Sunday, June 28, 2026
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राष्ट्रीय शिल्प मेले में लोक कलाकारों की धूम, मऊ की रिद्धि पांडे ने लोकधुनों से बांधा समां

मऊ ( राष्ट्र की परम्परा )उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रयागराज में 1 से 10 दिसंबर तक आयोजित राष्ट्रीय शिल्प मेला में लोक संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिला। मेले में मऊ जनपद की प्रतिभाशाली युवा गायिका रिद्धि पांडे ने अपनी मधुर लोकधुनों से दर्शकों का मन मोह लिया।

रिद्धि ने “मोहि लेलखिन सजनी”, “कौने रंग मोतिया”, “रिमझिम बरसे पनिया” जैसे लोकगीत प्रस्तुत कर उपस्थित कला प्रेमियों को झूमने पर मजबूर कर दिया। इस उत्कृष्ट प्रस्तुति पर काशी प्रांत संस्कार भारती के लोक कला सदस्य चंद्रमणि पांडे ने संस्कृति मंत्रालय तथा उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे राष्ट्रीय आयोजन से लोक कला एवं संगीत के संवर्धन-संरक्षण को नई ऊर्जा मिलती है तथा नई प्रतिभाओं को मंच मिलता है। इन कलाकारों के रंग, सुर और ताल से सतरंगी हो उठी। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमसेरी ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। प्रयागराज के आशुतोष श्रीवास्तव ने “सियाराम मैं जग जानी” और “मां तू कृष्णा कान्हा” जैसे भजनों से भक्तिमय वातावरण बनाया।
इसके बाद मथुरा की नृत्यांगनाओं ने प्रसिद्ध चरकुला नृत्य से रोमांच भर दिया। वहीं राजस्थान से आई कलाकार गंगा देवी और उनकी टीम ने तेरहताली और भवई नृत्य की प्रस्तुति से पंडाल में उपस्थित महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को मंत्रमुग्ध कर दिया। लोकगायक मुंशीलाल सोनकर के बिरहा गायन ने भी खूब वाहवाही लूटी।
कार्यक्रम के अंत में केंद्र के निदेशक सुदेश शर्मा ने मुख्य अतिथि, कलाकारों और दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
राष्ट्रीय शिल्प मेला इस वर्ष भी कला, संस्कृति और लोक परंपराओं का अविस्मरणीय उत्सव साबित हुआ।

62 वर्ष की रिटायरमेंट: राहत या रोजगार संकट?

गोंदिया – भारत सरकार द्वारा कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने पर गंभीरता से संभावित विचार किए जाने की हालिया जानकारी ने पूरे देश क़ी मीडिया में एकव्यापक बहस को जन्म दे दिया है। यह मुद्दा केवल सरकारी व्यवस्था या नौकरशाही तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के विशाल श्रम बाजार, आर्थिक संरचना, पेंशन प्रणाली, युवाओं की रोजगार संभावनाओं और कार्यस्थल की दीर्घकालिक नीतियों पर गहरा प्रभाव डालता है।वैश्विक संदर्भ में भी कई देशों ने बढ़ती उम्र,जीवन प्रत्याशा और पेंशन-भार को देखते हुए रिटायरमेंट आयु में बदलाव किए हैं। ऐसे में भारत का यह कदम न केवल अपरिहार्यता का संकेत है, बल्कि एक परिवर्तनशील सामाजिक- आर्थिक ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत भी देता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि केंद्रीय सरकार के स्तरपर रिटायरमेंट की उम्र को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने का विचार महज़ किसी एक प्रशासनिक या वित्तीय गणना का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई व्यापक कारण मौजूद हो सकते हैं?पिछले एक दशक में भारत में जीवन प्रत्याशा लगातार बढ़ी है, वरिष्ठ कर्मचारियों का स्वास्थ्य बेहतर हुआ है और कई क्षेत्रों में अनुभव -आधारित कार्य-प्रदर्शन की मांग बढ़ी है। जिन देशों में जनसंख्या वृद्ध हो रही है,वहां रिटायरमेंट आयु में बढ़ोतरी आम हो चुकी है,जैसे फ्रांस, जापान, जर्मनी, अमेरिका और चीन। भारत में भी यह मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है, क्योंकि देश की कार्यबल संरचना में तेजी से बदलाव हो रहा है।इसके अलावा, सरकार पर पेंशन-व्यय और सामाजिक- सुरक्षा योजनाओं का बोझ बढ़ता जा रहा है। एक बड़ी संख्या में कर्मचारी अगले 10-15 वर्षों में रिटायर होने वाले हैं। यदि एक साथ भारी संख्या में कर्मचारी सेवानिवृत्त होते हैं, तो इससे न केवल सरकारी व्यय में उछाल आता है,बल्कि अनुभवी मानव- संसाधन की कमी भी पैदा होती है। इसी संदर्भ में रिटायरमेंट आयु दो वर्ष बढ़ाने का प्रस्ताव कई स्तरों पर महत्त्वपूर्ण और तार्किक प्रतीत होता है।यह आर्टिकल सोशल मीडिया में चल रही तार्किक बस पर आधारित है सटीकता सेक़ोई भी संबंध नहीं है।

