Tuesday, June 30, 2026
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सलेमपुर में दबंगों का तांडव: होलसेल व्यापारी पर हमला, मुकदमा दर्ज

सलेमपुर, देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)। मोहम्मद हुसैन इंटर कॉलेज, नवलपुर के पास स्थित एक होलसेल दुकान पर दबंगों द्वारा की गई मारपीट और लूट की घटना में पुलिस ने पीड़ित की शिकायत पर नामजद सहित कई अज्ञात युवकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

पीड़ित मोहम्मद दानिश शोवेव, निवासी देवारा पूर्व शामपुर ने बताया कि घटना 19 नवंबर 2025 की शाम लगभग 3:30 बजे की है। वह अपनी दुकान, जहाँ चिकन और अंडों का होलसेल कारोबार होता है, पर मौजूद था। इसी दौरान ग्राम काजी का बलुआ (निज़ामाबाद) के निवासी फैसल कुरैशी पुत्र अख्तर कुरैशी, यूसुफ मजीद पुत्र मजीद, सरवर पुत्र अज्ञात, आसिफ पुत्र अब्दुल्ला, इरफान पुत्र फैयाज मरहूम, सैफ अली पुत्र फिरोज, सैफ पुत्र अज्ञात सहित लगभग चार अन्य युवक मोटरसाइकिलों के साथ दुकान के सामने जुट गए।

दानिश के अनुसार, भीड़ हटाने और रास्ता खाली करने का अनुरोध करते ही आरोपियों ने अचानक हमला कर दिया। उसे जमीन पर पटककर मारपीट की गई तथा दुकान में रखे अंडों को नुकसान पहुँचाया गया। इसी दौरान आरोपियों पर दुकान काउंटर में रखे नकद रुपए निकालने का भी आरोप है।

बीच-बचाव करने पहुँचे मोहम्मद गुफरात को भी हमलावरों ने पीटकर घायल कर दिया। जाते समय आरोपियों ने दानिश को जान से मारने की धमकी भी दी।

पीड़ित की तहरीर पर सलेमपुर कोतवाली में संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

भारतीय विद्यालय प्रबंधक संघ देवरिया की जिला कार्यकारिणी घोषितदेवेश मणि अध्यक्ष, प्रदीप गौड़ संगठन मंत्री बने

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)। नवगठित भारतीय विद्यालय प्रबंधक संघ की जिला स्तरीय बैठक बब्बन सिंह इंटरमीडिएट कॉलेज, हरैया (देवरिया) में सम्पन्न हुई। बैठक में सर्वसम्मति से नई जिला कार्यकारिणी का चुनाव किया गया।

चयनित पदाधिकारियों में देवेश मणि को जिला अध्यक्ष, हेमंत सिंह को जिला संयोजक, हृदय कुमार पाठक को वरिष्ठ जिला उपाध्यक्ष तथा संग्राम सिंह यादव को जिला उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।

इसके अलावा घनश्याम चौबे को जिला महामंत्री, प्रदीप गौड़ को जिला संगठन मंत्री, विशाल गुप्ता को जिला विधिक सलाहकार, दिनेश मिश्रा को सह जिला संयोजक तथा कृपा शंकर को जिला विद्यालय विकास मंत्री नियुक्त किया गया।

बैठक में संगठन की मजबूती, विद्यालयों की समस्याओं और आगामी कार्ययोजना पर भी विस्तृत चर्चा की गई। नई कार्यकारिणी के गठन पर सदस्यों ने हर्ष व्यक्त किया।

निर्वाचक नामावली के एसआईऑर हेतु जिला स्तर पर सुविधा केंद्र सक्रिय

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी ने अवगत कराया है कि भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार निर्वाचक नामावलियों के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण का कार्य जनपद में जारी है।
जनसाधारण की सुविधा के लिए जिला निर्वाचन कार्यालय में डिस्ट्रिक्ट कॉन्टैक्ट सेंटर (डीसीसी) स्थापित किया गया है, जिसका टोल-फ्री नंबर 1950 है।
उन्होंने बताया कि विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण के संबंध में किसी भी मतदाता को गणना प्रपत्र भरने, संशोधन से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने अथवा अन्य निर्वाचन संबंधी मार्गदर्शन की आवश्यकता होने पर वे टोल-फ्री नंबर 1950 पर कॉल कर सकते हैं।

सुबह की सन्नाटे में तड़के हादसा — तेज रफ्तार कार ने ली महिला की जान, चालक टायर फटने से दबोचा गया

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। श्यामदेउरवां थाना क्षेत्र के परतावल – गोरखपुर मार्ग पर रविवार की सुबह एक दर्दनाक हादसे ने पूरे इलाके को दहला दिया। बसहिंया खुर्द निवासी 38 वर्षीय पूनम यादव की एक तेज रफ्तार डिज़ायर कार की टक्कर से मौत हो गई। सुबह करीब 6:30 बजे पूनम यादव सड़क किनारे अपने घर लौट रही थीं, तभी पीछे से आ रही अनियंत्रित कार ने उन्हें जोरदार टक्कर मार दी।हादसा इतना भीषण था कि मौके पर अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों ने तत्काल उन्हें सीएचसी परतावल पहुंचाया,जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
बताया जा रहा है कि पूनम यादव रोज की तरह सुबह गोबर फेंककर घर वापस आ रही थीं, तभी यह हादसा हो गया।
टक्कर मारने के बाद कार चालक फरार होने की कोशिश कर रहा था, लेकिन किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया। रास्ते में कार का टायर फट गया, जिसके चलते लोगों ने दौड़कर उसे पकड़ लिया। इसकी सूचना तुरंत पुलिस को दी गई।श्यामदेउरवां थाना प्रभारी अभिषेक सिंह मौके पर पहुंचे और कार सहित चालक को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले में विधिक कार्रवाई शुरू कर दी है।
मृतका पूनम यादव के पति चइतु यादव सऊदी अरब में नौकरी करते हैं। घर पर दो मासूम बच्चे—आर्यन (14) और अयांश (10)—अपनी मां की असमय मौत से सदमे में हैं। परिवार और गांव में मातम पसरा हुआ है।
इलाके के लोगों में इस हादसे को लेकर गहरा आक्रोश है। स्थानीय निवासी सड़क पर तेज रफ्तार और लापरवाह ड्राइविंग पर लगाम लगाने की मांग उठा रहे हैं।

केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी पहुंचे वार्ड 15 चिउरहाँ के बूथ संख्या 179

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मतदाता पुनरीक्षण अभियान का निरीक्षण, युवाओं–महिलाओं से भरवाएं गए आवश्यक फार्म

