को कब्जे में लेकर दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
इस संबंध में थानाध्यक्ष अभिषेक सिंह ने बताया कि घायलों को तुरंत अस्पताल भेजा गया था। आगे की विधिक कार्रवाई शुरू है।

दुकान में लगी आग, जलकर राख हुए हजतो के सामान

बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

बांसडीह–सहतवार मार्ग पर रविवार की देर रात एक ऑटो पार्ट्स की दुकान में अचानक लगी भीषण आग से क्षेत्र में हड़कंप मच गया। संदिग्ध परिस्थितियों में लगी इस आग में 25 लाख रुपये से अधिक का माल जलकर खाक हो गया। आग इतनी तेज थी कि दुकान के बाहर खड़ी एक चार पहिया वाहन भी इसकी चपेट में आकर पूरी तरह नष्ट हो गई। सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, जिससे आसपास खड़े कई ट्रैक्टर सुरक्षित बचाए जा सके। जानकारी के अनुसार, कस्बा निवासी गिरधारी गुप्ता की यूनियन बैंक के पास रौनियार ऑटोमोबाइल्स नाम से ऑटो पार्ट्स की दुकान है। रोज की तरह रविवार की शाम वह दुकान बंद कर घर चले गए। देर रात अचानक दुकान से धुआं और आग की लपटें उठती देख राहगीरों ने इसकी जानकारी पुलिस को दी। पुलिस ने तुरंत फायर ब्रिगेड और दुकान मालिक को सूचना देकर मौके पर पहुंचा। आग इतनी भीषण थी कि दुकान के अंदर से तेज लपटें निकल रही थीं और पूरी जगह धुएं से भर चुकी थी। फायर ब्रिगेड के जवानों ने करीब ढाई घंटे की अथक मेहनत के बाद आग को काबू में किया। तब तक दुकान में रखे लिवगार्ड इनवर्टर, बैटरियां, गाड़ियों के मोबिल, विभिन्न वाहनों के स्पेयर पार्ट्स समेत भारी मात्रा में रखा सामान पूरी तरह जल चुका था। दुकान के बगल में सर्विसिंग के लिए रखे कई ट्रैक्टर भी खड़े थे, जिन्हें फायर टीम ने सूझबूझ और तेजी से कार्रवाई करते हुए सुरक्षित बचा लिया। हालांकि, दुकान मालिक की चार पहिया कार आग की लपटों में घिरकर पूरी तरह जल गई। दुकानदार गिरधारी गुप्ता ने बताया कि वह हमेशा की तरह दुकान बंद कर घर चले गए थे। आग कैसे लगी, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। उन्होंने बताया कि इस हादसे में लगभग 25 लाख रुपये का सामान एवं एक कार नष्ट हो गई है, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। फिलहाल पुलिस आग लगने के कारणों की जांच में जुटी हुई है और आसपास के सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं, ताकि घटना की वास्तविक वजह सामने आ सके।

शयन के सनातन नियम

सूने घर में अकेले सोना वर्जित है,
मन्दिर, श्मशान में सोना वर्जित है,
सोए को अचानक जगाना ठीक नहीं,
विद्यार्थी, कर्मचारी, संतरी व सैनिक,
ये अधिक समय तक सोए हों, तो इन्हें,
ज़्यादा समय तक सोने देना ठीक नहीं।

बृहम मुहूर्त में ही स्वस्थ मनुष्य को
स्वास्थ्य रक्षा हेतु उठ जाना चाहिए,
निरा अँधेरे कक्ष में नहीं सोना चाहिए,
सूखे पैर सोने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है,
भीगे पैर कभी भी नहीं सोना चाहिये,
टूटे खाट में व जूठे मुँह नहीं सोना चाहिये।

नग्न या निर्वस्त्र कभी नहीं सोना चाहिए,
पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या,
पश्चिम दिशा सिर करके सोने से चिन्ता,
उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि,
तथा दक्षिण दिशा सिर करके सोने
से धन और आयु की होती है वृद्धि।

दिन में कभी भी नहीं सोना चाहिए,
दिन में सोने से सुस्ती आ जाती है,
और शरीर में रोग भी बढ़ जाते हैं,
आयु का क्षरण भी होने लगता है,
हाँ ज्येष्ठ मास में दोपहर के समय
कुछ देर के लिए सोया जा सकता है।

दिन में और सूर्योदय एवं सूर्यास्त के
समय सोने से रोग़ी व दरिद्र हो जाता है,
सूर्यास्त के एक प्रहर, लगभग तीन
घण्टे बाद ही सोना शुभ माना जाता है।

बायीं करवट सोना स्वास्थ्य हेतु शुभ है,
दक्षिण में यम और देवों का निवास है,
उधर पाँव करके सोना भी अशुभ है,
कान में हवा भर जाती है, स्मृति ह्रास
मस्तिष्क में रक्त संचार कम होता है,
बीमारियाँ व देहावसान तक हो जाता है।

हृदय पर हाथ रख, छत के पाट/ बीम
के नीचे, पैर पर पैर चढ़ाकर न सोयें,
शय्या पर बैठ भोजन करना अशुभ है,
सोते सोते पढ़ने से नेत्र ज्योति घटती है,
मस्तक पर तिलक लगा सोना अशुभ है,
सोने से पहले तिलक हटा देना शुभ है।

आदित्य इन सोलह नियमों का
अनुकरण करने वाला यशस्वी,
निरोगी और दीर्घायु हो जाता है,
ऐसे शख़्स का जीवन सुखी होता है।

डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’

12वीं के विद्यार्थी बोर्ड परीक्षा में ऐसे पा सकते हैं 70/70 नम्बर

भूगोल विषय के लिए विशेष मार्गदर्शन दें रही हैं शालिनी मिश्रा

एजुकेशन डेस्क (राष्ट्र की परम्परा)। सीबीएसई की बारहवीं बोर्ड परीक्षाएँ 2026 में आयोजित की जानी हैं और विद्यार्थियों के पास बेहतर तैयारी के लिए अभी से सटीक रणनीति बनाने का उपयुक्त समय है। भूगोल विषय 70 अंकों का होता है और उचित योजना, सही पढ़ाई और नियमित अभ्यास के साथ विद्यार्थी पूर्ण अंक हासिल कर सकते हैं।
आपका अख़बार आज से विषय-विशेष तैयारी श्रृंखला शुरू कर रहा है, जिसमें विशेषज्ञ आपको परीक्षा में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए कारगर टिप्स देंगे। इसी क्रम में आज भूगोल विषय की विशेषज्ञ प्रवक्ता शालिनी मिश्रा ने 70/70 अंक तक पहुँचने की रणनीति साझा की है।
परीक्षा पैटर्न 2026: क्या पूछे जाते हैं सवाल?
भूगोल के प्रश्न पत्र में सामान्यतः निम्नलिखित पैटर्न से प्रश्न आते हैं—

संसाधन व सतत विकास से लगभग 12 अंक

ह्यूमन एक्टिविटीज से 10 अंक

  • परिवहन, संचार व व्यापार से 10 अंक
  • परिवहन, संचार व अंतरराष्ट्रीय व्यापार से 7 अंक
  • मैप आधारित प्रश्न अधिकतर इन्हीं इकाइयों से पूछे जाते हैं
    इसलिए विद्यार्थियों को इन अध्यायों को अत्यंत सावधानी से दोहराना चाहिए।
    NCERT ही है सफलता की कुंजी
    पिछले वर्षों के पेपर विश्लेषण से यह साफ़ है कि बोर्ड परीक्षा के ज्यादातर प्रश्न केवल NCERT से ही पूछे जाते हैं।
    अतः भूगोल की NCERT किताब कम से कम दो से तीन बार ध्यानपूर्वक पढ़ें
  • अतिरिक्त संदर्भ पुस्तकों से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, इसलिए उनका सीमित उपयोग करें
  • हर अध्याय के अंत में दिए प्रश्न अवश्य हल करें
    उत्तर लिखने की सही तकनीक अपनाएँ
  • इंक्लूजन व डिफरेंटशिएशन जैसे सवालों में कॉलम फ़ॉर्मेट का प्रयोग करें
  • लॉन्ग आंसर टाइप प्रश्नों को फ्लो चार्ट या प्वाइंट फॉर्म में लिखें
  • उत्तर में महत्वपूर्ण बिंदुओं को हाइलाइट करें, इससे परीक्षक पर बेहतर प्रभाव पड़ता है
  • मैप आधारित प्रश्नों के लिए रोज़ 10 मिनट का अभ्यास अनिवार्य करें

