Monday, June 29, 2026
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मुख्यमंत्री के प्रस्तावित दौरे को लेकर पुलिस सतर्क, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मुख्यमंत्री के प्रस्तावित जनपद भ्रमण कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए पुलिस प्रशासन सतर्क मोड में आ गयी है। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता बनाने के उद्देश्य से शुक्रवार को पुलिस लाइन महराजगंज में विशेष ब्रीफिंग का आयोजन किया गया, जिसमें अपर पुलिस अधीक्षक ने जनपद भर के पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों को विस्तृत दिशा-निर्देश दिए।

अपर पुलिस अधीक्षक ने कहा कि मुख्यमंत्री के आगमन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी प्रकार की चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने सभी पुलिस कर्मियों को अपने-अपने ड्यूटी प्वाइंट पर समय से पहुंचने, मार्ग सुरक्षा को सुचारू रखने, यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित दिशा देने, वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान आवश्यक प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करने और भीड़ नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि चूक की स्थिति न केवल सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है, बल्कि प्रशासन की छवि पर भी असर डाल सकती है। इसलिए प्रत्येक पुलिसकर्मी अनुशासन और सतर्कता के साथ अपनी ड्यूटी का निर्वहन करें।

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इस दौरान उन्होंने संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी, एस्कॉर्ट ड्यूटी को मजबूती, मार्ग का पूर्व निरीक्षण, संभावित भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा बल की तैनाती और समय-समय पर सभी व्यवस्थाओं की समीक्षा पर जोर दिया। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि प्रभारी अधिकारी सुनिश्चित करें कि दिये गए निर्देशों का पालन जमीनी स्तर पर हो।कार्यक्रम में पुलिस लाइन, जनपद के विभिन्न थानों एवं शाखाओं से आए अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे।

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बैठक के दौरान सभी ने आगामी कार्यक्रम को सुरक्षित, शांतिपूर्ण और सफल बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर जिला प्रशासन और पुलिस विभाग पूरी तरह मुस्तैद है तथा सुरक्षा प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया लगातार जारी है।

सीएम द्वारा 10 हजार सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र

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राजद प्रवक्ता कैलाश यादव ने बताया सराहनीय कार्य

रांची (राष्ट्र की परम्परा)। प्रदेश राजद प्रवक्ता कैलाश यादव ने राजद की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा 10 हजार सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र प्रदान करने के कार्य को सराहनीय बताया।
इस ऐतिहासिक व उत्कृष्ट कार्य के लिए युवा लोकप्रिय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित तमाम मंत्रिपरिषद को साधुवाद व हार्दिक बधाई।


यादव ने कहा कि झारखंड में जबसे हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन सरकार पार्ट -1एवं पार्ट – 2 बनी है 6 वर्षों के कार्यकाल के दौरान सभी क्षेत्रों में लाखों नियुक्ति पत्र बांटने का काम किया गया है।
विदित है कि महागठबंधन सरकार पार्ट -1 के दौरान मईया सम्मान योजना, किसानों का 2 लाख रु ऋण माफ छात्रों को छात्रवृत्ति देने सरकारी मॉडल स्कूल बनाने सहित अनेकों ज्वलंत मुद्दों पर काम किया है।
झारखंड नियुक्ति पत्र बांटने वाला देश का सबसे अव्वल राज्य बन गया है !
जबकि लगभग 18 राज्यों में बीजेपी की डबल इंजन सरकार चल रही है लेकिन वहां बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है।


वहीं दूसरी तरफ झारखंड में सीमित साधन होने के बावजूद सीएम हेमंत सोरेन के नेतृत्व में राज्य हर क्षेत्रों में काफी आगे बढ़कर जनाकांक्षाओं को पूर्ण करने का काम हो रहा है और प्रतिदिन जनता के सभी वादों को पूरा करने की ओर काम किया जा रहा हैं।
यादव ने कहा कि सीएम की सकारात्मक बहुमुखी सोच व दूरदर्शी व्यक्तित्व से झारखंड प्रगतिशील विकास के मामले में आगामी दिनों में देश का मॉडल राज्य बनकर उभरेगा।


हेमंत सरकार के कार्यशैली पर सवाल उठाने वाले बीजेपी के तमाम नेताओं को अपनी गिरेबाँ में झांकने की जरूरत है, क्योंकि 25 वर्षों में लगभग 16 वर्ष शासन करने वाले बीजेपी एनडीए सरकार सिर्फ हाथी उड़ाने का काम किया है ।

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चुनाव आयोग के आदेशों से जूझ रहे शिक्षक, गड़ना प्रपत्रों में सुधार बना बड़ी चुनौती

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुपालन में ग्राम सभाओं में चल रहे मतदाता सूची सुधार कार्य ने शिक्षकों एवं ड्यूटी में लगे कर्मचारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। गड़ना प्रपत्रों को सही करने तथा उनसे संबंधित आवश्यक दस्तावेज एकत्र करने का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।

इस कार्य में लगे कर्मचारी अंदरखाने भारी दबाव और असुविधाओं का सामना कर रहे हैं, लेकिन मजबूरीवश वे अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या मतदाताओं की उदासीनता बनती जा रही है। बहुत से मतदाता न तो अपने आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध करा रहे हैं और न ही उनके फोटो कॉपी कराने में सहयोग कर रहे हैं। कई स्थानों पर मतदाता यह कहकर टाल देते हैं कि उनके पास समय नहीं है, तो कहीं लोग सरकारी कार्य को बोझ समझकर दूरी बना रहे हैं।

इससे शिक्षकों को बार-बार लोगों के घरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे काम का बोझ दोगुना हो गया है।ड्यूटी में लगे शिक्षकों का कहना है कि उन्हें पहले से ही विद्यालयों की शैक्षणिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं, ऐसे में चुनाव से जुड़े अतिरिक्त कार्यों ने उनकी दिनचर्या को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। सुबह से लेकर देर शाम तक उन्हें ग्राम सभाओं में घूम-घूमकर प्रपत्र भरवाने, त्रुटियां सुधारने और दस्तावेज जुटाने में लगना पड़ रहा है।