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। मतदाता सूची को शुद्ध, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाने के उद्देश्य से चल रहे मतदाता पुनरीक्षण अभियान के तहत रविवार को केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री एवं सांसद पंकज चौधरी नगर के वार्ड संख्या 15 चिउरहाँ स्थित बूथ संख्या 179 पर पहुंचे। इस दौरान उन्होंने पुनरीक्षण प्रक्रिया का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया और अधिकारियों से अभियान की प्रगति की विस्तृत जानकारी हासिल की।
निरीक्षण के दौरान केंद्रीय मंत्री ने बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) से नए मतदाताओं के पंजीकरण, मृतक मतदाताओं के नाम हटाने, पते में परिवर्तन तथा सुधारात्मक फार्मों की स्थिति पर विस्तृत जानकारी ली। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची का पारदर्शी, अद्यतन और त्रुटिरहित होना अत्यंत आवश्यक है, तथा प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सूची में जुड़ना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
केंद्रीय मंत्री ने बूथ परिसर में उपस्थित युवाओं, महिलाओं व वरिष्ठ नागरिकों से आवश्यक फ़ॉर्म भरवाए और 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके युवाओं को अपनी पात्रता के अनुसार तुरंत नाम जुड़वाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपील की कि परिवार के सभी पात्र सदस्यों का नाम सूची में अवश्य जोड़ें और किसी भी त्रुटि की स्थिति में तुरंत सुधार कराएं। उन्होंने बीएलओ को निर्देश दिया कि घर–घर सत्यापन कार्य जिम्मेदारी के साथ पूरा किया जाए,किसी भी पात्र नागरिक का नाम सूची से न छूटे,सभी सुधारात्मक कार्य समयबद्ध तरीके से किए जाएँ,बूथ पर उपलब्ध आवश्यक सुविधाओं की निरंतर समीक्षा कर उन्हें बेहतर बनाया जाए।
इस दौरान कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष रविकांत पटेल, सदर विधायक जय मंगल कन्नौजिया, अमरनाथ पटेल, बबलू यादव, राजीव द्विवेदी, कृष्ण गोपाल जयसवाल, सतीश सिंह, रमेश वर्मा, दीपक, ऋषिकेश पटेल, राणा पटेल, पप्पू पटेल, आकाश श्रीवास्तव, अबरार अहमद, सहित अन्य जनप्रतिनिधि व स्थानीय नागरिक मौजूद रहें।

मुख्यमंत्री को पुलिस झंडा दिवस पर डीजीपी ने लगाया पुलिस कलर

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। कर्तव्यनिष्ठा, वीरता और सेवा-समर्पण की परंपरा को समर्पित पुलिस झंडा दिवस पर राजधानी लखनऊ में उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक राजीव केकृष्ण ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पुलिस कलर (झंडा) लगाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास पर भी पुलिस झंडा दिवस के तहत डीजीपी राजीव कृष्ण ने मुख्यमंत्री को फ्लैग पिन प्रदान किया। इस अवसर पर एडीजी एलओ अमिताभ यश, एडीजी एसके भगत सहित वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

भारत में सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्में: क्या हैं उनकी सफलता के कारण और किन पात्रों ने दिल में बनाई खास जगह

भारत में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि भावना, संस्कृति, संघर्ष, प्रेम, साहस और समाज का आईना माना जाता है। पिछले कई दशकों में कुछ ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने महीनों—कहीं-कहीं वर्षों तक—थियेटरों पर कब्ज़ा बनाए रखा और दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई। ये फिल्में सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज, भाषा, संवाद, फैशन और जीवनशैली पर गहरी छाप छोड़ने में सफल रहीं।

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हम उन भारतीय फिल्मों का विश्लेषण कर रहे हैं जो सबसे लंबी अवधि तक सिनेमाघरों में चलीं, साथ ही उनके पात्र, कहानी, और लंबे समय तक लोकप्रिय रहने के कारणों का विस्तृत अध्ययन भी कर रहे हैं।

  1. शोले (1975): भारतीय सिनेमा का अमर इतिहास
    चलने की अवधि : कुछ शहरों में 5 साल से भी अधिक
    निर्देशक : रमेश सिप्पी
    मुख्य कलाकार : अमिताभ बच्चन (जय), धर्मेंद्र (वीरू), अमजद ख़ान (गब्बर सिंह), हेमा मालिनी (बसंती), जया भादुड़ी (राधा)
    क्यों बनी ब्लॉकबस्टर?
    शोले सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक भावना है जो पीढ़ी दर पीढ़ी दर्शकों को जोड़ती रही है। इसकी सफलता के प्रमुख कारण थे—
    दमदार कहानी,यादगार किरदार,गब्बर सिंह जैसा खलनायक,दोस्ती, बदला और भावनाओं का मिश्रण,डायलॉग्स जिन पर आज भी मीम्स बनते हैं।
    पात्र जिन्होंने फिल्म को अमर बनाया
    जय: शांत, स्थिर और भावुक—अमिताभ की गंभीर अदाकारी का बेहतरीन उदाहरण।
    वीरू: मस्तीभरा, दिलदार और रोमांटिक—धर्मेंद्र का बेमिसाल अंदाज़।
    गब्बर सिंह: अमजद ख़ान की आवाज़, संवाद और खतरनाक व्यक्तित्व ने उसे दुनिया के सबसे यादगार विलेन में बदल दिया।
    बसंती: ‘चक्‍की पर बोलने’ वाली न्यारी बसंती ने दर्शकों के दिल में खास जगह बनाई।
  2. ये भी पढ़ें –रबी मौसम 2025 के लिए गेहूं, चना, सरसों और आलू फसलें अधिसूचित, बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर निर्धारित
  3. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995): प्रेम का अंतहीन सफर
    चलने की अवधि : मुंबई के मराठा मंदिर में 2.5+ वर्षों तक
    निर्देशक : आदित्य चोपड़ा
    मुख्य कलाकार : शाहरुख खान (राज), काजोल (सिमरन)
    क्यों बनी रिकॉर्ड तोड़ रोमांटिक फिल्म?
    DDLJ ने भारतीय रोमांस की परिभाषा बदल दी।
    परिवार की इज्जत और प्यार दोनों को समान सम्मान
    स्विट्ज़रलैंड से लेकर पंजाब तक की खूबसूरत लोकेशन,रोमांस, संगीत और भावनाओं का दिलकश मेल।
    मुख्य पात्रों का प्रभाव
    राज मल्होत्रा : चुलबुला, दिलफेंक लेकिन संस्कारी—शाहरुख खान की आइकॉनिक पहचान।
    सिमरन : भारतीय परंपरा और आधुनिक सोच का सुंदर मिश्रण।
    फिल्म ने करोड़ों युवाओं को प्रेम का असली अर्थ सिखाया—सम्मान, विश्वास और परिवार की स्वीकृति।
  4. मुग़ल-ए-आजम (1960): भव्यता और प्रेम का शाश्वत संगम।
    चलने की अवधि : वर्षों तक पुनः-प्रदर्शन
    निर्देशक : के. आसिफ
    कलाकार : दिलीप कुमार (सलीम), माधुबाला (अनारकली), पृथ्वीराज कपूर (अकबर)
    क्यों आज भी अनोखी?
    भव्य सेट,क्लासिकल संगीत,शाही संवाद,अभिनय की ऊँचाइयाँ,प्रेम और त्याग का मार्मिक चित्रण
    पात्र
    अनारकली : अपने प्रेम के लिए सब कुछ कुर्बान करने वाली एक प्रतीकात्मक शख्सियत।
    सलीम : प्रेम में डूबा शहजादा और विद्रोही युवराज।
    अकबर : पिता, बादशाह और एक दृढ़ प्रशासक का शक्तिशाली चरित्र।
  5. हम आपके हैं कौन (1994): परिवार और संस्कारों का उत्सव।
    चलने की अवधि : कई सिनेमाघरों में 1 वर्ष से अधिक
    निर्देशक : सूरज बड़जात्या
    कलाकार : सलमान खान (प्रेम), माधुरी दीक्षित (निशा)इस फिल्म ने साबित किया कि बिना विलेन, बिना बड़ी लड़ाई, केवल रिश्तों और गीतों पर आधारित कहानी भी सुपरहिट हो सकती है।
    अंत में: भारतीय सिनेमा का जादू क्यों चलता है वर्षों तक?
    भारत की सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्मों में एक बात समान है—
    भावनात्मक गहराई
    मजबूत कहानी
    यादगार पात्र
    संगीत
    परिवार और समाज से जुड़ाव
    भारतीय दर्शक भावनाओं से भरे होते हैं, और यही वजह है कि जो फिल्में दिल को छू जाती हैं, वे कुछ महीनों नहीं बल्कि दशकों तक सिनेमाघरों में राज करती हैं।