सैंपल पेपर और नोट्स—70/70 की मजबूत नींव

  • सीबीएसई द्वारा जारी सैंपल पेपर ध्यान से पढ़ें और सवालों के पैटर्न को समझें
  • NCERT पढ़ने के बाद अपने शब्दों में छोटे-छोटे नोट्स तैयार करें
  • रिवीजन के दौरान किताब उठाने की जरूरत न पड़े, ऐसे नोट्स बनाएं
  • हर 7 दिन में एक फुल सिलेबस टेस्ट हल करें।

अंतिम सुझाव

  • NCERT + सैंपल पेपर = 70/70 की गारंटी
  • रोजाना 45–60 मिनट भूगोल की नियमित पढ़ाई
  • मैप, चार्ट और डायग्राम की प्रैक्टिस को कभी न छोड़ें
  • परीक्षा से पहले कम से कम 4–5 प्रैक्टिस पेपर अवश्य हल करें

सही रणनीति, अवधारणाओं की स्पष्टता और नियमित अभ्यास के साथ 12वीं के विद्यार्थी आगामी 2026 की बोर्ड परीक्षा में भूगोल में पूरे 70/70 अंक प्राप्त कर सकते हैं।

उमरा यात्रियों का काफ़िला सऊदी अरब में हादसे का शिकार

डीज़ल टैंकर से भीषण टक्कर में दर्जनों भारतीयों की दर्दनाक मौत

रियाद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)
सऊदी अरब की पवित्र धरती पर सोमवार की रात श्रद्धा का सफ़र एक पल में मातम में बदल गया, जब उमरा से लौट रहे भारतीय तीर्थयात्रियों की बस एक तेज रफ्तार डीज़ल टैंकर से टकरा गई। भीषण टक्कर के बाद बस में लगी आग ने मौके को चीख-पुकार से भर दिया। हादसा इतना भयंकर था कि कई शवों की पहचान तक मुश्किल हो गई है। भारत में बैठे परिजनों के लिए यह ख़बर एक गहरे सदमे की तरह आई है, जबकि सरकारें हालात पर नज़र बनाए हुए हैं।
मदीना मार्ग पर एक डीज़ल टैंकर से हुई जोरदार भिड़ंत के बाद बस में आग भड़क उठी, जिससे सवार यात्री बाहर निकल भी नहीं पाए। हादसा उमरा यात्रा पूर्ण कर चुके भारतीय तीर्थयात्रियों के काफ़िले के साथ हुआ।
प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, इस दुर्घटना में 40 से अधिक भारतीय नागरिकों के मारे जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। आधिकारिक पुष्टि के लिए स्थानीय प्रशासन जुटा हुआ है।
अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, अधिकांश मृतक तेलंगाना के हैदराबाद क्षेत्र से संबंधित बताए जा रहे हैं। कई परिवारों में मातम पसर गया है और घरों में कोहराम मचा हुआ है।
यह दर्दनाक दुर्घटना मक्का से मदीना की ओर जा रही बस के साथ मदीना के नज़दीक हुई। उमरा ज़ियारत पूरी कर यात्री आगे की यात्रा पर थे कि यह हादसा हो गया।
तेलंगाना सरकार ने स्थिति पर नज़र रखते हुए एक विशेष नियंत्रण कक्ष (कंट्रोल रूम) स्थापित किया है, ताकि प्रभावित परिवारों को जानकारी और सहायता पहुंचाई जा सके।
सऊदी अधिकारी घटना के कारणों की जांच में जुटे हैं।

  • मृतकों की शिनाख्त
  • घायलों का उपचार
  • हादसे के तकनीकी कारण
    इन सभी बिंदुओं पर स्पष्टता लाने के प्रयास जारी हैं।

रोग केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं।

आओ रोगों से जूझ रहे लोगों के प्रति सहानुभूति रखें उन्हें जीवनशैली सुधारने को प्रेरित करें और स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए समाज को बेहतर दिशा दें -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आधुनिक मानव सभ्यता आज जिस डिजिटल और प्रौद्योगिकीय उन्नति के शिखर पर खड़ी है, उसे देखते हुए यह मानना स्वाभाविक लगता है कि विज्ञान की शक्ति ने दुनियाँ को लगभग हर समस्या का समाधान देना शुरू कर दिया होगा।कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स क्वांटम कंप्यूटिंग और जेनेटिक एडिटिंग जैसी तकनीकों ने हमारे जीवन को जितना सरल बनाया है, उतनी ही आशाएं भी जगाई हैं। किंतु, विरोधाभास यह है कि इस टेक्नोलॉजी-प्रधान सामयिक दुनियाँ में भी पृथ्वी के प्रत्येक देश को अनेक प्रकार की बीमारियाँ चुनौती के रूप में घेरे हुए हैं। अनेक रोग ऐसे हैं जिनके उपचार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है,परंतु अब भी कई बीमारियाँ मनुष्य और चिकित्सा जगत के लिए पहेली समान बनी हुई हैं। यह परिघटना न केवल चिकित्सा प्रणाली को निरंतर विकसित होने का संदेश देती है,बल्कि यह भी दर्शाती है कि रोगों के विरुद्ध अंतिम जीत अभी दूर है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि दुनियाँ भर में आज भी लाखों लोग उन बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं,जो या तो लाइलाज हैं या जिनका उपचार कठिन, महंगा और अत्यंत जटिल है। ऐसे रोग केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। कैंसर इसका प्रमुख उदाहरण है,एक ऐसी बीमारी जिसकी तीव्रता और विस्फोटक विस्तार आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए आज भी अत्यंत बड़ी चुनौती बना हुआ है। कैंसर के अनेक प्रकार,उनकीविविधतापूर्ण प्रकृति और तेजी से फैलने वाले स्वरूप ने यह सिद्ध कर दिया है कि रोगों से लड़ाई विज्ञान और समाज दोनों स्तरों पर बराबर की लड़ाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दशक में कैंसर के मामलों में असाधारण वृद्धि हुई है, जो यह दर्शाती है कि आधुनिक जीवनशैली और पर्यावरणीय परिवर्तन भी इस रोग के कारकों को बढ़ावा दे रहे हैं। आज हम बीमारियों पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसी संदर्भ में, 17 नवंबर 2025 को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय मिर्गी दिवस(नेशनल एपिलेपसी डे) अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर बन जाता है।मिर्गी (एपिलेपसी) एक ऐसा न्यूरोलॉजिकल विकार है जो विश्व की लगभग 5 करोड़ आबादी को प्रभावित करता है, और यह आंकड़ा इसे दुनियाँ के सर्वाधिक सामान्यन्यूरोलॉजिकल विकारों में शामिल करता है। इस विकार से पीड़ित लोगों को सामाजिक भेदभाव, गलत धारणाओं और असमंजस का सामना करना पड़ता है। बता दें सबसे पहले यह माना जाता है की यह एक संक्रामक बीमारी है जिस कारण मरीज की कोई सहायता करने से भी डरता है लेकिन यह एक असंक्रामक बीमारी है और हमारे अंदर नहीं फैल सकती है। दूसरी अफवाह यह है की अगर किसी को दौरे पड़ रहे हैं तो उसे भूत प्रेत और जादू टोने से जोड़ दिया जाता है जो पूरी तरह से झूठ है। मिर्गी के मरीज को जूता सुंघाना, उसके मुंह में चम्मच डालना भी आधार रहित बातें हैँ,ऐसे में जागरूकता, स्वीकार्यता और वैज्ञानिक जानकारी ही वह हथियार है जो मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति के जीवन को बेहतर, सुरक्षित और सम्मानजनक बना सकता है।