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साथियों बात कर हम सरकार का प्रस्ताव:60 से 62 वर्ष रिटायरमेंट आयु एक नीतिगत परिवर्तन इसको समझने की करें तो, सरकार द्वारा संकेत दिए गए संभावित प्रस्ताव में रिटायरमेंट आयु को 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष करने की संभावना जताई गई है। यह प्रस्ताव केंद्रीय कर्मचारियों, राज्यों के कर्मचारियों,सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों, और कई अर्ध-सरकारी संस्थाओं कोप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करेगा।सरकार के इस कदम के पीछे प्रमुख तर्क इस प्रकार हो सकते हैं (1) अनुभवी कर्मचारियों को बनाए रखना-प्रशासन से लेकर टेक्निकल क्षेत्रों तक, कई विभाग ऐसे हैं जहां अनुभव सीधे कार्य-कुशलता से जुड़ा होता है। वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों का सेवाकाल बढ़ाने से नीतिगत निरंतरता बनी रहती है और प्रशिक्षण पर दबाव घटता है।(2) पेंशन-भार कम करना-दो वर्ष अतिरिक्त सेवा का अर्थ है कि कर्मचारी दो साल और योगदान देंगे, जबकि सरकार को पेंशन का बोझ दो साल बाद उठाना होगा। इससे राजकोष पर तत्काल दबाव कम होगा। (3) कर्मचारियों के वित्तीय जीवन को स्थिरता- महंगाई बढ़ता शहरी जीवन-यापन खर्च, स्वास्थ्य- देखभाल के बढ़ते खर्च और लंबी आयु इन सभी के लिए लंबी आयु तक सेवा कर्मचारी को आर्थिक सुरक्षा देती है।(4) पोस्ट- रिटायरमेंट आर्थिक तनाव कम करना-कई अध्ययन बताते हैं कि बड़ी संख्या में लोग रिटायरमेंट के तुरंत बाद आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हैं। दो वर्ष का अतिरिक्त समय उनके लिए एक मजबूत सुरक्षा परत तैयार करता है। 

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साथियों बात अगर हम कर्मचारियों की उम्मीदें और वित्तीय लाभ- दो साल की अतिरिक्त सेवा क्यों महत्वपूर्ण है इसको समझने की करें तो,भारत में 60 वर्ष के बाद लोग केवल उम्र के हिसाब से बूढ़े माने जाते हैं, क्षमताओं के हिसाब से नहीं। आधुनिक कार्य वातावरण में 60 वर्ष से अधिक आयु वाले लोग पूरी तरह सक्रिय और कुशल होते हैं। ऐसे में कर्मचारियों के लिए यह निर्णय कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान कर सकता है:(1)दो वर्ष का अतिरिक्त वेतन -जीवन भर की आय पर बड़ा असर सबसे बड़ा लाभ सीधे वेतन से जुड़ा है। कर्मचारियों को दो वर्ष अधिक वेतन मिलने का मतलब है-अधिक बचत,अधिक निवेश, सामाजिक सुरक्षा राशि में बढ़त, रिटायरमेंट के बाद बेहतर आय- स्रोत,विशेषकर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी अत्यंत महत्वपूर्ण है। (2) पेंशन और ग्रेच्युटी में वृद्धि-पेंशन का निर्धारण आखिरी वेतन और कुल सेवा अवधि के आधार पर होता है।दो वर्ष की अतिरिक्त सेवा से-पेंशन राशि बढ़ जाएगी, ग्रेच्युटी की कुल गणना में वृद्धि होगी,कम्युटेशन (एकमुश्त राशि) बढ़ेगी,इससे रिटायरमेंट के बाद वित्तीय स्थिरता काफी मजबूत होगी। (3) ईपीएफओ में अधिक योगदान जो कर्मचारी ईपीएफ के दायरे में आते हैं, उन्हें दो वर्षों तक एम्प्लायर और एम्प्लोयी दोनों का योगदान मिलता रहेगा।इससे-रिटायरमेंट कॉर्पस मजबूत होगा,ब्याज के रूप में अधिक राशि का लाभ मिलेगा,लंबे समय तक सुरक्षित कैश रिज़र्व बनेगा (4) स्वास्थ्य सुरक्षा और मेडिकल कवरेज-सेवा अवधि बढ़ने से कई कर्मचारियों को-सरकारी चिकित्सा सुविधाएँ,स्वास्थ्य बीमा सीजीएचएस लाभ-दो वर्ष अधिक मिलेंगे।यह सेवानिवृत्ति के बाद होने वाले स्वास्थ्य खर्चों को काफी कम कर सकता है। (5) 2025-2026 में रिटायर होने वाले कर्मचारियों को राहत- वे कर्मचारी जो जल्द ही रिटायर होने वाले हैं, उनके लिए यह प्रस्ताव राहत का संदेश है। उन्हें अचानक आर्थिक योजना बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी और वे दो वर्ष तक परिवार की वित्तीय सुरक्षा बेहतर ढंग से कर पाएंगे।