रबी मौसम 2025 के लिए गेहूं, चना, सरसों और आलू फसलें अधिसूचित, बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर निर्धारित

आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)कृषि विभाग आगरा ने जनपद के सभी कृषकों को रबी मौसम 2025-26 के फसल बीमा से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी जारी की है। उप कृषि निदेशक मुकेश कुमार ने बताया कि रबी की अधिसूचित फसलों—गेहूं, चना, सरसों और आलू—के बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 दिसंबर 2025 तय की गई है। जनपद में HDFC ERGO जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड वर्ष 2023-24 से 2025-26 तक कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में अधिकृत है।

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फसल बीमा के लिए किसानों को मात्र 1.5% से 5% तक प्रीमियम जमा करना होगा।
गेहूं: प्रीमियम 1326 रुपये/हेक्टेयर, बीमित राशि 88,400 रुपये
चना: प्रीमियम 1441.50 रुपये/हेक्टेयर, बीमित राशि 96,100 रुपये
सरसों: प्रीमियम 1725 रुपये/हेक्टेयर, बीमित राशि 1,15,000 रुपये
आलू: प्रीमियम 11,200 रुपये/हेक्टेयर (5%), बीमित राशि 2,24,000 रुपये

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उप कृषि निदेशक ने स्पष्ट किया कि ऋणी कृषक यदि योजना में शामिल नहीं होना चाहते हैं, तो उन्हें 24 दिसंबर 2025 तक अपनी बैंक शाखा में लिखित सूचना देना अनिवार्य है। वहीं गैर-ऋणी कृषक जन सेवा केंद्र, संबंधित बैंक या स्वयं ऑनलाइन माध्यम से 31 दिसंबर 2025 तक बीमा करा सकते हैं।

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स्थानीय आपदा, भारी वर्षा या प्राकृतिक क्षति की स्थिति में किसान को 72 घंटे के भीतर सरकारी टोल-फ्री नंबर 14447 पर सूचना देना आवश्यक होगा। फसल क्षति का मुआवजा केवल उन्हीं किसानों को मिलेगा जिन्होंने समय पर बीमा कराया है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सूचना दी है।

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योजना की विस्तृत जानकारी के लिए किसान HDFC ERGO की जनपद प्रतिनिध रवीना चौधरी (मो.- 8529766209) से संपर्क कर सकते हैं।

बीती रात मार्ग दुर्घटना में भिटौली के पूर्व प्रधान व पत्रकार आशीष गौतम का निधन,क्षेत्र में गहरा शोक

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। बीती रात एक दर्दनाक सड़क हादसे में ग्राम पंचायत भिटौली बाजार के पूर्व प्रधान व पत्रकार आशीष गौतम का असमय निधन हो गया। हादसे के बाद उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
घटना की सूचना मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।यह दुर्घटना आशीष गौतम अपने दरवाजे पर टेलीफोन से किसी से बात कर रहे थे कि अचानक एक मुर्गी भरी पिकअप उन्हें ठोकर मारी ,गंभीर चोट लगने से आहत गौतम को जिला अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने चिकित्सा के दौरान मृत घोषित कर दिया ।आशीष गौतम के मृत्यु की खबर से पूरा पत्रकार समाज को एक गहरा ठेस पहुंचा। वे मिलनसार व्यक्तित्व और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका के लिए जाने जाते थे। उनके निधन से पत्रकार, ग्रामीणों, शुभचिंतकों और समाजसेवियों में गहरा दुःख व्याप्त है। परिजन बार-बार बेसुध हो रहे हैं और गांव में मातम का माहौल है। उनकी मौत की सूचना पर उनके शुभचिंतकों के आने जाने का ताता लगा हुआ है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हुए शोक-संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है।