ये भी पढ़ें –प्राकृतिक चिकित्सा: जीवनशैली जनित रोगों का सबसे सुरक्षित समाधान

साथियों बात अगर हम राष्ट्रीय मिर्गी दिवस क़े मुख्य उद्देश्य को समझने की करें तो, लोगों को यह समझाना हैं कि मिर्गी कोई अलौकिक घटना नहीं, बल्कि मस्तिष्क का चिकित्सकीय विकार है; इसका इलाज मौजूद है; और सही देखभाल तथा जागरूकता से व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। इस दिवस पर चिकित्सा जगत, समाज और सरकारें मिलकर एक संगठित अभियान के माध्यम से मिर्गी को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करती हैं। यह संदेश दुनिया के हर देश के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बीमारियों और विकारों का मानव जीवन पर प्रभाव सीमाओं को पार कर वैश्विक स्वरूप धारण करता है।

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साथियों बात अगर हम जीवनशैली में परिवर्तन, रोग को बढ़ावा देने वाले कारकों से बचाव को समझने की करें तो रोगों के उपचार में केवल दवाइयाँ और चिकित्सा हस्तक्षेप ही पर्याप्त नहीं होते;जीवनशैली में परिवर्तन रोग को बढ़ावा देने वाले कारकों से बचाव, मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान तथा नियमित दिनचर्या स्वास्थ्य को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। कई बीमारियाँ ऐसी होती हैं जिनका प्रमुख कारण अनुचित जीवनशैली, असंतुलित आहार, तनाव, पर्यावरणीय प्रदूषण और गतिहीन दिनचर्या होती है। विश्वभर में अध्ययन यह दर्शाते हैं कि एक बड़ी संख्या उन रोगों की है जिनका प्रतिशत केवल जीवनशैली सुधार, जैसे स्वस्थ भोजन,नियमित व्यायाम,पर्याप्त नींद,मानसिक संतुलन औरतनाव प्रबंधन से कम किया जा सकता है। मिर्गी के संदर्भ में भी यह पूर्णत: सत्य है। मिर्गी का दौरा कई बार नींद की कमी, तेज़ रोशनी, दिमागी तनाव, शराब सेवन या दवाई छोड़ देने से ट्रिगर हो जाता है। इसलिए, रोग की समझ और जीवनशैली का अनुशासन व्यक्ति को सुरक्षित रखने का सबसे विश्वसनीय तरीका है।जीवनशैली सुधार के अतिरिक्त, जागरूकता वह सटीक और शक्तिशाली अस्त्र है जो रोगों की रोकथाम, उपचार और प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभाता है। दुनिया के अनेक देशों में स्वास्थ्य से संबंधित जागरूकता अभियानों ने लाखों लोगों की जान बचाई है। पोलियो, एड्स, क्षयरोग और कोविड-19 जैसी बड़ी महामारियों के दौरान भी जागरूकता ने निर्णायक भूमिका निभाई। रोग को समझना, लक्षणों को पहचानना, उपचार को जानना और गलत धारणाओं से दूर रहना,ये सभी बातें व्यक्ति को बीमारी से बचाने में उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी आधुनिक दवाइयाँ और तकनीक।

साथियों बात अगर हम आज डिजिटल मीडिया, इंटरनेट और शिक्षा के विस्तार के कारण स्वास्थ्य से संबंधित लाभ हानि को समझने की करें तो,जानकारी पहले की तुलना में कहीं अधिक सुलभ हो गई है। किंतु इसके साथ ही गलत सूचनाओं का प्रसार भी उतनी ही तेजी से हुआ है। ऐसे में वास्तविक,वैज्ञानिक और सत्य आधारित जानकारी लोगों तक पहुँचना बेहद आवश्यक हो गया है। मिर्गी जैसे विकारों को लेकर अभी भी विभिन्न देशों में मिथक और अंधविश्वास फैले हुए हैं। कुछ लोग इसे दैवी या अलौकिक घटना समझते हैं, कुछ इसे मानसिक कमजोरी से जोड़ते हैं और कुछ इसे सामाजिक कलंक की तरह देखते हैं। इस सोच को बदलने का एकमात्र तरीका है, जागरूकता, संवाद और सटीक सूचना का प्रसार। 

साथियों बातअगर हम विश्व के कई देशों में ऐसे रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसको समझने की करें तो उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में समान अवसर नहीं मिल पाते। यह स्थिति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक विकास में भी बड़ी बाधा बनती है। इसलिए, विकारों को त्यागने का संदेश और सामाजिक स्वीकार्यता आज के स्वास्थ्य विमर्श का अत्यंत आवश्यक हिस्सा है। मिर्गी, कैंसर या किसी भी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को सहानुभूति, सम्मान और सहयोग की आवश्यकता होती है,न कि भेदभाव, दूरी या भय की। यदि सामाजिक रूप से स्वस्थ वातावरण उपलब्ध हो, तो बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति पुनर्वास और सुधार की दिशा में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकता है।यह भी स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य केवलचिकित्सा प्रणाली का विषय नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संरचना का हिस्सा है। बीमारियों से लड़ाई तभी सफल हो सकती है जब सरकारें, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सामाजिक संस्थाएँ, स्कूल, मीडिया और आम नागरिक मिलकर एक वैश्विक प्रयास करें। इस संदर्भ में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रेड क्रॉस जैसी संस्थाएँ दुनिया के विभिन्न देशों में बीमारियों के प्रति जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने में निरंतर कार्यरत हैं।

साथियों बात अगर हम इस तथ्य को समझने की करें कि  आज की दुनियाँ में यह आवश्यक है कि हम बीमारी को केवल चिकित्सा दृष्टि से नहीं,बल्कि एक समग्र सामाजिक -मानवीय दृष्टि से देखें। रोगों से पीड़ित लोगों की संख्या तब ही कम होगी जब समाज के प्रत्येक व्यक्ति में जागरूकता का विस्तार होगा, जीवनशैली में सुधार आएगा और बीमारियों के विरुद्ध सामूहिक प्रयास होंगे। हमें यह समझना होगा कि कोई भी रोग किसी एक व्यक्ति, परिवार या देश की समस्या नहीं है; यह संपूर्ण मानवता की साझा चुनौती है।इसीलिए, 17 नवंबर 2025 का राष्ट्रीय मिर्गी दिवस केवल भारत का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक वैश्विक संदेश है,कि बीमारियों और विकारों से लड़ाई में जागरूकता, सहानुभूति, विज्ञान और उचित जीवनशैली को अपनाना ही सबसे प्रभावी रास्ता है। यह दिन न केवल मिर्गी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर है, बल्कि आधुनिक दुनिया को यह याद दिलाने का भी मंच है कि जब तक मानवता के किसी भी हिस्से में कोई व्यक्ति किसी रोग से पीड़ित है, तब तक हमारी जिम्मेदारी नहीं होती।

अंतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक तकनीक,चिकित्सा विज्ञान, सामाजिक जागरूकता और मानवीय सहयोग मिलकर ही एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर सकते हैं जहाँ रोग केवल उपचार का विषय न हो,बल्कि रोकथाम, जागरूकता और संवेदना के साथ नियंत्रित हो सके। हम सभी का दायित्व है कि रोगों से जूझ रहे लोगों के प्रति सहानुभूति रखें,उन्हें सही जानकारी दें,जीवनशैली सुधारने को प्रेरित करें और स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए समाज को बेहतर दिशा दें। यही आधुनिक, संवेदनशील और स्वास्थ्य- सुरक्षित विश्व की वास्तविक पहचान है।