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बावजूद इसके, जब मतदाता सहयोग नहीं करते, तो कार्य समय पर पूरा करना बेहद कठिन हो जाता है।कई शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यदि किसी प्रपत्र में थोड़ी भी गलती रह जाती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर डाल दी जाती है, जबकि संसाधनों की कमी और लोगों की लापरवाही के कारण उनकी स्थिति बेहद असहज हो चुकी है।

फिलहाल, चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन कराने के लिए प्रशासन पूरी तरह सक्रिय है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इस कार्य को सफल बनाने के लिए जनता का सहयोग बेहद आवश्यक है। जब तक मतदाता स्वयं आगे आकर अपने दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराएंगे, तब तक यह कार्य इसी तरह मुश्किल बना रहे है।

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सड़क निर्माण में घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग, सब्सिडी के दुरुपयोग का गंभीर आरोप

महराजगंज के सिंदुरिया क्षेत्र में सड़क मरम्मत कार्य पर उठे सवाल, ठेकेदारों पर नियमों के उल्लंघन का आरोप

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। सिंदुरिया क्षेत्र में नहर किनारे चल रहे सड़क मरम्मत कार्य में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप सामने आया है। आरोप है कि लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा कराए जा रहे इस कार्य में ठेकेदार पिछले एक सप्ताह से घरेलू गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि नियमों के अनुसार तारकोल गर्म करने के लिए कमर्शियल गैस सिलेंडर, डीज़ल या लकड़ी का प्रयोग अनिवार्य है।

सूत्रों के अनुसार सिंदुरिया से हरिहरपुर टोला मोतीपुर तक दो किलोमीटर लंबे सड़क मरम्मत कार्य में बड़ी मात्रा में तारकोल का उपयोग किया जा रहा है। ठेकेदार महंगे कमर्शियल गैस सिलेंडरों से बचते हुए सब्सिडी वाले घरेलू सिलेंडर उपयोग कर रहे हैं, जिससे न केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि सरकारी सब्सिडी का दुरुपयोग भी हो रहा है।

जानकारी के मुताबिक निर्माण स्थल पर प्रतिदिन लगभग 10 सिलेंडरों की खपत हो रही है। घरेलू गैस सिलेंडर में प्रति किलो गैस की कीमत लगभग ₹58 होती है, जबकि कमर्शियल सिलेंडरों में यह कीमत ₹99 प्रति किलो तक पहुंच जाती है। इसी अंतर का आर्थिक लाभ उठाने के लिए ठेकेदार घरेलू सिलेंडरों का उपयोग कर रहे हैं, जो एलपीजी वितरण प्रणाली में अनियमितता और सरकारी नुकसान का स्पष्ट मामला माना जा रहा है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि संबंधित विभाग ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है, जिससे विभागीय मिलीभगत की आशंका भी सामने आती है। उनका कहना है कि यदि अधिकारी मौके का निरीक्षण करें तो सच्चाई तुरंत सामने आ जाएगी।

इस मामले पर जिला आपूर्ति अधिकारी ए.पी. सिंह ने कहा कि विभागीय टीम समय-समय पर चेकिंग अभियान चलाती है। यदि सड़क निर्माण में घरेलू गैस सिलेंडरों के उपयोग की पुष्टि हुई, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर पुनर्निर्माण के लिए हुआ भूमि पूजन

मऊ (राष्ट्र की परम्परा)। मऊ जनपद में स्थित श्री शीतला माता धाम का पुनर्निर्माण अब दिव्य और भव्य स्वरूप में होने जा रहा है। शुक्रवार को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य हेतु भूमि पूजन और शिलान्यास समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार के ऊर्जा एवं नगर विकास मंत्री ए.के. शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

समारोह को संबोधित करते हुए मंत्री ए.के. शर्मा ने कहा कि माऊ अब जगत के पालक महादेव और जगत धात्री माता शीतला के भव्य मंदिरों के लिए जाना जाएगा। उन्होंने कहा कि वे मनसा, वाचा और कर्मणा—हर रूप में—मंदिर के पुनर्निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे, ताकि शीतला माता धाम को विश्वस्तरीय स्वरूप प्रदान किया जा सके।

विशिष्ट अतिथि जिला पंचायत अध्यक्ष मनोज राय ने कहा कि मंदिर निर्माण में धन की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। उन्होंने बताया कि जैसे मऊवासियों ने अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण में उदारता से योगदान दिया, उसी तरह शीतला माता मंदिर के लिए भी घर-घर जाकर दान एकत्र किया जाएगा।

कार्यक्रम में सम्बोधन करते हुए समिति के संरक्षक इंजीनियर वीरेंद्र कुमार, भरत लाल राही, संजय वर्मा सहित कई वक्ताओं ने पुनर्निर्माण कार्य को ऐतिहासिक कदम बताया। समिति के महामंत्री डॉ. राम गोपाल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।

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भूमि पूजन के दौरान काशी से आए विद्वानों द्वारा पूरे दिन वेद मंत्रों के बीच यज्ञ-हवन संपन्न कराया गया। यजमान के रूप में सौरभ मद्धेशिया, राम जपित पांडेय, विट्ठल दास गुजराती, संजय खंडेलवाल आदि उपस्थित रहे।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे, जिनमें उमाशंकर चौरसिया, आनंद कुमार, दिनेश बरनवाल, संजय कुमार, सौरभ बरनवाल, चंद्रशेखर अग्रवाल, राम अवध सिंह, ऋचा मैडम, नैंसी कन्नौजिया सहित हजारों भक्त शामिल थे।

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NH-730 पर अंधेरा बना खतरा: शिकारपुर चौराहे पर हाई मास्ट लाइट न होने से बढ़ रहा हादसों का जोखिम

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-730 पर स्थित शिकारपुर चौराहे पर लंबे समय से हाई मास्ट लाइट न लग पाने के कारण स्थानीय नागरिकों और राहगीरों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। रात होते ही पूरा इलाका अंधेरे में डूब जाता है, जिसके चलते सड़क दुर्घटनाओं की आशंका लगातार बढ़ती जा रही है।
स्थानीय निवासियों ने बताया कि शिकारपुर चौराहा पहले से ही हाईवे का अत्यंत व्यस्त जंक्शन है, जहां दिन भर भारी वाहनों की आवाजाही रहती है। अंधेरे के कारण वाहन चालकों को सड़क, मोड़ और कटिंग का सही आकलन नहीं हो पाता। परिणामस्वरूप कई बार वाहन अनियंत्रित होकर फिसल जाते हैं या सामने से आ रहे वाहनों से टक्कर की नौबत आ जाती है। रात के समय दोपहिया वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए स्थिति और भी अधिक खतरनाक बनी रहती है।
स्थानीय दुकानदारों और ग्रामीणों के अनुसार, हाई मास्ट लाइट की मांग कई बार विभागीय अधिकारियों तक पहुंचाई गई, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