वेतन घोटाला से लेकर अवैध वसूली तक, डीपीआरओ पर गंभीर आरोपों की बौछार

पंचायती विभाग में खलबली! डीपीआरओ के खिलाफ कार्रवाई की तलवार

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)l जिला पंचायत राज अधिकारी (डीपीआरओ) मनोज कुमार यादव के खिलाफ कई गंभीर आरोप सामने आने के बाद पंचायती राज विभाग में जोरदार हलचल मची हुई है। प्रयागराज के सामाजिक कार्यकर्ता पी.एल. आहूजा ने उत्तर प्रदेश शासन को भेजी अपनी विस्तृत शिकायत में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और पद के दुरुपयोग से जुड़े कई बिंदु उठाए हैं, जिसके बाद अफसरशाही में चिंता गहराती जा रही है।
बस्ती मंडल के उप निदेशक (पंचायत) समरजीत यादव ने डीपीआरओ से 48 घंटे के भीतर सभी आरोपों पर साक्ष्य सहित उत्तर देने को कहा है। इससे पहले शासन द्वारा 3 अक्टूबर 2025 को भेजे गए नोटिस का कोई जवाब न देने पर उप निदेशक ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की और स्पष्ट किया कि निर्धारित समय में जवाब न मिलने पर रिपोर्ट सीधे शासन व निदेशालय को भेजी जाएगी।
शिकायत में वेतन संबंधी अनियमितताएँ सबसे प्रमुख हैं। आरोप है कि डीपीआरओ गलत पे-लेवल के आधार पर उच्च वेतन ले रहे हैं और अपनी मूल सेवापुस्तिका स्वयं रखने के कारण एसीपी प्रस्ताव जानबूझकर लंबित कर दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुँच रहा है।
इसके अलावा संविदा पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों के मानदेय को 2-3 माह तक रोकने, नौकरी से निकालने की धमकी देने और अपरोक्ष रूप से आर्थिक लाभ लेने का भी आरोप लगाया गया है। शिकायत में यह भी दर्ज है कि सरकारी वाहन का निजी उपयोग, लखनऊ तक ले जाना, अपनी बिरादरी के सफाईकर्मी से गाड़ी चलवाना और लॉगबुक में डीजल हेराफेरी जैसी गतिविधियाँ लंबे समय से चल रही हैं।
अन्य आरोपों में यह भी शामिल है कि डीपीआरओ ने सुल्तानपुर में अपर डीपीआरओ का कार्यभार ग्रहण नहीं किया और संत कबीर नगर में ही टिके रहे। इसके साथ ही 2018 और 2022 में नियुक्त ग्राम पंचायत अधिकारियों को प्रभारी सहायक विकास अधिकारी पंचायत बनाकर वित्तीय अधिकार देने के लिए डोंगल एक्टिवेट कराने का आरोप भी है, जिसे शासनादेशों के विरुद्ध बताया गया है।
ग्राम पंचायत सचिवों तथा पंचायत अधिकारियों के वेतन में देरी, बकाया भुगतान में मनमानी और जांच रिपोर्ट रोककर अवैध वसूली करने जैसी बातें भी शिकायत में शामिल हैं।
पी.एल. आहूजा ने शासन से मांग की है कि डीपीआरओ को तत्काल हटाते हुए निलंबित किया जाए और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि समयबद्ध कार्रवाई न हुई, तो वह हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करेंगे।

प्रकृति के मौन संदेशों को सुनने वाले वैज्ञानिक: डॉक्टर जगदीश चंद्र बोस

पुनीत मिश्र

विज्ञान के विशाल परिदृश्य में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल प्रयोगशाला की दीवारों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपनी दृष्टि को प्रकृति, जीवन और मानवता की व्यापक समझ से जोड़ देते हैं। जगदीश चंद्र बोस ऐसा ही एक नाम हैं। एक वैज्ञानिक, एक खोजकर्ता और एक ऐसे चिंतक, जिन्होंने अदृश्य तरंगों में भविष्य की तकनीक और मौन पौधों में जीवन की धड़कन पहचान ली।
आज जब दुनिया वायरलेस संचार, माइक्रोवेव तकनीक और जैविक अनुसंधान के चमत्कारों पर गर्व करती है, तब यह स्मरण करना आवश्यक है कि इन क्षेत्रों में भारत के इस मनीषी का योगदान कितना मौलिक और दूरदर्शी था। 1895 में बोस ने रेडियो तरंगों का प्रसारण और रिसेप्शन प्रदर्शित किया, उस समय जब वायरलेस नेटवर्क की कल्पना भी वैज्ञानिक दुनिया के लिए एक रोमांच मात्र थी। उन्होंने ऐसे उपकरण विकसित किए जो बाद में वैश्विक संचार प्रणाली का आधार बने, लेकिन उन्होंने अपनी खोजों का पेटेंट कराने से इनकार कर दिया। उनके अनुसार विज्ञान मानवता की साझा विरासत है, किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं। यह दृष्टि आज भी वैज्ञानिक जगत को प्रेरित करती है।
बोस के योगदान का दूसरा पहलू और भी चमत्कारी है। उन्होंने साबित किया कि पौधे संवेदनहीन नहीं, बल्कि जीवित प्रतिक्रियाशील प्रणालियाँ हैं। क्रेस्कोग्राफ जैसे उपकरण बनाकर उन्होंने दिखाया कि पौधे प्रकाश, ताप, ध्वनि और रासायनिक प्रभावों पर प्रतिक्रिया करते हैं। यह विचार उस समय इतना अनोखा था कि दुनिया को इसे स्वीकार करने में समय लगा। लेकिन बोस ने धैर्य और वैज्ञानिक प्रामाणिकता के सहारे सिद्ध किया कि जीवन की अभिव्यक्ति केवल गतिशीलता में नहीं, संवेदनशीलता में भी होती है।
आज जब पर्यावरण और प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध पुनर्परिभाषित हो रहा है, बोस का काम और भी प्रासंगिक प्रतीत होता है। उन्होंने सजीव और निर्जीव दोनों में ऊर्जा और प्रतिक्रियाओं की समानता की बात कही, यह वैज्ञानिक अवधारणा आज सतत विकास, प्रकृति संरक्षण और जैविक विविधता जैसे विषयों को नई दृष्टि देने में सक्षम है।
यह भी उल्लेखनीय है कि बोस ने ऐसे समय में विज्ञान किया जब औपनिवेशिक भारत में संसाधनों की कमी थी, और भारतीय वैज्ञानिकों को मान्यता मिलने में भारी कठिनाइयाँ थीं। फिर भी उन्होंने अपनी दृढ़ता, सिद्धांतों और रचनात्मकता के बल पर विश्व मंच पर भारत की उपस्थिति दर्ज कराई।
आज आवश्यकता है कि उनकी वैज्ञानिक चेतना, जिसमें सादगी, वैचारिक स्वतंत्रता, नैतिकता और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान शामिल था, को हम अपने शिक्षा और शोध संस्कारों में पुनः स्थापित करें। बोस हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा विज्ञान वही है जो सीमाओं को तोड़े, रूढ़ियों को चुनौती दे और मानवता को आगे बढ़ाए।
डॉक्टर जगदीश चंद्र बोस का जीवन और कार्य एक संदेश देता है- “प्रकृति बोलती है, बस सुनने वाले कान और समझने वाली दृष्टि चाहिए।”

“कचरा हम फेंकते हैं, शहर क्यों भुगते? — शहरी जिम्मेदारी का सच”