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

सवालों के घेरे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद

विश्व राजनीति की अशांत मिट्टी पर खड़े संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का नैतिक व संस्थागत आधार आज पहले से कहीं अधिक प्रश्नों से घिरा है। जब युद्ध बढ़ते जा रहे हैं, तब शांति का सबसे बड़ा संरक्षक स्वयं अपनी भूमिका सिद्ध करने में असफल दिख रहा है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 1945-आधारित संरचना आज की बहुध्रुवीय और संघर्षग्रस्त दुनिया में शांति बनाए रखने में सक्षम नहीं रह गई है। वीटो शक्ति का राजनीतिक दुरुपयोग, अप्रतिनिधिक सदस्यता, कमजोर राजनीतिक निरंतरता, असंगठित शांति अभियानों और बड़े मानवीय संकटों पर निष्क्रियता ने UNSC को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैश्विक दक्षिण की बढ़ती असंतुष्टि और विश्व व्यवस्था में उभरते शक्ति-संतुलन इस संस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हैं। संयुक्त राष्ट्र को अपनी वैधता और प्रभावशीलता बचाने के लिए गहरे, व्यावहारिक और कार्यात्मक सुधार अपनाने होंगे—अन्यथा शांति का यह सबसे बड़ा संरक्षक स्वयं प्रश्नों का केंद्र बन जाएगा।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

सवालों के घेरे में खड़ा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद केवल एक संस्था का संकट नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नैतिक नेतृत्व के क्षरण की बड़ी कहानी भी है। जब संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ था, तब दुनिया दूसरी विश्वयुद्ध की राख से निकल रही थी और मानवता ने सामूहिक रूप से यह प्रण लिया था कि भविष्य में किसी भी बड़े युद्ध को रोका जाएगा। उस सपने का केंद्र था—सुरक्षा परिषद, जिसे शांति का संरक्षक, वैश्विक न्याय का प्रहरी और सामूहिक सुरक्षा का आधार माना गया। मगर आज, लगभग 80 वर्ष बाद, जब दुनिया यूक्रेन, गाज़ा, सूडान, यमन, म्यांमार और साहेल जैसे संघर्षों से दहक रही है, तब यह संस्था अक्सर मौन खड़ी दिखाई देती है।

यह मौन केवल असहायता का प्रतीक नहीं है, बल्कि उस संरचनात्मक कमजोरी का भी संकेत है जिसने वर्षों में इसकी विश्वसनीयता को खोखला कर दिया। जब दुनिया भर के नागरिक शांति की उम्मीद में इस संस्था की ओर देखते हैं, तब यह भू-राजनीतिक हितों की जकड़ में बंधी दिखाई देती है। यही कारण है कि आज शांति का सबसे बड़ा संरक्षक स्वयं सबसे बड़े सवालों का विषय बन गया है।

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सबसे बड़ी समस्या है—वीटो शक्ति से पैदा होने वाला शक्ति-असंतुलन। पाँच स्थायी सदस्य देशों के हाथों में केंद्रित यह शक्ति उन्हें किसी भी प्रस्ताव को रोकने का अधिकार देती है, भले वह प्रस्ताव मानवीय त्रासदी को रोकने जितना आवश्यक ही क्यों न हो। यही कारण है कि गाज़ा में हज़ारों बच्चों की मौतें हों, यूक्रेन में शहरों के शहर तबाह हो जाएँ, या म्यांमार में लोकतांत्रिक संस्थाओं का विनाश हो—सुरक्षा परिषद अक्सर पक्षाघात की स्थिति में दिखाई देती है। यह एक ऐसे दरवाज़े का दृश्य बन गया है जिसके बाहर सहायता की गुहार लगाने वाले लाखों लोग खड़े होते हैं, लेकिन उस दरवाज़े को खोलने की चाबी कुछ सीमित देशों के हाथों में होती है, जो अपने राष्ट्रीय हितों को वैश्विक शांति से ऊपर रख देते हैं।

सवाल यहाँ से आगे बढ़ता है—क्या शांति किसी राष्ट्र के हितों से छोटी हो सकती है? क्या हत्या और भूख से जूझते लोग किसी स्थायी सदस्य की भू-नीति के कारण मृत्यु के लिए छोड़ दिए जाएँ? क्या संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठन का उद्देश्य केवल औपचारिक बयान देना रह गया है? ये प्रश्न आज तीखे होते जा रहे हैं, क्योंकि दुनिया भर में मीडिया, नागरिक समाज और शांति विशेषज्ञ लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र की नैतिक शक्ति का क्षरण हो चुका है।

दूसरी समस्या है—इस संस्था की संरचना का अप्रतिनिधिक होना। दुनिया 1945 से अब पूरी तरह बदल चुकी है, लेकिन UNSC की संरचना लगभग जड़वत है। अफ्रीका, जो संघर्षों का केंद्र भी है और शांति के लिए सर्वाधिक योगदान भी देता है, उसका कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं है। भारत जैसा विशाल लोकतंत्र, जिसके योगदान शांति रखरखाव से लेकर मानवीय सहायता तक व्यापक हैं, उसे भी अब तक स्थायी सदस्यता नहीं मिली है। यह एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का संकेत है जो वास्तविकता से कट चुकी है।

जहाँ वैश्विक शक्ति-मानचित्र बदल गया है—चीन का उदय हुआ, भारत आर्थिक व राजनीतिक रूप से नई ऊँचाइयों पर पहुँचा, अफ्रीका उभरती संभावनाओं का महाद्वीप बन गया, लातिन अमेरिका राजनीतिक रूप से अधिक मुखर हुआ—वहाँ सुरक्षा परिषद अब भी 1945 की मानसिकता में फंसी है। परिणामस्वरूप, कई देश इसे “वैध” के बजाय केवल “पुरानी व्यवस्था” का अवशेष समझने लगे हैं।

तीसरी समस्या है—शांति अभियानों की राजनीतिक विफलता। संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों ने कई जगह हिंसा को रोका जरूर, परंतु राजनीतिक स्थिरता नहीं ला सके। यह ऐसा था मानो किसी टूटते हुए घर की दीवार पर रंग तो कर दिया जाए, लेकिन दरारों की मरम्मत न की जाए। शांति केवल बंदूकें शांत कर देने से नहीं आती; यह आती है संवाद, समावेशन, शासन-सुधार और समाज के भीतर विश्वास पैदा करने से। लेकिन संयुक्त राष्ट्र का तंत्र शांति स्थापना और राजनीतिक समाधान को एकीकृत नहीं कर पाता।

उदाहरण के लिए, कई अफ्रीकी देशों में शांति सेना लगाने के बाद राजनीतिक मार्गदर्शन का अभाव रहा, जिसके कारण थोड़े समय बाद हिंसा फिर भड़क उठी। यह विफलता केवल संसाधन या क्षमता की नहीं, बल्कि दृष्टि-हीन रणनीति की भी है।

चौथी समस्या है—निरंतरता का अभाव। UNSC अक्सर केवल संकट की शुरुआत में सक्रिय होता है, लेकिन जब स्थिति स्थिर होने लगती है, तब उसकी उपस्थिति कम हो जाती है। इससे संघर्षग्रस्त देश राजनीतिक संक्रमण के बीच झूलते रह जाते हैं। यह “अधूरी शांति” का निर्माण करता है, जिसका अंत प्रायः नई हिंसा में होता है।

पाँचवीं समस्या है—इन विफलताओं के कारण संयुक्त राष्ट्र के प्रति भरोसे का क्षरण। आज वैश्विक दक्षिण में यह धारणा तेजी से बढ़ रही है कि सुरक्षा परिषद कुछ देशों की राजनीतिक लड़ाई का मैदान बन गया है। यही कारण है कि अफ्रीकी संघ, आसियान, अरब लीग और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रीय संगठन अपने-अपने सुरक्षा ढाँचे मजबूत कर रहे हैं, और यह प्रवृत्ति संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सीमित करती जा रही है।

इन सबके बीच प्रश्न उठता है—क्या समाधान है? क्या UNSC को बदलने की जरूरत है? या उसे पुनर्जीवित करने की?
उत्तर है—दोनों।

सुरक्षा परिषद में संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं—नए स्थायी सदस्य, वीटो शक्ति की समीक्षा, क्षेत्रीय संतुलन—परंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कार्यप्रणाली में सुधार। संयुक्त राष्ट्र महासभा अनुच्छेद 22 के तहत नए संस्थान बनाकर सुरक्षा परिषद की कमजोरियों की भरपाई कर सकती है। एक शांति एवं सतत सुरक्षा बोर्ड जैसी संस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि राजनीतिक निरंतरता बनी रहे, संघर्ष-बाद सुधारों की निगरानी हो, और शांति केवल युद्धविराम पर आधारित न होकर दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता में बदले।