बरसात के दिनों में यह समस्या और विकराल रूप ले लेती है, जब सड़क पर फिसलन और कम दृश्यता दुर्घटनाओं की आशंका को दोगुना कर देती है। शिकारपुर चौराहा वह मार्ग है जिससे प्रतिदिन हजारों यात्री और व्यापारी आवागमन करते हैं, लेकिन प्रकाश व्यवस्था की कमी के कारण उनकी सुरक्षा जोखिम में बनी हुई है।

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स्थानीय जनता ने जिला प्रशासन और संबंधित विभागों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही यहां हाई मास्ट लाइट की स्थापना नहीं कराई गई तो भविष्य में बड़ी दुर्घटनाएं हो सकती हैं। लोगों ने अपेक्षा जताई है कि प्रशासन इस मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए शीघ्र कार्रवाई करेगा, ताकि यात्रियों को सुरक्षित यात्रा का मार्ग सुनिश्चित हो सके।

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बंदी की संदिग्ध मौत पर बवाल, पब्लिक ने थाने का किया घेराव — जेल सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

धौरहरा खीरी (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) जिले के धौरहरा थाना क्षेत्र के माधवपुरवा निवासी 50 वर्षीय सुरेश वर्मा की जिला कारागार खीरी में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश फैल गया। मौत की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने धौरहरा थाना परिसर का घेराव कर दिया और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।

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जानकारी के अनुसार, सुरेश वर्मा को 103 बीएनएस के एक मामले में जेल भेजा गया था। गुरुवार देर शाम वह जिला कारागार के शौचालय में फांसी पर झूलते मिले। घटना की सूचना मिलते ही जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि बंदी काफी देर तक शौचालय में था, लेकिन समय पर निगरानी न होने के कारण यह गंभीर चूक सामने आ गई।

जानकारी देते वाइट

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जेल प्रशासन की लापरवाही के चलते एक निर्दोष व्यक्ति की जान गई है। वहीं परिजनों ने भी पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

इस बीच जेल अधीक्षक खीरी ने बयान जारी कर कहा कि—“घटना अत्यंत गंभीर है। बंदी के व्यवहार, मानसिक स्थिति और घटनास्थल से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। मामले में लापरवाही पाई जाने पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।”

घटना के बाद क्षेत्र में तनाव का माहौल बना हुआ है। पुलिस बल तैनात कर स्थिति को नियंत्रित किया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जेल जैसी उच्च सुरक्षा वाली जगह में ऐसी घटना हो सकती है, तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल है।

बौद्धिक प्रदूषण और नशे के खिलाफ लड़ाई, केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं,एक सामाजिक युद्ध

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी मानव सभ्यता को तकनीक, विज्ञान, स्वास्थ्य, पर्यावरण और शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक ले जा रही है, लेकिन इसी प्रगति के समानांतर दुनियाँ दो ऐसी अदृश्य और बढ़ती चुनौतियों से जूझ रही है, जिनका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक, गहरा और दीर्घकालिक स्तरपर भविष्य के निर्माता युवाओं पर पड़ रहा है  है, वो है बौद्धिक प्रदूषण  और नशा जिसके खिलाफ़ समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बन गई है।पर्यावरणीय प्रदूषण के समाधान की दिशा में वैश्विक तंत्र,कानून, विज्ञान और तकनीक सतत सुधार के साथ आगे बढ़ रहे हैं। हवा, पानी, प्लास्टिक, कचरा, औद्योगिक उत्सर्जन और कार्बन फुटप्रिंट को नियंत्रित करने के लिए नीतियाँ, शोध, संस्थान और संसाधन मौजूद हैं, लेकिन बौद्धिक प्रदूषण और नशे के विरुद्ध सामाजिक उत्तरदायित्व उतनी तेजी और सटीकता से नहीं बन पा रहा है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि  जब प्रश्न मानव चेतना, विचार, मूल्य और मानसिकता के प्रदूषण का हो,तो समाधान पारंपरिक नहीं रह जाता, बल्कि वह नैतिक, बौद्धिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेपों पर आधारित हो जाता है। यही कारण है कि बौद्धिक प्रदूषण किसी भी सभ्यता को भीतर से कमजोर करने वाला सबसे खतरनाक ”अदृश्य स्मॉग” बन चुका है, जिसकी तुलना किसी भी भौतिक प्रदूषण से नहीं की जा सकती।इसी प्रकार नशा आज केवल स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, जनसंख्या, परिवार, शिक्षा, अपराध, मानव संसाधन और राष्ट्रीय विकास से जुड़ेबहुआयामी संकट का रूप ले चुका है। यह सोचना कि नशाखोरी रोकना केवल पुलिस, कानून या दंड व्यवस्था की जिम्मेदारी है, एक गलत और सीमित दृष्टिकोण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नशे के बढ़ते मामलों में 70 प्रतिशत जड़ें सामाजिक व्यवहार, वातावरण,परिवार, सांस्कृतिक प्रभाव और मानसिक तनाव से जुड़ी होती हैं, जबकि कानून केवल अंतिम चरण में हस्तक्षेप करता है। इसलिए नशे के खिलाफ लड़ाई वास्तव में समाज,परिवार  शिक्षा तंत्र, स्वास्थ्य संस्थान, मीडिया, धार्मिक-सांस्कृतिक समुदायों और शासन प्रणाली इन सभी का संयुक्त युद्ध है।