राष्ट्र की परम्परा डेस्क – सोमनाथ मिश्र

शहर सिर्फ ईंट, सीमेंट और सड़कों से नहीं बनते; शहर बनते हैं लोगों की आदतों, जिम्मेदारियों और साझा व्यवहार से। लेकिन दुखद यह है कि शहर हमारी जरूरतों से बसते हैं और हमारी लापरवाहियों से टूटते भी वही हैं। रोज़ सड़क किनारे बिखरी पोलिथीन, नालों में फेंकी गई गंदगी, खाली प्लॉटों में जमा कूड़े के ढेर—ये किसी बाहरी खतरे की देन नहीं; यह हमारी ही बनाई हुई समस्या है। सवाल कचरे का नहीं, कर्तव्यबोध का है। यही वजह है कि आज शहरी स्वच्छता, भारत की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।
हर सुबह जब हम घर का कचरा उठाकर गली के किसी कोने में डाल आते हैं, हमें लगता है कि हमारा काम खत्म। लेकिन सच तो यह है कि समस्या की असली शुरुआत वहीं से होती है। वह छोटा-सा कचरा का थैला शहर में बदबू का पहाड़, बीमारी का दौर, धुएँ से भरी कचरा-ढेर की आग, जाम हुए नाले और बारिश में डूबती सड़कों का कारण बनता है। शहर का प्रशासन कितना भी मजबूत क्यों न हो, जब तक नागरिक अपनी भूमिका नहीं समझेंगे, स्वच्छता सिर्फ पोस्टरों और स्लोगनों में ही चमकती रहेगी।
शहर की सफाई एक व्यवस्था नहीं, एक व्यवहार है। और यही व्यवहार आज सबसे अधिक बिगड़ा हुआ है।
कचरे की असली यात्रा: घर से सड़क तक, सड़क से संकट तक
आपके घर से निकला 1 किलो कचरा शहर में 10 किलो की समस्या बनकर लौटता है।
लगभग 70% घरेलू कचरा रीसायकल योग्य होता है,लेकिन बिना अलगाव के वह सिर्फ एक बेकार ढेर बन जाता है

हर गली में “किसी और का कचरा” वाली सोच
गंदगी की असल जड़ है।

सड़कों पर फेंका गया कचरा नालों को जाम करता है, नाले जाम होते हैं तो बारिश में शहर डूबता है—
और फिर दोष दिया जाता है सिस्टम को, जबकि गलती हमारी अपनी होती है।
यानी कचरा हम फेंकते हैं, लेकिन उसकी कीमत शहर चुकाता है—भीड़, बीमारी, प्रदूषण और अव्यवस्था के रूप में।
नागरिक जिम्मेदारी बनाम प्रशासनिक व्यवस्था
शहर की स्वच्छता किसी एक विभाग का दायित्व नहीं। यह एक त्रिकोणीय जिम्मेदारी है—

  1. नागरिक — कचरे का सही निपटान
  2. प्रशासन — नियमित सफाई और बेहतर प्रबंधन
  3. समाज — जागरूकता और सहभागिता
    लेकिन जब इन तीन में से दो भी हिस्से अपनी भूमिका भूल जाते हैं, परिणाम वही दिखाई देता है।
    गंदगी से घिरा शहर, शिकायतों से भरा जनमानस और हर तरफ फैली बेबसी।

    स्वच्छता कोई “सरकारी अभियान” नहीं; यह नागरिक सभ्यता है।
    लोगों की सोच बदलने वाली अपील — “कचरा मत फेंको, आदत फेंको”
    स्वच्छता को आदेश में नहीं, आदत में बदलना होगा।
    घर में गीला-सूखा कचरा अलग करें।
    सड़क पर गंदगी न फेंकें।
    सार्वजनिक स्थानों को घर जैसा सम्मान दें
    सफाई कर्मियों की मेहनत को समझें
    मोहल्ला स्तर पर छोटे-छोटे लक्ष्य तय करें
    जब नागरिक अपनी छोटी आदतें बदलते हैं, तब महानगर खुद-ब-खुद बड़े बदलाव महसूस करते हैं।
    भावनात्मक पुकार — शहर हमारा है, शर्म भी हमारी होनी चाहिए
    शहर की गंदगी कोई प्राकृतिक त्रासदी नहीं—यह हमारी बनाई मुसीबत है।
    एक पॉलीथिन उठाने से न आपको नुकसान होता है, न शहर पर बोझ बढ़ता है;
    लेकिन वही पॉलीथिन नाले में जाकर पूरे क्षेत्र को बीमार बना सकती है।
    शहर को साफ रखना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, यह सबकी साझी जिम्मेदारी है। अगर हम अपनी आदतें सुधार लें, तो—
    नालियाँ खुद डूबना बंद कर देंगी
    सड़कें साँस लेना शुरू कर देंगी
    नाले गंदगी नहीं, पानी बहाएंगे
    और शहर सच में “स्मार्ट सिटी” दिखने लगेगा
    हम बदलें, तो शहर भी बदलेगा।
    “शहर हमारा है, जिम्मेदारी भी हमारी”
    आज जरूरत सिर्फ सफाई अभियान की नहीं, बल्कि जागरूकता अभियान की है।
    क्योंकि किसी भी शहर को साफ रखने के लिए सबसे जरूरी मशीनरी न तो झाड़ू है, न ट्रैक्टर—
    सबसे जरूरी है नागरिक की सोच।
    यह लेख एक दर्पण है, जिसमें हम खुद को देखकर यह सवाल पूछ सकें—
    “कचरा मैं फेंक रहा हूँ… तो शहर क्यों भुगते?”

अनोखी प्रतिभा के धनी पीयूष गोयल: पाँच तरीकों से पाँच महान कृतियाँ लिखकर रचा इतिहास

नवनीत मिश्र

दुनिया में कलाकारों की कमी नहीं, लेकिन कुछ लोग अपनी कल्पनाशक्ति और साधना से ऐसे चमत्कार कर दिखाते हैं जो सामान्य सोच से परे हों। ऐसी ही अद्भुत प्रतिभा के धनी हैं पीयूष गोयल, जिन्होंने पाँच अलग-अलग तरीकों से पाँच क्लासिक किताबें लिखकर साहित्य और कला जगत को चौंका दिया है। उनकी यह कला न सिर्फ कौशल का प्रमाण है, बल्कि संकल्प, धैर्य और निरंतर अभ्यास का अद्भुत संगम भी है।

उल्टे अक्षरों में लिखी भागवत गीता
पीयूष गोयल की साधना की शुरुआत भागवत गीता से हुई। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता को मिरर इमेज शैली में लिखा। पहली दृष्टि में अक्षर समझ में नहीं आते, लेकिन दर्पण के सामने रखते ही शब्द साफ दिखाई देते हैं। यह लेखन शैली इतनी दुर्लभ है कि पाठक किताब को देखकर पहले आश्चर्य, फिर प्रशंसा से भर उठते हैं।