इसके साथ क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका भी बढ़ानी होगी, क्योंकि वे स्थानीय संस्कृति, राजनीति और जमीनी वास्तविकताओं को बेहतर समझते हैं। शांति स्थापना अभियानों को राजनीतिक रणनीति के साथ जोड़ना होगा ताकि केवल बंदूकें ही नहीं, बल्कि मन भी शांत हो सकें।

सबसे महत्वपूर्ण है—संयुक्त राष्ट्र को स्वयं अपनी नैतिक विश्वसनीयता को पुनः स्थापित करना होगा। वह तभी संभव है जब वह मानवीय संकटों में समयबद्ध, निष्पक्ष और साहसिक निर्णय लेने में सक्षम हो। केवल बयान देने की संस्कृति से आगे बढ़कर, उसे वास्तविक प्रवर्तन-आधारित शांति तंत्र बनना होगा।

आज दुनिया भय, ध्रुवीकरण, तकनीकी संघर्ष, आतंकवाद, जल-संकट, और युद्ध की आशंकाओं से जूझ रही है। ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता मानवता को निराश कर रही है। शांति के इस सबसे बड़े संरक्षक पर उठते सवाल तभी शांत होंगे जब यह संस्था स्वयं को 21वीं सदी के अनुरूप पुनर्निर्मित करेगी।

समय आ गया है कि दुनिया संयुक्त राष्ट्र से वह भूमिका वापस मांगे जिसे निभाने का वादा उसने 80 वर्ष पहले किया था—
शांति, न्याय और मानवता की रक्षा।

डॉ सत्यवान सौरभ -स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भस्कार -हिसार

प्राकृतिक चिकित्सा: जीवनशैली जनित रोगों का सबसे सुरक्षित समाधान

8 वाँ राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा दिवस 18 नवंबर 2025:-एक सुरक्षित वैज्ञानिक और स्थाई स्वास्थ्य प्रणाली-स्वास्थ्य क्रांति का नया अध्याय

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मानव सभ्यता के विकास के साथ चिकित्सा विज्ञान ने जितनी प्रगति की है,उतनी ही तेज़ी से जीवनशैली आधारित बीमारियाँ भी बढ़ी हैं।आज कैंसर,हार्ट अटैक,मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अवसाद,मोटापा और प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी जैसी बीमारियाँ वैश्विक चुनौती बन चुकी हैं। आधुनिक चिकित्सा जहाँ उन्नत उपचार प्रदान करती है,वहीं बीमारियों के मूल कारण, जीवनशैली ,तनाव,प्रदूषण गलत खान-पान और अनियमित दिनचर्या,को प्राकृतिक चिकित्सा ही सबसे सरल, सुरक्षित और प्रभावी रूप से संबोधित करती है। इसी बढ़ते महत्व के कारण हर वर्ष 18 नवंबर को प्राकृतिक चिकित्सा दिवस मनाया जाता है। यह दिन न केवल प्राकृतिक उपचार के विचारों का प्रसार है, बल्कि एक स्वस्थ, सशक्त और रोग-प्रतिरोधक समाज की नींव रखने की वैश्विक पहल भी है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि आज दुनियाँ जिस दिशा में जा रही है, वहाँ जीवनशैली जनित रोगों का खतरा अत्यधिक बढ़ता जा रहा है। कंप्यूटर, मोबाइल, तनाव, नींद की कमी, बाहर का भोजन, प्रदूषण,और निष्क्रिय जीवनशैली ने शरीर को बीमारियों का घर बना दिया है।ऐसे समय में प्राकृतिक चिकित्सा का प्रसार और प्रचार बेहद आवश्यक हो जाता है, क्योंकि यह सस्ती, सुलभ, बिना दुष्प्रभाव, और वैज्ञानिक आधार वाली चिकित्सा है,जिसका मुख्य उद्देश्य रोग को हटाना नहीं बल्कि स्वास्थ्य को स्थायी रूप से स्थापित करना है।प्राकृतिक चिकित्सा दिवस (18 नवंबर) की उत्त्पत्ति का उद्देश्य ही यह था कि देश और दुनियाँ के लोग अपनी जड़ों की ओर लौटें और नेचर केयरस अर्थात प्रकृति ही चंगा करती है,इस विचार को पुनर्स्थापित करें। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आधुनिक दवाइयाँ केवल बीमारी को दबाती हैं,परंतु प्राकृतिक चिकित्सा बीमारी के कारण को मिटाती है।
साथियों बात अगर हम प्रकृति- सबसे बड़ी हीलर और संतुलित जीवनशैली,सबसे बड़ी दवा इसको समझने की करें तो,मनुष्य जब प्रकृति से दूर होता है तो बीमार पड़ता है, और जब वह प्रकृति के पास लौटता है तो बिना दवा के भी स्वस्थ हो जाता है। यही प्राकृतिक चिकित्सा का मूल मंत्र है। प्रकृति ने हमें हवा, पानी, धूप, मिट्टी और भोजन दिया,ये पाँच तत्व ही असली डॉक्टर हैं। संतुलित जीवनशैली, नियमित दिनचर्या, संतुलित आहार पर्याप्त आराम, मानसिक शांति और सकारात्मक दृष्टिकोण किसी भी आधुनिक दवा से अधिक प्रभावी साबित होती है।प्रकृति का हीलिंग प्रभाव वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध है-
(1) वनस्पतियों के बीच रहने से स्ट्रेस हार्मोन 40 प्रतिशत तक कम हो जाता है(2)सूर्य किरणें T-सेल्स और इम्यून कोशिकाओं को सक्रिय करती हैं (3) मिट्टी में मौजूद माइक्रोब्स मानसिक अवसाद कम करते हैं (4) जंगल की हवा एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होती है (5) प्राकृतिक वातावरण रक्तचाप और नाड़ी की गति को सामान्य करता है इसलिए कहा जाता है,अगर जीवन संतुलित है तो दवा की ज़रूरत नहीं पड़ती, और अगर जीवन असंतुलित है तो दवा भी पूरी तरह लाभ नहीं देती।

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साथियों बात अगर हम,दिनचर्या और जीवनशैली में सुधार द्वारा रोग प्रतिरोधक शक्ति कैसे बढ़ाई जा सकती है,इसको समझने की करें तो मानव शरीर अद्भुत है।इसमें स्वयं को ठीक करने की क्षमता जन्मजात होती है। लेकिन आज का जीवन,तेज़ गति, तनाव प्रदूषण, देररात जागना फास्ट फूड और मानसिक दबाव,इस प्राकृतिक क्षमता को कमजोर कर देता है। रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के लिए जीवनशैली सुधार सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक तरीका है। (1) सूर्योदय के साथ दिनचर्या की शुरुआत- सुबह की धूप विटामिन डी का प्राकृतिक स्रोत है, जो इम्यून सिस्टम को अत्यधिक सशक्त बनाता है। सूर्योदय के समय वायु शुद्ध होती है और शरीर ऊर्जा से भर जाता है। (2) प्राकृतिक आहार पर आधारित भोजन-कच्चा भोजन, मौसमी फल,अंकुरित अनाज, सलाद हरी सब्जियाँ, नारियल पानी, नींबू, फाइबर और कम तेल वाला भोजन शरीर को शुद्ध करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।(3)जल का संतुलित सेवन- शरीर में 70 प्रतिशत पानी होता है। सुबह गुनगुना पानी पीना, जल- चिकित्सा और पर्याप्त हाइड्रेशन शारीरिक टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है। (4) श्वास और योग अभ्यास-रेगुलर प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका और ध्यान,मानसिक तनाव कम करते हैं और कोशिकाओं में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाते हैं। (5) पर्याप्त नींद-7-8 घंटे की नींद हार्मोन संतुलन बनाती है, अवसाद कम करती है और प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करती है। (6) तनाव प्रबंधन-मेडिटेशन, संगीत, प्रकृति में समय, पेड़-पौधों के बीच चलना, और डिजिटल डिटॉक्स तनाव से मुक्ति के श्रेष्ठ उपाय हैं। (7) सक्रिय दिनचर्या-चलना, तैरना, हल्का व्यायाम, गार्डनिंग, ये सभी इम्यून सेल्स को सक्रिय रखते हैं। इन आदतों के माध्यम से शरीर स्वाभाविक रूप से मजबूत बनता है और गंभीर बीमारियों से बचाव की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