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साथियों बात अगर हम सरकारी तर्क: कार्यस्थल पर दक्षता और अनुभव का योगदान इसको समझने की करें तो,सरकार का तर्क है कि वरिष्ठ कर्मचारियों के पास वह अनुभव, जमीनी समझ और नीतिगत परिपक्वता होती है जिसे अचानक प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।कई क्षेत्रों में जैसे-आयुर्विज्ञान,न्यायपालिका,अनुसंधानइंजीनियरिंग,सार्वजनिक प्रशासन में उम्र ज्ञान का पर्याय होती है।इन क्षेत्रों में 60 वर्ष की आयु में क्षमता समाप्त नहीं होती, बल्कि कई मामलों में इसी उम्र में व्यक्तियों का प्रदर्शन सबसे परिपक्व होता है।इसके अलावा, कई युवा अधिकारी अनुभवहीन होने के कारण उन्हीं वरिष्ठ अधिकारियों से मार्गदर्शन लेकर कार्य-क्षेत्र में दक्ष बनते हैं।यदि सभी वरिष्ठ कर्मचारी एक साथ रिटायर होने लगेंगे, तो संस्थागत निरंतरता टूट सकती है।इसलिए रिटायरमेंट आयु बढ़ाना रणनीतिक रूप से प्रशासनिक मजबूती का उपाय भी माना जा रहा है।

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साथियों बात अगर हम युवाओं की चिंता: रोजगारअवसरों पर संभावित प्रभाव इसको समझने की करें तो,इस निर्णय कायुवाओं पर प्रभाव बहस का प्रमुख केंद्र है।युवा वर्ग विशेष रूप से इस बात को लेकर चिंतित है कि (1) नई भर्ती में देरी हो सकती है-यदि वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग दो वर्ष और सेवा में रहेंगे तो,नए पद देर से खाली होंगे, प्रमोशन चैन धीमा पड़ेगा,युवा उम्मीदवारों की नियुक्ति की गति कम हो सकती है,यह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए चिंता का विषय है। (2) पदों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है- कई विभागों में भर्ती पदों की संख्या स्वतःरिटायरमेंट पर निर्भर होती है।रिटायरमेंट आयु बढ़ने का अर्थ है-भर्ती चक्र धीमा, रिक्तियां कम,नए रोजगारअवसरों में संकुचन (3) करियर की शुरुआत में देरी-भारतीय युवा अक्सर 25-28 वर्ष की उम्र में नौकरी की तैयारी में लगे होते हैं।यदि भर्ती देर से होगी तो,उनके करियर की शुरुआत पीछे चली जाएगी,सामाजिक और पारिवारिक दबाव बढ़ेगा,आर्थिक स्वतंत्रता की शुरुआत भी काफी देर से होगी (4) निजी व सार्वजनिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है- सरकारी नौकरियों में देरी का अर्थ है कि अधिक युवा निजी क्षेत्र में धकेले जाएंगे, जिससे उस क्षेत्र में भी प्रतियोगिता बढ़ जाएगी। 

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साथियों बात अगर हम सरकार का दृष्टिकोण: संतुलन बनाते हुए नीति लागू करने की कोशिश इसको समझने की करें तो, सरकार की ओर से संकेत दिया गया है कि यह नीति जल्दबाज़ी में लागू नहीं की जाएगी बल्कि चरणबद्ध तरीके से इसे लागू करने पर विचार होगा। इसके संभावित विकल्प हैं-विभागवार रिटायरमेंट आयु में वृद्धि,कुछ पदों पर फिलहाल 60 वर्ष ही बनाए रखना,युवाओं के लिए समानांतर विशेष भर्ती मिशन,नए पद सृजित करके रिक्तियों की कमी दूर करना,सरकार का मानना है कि युवाओं और वरिष्ठ दोनों वर्गों के हितों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।इसलिए इस नीति से पहले व्यापक दिशानिर्देश जारी होने की संभावना है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि,भर्ती प्रक्रिया बाधित न हो,युवाओं के लिए वैकल्पिक अवसर बनें,वरिष्ठ कर्मचारियों को बिना व्यवधान योगदान देने का अवसर मिले।