सुई से लिखी ‘मधुशाला’: दुनिया की पहली Needle-Written Mirror Book

जब लोगों ने कहा कि मिरर इमेज पढ़ने के लिए दर्पण साथ रखना कठिन होता है, तो पीयूष ने समाधान के रूप में सुई का सहारा लिया।
हरिवंश राय बच्चन की अमर कृति ‘मधुशाला’ को उन्होंने सुई से पन्नों पर उकेरा। न स्याही, न पेन, केवल सुई की नोक से शब्द बनाना अत्यंत धैर्य का कार्य है।
करीब ढाई महीने की साधना के बाद तैयार हुई यह पुस्तक दुनिया की पहली ऐसी रचना मानी जाती है जो सुई से और मिरर इमेज दोनों रूप में लिखी गई है।

मेंहदी कोन से रची गई ‘गीतांजलि’

रबीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ को पीयूष ने मेहंदी कोन से लिखा।
17 मेहंदी कोन और दो नोटबुक्स में तैयार हुए 103 अध्याय सौंदर्य और आध्यात्मिकता दोनों की अनूठी मिसाल हैं। मेहंदी जैसी नाजुक माध्यम से इतना विस्तृत लेखन करना अत्यंत कठिन है, लेकिन उनकी कला इसे सहज बना देती है।

कील से उकेरी अपनी ही पुस्तक ‘पीयूष वाणी’

सुई से पुस्तक लिखने के बाद उन्होंने प्रयोग को एक कदम आगे बढ़ाकर ‘कील’ को लेखन माध्यम बनाया।
ए-4 साइज की एल्युमिनियम शीट पर उन्होंने ‘पीयूष वाणी’ को कील से उकेरा। इसे बनाना न सिर्फ कौशल, बल्कि गहरी एकाग्रता और श्रम की मांग करता है। यह कला उनके भीतर छिपी असीम संभावनाओं का परिचायक है।

कार्बन पेपर से लिखी पंचतंत्र

आचार्य विष्णु शर्मा की पंचतंत्र को लिखने के लिए पीयूष ने कार्बन पेपर का अनोखा प्रयोग किया।
उन्होंने कार्बन पेपर को उल्टा रखकर लिखा, जिससे एक तरफ शब्द उल्टे और दूसरी तरफ सीधे बन गए। इस तकनीक से पंचतंत्र की पाँचों तंत्र और 41 कहानियों को विशेष अंदाज़ में रूप दिया गया।

संघर्ष से साधना तक का सफर

10 फ़रवरी 1967 को जन्मे पीयूष गोयल पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं। वर्ष 2000 में हुए गंभीर हादसे के कारण वे नौ महीने बिस्तर पर रहे। इसी दौरान उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता को जीवन में आत्मसात किया।
स्वास्थ्य लाभ के बाद उन्होंने कुछ अलग करने की इच्छा से उल्टे अक्षरों में लिखने का अभ्यास शुरू किया और फिर एक-एक करके ऐसी अद्भुत कृतियाँ जन्म लेती चली गईं।

जीवन-मंत्र बना प्रेरणा का स्रोत

“नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो, कुछ नाम करो”
इन पंक्तियों को जीवन का आधार मानकर पीयूष अपनी कला को निरंतर निखारते रहे। आज वे कई ग्रंथों को अलग-अलग शैली में लिख चुके हैं और उनका यह अनोखा काम साहित्य जगत में नई दिशा दिखाता है।

NHBVN के सेवानिवृत्त JE पर ₹28.70 लाख की अवैध संपत्ति अर्जित करने का आरोप, FIR दर्ज

कैथल (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। हरियाणा में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई में, राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अंबाला ने उत्तरी हरियाणा बिजली वितरण निगम (NHBVN) के सेवानिवृत्त कनिष्ठ अभियंता (JE) बलबीर सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) अर्जित करने के आरोप में FIR दर्ज की है। बलबीर सिंह कैथल के निवासी हैं।

​यह कार्रवाई हरियाणा के मुख्य सचिव और राज्य चौकसी ब्यूरो के महानिदेशक की अनुमति के बाद की गई है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो-टॉलरेंस नीति को दर्शाती है।

​करोड़ों की संपत्ति का खुलासा

​जांच रिपोर्ट के अनुसार, बलबीर सिंह ने अपनी सेवा अवधि (1991 से 2018) के दौरान वैध स्रोतों से कुल ₹46.24 लाख की आय अर्जित की थी। हालांकि, जांच में उनके और उनकी पत्नी के नाम पर ₹40.56 लाख की चल-अचल संपत्ति पाई गई।

​सबसे चौंकाने वाला खुलासा उनके बैंक खातों से हुआ, जहां 2010, 2011, 2014 और 2018 में ₹27.37 लाख की संदिग्ध राशि (नकद, RTGS, TRF) मिली। यह राशि न तो उनके आयकर रिटर्न में दर्शाई गई थी और न ही इसका कोई वैध स्रोत बताया गया।

​जांच में स्पष्ट रूप से पाया गया कि सेवानिवृत्त जेई ने ₹28,70,944 की आय से अधिक संपत्ति अर्जित की है, जो कि उनके वैध स्रोतों से 62.09% अधिक है।

​कई संपत्तियों की खरीद के दस्तावेज जुटाए गए

​जांच अधिकारी इंस्पेक्टर बिमला देवी ने विभिन्न विभागों से रिकॉर्ड जुटाकर आय-व्यय का विस्तृत विवरण तैयार किया। रिपोर्ट में बलबीर सिंह द्वारा कैथल में कई प्लॉट, दुकानें, मकान और कृषि भूमि खरीदने का पता चला।

​खर्चों में कार लोन, मकान निर्माण, सावधि जमा (FD), और बेटे की शिक्षा व शादी पर किया गया खर्च भी शामिल है। बलबीर सिंह 4 एकड़ कृषि भूमि और पशुओं से आय का दावा तो करते हैं, लेकिन इसके संबंध में कोई दस्तावेज या संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाए।

​सरकार की मंजूरी के बाद मामला दर्ज

​जांच रिपोर्ट को राज्य सरकार के पास भेजा गया था। मुख्य सचिव हरियाणा और अतिरिक्त महानिदेशक, राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की स्वीकृति मिलने के बाद, बलबीर सिंह के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश जारी किए गए।

​थाना राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अंबाला ने मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका पाए जाने पर उसके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की जाएगी।

29 कानूनों की जटिलता खत्म: चार श्रम संहिताएँ कैसे बदलेंगी मजदूरों और उद्योगों की दुनिया?