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साथियों बात अगर हम कैंसर और हार्ट अटैक जैसी भयानक बीमारियों में प्राकृतिक चिकित्सा का योगदान- विज्ञान, व्यवहार और संभावनाएँ इसको समझने की करें तो,कैंसर और हार्ट अटैक आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न सबसे गंभीर बीमारियों में शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाँ में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और हृदय रोग आज भी मृत्यु का सबसे बड़ा कारण हैं।यद्यपि इन बीमारियों का प्रत्यक्ष इलाज आधुनिक चिकित्सा के माध्यम से ही संभव है, लेकिन इनकी रोकथाम, जोखिम कम करने और उपचार के बाद स्वस्थ होने की प्रक्रिया में प्राकृतिकचिकित्सा अत्यंत प्रभावी रूप से कार्य करती है।प्राकृतिक चिकित्सा मूलतः शरीर की अपनी चिकित्सकीय शक्ति को सक्रिय करने पर आधारित विज्ञान है। इसमें पाँच प्रमुख तत्व,जल, वायु, धूप, मिट्टी और आहार,को संतुलित उपयोग के माध्यम से शरीर को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया है। कैंसर के संदर्भ में प्राकृतिक चिकित्सा सूजन को कम करने, टॉक्सिन हटाने, हार्मोन संतुलन, और मानसिक तनाव घटाने में अद्भुत प्रभाव डालती है। कई शोध यह बताते हैं कि प्राकृतिक भोजन, ऑर्गेनिक आहार, योग, सूर्य स्नान, जल चिकित्सा और भावनात्मक संतुलन कोशिकाओं की उम्र बढ़ने और डीएनए क्षति को कम कर सकते हैं,जो कैंसर के प्रमुख कारणों में से हैं।हार्ट अटैक की रोकथाम में भी प्राकृतिक चिकित्सा एक स्तंभ के समान है। डॉ. डीन ऑर्निश और अन्य वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि जीवनशैली सुधार,खान-पान, मेडिटेशन, गहरी श्वास, प्राकृतिक आहार और तनाव प्रबंधन,हृदय की धमनियों में जमा वसा को कम करने में सहायक हो सकता है। नेचर क्योर’ की पद्धति रक्तचाप को नियंत्रित करती है, कोलेस्ट्रॉल को संतुलित करती है और शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करती है। इस प्रकार यह कहना बिल्कुल उचित है कि प्राकृतिक चिकित्सा कैंसर और हार्ट अटैक के प्रत्यक्ष इलाज की जगह नहीं, बल्कि इनके खिलाफ प्रभावी सुरक्षा कवच है,जो लंबे समय तक बीमारी से बचाव और उपचार के बाद स्वस्थ रहने की शक्ति विकसित करती है।
साथियों बात अगर हम लोगों में प्राकृतिक चिकित्सा के प्रति जागरूकता क्यों आवश्यक है और 18 नवंबर को प्राकृतिक चिकित्सा दिवस क्यों मनाया जाता है इसको समझने की करें तो इस दिन को मनाने का उद्देश्य है- (1)सरल जीवनशैली अपनाने का संदेश देना (2) लोगों को दवाओं पर अत्यधिक निर्भरता से बचाना (3) प्राकृतिक भोजन, योग, प्राणायाम और धूप के महत्व को समझाना (4) बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों में स्वास्थ्य सुरक्षा की संस्कृति विकसित करना (5) समाज में रोकथाम- आधारित चिकित्सा की सोच को मजबूत करनाभारत सरकार ने 2025 में इसे विशेष रूप से 8 नवंबर को राष्ट्रीय स्तर पर महोत्सव के रूप में मनाने का निर्णय लिया, ताकि अधिकाधिक जनभागीदारी बढ़े और लोग प्रकृति- आधारित जीवनशैली के प्रति प्रेरित हों। यह न केवल एक दिवस है बल्कि एक राष्ट्रव्यापी स्वास्थ्य आंदोलन है।वर्ष 2025 में 8 नवंबर को पूरे देश में राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्स दिवस मनाए जाने की घोषणा की गई है। यह दिन प्राकृतिक चिकित्सा को सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के महत्वपूर्ण आधार के रूप में चिन्हित करता है। इस अवसर पर देशभर में अनेक आयोजन किए जाते हैं- (1) हेल्थ कैंप (2) निःशुल्क प्राकृतिक चिकित्सा शिविर (3) योग एवं ध्यान कार्यशालाएँ (4) प्रकृति आधारित जीवनशैली से संबंधित संगोष्ठियाँ (5) स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम (6) महिलाओं, बुजुर्गों और युवा वर्ग के लिए विशेष प्रशिक्षण (7) प्राकृतिक चिकित्सकों द्वारा मार्गदर्शन (8) स्वास्थ्य यात्रा और जन-जागरण रैलीआयोजित की जाएँगी।इसका लक्ष्य यह संदेश देना है कि स्वास्थ्य का मूल मंत्र दवाओं में नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवनशैली के समन्वय में है। यह दिवस आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, निरोगी और जागरूक भारत की नींव रखेगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि प्राकृतिक चिकित्सा केवल उपचार नहीं, बल्कि जीवन जीने का पूर्ण विज्ञान है प्राकृतिक चिकित्सा केवल बीमारियों का इलाज नहीं, बल्कि मानव जीवन को प्रकृति के साथ समरस करने का दर्शन है। कैंसर और हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों की रोकथाम, हमारी रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाना, जीवन में संतुलन लाना और मानसिक शांति की स्थापना,ये सभी लाभ प्राकृतिक चिकित्सा को आधुनिक युग में अत्यंत महत्वपूर्ण बना देते हैं।प्राकृतिक जीवनशैली अपनाना न केवल स्वास्थ्य की दिशा में कदम है, बल्कि मानवता की सुरक्षा, सामूहिक कल्याण और वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।प्रकृति ही सबसे बड़ी हीलर है, और संतुलित जीवनशैली ही सबसे बड़ी दवा।यही संदेश, यही मार्ग, और यही भविष्य है।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

🌅 “जब तक हम हैं, उम्मीद ज़िंदा है” — बुरे दौर से उबरने का सबसे बड़ा सहारा: हम खुद

लेखक – दिलीप पाण्डेय

ज़िंदगी में ऐसे पल आ ही जाते हैं जब लगता है कि सब कुछ थम गया है। हालात उम्मीद से बिल्कुल उलट हो जाते हैं और मन स्वीकार नहीं कर पाता कि इतना अंधेरा भी कभी हो सकता है। ऐसे दौर में एक ही सवाल उठता है — क्या कल बेहतर होगा?
और इसका सबसे सटीक उत्तर है — हाँ, क्योंकि ‘उम्मीद हमारा सबसे बड़ा सहारा’ है।

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कठिन समय हमेशा इंसान को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे भीतर से मजबूत बनाता है। जब बाहरी दुनिया से समर्थन कम हो जाए, तो अंत में सिर्फ हम ही अपने सबसे बड़े साथी बनकर खड़े होते हैं। यही कारण है कि कहा जाता है — “हमारी आखिरी उम्मीद हम खुद हैं, जब तक हम हैं।”
उम्मीद हमारा सबसे बड़ा सहारा: मुश्किल दौर की सबसे बड़ी सीख आज जब लोग तनाव, बेरोजगारी, आर्थिक चुनौतियों और मानसिक बोझ से गुजर रहे हैं, तब उम्मीद का होना केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि उम्मीद का स्तर जितना ऊँचा होता है, व्यक्ति की समस्या-समाधान क्षमता उतनी ही बेहतर होती है।

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उम्मीद क्यों ज़रूरी है?