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साथियों बात अगर हम बौद्धिक प्रदूषण एक अदृश्य खतरा और वैश्विक संकट है इसको समझने की करें तो बौद्धिक प्रदूषण को सरल शब्दों में परिभाषित किया जाए तो यह वह स्थिति है जब मनुष्य की सोच, समझ, विवेक, निर्णय-क्षमता और नैतिक चेतना गलत,भ्रमित, पक्षपातपूर्ण उग्र, हिंसक, असत्य या दुष्प्रभावित विचारों से प्रभावित हो जाती है। यह प्रदूषण किसी फैक्ट्री के धुएँ या वाहन के धुएँ की तरह दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका नुकसान किसी भी वायु प्रदूषण से बड़ा हो सकता है, क्योंकि यह व्यक्ति को विचारों, धारणाओं और सूचनाओं के भ्रमजाल में फँसा कर उसकी तार्किक क्षमता और सामाजिक चेतना को नष्ट कर देता है। फेक न्यूज, नफरत आधारित प्रचार, कट्टर राष्ट्रवाद, उग्रवाद, नस्लीय विभाजन, षड्यंत्र,धार्मिक उन्माद, डिजिटल हेरफेर, गलत सूचना, दुष्प्रचार, हेट स्पीच और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म के माध्यम से फैलने वाला भ्रम,आज दुनियाँ भर के देशों में बौद्धिक प्रदूषण के मुख्य स्रोत बन चुके हैं।तकनीक और ज्ञान की उपलब्धता जितनी तेज़ी से बढ़ी है, उतनी ही तेजी से मानव मन की ग्रहणशीलता पर अनियंत्रित सूचनाओं का बोझ बढ़ा है। इंटरनेट ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन उसी ने अज्ञान को भी संस्थागत रूप दे दिया। अब सत्य और असत्य में फर्क करना एक आम नागरिक के लिए पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। यह बौद्धिक धुंध न केवल व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करती है, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक सद्भाव, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और मानवीय मूल्यों को भी कमजोर करती है। इतिहास गवाह है कि सभ्यताएँ बाहरी हमलों से कम, आंतरिक भ्रम, विभाजन, गलत विचारधारा और मानसिकप्रदूषण से अधिक टूटती हैं। इसी कारण बौद्धिक प्रदूषण मानवता के लिए एक ”साइलेंट ग्लोबल पैंडेमिक” बनकर उभरा है।

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साथियों बात अगर हम  क्या बौद्धिक प्रदूषण का समाधान संभव है? इसको समझने की करें तो, भौतिक प्रदूषण के समाधान स्पष्ट हैं, फिल्टर, रिसाइक्लिंग प्रतिबंध, तकनीक, कानून और स्वच्छ ऊर्जा। लेकिन बौद्धिक प्रदूषण का समाधान विज्ञान नहीं, बल्कि चेतना, शिक्षा, नैतिकता, संवाद, मीडिया जिम्मेदारी और सामाजिक संरचना के सुधार में निहित है। यह प्रदूषण तब पनपता है जब समाज तर्क की जगह अंधानुकरण को अपनाता है,जब शिक्षा ज्ञान की जगह अंकों पर आधारित हो जाती है, जब मीडिया सूचना की जगह सनसनी को बेचने लगता है,और जब तकनीक सत्य की जगह भ्रम को अधिक प्रोत्साहित करती है। इसलिए समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए,समालोचनात्मक सोच पर आधारित शिक्षा, डिजिटल साक्षरता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तथ्य-आधारित संवाद, मीडिया पारदर्शिता, सामाजिक संवाद, युवा नेतृत्व और बहु सांस्कृतिक सम्मान की संस्कृति। बौद्धिक प्रदूषण को किसी एक संस्था, कानून या सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक चुनौती है। यह समाधान तभी संभव है जब वैश्विक समाज सत्य को मूल्य के रूप में स्वीकार करे, संवाद को संघर्ष से ऊपर रखे और शिक्षा को नौकरी नहीं बल्कि चेतना- निर्माण का माध्यम समझे। हर परिवार,हर स्कूल,हर विश्वविद्यालय और हर राष्ट्र को यह स्वीकार करना होगा कि विचारों की शुद्धता सभ्यता के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। यदि मन प्रदूषित है तो प्रगति विनाश बन जाती है, और यदि विचार निर्मल हैं तो मानवता हर संकट का समाधान ढूँढ सकती है।

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साथियों बात अगर हम नशे के खिलाफ़ लड़ाई,केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं,एक सामाजिक युद्ध है इसको समझने की करें तो, नशा किसी एक देश, समाज, धर्म, वर्ग या उम्र की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक महामारी है। ड्रग्स, शराब, तंबाकू, सिंथेटिक नशीले पदार्थ, प्रिस्क्रिप्शन ड्रग्सका दुरुपयोग, गेमिंग और डिजिटल एडिक्शन ये सभी आधुनिक नशे के विस्तृत रूप हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनियाँ में हर वर्ष 3 करोड़ से अधिक लोग नशे से सीधे प्रभावित होते हैं और लाखों की मौतें इससे जुड़ी बीमारियों और अपराधों के माध्यम से होती हैं। नशा केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं,बल्कि अपराध, सीमा पार तस्करी, आतंकवाद, मानव तस्करी,घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएँ,आत्महत्या, स्कूल ड्रॉप -आउट, बेरोजगारी और आर्थिक क्षति जैसे व्यापक संकटों को जन्म देता है।यह मान लेना कि इस समस्या को पुलिस, कानून और दंडात्मक व्यवस्था अकेले समाप्त कर देगी, एक बड़ी भूल है। पुलिस केवल अपराध को रोक सकती है, आदत को नहीं; कानून केवल सजा दे सकता है, मानसिकता को नहीं; और दंड केवल भय पैदा कर सकता है, समाधान नहीं। नशे की जड़ें मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव, परिवारिक टूटन, बेरोजगारी, अकेलापन, हिंसा, निराशा, असमानता और गलत संगत में छिपी होती हैं। इसलिए नशा एक मनोवैज्ञानिक सामाजिक और सांस्कृतिक संकट है, जिसका समाधान केवल दंड नहीं बल्कि पुनर्वास, संवाद,शिक्षा,सामुदायिक सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व में है। परिवारों को प्रारंभिक पहचान सीखनी होगी, स्कूलों को निवारक शिक्षा देनी होगी,मीडिया को नैतिक जिम्मेदारी निभानी होगी, स्वास्थ्य संस्थानों को उपचार और परामर्श को केंद्र में रखना होगा, और समाज को नशाखोर को अपराधी नहीं बल्कि रोगी के रूप में समझकर उसके पुनर्निर्माण का प्रयास करना होगा। यह संघर्ष तभी जीता जा सकता है जब समाज नशे को शर्म नहीं, समस्या माने; अपराध नहीं, बीमारी समझे; और दंड नहीं, उपचार को प्राथमिकता दे।