10 लेबर यूनियनों के संयुक्त मंच ने इस कदम को मजदूर विरोधी बताते हुए कहा है कि इससे मालिक अधिक शक्तिशाली होंगे और श्रमिकों की सौदेबाजी क्षमता घटेगी

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में श्रम सुधारों को लेकर दशकों से बहस चलती रही है। 1930- 1950 के बीच बनाए गए श्रम कानूनों ने स्वतंत्र भारत के औद्योगिक विकास और श्रमिक सुरक्षा की बुनियाद रखी,लेकिन समय के साथ उद्योगों कीसंरचना  तकनीक, रोजगार पैटर्न और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में व्यापक परिवर्तन आए। आज की अर्थव्यवस्था डिजिटल, वैश्विक और कौशल आधारित है, जहाँ पारंपरिक श्रम ढाँचों के आधार पर श्रम प्रबंधन न तो उद्योगों के लिए लाभकारी है और न ही श्रमिकों के हितों की रक्षा करने में सक्षम। इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार ने 21 नवंबर 2025 से चार नई श्रम संहिताओं-वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020,सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 औरव्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य शर्त संहिता 2020 को लागू करने की घोषणा की। यह निर्णय भारतीय श्रम बाजार के इतिहास में सबसे बड़े संरचनात्मक परिवर्तनों में से एक माना जा रहा है,जो न केवल घरेलू औद्योगिक माहौल बल्कि वैश्विक निवेश पर भी प्रभाव डाल सकता है। बता दे। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र नें जब इस मुद्दे का रिसर्च किया तो मुझे संगठनों और यूनियनों की प्रतिक्रिया में समर्थन और विरोध का टकराव मीडिया के माध्यम से सुनाई दे रहा है,इस सुधार पर प्रतिक्रियाएँ विभाजित हैं।जहाँ 15 प्रमुख व्यापारिक संगठनों ने इन कोडों का स्वागत किया है, उनका कहना है कि यह भारत को वैश्विक विनिर्माण और निवेश का केंद्र बनाने में मदद करेगा।तो वहीं 10 लेबर यूनियनों के संयुक्त मंच ने इस कदम को मजदूर विरोधी बताते हुए कहा है कि इससे मालिक अधिकशक्तिशाली होंगे और श्रमिकों की सौदेबाजी क्षमता घटेगी। भारतीय मजदूर संघ ने इसे सकारात्मक सुधार माना और लंबे समय से प्रतीक्षित बताया।

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साथियों बात कर हम औपनिवेशिक युग के श्रम कानूनों से मुक्ति, ऐतिहासिक संदर्भ और सुधार की आवश्यकता को समझने की करें तो,भारत के श्रम कानूनों की नींव ब्रिटिश शासन के दौरान डाली गई थी, जिसका उद्देश्य उस समय की औद्योगिक परिस्थितियों को नियंत्रित करना था। इन कानूनों का मुख्य फोकस श्रमिकों पर नियंत्रण, औद्योगिक उत्पादन की निरंतरता और औपनिवेशिक शासन के हितों की रक्षा रहा, न कि श्रमिक अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा या आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देना। स्वतंत्रता के बाद इन कानूनों में संशोधन तो हुए, लेकिन संरचनात्मक एकीकरण और सरलीकरण नहीं किया गया। परिणामस्वरूप,भारत में श्रम कानून व्यवस्थाअत्यंत जटिल, उलझी हुई और बहु- स्तरीय हो गई, जिसमें 29 अलग-अलग कानून और सैकड़ों नियम शामिल थे। इससे उद्योगों को अनुपालन की भारी लागत उठानी पड़ती थी, जबकि श्रमिकों को भी अपने अधिकारों को समझना और लागू कराना मुश्किल होता था।विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और कई आर्थिक संस्थानों ने बार-बार सुझाव दिया कि भारत को श्रम सुधारों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए ताकि निवेश आकर्षित हो, रोजगार बढ़े और श्रमिक सुरक्षा मजबूत बने। इसी लंबे समय से महसूस की जा रही आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत सरकार ने पुराने कानूनों को समेकित कर चार संहिताओं का सटीक ढाँचा तैयार किया। 

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साथियों बात अगर हम नई श्रम संहिताएँ:संरचना और उनके उद्देश्यों को समझने की करें तो, नई श्रम संहिताओं का मूल उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल, एकीकृत और आधुनिक बनाना है, ताकि तेजी से बदलते कार्य वातावरण के अनुरूप भारत का श्रम ढाँचा लचीला और प्रभावी बन सके। इन चार संहिताओं के प्रमुख उद्देश्य हैं-(1)श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाना(2)उद्योगों के लिए नियमों को सरल और पारदर्शी बनाना (3) रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करना (4) श्रम बाजार में औपचारिकता बढ़ाना (5) वैश्विक निवेश आकर्षित करना (6) कामकाजी परिस्थितियों में सुधार करना।यह कदम “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” जैसे राष्ट्रीय आर्थिक अभियानों को समर्थन देता है, क्योंकि श्रम सुधारों को अक्सर वैश्विक निवेश और औद्योगिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।

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साथियों बात अगर हम चार श्रम संहिताओं का विस्तार: प्रत्येक कोड क़े महत्व को समझने की करें तो (1) वेतन संहिता 2019 –यह संहिता वेतन से संबंधित चार अलग-अलग कानूनों को मिलाकर बनाई गई है। इसका उद्देश्य सभी श्रमिकों को समय पर और समान वेतन सुनिश्चित करना है।न्यूनतम वेतन, ओवरटाइम बोनस और वेतन भुगतान जैसे प्रावधानों को स्पष्ट और सरल बनाया गया है। इससे असंगठित और गिग वर्कर्स सहित अधिक श्रमिकों को न्यूनतम वेतन सुरक्षा के दायरे में लाया जाएगा। (2) औद्योगिक संबंध संहिता 2020– इसका फोकस श्रमिकों और उद्योगों के बीच सामंजस्य और औद्योगिक शांति बनाए रखना है। इसमें हड़ताल, छंटनी, पुनर्नियोजन और स्थायी श्रमिकों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधानों को सरल किया गया है। उद्योगों का तर्क है कि इससे उत्पादन स्थिर रहेगा और निवेशक विश्वास बढ़ेगा, जबकि यूनियनों का आरोप है कि इससे छंटनी आसान हो जाएगी।(3)सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020–यह संहिता भारत के श्रम इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाती है। ईपीएफ, ईएसआई, मातृत्व लाभ, बीमा और पेंशन जैसी सुविधाओं को अधिक व्यापक और समावेशी बनाया गया है। (4) व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्त संहिता 2020–इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वच्छता और उचित कार्य परिस्थितियों को सुनिश्चित करना है। इसमें कार्यस्थल सुरक्षा मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप लाया गया है।