  1. क्योंकि यह आगे बढ़ने का ईंधन देती है।
  2. क्योंकि यह आत्मविश्वास को मज़बूत करती है।
  3. क्योंकि यह हमें नए रास्ते खोजने के लिए प्रेरित करती है।
  4. क्योंकि यह मानसिक स्वास्थ्य को स्थिर रखती है।
    जब परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं, तब हम महसूस करते हैं कि हालात हमारे नियंत्रण में नहीं, लेकिन हमारा दृष्टिकोण जरूर है। यही दृष्टिकोण उम्मीद को जन्म देता है और इसीलिए उम्मीद हमारा सबसे बड़ा सहारा बन जाती है।
    अंधेरे के बाद ही रोशनी आती है — और यह प्रकृति का नियम है।इतिहास गवाह है कि हर बड़ी उपलब्धि के पीछे निराशा, संघर्ष और कड़ी परीक्षा के पल जरूर रहे हैं। वैज्ञानिक हो या खिलाड़ी, साधारण व्यक्ति हो या कोई नेता—सबने हार का स्वाद चखा है। फर्क बस इतना है कि उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा।
    बुरा दौर हमेशा स्थायी नहीं होता। यह भी एक प्रक्रिया है जो हमें अगले चरण के लिए तैयार करती है। जैसे बादलों के पीछे सूरज छिपता है, लेकिन गायब नहीं होता—वैसे ही उम्मीद भी कभी खत्म नहीं होती, बस थोड़ी देर के लिए धुंधली हो सकती है।
    महत्वपूर्ण तथ्य (Important Facts):
    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, उम्मीद रखने वाले लोग तनाव से 40% तेजी से बाहर निकलते हैं।
    वैज्ञानिक सिद्ध करते हैं कि सकारात्मक अपेक्षा रखने से दिमाग में डोपामिन बढ़ता है, जो मानव क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति को मजबूत करता है।
    जीवन में 90% समस्याएँ स्थायी नहीं होतीं, लेकिन 90% लोग उन्हें स्थायी मानकर उम्मीद छोड़ देते हैं।
    संतुलित जीवन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास उम्मीद को स्थायी रूप से मजबूत रखते हैं।
    जीवन में चाहे कितना भी अंधेरा क्यों न घिर आए, एक बात हमेशा याद रखिए—जब तक हम हैं, उम्मीद जिंदा है।
    बुरा समय हमें तोड़ने नहीं, बल्कि आगे की ऊँचाइयों के लिए तैयार करने आता है। इसलिए खुद पर भरोसा रखिए, क्योंकि “उम्मीद हमारा सबसे बड़ा सहारा” है और यह सहारा हमें हर चुनौती से पार ले जाने की क्षमता रखता है।

राष्ट्र के महान योगदानकर्ताओं की अनमोल विरासत

2020 – मोहनजी प्रसाद: भोजपुरी और हिन्दी सिनेमा के सशक्त निर्देशक
मोहनजी प्रसाद भोजपुरी और हिन्दी सिनेमा के उन प्रतिष्ठित निर्देशकों में शामिल थे, जिन्होंने क्षेत्रीय फिल्मों को नई दिशा दी। उनके निर्देशन में बनी फिल्मों में सामाजिक सरोकार, पारिवारिक मूल्य और समसामयिक वास्तविकताओं की झलक मिलती है। भोजपुरी कला को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में उनका योगदान अद्वितीय माना जाता है। 17 नवंबर 2020 को उनके निधन ने फिल्म जगत को गहरा आघात पहुँचाया और अत्यंत अनुभवी निर्देशक की कमी हमेशा खलेगी।
2018 – कुलदीप सिंह चाँदपुरी: लौंगावाला के अमर योद्धा
1971 के भारत-पाक युद्ध में ‘लौंगावाला के शेर’ के रूप में पहचाने जाने वाले मेजर (बाद में कर्नल) कुलदीप सिंह चाँदपुरी भारतीय सैन्य इतिहास के वीरतम योद्धाओं में गिने जाते हैं। 120 सैनिकों के छोटे से सैनिक दल के साथ उन्होंने पाकिस्तानी टैंकों की भारी फौज को पछाड़ते हुए इतिहास बदला। महावीर Chakra से सम्मानित यह वीर 17 नवंबर 2018 को दुनिया से विदा हुए, पर उनका साहस नई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत बना हुआ है।
2016 – श्रीनिवास कुमार सिन्हा: सैनिक, प्रशासक और आदर्श राजनेता
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) श्रीनिवास कुमार सिन्हा भारतीय सेना के श्रेष्ठ रणनीतिकारों में गिने जाते थे। सेवा के बाद उन्होंने असम, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल के रूप में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका निभाई। सुरक्षा नीति, रक्षा रणनीति और सुशासन पर उनकी स्पष्ट सोच ने उन्हें एक आदर्श प्रशासक के रूप में स्थापित किया। 17 नवंबर 2016 को उनका निधन भारत के सैन्य व राजनीतिक इतिहास के लिए बड़ी क्षति थी।
2015 – अशोक सिंघल: हिंदुत्व विचारधारा के प्रखर स्वर
‘विश्व हिन्दू परिषद’ के पूर्व अध्यक्ष अशोक सिंघल भारतीय सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों की प्रमुख आवाज थे। राम जन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका केंद्रीय रही और वह हिंदू समाज के संगठन, संस्कृत शिक्षा और सांस्कृतिक जागरण पर लगातार कार्यरत रहे। 17 नवंबर 2015 को उनका निधन हिंदू संगठित शक्ति के एक युग के अंत जैसा था।
2012 – बाल ठाकरे: महाराष्ट्र के करिश्माई नेता
शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे अपने बेबाक राजनीतिक दृष्टिकोण, प्रखर व्यक्तित्व और मराठी अस्मिता के लिए प्रसिद्ध थे। पत्रकारिता से राजनीति तक का उनका सफर उन्हें जनता का “साहेब” बनाता है। महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी पकड़ और सामाजिक आंदोलनों में भूमिका ने उन्हें लोकप्रिय नेता बना दिया। 17 नवंबर 2012 को उनका निधन एक युगांतकारी घटना साबित हुई जिसने राजनीति के स्वरूप को बदल दिया।
2008 – डार्विन दीनघदो पग: मेघालय के दूसरे मुख्यमंत्री
डार्विन दीनघदो पग पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख नेताओं में से थे और मेघालय के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल दूरदर्शिता और सरल प्रशासन के लिए जाना जाता है। उन्होंने जनजातीय समाज के साथ संवाद, विकास योजनाओं के विस्तार और शिक्षा को बढ़ावा देने में उल्लेखनीय योगदान दिया। 17 नवंबर 2008 को उनका निधन एक संवेदनशील और दूरदर्शी नेता की क्षति थी।
2007 – रघुनंदन स्वरूप पाठक: भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश
भारत के 18वें मुख्य न्यायाधीश रघुनंदन स्वरूप पाठक न्यायपालिका में पारदर्शिता, न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक सुधारों के प्रबल समर्थक थे। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत के प्रतिनिधि के रूप में भी उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया। न्याय प्रणाली में उनकी गरिमामयी भूमिका 17 नवंबर 2007 को उनके निधन के साथ इतिहास का हिस्सा बन गई।
1962 – जसवंत सिंह रावत: एक अकेले सैनिक की अमर गाथा
1962 के भारत-चीन युद्ध में जसवंत सिंह रावत ने जिस प्रकार अकेले 72 घंटे तक मोर्चा संभालकर शत्रु सेना को रोके रखा, वह भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे प्रेरक गाथाओं में से एक है। आज भी उनका स्मारक ‘जसवंतगढ़’ भारतीय सैनिकों की आस्था का प्रतीक है। 17 नवंबर 1962 को उनका बलिदान सदा के लिए अमर हो गया।
1928 – लाला लाजपत राय: पंजाब केसरी का अमर बलिदान
लाल-बाल-पाल त्रिकोण के स्तंभ लाला लाजपत राय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रदूतों में से थे। साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान अंग्रेजों की लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल होने के बाद 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हुआ। उनके शब्द—“मेरे शरीर पर लगी चोटें भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतिम कील साबित होंगी”—आज भी गूंजते हैं।
17 नवंबर को हुए निधन हमें याद दिलाते हैं कि देश केवल सीमाओं, संस्कृतियों और परंपराओं से नहीं बनता, बल्कि उन महान लोगों के सपनों, संघर्ष और बलिदानों से बनता है जिन्होंने राष्ट्र को नई दिशा दी। यह तिथि उनके अद्वितीय योगदानों को नमन करने और उनसे प्रेरणा लेने का समय है।