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अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बौद्धिक प्रदूषण और नशा दोनों अदृश्य संकट हैं, लेकिन इनके प्रभाव दृश्यमान,गहरे और विनाशकारी हैं। पहला मानव की सोच को विकृत करता है, दूसरा शरीर और जीवन को नष्ट करता है। एक सभ्यता को भीतर से गिराता है, दूसरा समाज की ऊर्जा और युवा शक्ति को खोखला करता है। और सबसे महत्वपूर्ण,इन दोनों से लड़ाई केवल कानून या सरकार नहीं जीत सकती। यह मानवता का संघर्ष है, समाज का दायित्व है, शिक्षा का मिशन है और प्रत्येक नागरिक की जागरूक भूमिका का विषय है। यदि विचार शुद्ध हों और समाज जिम्मेदार हो, तो मानवता इन दोनों संकटों पर विजय पा सकती है। लेकिन यदि हम मौन रहे, उदासीन रहे या जिम्मेदारी टालते रहे,तो प्रगति के बावजूद सभ्यता का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।

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-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

सर्दियों में सुबह-सुबह बढ़ रही खांसी? हो सकता है इस बीमारी का संकेत, जानें कारण और बचाव

Why You Cough More in Winter: सर्दी शुरू होते ही कई लोगों में सुबह-सुबह खांसी की समस्या बढ़ जाती है। आमतौर पर यह मौसम का असर होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह किसी अंदरूनी बीमारी का संकेत भी हो सकता है—खासकर तब जब खांसी के साथ बलगम, सीने में दर्द, सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएँ दिखाई दें।
यदि यह सामान्य सर्दी वाली खांसी है, तो घबराने की जरूरत नहीं। थोड़ी सावधानी और कुछ आसान घरेलू उपाय इसे जल्दी नियंत्रित कर सकते हैं।

सर्दियों में खांसी क्यों बढ़ जाती है?

ठंड में हम अधिकतर समय हीटर या बंद कमरों में बिताते हैं।

• हीटर की गर्मी और सूखी हवा गले और नाक के रास्तों को सुखा देती है, जिससे खांसी शुरू हो जाती है।

• सर्दियों में वातावरण की हवा भी काफी ड्राई होती है, जिसके कारण श्वसन तंत्र आसानी से इरिटेट हो जाता है।

सर्दियों में खांसी की आम वजहें

  1. अस्थमा (Asthma)

ठंडी हवा, धूल और प्रदूषण अस्थमा को ट्रिगर कर देते हैं, जिससे सीजन भर सूखी खांसी रह सकती है।

  1. ब्रोंकाइटिस (Bronchitis)

एयरवेज में सूजन पैदा करता है। क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस वाले लोगों को पूरी सर्दी खांसी बनी रह सकती है।

  1. वायरल या बैक्टीरियल इन्फेक्शन

फ्लू, वायरल सर्दी, या निमोनिया जैसे गंभीर संक्रमण खांसी को लंबे समय तक बढ़ा देते हैं।

  1. एलर्जी (Allergens)

धूल, फफूंद, पराग और पालतू जानवरों के कण ठंडी हवा के साथ आसानी से उड़ते हैं और खांसी ट्रिगर कर सकते हैं।

  1. पोस्टनेजल ड्रिप

नींद के दौरान नाक का म्यूकस गले में जमा हो जाता है, जिससे सुबह उठते ही खांसी तेज हो जाती है।

सर्दियों की खांसी के आसान घरेलू उपाय

1. अधिक पानी पिएं

हाइड्रेशन म्यूकस को पतला बनाता है और गले की जलन कम करता है।

2. गुनगुने नमक के पानी से गरारे

गले की सूजन और दर्द कम होता है, खांसी में राहत मिलती है।

3. हर्बल टी का सेवन

अदरक, थाइम या मार्शमैलो रूट वाली चाय सूजन शांत करती है और खांसी कम करती है।

4. ह्यूमिडिफायर का उपयोग

कमरे में नमी बढ़ती है और सांस लेने में आसानी होती है। चाहें तो यूकेलिप्टस या पुदीना ऑयल की कुछ बूंदें भी डाल सकते हैं।

5. भाप लें (Steam Inhalation)

गर्म भाप म्यूकस को ढीला करती है और खांसी में तुरंत आराम देती है।

कब डॉक्टर से संपर्क करें?

Indigo Health के अनुसार, यदि खांसी कुछ हफ्तों तक बनी रहे या इनमें से कोई लक्षण दिखे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवाएँ:

• हरा या पीला गाढ़ा बलगम

• घरघराहट (Wheezing)

• बुखार

• सांस लेने में दिक्कत

• अत्यधिक थकान

• बिना वजह वजन कम होना

Disclaimer: यह जानकारी शोध और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी इलाज या उपाय को अपनाने से पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

भारत के लोकतंत्र में पुराने चेहरों का दबदबा क्यों? क्या नए नेतृत्व को नहीं मिलना चाहिए समान अवसर?

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लेखक: चंद्रकांत सी. पूजारी, गुजरात

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन यहाँ बार-बार एक ही चेहरों और पुराने नेताओं का सत्ता में लौटना एक गंभीर बहस का मुद्दा है। लोकतंत्र केवल हर पाँच साल में चुनाव कराना नहीं है, बल्कि इसका असली सार है—विकल्पों की विविधता, नए विचारों का प्रवेश और नेतृत्व का निरंतर नवीकरण।

फिर सवाल उठता है—क्या नए नेतृत्व को बराबर का मौका नहीं मिलना चाहिए?
जवाब है—बिल्कुल मिलना चाहिए। क्योंकि स्वस्थ लोकतंत्र वही है जो समय के साथ खुद को अपडेट करता रहे।

क्यों बार-बार वही चेहरे सत्ता में लौट आते हैं?