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साथियों बात अगर कर हम 29 कानूनों के स्थान पर चार संहिताएँ : श्रमिकों को क्या लाभ? इसको समझने की करें तो,नई संहिताओं से श्रमिकों को कई प्रमुख लाभ मिल सकते हैं (1) फिक्स्ड-टर्म स्टाफ को परमानेंट लेवल के फायदे- फिक्स्ड-टर्म वाले कर्मचारी अब परमानेंट वर्कर्स जैसे फायदे पाएंगे, जैसे सोशल सिक्योरिटी, मेडिकल कवर और पेड लीव। ग्रेच्युटी पाने के लिए 5 साल की जगह एक साल का समय ही लगेगा। इससे कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों पर ज्यादा निर्भरता कम होगी और डायरेक्ट हायरिंग को बढ़ावा मिलेगा। (2) सभी मजदूरों के लिए मिनिमम वेज और समय पर पेमेंट- हर सेक्टर के मजदूरों को नेशनल फ्लोर रेट से जुड़ी न्यूनतम वेतन मिलेगा, साथ ही समय पर पेमेंट और अन ऑथराइज्ड कटौतियां बंद होंगी।(3) महिलाओं को सभी शिफ्ट्स और जॉब रोल्स में अनुमति- महिलाएं नाइट शिफ्ट्स में और सभी कैटेगरी में उनकी मंजूरी और सेफ्टी मेजर्स के साथ काम कर सकेंगी। जैसे माइनिंग, हैवी मशीनरी और खतरनाक जगहों पर। बराबर पेमेंट जरूरी है और ग्रिवांस पैनल्स में उनकी रिप्रेजेंटेशन जरूरी। (4)बेहतर वर्किंग-आवर रूल्स और ओवरटाइम प्रोटेक्शन-ज्यादातर सेक्टर्स में काम के घंटे 8-12 घंटे प्रति दिन और 48 घंटे प्रति हफ्ते तक रहेंगे, ओवरटाइम के लिए दोगुना वेतन और जरूरी जगहों पर लिखित कंसेंट जरूरी होगा। एक्सपोर्ट्स जैसे सेक्टर्स में 180 वर्किंग डेज के बाद लीव्स एक्यूमुलेट होंगी (5) यूनिवर्सल अपॉइंटमेंट लेटर्स और फॉर्मलाइजेशन पुश- अब सभी नियोक्ताओं (एम्प्लॉयर्स) को हर मजदूर को अपॉइंटमेंट लेटर देना जरूरी होगा।इससे मजदूरों की नौकरी का रिकॉर्ड साफ रहेगा, वेतन में पारदर्शिता रहेगी और उन्हें मिलने वाले लाभों तक पहुंच आसान होगी। इस कदम से आईटी, डॉक, टैक्सटाइल जैसी इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों की नौकरियां अधिक फॉर्मल होंगी और सिस्टम अधिक व्यवस्थित होगा।(6) गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स कोआधिकारिक मान्यता: पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म मजदूरों को कानूनी तौर पर परिभाषित किया गया। एग्रीगेटर्स को अपनी कमाई का 1-2 प्रतिशत (पेमेंट्स का 5 प्रतिशत तक कैप्ड) वेलफेयर के लिए देना होगा और आधार से लिंक्ड पोर्टेबल फायदे हर राज्य में मिलेंगे। (7) जोखिम वाली इंडस्ट्रीज में हेल्थ चेकअप्स और सेफ्टी नियम जरूरी- खतरनाक फैक्ट्रियों, प्लांटेशन, कॉन्ट्रैक्ट लेबर और खदानों में काम करने वाले मजदूरों (जो तय संख्या से ज्यादा हैं) के लिए हर साल फ्री हेल्थ चेकअप कराना जरूरी होगा। इसके साथ ही सरकार द्वारा तय किए गए सेफ्टी और हेल्थ स्टैंडर्ड लागू करने होंगे, और बड़े संस्थानों में सेफ्टी कमेटी बनाना भी अनिवार्य होगा, ताकि मजदूरों की सुरक्षा पर लगातार नजर रखी जा सके।(8)उद्योगों में सोशल सिक्योरिटी का नेटवर्क और बड़ा- सोशल सिक्योरिटी कोड की कवरेज पूरे देश में फैल जाएगी, जिसमें एमएसएमई कर्मचारी, खतरनाक जगहों पर एक भी मजदूर, प्लेटफॉर्म वर्कर्स और वो सेक्टर शामिल हैं जो पहले ईएसआई की जरूरी स्कीम से बाहर थे।(9) डिजिटल और मीडिया वर्कर्स को आधिकारिक कवर- अब पत्रकार, फ्रीलांसर, डबिंग आर्टिस्ट और मीडिया से जुड़े लोग भी लेबर प्रोटेक्शन के दायरे में आएंगे।इसका मतलब है कि उन्हें अपॉइंटमेंट लेटर मिलेगा, उनकी सैलरी समय पर और सुरक्षित रहेगी, और उनके काम के घंटे तय और नियमबद्ध होंगे।(10) कॉन्ट्रैक्ट, माइग्रेंट और अनऑर्गनाइज्ड वर्कर्स के लिए मजबूत प्रोटेक्शन- कॉन्ट्रैक्ट और दूसरे शहरों से आए मजदूरों को अब स्थायी कर्मचारियों जितना ही वेतन, सरकारी वेलफेयर योजनाएं, और ऐसी सुविधाएं मिलेंगी जो एक जगह से दूसरी जगह जाने पर भी जारी रहेंगी। साथ ही जिस कंपनी में वे काम करते हैं, उसे उनके लिए सोशल सिक्योरिटी देना जरूरी होगा और पीने का पानी, आराम करने की जगह और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी।विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के 90 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों के लिए यह सुधार ऐतिहासिक माने जा रहे हैं।

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अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आत्मनिर्भर भारत के लिए श्रम सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम-चार श्रम संहिताओं का लागू होना भारत के श्रम इतिहास का सबसे व्यापक और परिवर्तनकारी कदम है। यह सुधार न केवल कानूनों को सरल और आधुनिक बनाता है, बल्कि श्रमिकों की सुरक्षा और उद्योग प्रतिस्पर्धा दोनों को संतुलित करने का प्रयास करता है। चुनौतियाँ और आलोचनाएँ अपनी जगह हैं,लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत का श्रम ढाँचा अब वैश्विक मानकों के अनुरूप आगे बढ़ रहा है, जो देश को अधिक मजबूत,प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर करेगा।

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-संकलनकर्ता लेखक – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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