स्वास्थ्य, करियर, राजनीति, प्रशासन और प्रेम का पूर्ण विश्लेषण

♈ मेष (Aries) – अक्षर: अ, च, ल
सार: दिन आनंददायक। प्रेम और वैवाहिक जीवन रंगीन।
स्वास्थ्य: बेहतर।
प्रेम/दांपत्य: मुलाकात, समझ व रोमांस बढ़ेगा।
व्यवसाय/कार्य: सफलता।
शिक्षा: मन एकाग्र रहेगा, प्रतियोगिता में लाभ।
कला/संगीत: नई उपलब्धि का योग।
राजनीति: जनसमर्थन मिलेगा।
प्रशासन: नई जिम्मेदारी संभव।
आर्थिक स्थिति: मजबूत।
शुभ रंग: लाल
शुभ अंक: 9
उपाय: काली माँ को प्रणाम करें।

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वृषभ (Taurus) – अक्षर: ब, व, उ
सार: स्वास्थ्य पर ध्यान दें।
स्वास्थ्य: हार्मोनल समस्या उभर सकती है।
प्रेम/संतान: ठीक-ठाक।
व्यवसाय: स्थिर लाभ।
शिक्षा: नियमित अध्ययन करें।
कला/संगीत: रचनात्मकता बढ़ेगी।
राजनीति: प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
प्रशासन: कार्य समय पर पूरे होंगे।
आर्थिक स्थिति: सामान्य।
शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 6
उपाय: सफेद वस्तु साथ रखें।
मिथुन (Gemini) – अक्षर: क, छ, घ
सार: शुभ निर्णय के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन।
स्वास्थ्य: पहले से बेहतर।
प्रेम/संतान: मजबूत स्थिति।
व्यवसाय: वृद्धि।
शिक्षा: अध्ययन में प्रगति।
कला/संगीत: कार्यों में चमक।
राजनीति: नई भूमिका संभव।
प्रशासन: वरिष्ठ प्रसन्न रहेंगे।
आर्थिक स्थिति: बढ़िया लाभ।
शुभ रंग: नीला
शुभ अंक: 5
उपाय: काली माँ के मंदिर जाएँ।
कर्क (Cancer) – अक्षर: ह, ड, म
सार: संपत्ति खरीद का योग।
स्वास्थ्य: अच्छा।
प्रेम/संतान: अनुकूल।
व्यवसाय: लाभ।
शिक्षा: सफलता के अवसर।
कला/संगीत: उत्सव जैसा दिन।
राजनीति: लोकप्रियता बढ़ेगी।
प्रशासन: फैसले आपके पक्ष में होंगे।
आर्थिक स्थिति: मजबूती।
शुभ रंग: लाल
शुभ अंक: 2
उपाय: लाल वस्तु रखें।

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सिंह (Leo) – अक्षर: म, ट, फ
सार: पराक्रम फल देगा।
स्वास्थ्य: बेहतर।
प्रेम/संतान: शुभ।
व्यवसाय: उन्नति।
शिक्षा: प्रतियोगिताओं में बढ़त।
कला/संगीत: विशेष प्रशंसा।
राजनीति: पदोन्नति या प्रशंसा।
प्रशासन: तरक्की के योग।
आर्थिक स्थिति: मजबूत।
शुभ रंग: पीला
शुभ अंक: 1
उपाय: पीली वस्तु साथ रखें।
कन्या (Virgo) – अक्षर: प, ठ, ण
सार: धन आगमन।
स्वास्थ्य: अच्छा।
प्रेम/संतान: श्रेष्ठ समय।
व्यवसाय: वृद्धि।
शिक्षा: नई उपलब्धि।
कला/संगीत: वाणी का प्रभाव बढ़ेगा।
राजनीति: जनसंपर्क मजबूत।
प्रशासन: फैसले आपके अनुसार होंगे।
आर्थिक स्थिति: अच्छी पर निवेश टालें।
शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 7
उपाय: सफेद वस्तु रखें।
तुला (Libra) – अक्षर: र, त
सार: आकर्षण व प्रभाव बढ़ेगा।
स्वास्थ्य: अच्छा।
प्रेम/संतान: सुखद।
व्यवसाय: लाभ।
शिक्षा: पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
कला/संगीत: मंच पर ख्याति।
राजनीति: सम्मान व बढ़त।
प्रशासन: पद प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
आर्थिक स्थिति: लाभकारी दिन।
शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 3
উপाय: सफेद वस्तु पास रखें।
वृश्चिक (Scorpio) – अक्षर: न, य
सार: खर्च अधिक पर कोई अशुभता नहीं।
स्वास्थ्य: सामान्य।
प्रेम/संतान: सहयोग मिलता रहेगा।
व्यवसाय: लाभ ही लाभ।
शिक्षा: प्रगति।
कला/संगीत: नए अवसर।
राजनीति: आलोचना से बचें।
प्रशासन: कार्य सुचारु।
आर्थिक स्थिति: नियंत्रित रहे।
शुभ रंग: पीला
शुभ अंक: 4
उपाय: पीला वस्त्र धारण करें।
धनु (Sagittarius) – अक्षर: भ, ध, फ
सार: आय के नए स्रोत।
स्वास्थ्य: अच्छा।
प्रेम/संतान: शुभ।
व्यवसाय: मजबूत सफलता।
शिक्षा: उच्च शिक्षा में लाभ।
कला/संगीत: मान-यश मिलेगा।
राजनीति: पुरानी योजनाओं से लाभ।
प्रशासन: प्रमोशन योग।
आर्थिक स्थिति: बहुत मजबूत।
शुभ रंग: लाल
शुभ अंक: 8
उपाय: लाल वस्तु रखें।
मकर (Capricorn) – अक्षर: भ, ज
सार: व्यापारिक उन्नति।
स्वास्थ्य: अच्छा।
प्रेम/संतान: शुभ।
व्यवसाय: कोर्ट-कचहरी में विजय।
शिक्षा: प्रतियोगिता में अच्छे परिणाम।
कला/संगीत: नई पहचान।
राजनीति: प्रभाव बढ़ेगा।
प्रशासन: ऊँचे पद का योग।
आर्थिक स्थिति: मजबूत लाभ।
शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 1
उपाय: सफेद वस्तु साथ रखें।
कुंभ (Aquarius) – अक्षर: ग, स, श
सार: भाग्य का साथ, यात्रा लाभकारी।
स्वास्थ्य: अच्छा।
प्रेम/संतान: अनुकूल।
व्यवसाय: मजबूती।
शिक्षा: नया अवसर।
कला/संगीत: विदेश से सम्मान।
राजनीति: प्रभाव बढ़ेगा।
प्रशासन: वरिष्ठों का समर्थन।
आर्थिक स्थिति: समृद्धि।
शुभ रंग: हरा
शुभ अंक: 5
उपाय: हरी वस्तु साथ रखें।
मीन (Pisces) – अक्षर: द, च, झ
सार: परिस्थितियाँ प्रतिकूल, सावधानी जरूरी।
स्वास्थ्य: मध्यम।
प्रेम/संतान: सामान्य।
व्यवसाय: लगभग ठीक।
शिक्षा: आलस्य हानि देगा।
कला/संगीत: रचनात्मकता कम।
राजनीति: संयम रखें।
प्रशासन: विवादों से बचें।
आर्थिक स्थिति: औसत।
शुभ रंग: क्रीम
शुभ अंक: 2
उपाय: सफेद वस्तु काली मंदिर में दान करें।
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