  1. जनता की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा – “परिचित चेहरा सुरक्षित लगता है”

भारतीय मतदाता अक्सर उसी नेता को चुनते हैं जिसे वे लंबे समय से जानते हैं। नया विकल्प उन्हें अनिश्चितता का एहसास कराता है। इसी डर के कारण कई बार लोग बदलाव नहीं चाहते।

  1. राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी

अधिकांश पार्टियों में टिकट वितरण से लेकर नेतृत्व चयन तक में पारदर्शिता कम है। परिवारवाद, गुटबाज़ी और वफादारी पर ज़ोर रहता है, जिससे नए चेहरे उभर ही नहीं पाते।

  1. चुनावी संसाधनों में असमानता

सत्ता में रहने वाले नेताओं के पास धन, प्रचार, मीडिया और संगठनात्मक ताकत होती है। नया उम्मीदवार इनसे मुकाबला ही नहीं कर पाता।

  1. करिश्माई व्यक्तित्व की राजनीति

भारत में विचारों से ज्यादा व्यक्तित्व की राजनीति चलती है। जो नेता एक बार “करिश्माई” बन जाता है, उसका प्रभाव वर्षों तक कायम रहता है।

  1. विकास और स्थिरता की चाह

कई राज्य स्थिरता के लिए पुराने नेता को ही चुनते हैं ताकि योजनाओं और प्रोजेक्टों की निरंतरता बनी रहे।

  1. जागरूकता और सूचना का असंतुलन

शहरी मतदाता नए विकल्पों पर विचार करते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जाति, क्षेत्रवाद और पुरानी वफादारियाँ चुनाव को प्रभावित करती हैं।

नए चेहरों को मौका मिलना क्यों ज़रूरी है?

• लोकतंत्र में नई ऊर्जा और नए विचार आना आवश्यक है।

• युवा पीढ़ी की समस्याओं—डिजिटल इकॉनमी, स्टार्टअप, बेरोजगारी—के लिए नए दृष्टिकोण चाहिए।

• पुराने नेताओं को चुनौती मिलने से शासन और नीतियाँ बेहतर होती हैं।

• सत्ता लंबे समय तक एक ही समूह में रहने से लोकतंत्र कमजोर होता है।

• युवा और महिलाओं का राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधित्व बढ़ता है।

नए नेतृत्व को आगे लाने के व्यावहारिक उपाय

  1. राजनीतिक दलों में अनिवार्य आंतरिक लोकतंत्र

टिकट वितरण और नेतृत्व चयन पारदर्शी प्रक्रिया से हो।

  1. युवाओं और महिलाओं को प्राथमिकता

कम से कम 33–50% टिकट नए चेहरों, युवाओं और महिलाओं को मिले।

  1. चुनावी खर्च पर कड़ी निगरानी

धनबल को सीमित कर समान अवसर सुनिश्चित किए जाएँ।

  1. मतदाता जागरूकता अभियान

स्कूल-कॉलेज और गाँव स्तर पर नए विकल्पों की जानकारी पहुँचाई जाए।

  1. मीडिया की संतुलित भूमिका

मीडिया को चाहिए कि वह लोकप्रिय चेहरों के साथ नए उम्मीदवारों को भी उचित स्थान दे।

  1. युवा नेताओं के लिए प्रशिक्षण और मेंटरशिप

पार्टियाँ और संस्थाएँ युवाओं को राजनीति का प्रशिक्षण दें।

भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है जब पुराने और नए दोनों तरह के नेताओं को समान अवसर मिले।
आज का भारत—युवा भारत, डिजिटल भारत, महत्वाकांक्षी भारत—नए, साहसी और दूरदर्शी नेतृत्व की मांग कर रहा है।

लोकतंत्र की असल खूबसूरती बदलाव में है।
और बदलाव तभी आएगा जब जनता, मीडिया और राजनीतिक दल नए चेहरों को मौका देने की पहल करें।

UIDAI ने बंद किए 2 करोड़ आधार कार्ड: क्या आपका Aadhaar भी हुआ Deactivate? ऐसे करें तुरंत चेक

Aadhaar Card Deactivated: आधार कार्ड भारत में पहचान का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है और देश की लगभग 90% आबादी के पास यह मौजूद है। इसी बीच UIDAI ने एक बड़ा कदम उठाते हुए करीब 2 करोड़ आधार नंबरों को निष्क्रिय (Deactivate) कर दिया है। यह फैसला देशभर में जारी एक बड़े डेटा क्लीनअप ड्राइव का हिस्सा है, जिसने हर आधार धारक का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

अब लाखों लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है—आखिर UIDAI ने इतने आधार कार्ड क्यों बंद किए? और क्या आपका आधार कार्ड भी इस लिस्ट में शामिल हो सकता है?

क्यों बंद किए गए 2 करोड़ आधार कार्ड?

UIDAI के अनुसार यह पूरा अभियान मृत व्यक्तियों (Deceased Persons) के आधार नंबरों को सिस्टम से हटाने के लिए चलाया गया है।

सरकार के पास विभिन्न स्रोतों से जानकारी आती है कि संबंधित व्यक्ति अब जीवित नहीं है। ऐसी स्थिति में उस आधार नंबर को सिस्टम में इनएक्टिव कर दिया जाता है।
यह इसलिए आवश्यक है ताकि—

मृत व्यक्ति की पहचान का बैंकिंग फ्रॉड में उपयोग न हो,

सब्सिडी से जुड़े घोटाले रोके जा सकें,

तथा अन्य किसी गलत गतिविधि में आधार का दुरुपयोग न हो।

UIDAI द्वारा निष्क्रिय किए गए ये 2 करोड़ आधार नंबर सुरक्षा जोखिमों को कम करेंगे और सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ाएंगे।

कैसे चेक करें आपका आधार कार्ड Active है या Deactivated?

UIDAI ने आधार वेरिफिकेशन का आसान फीचर उपलब्ध कराया है, जहां आप सिर्फ कुछ सेकंड में अपना आधार स्टेटस जान सकते हैं।

स्टेप-बाय-स्टेप प्रक्रिया

  1. UIDAI की आधिकारिक साइट पर जाएं:
    https://myaadhaar.uidai.gov.in/verifyAadhaar
  2. Verify Aadhaar Number विकल्प चुनें।
  3. अपना 12 अंकों का आधार नंबर दर्ज करें।
  4. कैप्चा भरकर Proceed पर क्लिक करें।
  5. सिस्टम तुरंत बताएगा कि आधार Exists (सक्रिय) है या Invalid Aadhaar (निष्क्रिय)।

अगर स्क्रीन पर आपका Aadhaar नंबर और उसके आगे “Exists” लिखा आता है, तो आपका आधार सक्रिय है।
अगर “Invalid Aadhaar” दिखाई देता है, तो आपका आधार निष्क्रिय माना जाएगा।

क्यों जरूरी है यह जांच?

• आधार निष्क्रिय होने पर

• बैंकिंग सेवाएं,

• सिम कार्ड अपडेट,

• सरकारी योजनाओं का लाभ,

पैन–आधार लिंकिंग
जैसे कई जरूरी काम रुक सकते हैं। इसलिए अपना आधार स्टेटस चेक करना बेहद महत्वपूर्ण है।

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मेडिकल कॉलेज से लापता नवजात कुशीनगर में सकुशल बरामद, पुलिस की त्वरित कार्रवाई से बड़ी सफलता

हाटा/कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा)। मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू वार्ड से गायब हुआ नवजात बच्चा आखिरकार सुरक्षित बरामद कर लिया गया है। घटना सामने आते ही पुलिस और प्रशासन हरकत में आ गए थे। देर शाम स्वाट टीम और स्थानीय पुलिस द्वारा की गई तेज कार्रवाई ने इस मामले में बड़ी सफलता दिलाई।

महिला नवजात को वार्ड से उठा ले गई थी

मिली जानकारी के अनुसार मणिकौरा के टोला बिंद टोली, महुअवा कुटी गांव की माया देवी (पत्नी स्व. बसंत निषाद) नवजात को एसएनसीयू वार्ड से उठा ले गई थीं। घटना की पुष्टि होते ही पुलिस ने तकनीकी और स्थानीय स्तर पर ढूंढ तलाश शुरू कर दी।

ग्राम प्रधान ने दी सूचना, पुलिस ने तुरंत की घेराबंदी

ग्राम प्रधान नंदलाल साहनी ने क्षेत्र में संदिग्ध गतिविधि की सूचना पुलिस को दी। सूचना मिलते ही

स्वाट टीम प्रभारी आशुतोष सिंह

जटहां बाजार थाना प्रभारी आलोक यादव
अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे।

त्वरित घेराबंदी और तलाशी के बाद नवजात को सुरक्षित बरामद कर लिया गया। बच्चे की हालत सामान्य बताई जा रही है और उसे तुरंत मेडिकल टीम को सौंप दिया गया।

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जांच जारी, स्थानीय लोगों ने की सराहना

पुलिस ने मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। नवजात को सुरक्षित वापस लाने की त्वरित कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों ने पुलिस और प्रशासन की खूब सराहना की है।

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जहां न्याय मिलता देर से, वहां अन्याय होता तेजी से — व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। देश में न्याय व्यवस्था की देरी एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। “न्याय में देरी, न्याय का इंकार है” — यह कहावत आज की परिस्थितियों में पूरी तरह सच साबित होती दिख रही है। आम नागरिक वर्षों तक अदालतों, सरकारी दफ्तरों और अधिकारियों के चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन अपराधी, दबंग और भ्रष्ट तत्व इसी देरी का फायदा उठाकर अन्याय को और तेजी से फैलाते जा रहे हैं।

पीड़ित थक जाता है, अपराधी मजबूत होता जाता है

अदालतों में तारीख पर तारीख लेने से आम आदमी टूट जाता है, जबकि दोषी खुलेआम घूमते रहते हैं। कई बार वही अपराधी पीड़ित को डराने, धमकाने या दबाव डालने तक का प्रयास करते हैं।
ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों तक — जमीन विवाद, महिला उत्पीड़न, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, अपराधों की जांच—हर जगह न्याय की रफ्तार बेहद धीमी है।

कहीं जांच लटक जाती है, कहीं फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं, गवाह पलट जाते हैं,

तो कई मामलों में सत्ता और सिस्टम का दबाव पूरी दिशा बदल देता है।

इस बीच अपराधियों का मनोबल तेजी से बढ़ता जाता है, क्योंकि उन्हें पता है—कार्रवाई होना आसान नहीं, और होना भी हो तो देर से होगा।

कानून विशेषज्ञों की नजर में समस्या

कानून विशेषज्ञों के अनुसार— लंबित मामलों की बढ़ती संख्या, अधिकारियों की कमी, धीमी फाइल प्रक्रिया, लचर निगरानी तंत्र
—इन सभी कारणों से न्याय प्रणाली की गति प्रभावित हो रही है।

जब हर कदम पर “जांच जारी है” का बोर्ड टंगा दिखाई दे, तब न्याय उम्मीद की जगह भ्रम जैसा प्रतीत होने लगता है।

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स्थानीय स्तर पर भी स्थिति भयावह

कई लोगों का कहना है कि थाने से लेकर तहसील तक एक आवेदन की सुनवाई में हफ्तों लग जाते हैं। इस बीच ताकतवर लोग इस देरी का लाभ उठाकर दूसरों को नुकसान पहुंचाने में सफल हो जाते हैं। इससे न केवल पीड़ित कमजोर पड़ता है, बल्कि सिस्टम पर भरोसा भी टूटने लगता है।

तेज न्याय ही मजबूत लोकतंत्र की नींव

आज जरूरत है—

समयबद्ध मामलों, जवाबदेही तय करने, तेज न्याय प्रक्रिया, पीड़ितों की सुरक्षा और सम्मान की गारंटी की।

क्योंकि जहां न्याय धीमा पड़ेगा, वहां अन्याय तेजी से पनपेगा, और यही स्थिति समाज और लोकतंत्र दोनों की जड़ों को कमज़ोर करती है।

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घमंड नहीं, अनुभव ने सिखाया है—जिन्दगी का सच बहुत गहरा है

✍️ कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मुझे किसी बात का घमंड नहीं। जीवन ने इतना कुछ सिखा दिया है कि अब न दर्द पर हैरानी होती है, न अकेलेपन से डर लगता है। लोग कहते हैं—मेरी जबान कड़वी है। पर सच तो यह है कि शहद में जहर घोलना मेरे बस की बात नहीं। साफ बात कहना ही मेरी पहचान है, और शायद इसी कारण मेरा किरदार हर किसी को भाता नहीं।
विधाता ने दर्द के सैलाब में पाला, मुश्किलों की आग में तपाया, और रंज-ओ-गम के मेले में अकेले चलने की हिम्मत दी। अब तन्हाई भी साथी है—न किसी के आने पर खुशी, न किसी के जाने पर गम। यह सोचकर मन बदल गया कि इस संसार में कुछ भी अपना नहीं, बस स्वार्थ का मेला लगा है। हर कदम पर इम्तिहान, हर कदम पर खेल।


लेकिन सवाल यह है—इंसान इतनी चाहतों और झूठे गुमान में डूब क्यों जाता है, जबकि उसे पता है यह जीवन स्थाई नहीं? महज कुछ दिन का पड़ाव है। आया है, सो जाएगा—राजा, रंक, फकीर सभी। इसलिए जितने दिन मिले हैं, उन्हें परमार्थ और मानवता की सेवा में लगा दो। यही कमाई पारलौकिक संसार में काम आएगी।


यह नश्वर संसार मोह-माया का भ्रम जाल है। हर कोई लक्ष्मी को बंधक बनाने में व्यस्त है जबकि खुद मिट्टी की काया में कैद है, जिसका अंत निश्चित है। प्रारब्ध, परिवर्तन और कर्म-फल—सब पूर्व लिखित। फिर भी स्वार्थ की अंधी दौड़ जारी है। मौत साथ चलती है, पर इंसान गाफिल ही रहता है।


अवतरण दिवस से ही उलटी गिनती शुरू हो जाती है। एक दिन ऐसा आता है जब जीवन- यात्रा के आख़िरी पन्ने पर रुखसती का फरमान जारी कर दिया जाता है—बिना सुनवाई, बिना अपील। सब कुछ छोड़कर जाना होता है, यह नियति का अंतिम आदेश है। और जैसे ही चिता की लपटों में देह पंचतत्व में विलीन होती है, दुनिया कुछ पल रोकर सब भूल जाती है—क्योंकि स्वार्थ ही उसका आधार है।

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हम रोज मौत को पास से गुजरते देखते हैं, फिर भी सच को स्वीकार नहीं करते। ख्वाहिशों, घमंड और झूठे रुआब की भूख इंसान को आखिरी सांस तक अंधा बनाए रखती है। जबकि समय हमें उस मुकाम तक ले आता है जहां सारी गिनतियां शून्य में समा जाती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि इस अभिषप्त जीवन को इंसानियत के उपवन में बदलें—जहां प्रेम, करुणा और भाई-चारे के फूल खिल सकें। ताकि जब आत्मा देह त्यागे, तो नव प्रवाह में परमात्मा से मिलन का मार्ग सुगम हो सके।

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1 दिसंबर से 28 फरवरी तक बिहार-दिल्ली-हरियाणा रूट की 24 ट्रेनें रद्द, 28 की फ्रीक्वेंसी भी घटी — यात्रियों के लिए जरूरी अपडेट

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Train Cancelled Alert: सर्दियों में बढ़ते कोहरे ने उत्तर भारत में ट्रेन संचालन पर बड़ा असर डालना शुरू कर दिया है। घने कोहरे में ट्रेनों को सुरक्षित चलाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है, इसलिए भारतीय रेलवे ने 1 दिसंबर 2024 से 28 फरवरी 2025 तक बड़ी संख्या में ट्रेनों के संचालन में बदलाव किया है। इस दौरान 24 मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें पूरी तरह कैंसिल रहेंगी, जबकि 28 ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी कम कर दी गई है।

अगर आपने इन तारीखों के बीच यात्रा की बुकिंग करा ली है या यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यह जानकारी आपके काम की है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

पूर्व मध्य रेलवे के अनुसार, मौसम विभाग ने दिसंबर–फरवरी के दौरान उत्तर भारत में घने कोहरे की संभावना जताई है।
खासकर प्रयागराज–टूंडला सेक्शन में कोहरा ट्रेन संचालन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
रेलवे अधिकारियों ने बताया कि देरी और दुर्घटना के जोखिम को कम करने के लिए यह कदम उठाया गया है।

यात्रियों को सलाह दी गई है कि यात्रा से पहले अपडेटेड टाइमटेबल और ट्रेन स्टेटस जरूर चेक करें।

1 दिसंबर से 28 फरवरी तक पूरी तरह रद्द ट्रेनें

• प्रयागराज–मुजफ्फरपुर एक्सप्रेस

• हावड़ा–देहरादून उपासना एक्सप्रेस

• कोलकाता–वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी एक्सप्रेस

• मालदा टाउन–नई दिल्ली एक्सप्रेस

• बरौनी–अंबाला एक्सप्रेस

• पूर्णिया कोर्ट–अमृतसर जनसेवा एक्सप्रेस

• डिब्रूगढ़–चंडीगढ़ एक्सप्रेस

• कामाख्या–गया एक्सप्रेस

• हटिया–आनंद विहार एक्सप्रेस

• टाटा–अमृतसर एक्सप्रेस

(अन्य रद्द ट्रेनों की सूची रेलवे नोटिफिकेशन में उपलब्ध है)

जिन ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी कम की गई

• ग्वालियर–बरौनी एक्सप्रेस

• अजमेर–सीलदह एक्सप्रेस

• हावड़ा–काठगोदाम बाघ एक्सप्रेस

• कोलकाता–अमृतसर एक्सप्रेस

• भागलपुर–आनंद विहार एक्सप्रेस

• कामाख्या–आनंद विहार एक्सप्रेस

• पाटलिपुत्र–लखनऊ एक्सप्रेस

• पाटलिपुत्र–गोरखपुर एक्सप्रेस

• डिब्रूगढ़–लालगढ़ अवध एक्सप्रेस

इन ट्रेनों के ट्रिप कम कर दिए गए हैं ताकि संचालन सुचारू रहे और बेमौसम देरी से बचा जा सके।

यात्रियों के लिए सलाह

यात्रा से पहले अपना PNR स्टेटस, ट्रेन शेड्यूल और रद्द/रिस्केड्यूल की सूची जरूर देखें।

रेलवे ऐप या आधिकारिक वेबसाइट पर लगातार अपडेट मिलते रहेंगे।

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