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साथियों बात अगर हम आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव, विस्तृत विश्लेषण के दृष्टिकोण से देखे तो (1) आर्थिक प्रभाव- सरकारी पेंशन व्यय में कमी  सार्वजनिक धन का बेहतर प्रबंधन,वरिष्ठ कर्मचारियों के माध्यम से आर्थिक स्थिरता (2) सामाजिक प्रभाव- परिवारों की आर्थिक सुरक्षा बढ़ेगी,वरिष्ठ नागरिक समाज में अधिक सक्रिय रहेंगे,वृद्धावस्था आश्रय और पेंशन आधारित निर्भरता कम होगी (3)कार्य-संस्कृति पर प्रभाव-अनुभवी व युवा कर्मचारियों का मिश्रण,कार्यस्थल पर कौशल-साझेदारी में सुधार, संस्थागत ज्ञान संरक्षित रहेगा, युवा और वरिष्ठ कर्मचारियों के बीच संतुलन ही वास्तविक समाधान,रिटायरमेंट आयु बढ़ाना एक अत्यंत व्यापक निर्णय है जिसका असर दो पीढ़ियों पर समान रूप से होगा।इसलिए आवश्यक है कि(1)सरकार स्पष्ट नीति बनाए(2)युवाओं के लिए समानांतर रोजगार सृजन योजनाएँ जारी की जाएँ (3) भर्ती -पदों की संख्या बढ़ाई जाए(4)वरिष्ठ कर्मचारियों को क्षमता के आधार पर कार्य सौंपे जाएँ(5)डिजिटल, तकनीक, स्टार्टअप क्षेत्र में युवा-उन्मुख रोजगार बढ़ाए जाएँ।

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अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि,रिटायरमेंट आयु को 60 से बढ़ाकर 62 करने का प्रस्ताव भारत में प्रशासनिक,आर्थिक और सामाजिक ढांचे को नया रूप दे सकता है। कर्मचारियों के लिए यह लाभदायक है, क्योंकि इससे उनकी आर्थिक सुरक्षा, पेंशन, ग्रेच्युटी और पीएफ में वृद्धि होगी। वहीं युवाओं के लिए यह चिंता का विषय है, लेकिन सरकार का दावा है कि यह निर्णय संतुलित तरीके से लागू किया जाएगा ताकि दोनों वर्गों के हित सुरक्षित रहें।यह मुद्दा केवल रोजगार या पेंशन का नहीं, बल्कि बदलते भारत की सामाजिक -आर्थिक संरचना का प्रतिबिंब है।यदि इस नीति को योजना-बद्ध, पारदर्शी और न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाए, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होगा, बल्कि अनुभवी व युवा मानव संसाधन के संतुलन से वैश्विक स्तर पर कार्यकुशलता का एक नया मॉडल भी प्रस्तुत कर सकता है।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

दहेज में 5 लाख की मांग, पिटाई कर बाजार में छोड़ा—छह लोगों पर मुकदमा दर्ज

मऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। मऊ जनपद के कोपागंज नगर पंचायत क्षेत्र में दहेज उत्पीड़न का गंभीर मामला सामने आया है। दोस्तपुरा निवासी अनामिका ने अपने पति, ससुर, सास सहित कुल छह लोगों पर दहेज उत्पीड़न, मारपीट, धमकी और साजिश के आरोप लगाते हुए एसपी मऊ से न्याय की गुहार लगाई। एसपी के निर्देश पर सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

शादी के बाद शुरू हुआ उत्पीड़न, 5 लाख रुपये की मांग

पीड़िता ने प्रार्थना पत्र में बताया कि उसकी शादी 3 दिसंबर 2023 को पिपरीडीह निवासी प्रीतम गुप्ता से हुई थी। विवाह में उपहारस्वरूप पर्याप्त सामान देने के बावजूद कुछ महीनों बाद ससुरालीजन द्वारा कम दहेज लाने का ताना दिया जाने लगा।

आरोप है कि पति, सास-ससुर और अन्य परिजनों ने लगातार 5 लाख रुपये की मांग करते हुए उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। इतना ही नहीं, पीड़िता के सभी जेवरात छीन लिए गए और मायकेवालों को जान से मरवाने की धमकी भी दी गई।

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9 जुलाई को मारपीट कर बाजार में छोड़ा

पीड़िता के अनुसार, 9 जुलाई 2025 की सुबह 7:30 बजे पति के मामा दीनानाथ और मुरारी की मौजूदगी में उसकी जमकर पिटाई की गई। इसके बाद उसे कोपागंज बाजार में छोड़कर सभी आरोपी फरार हो गए।

इससे पहले भी 14 मई को शिकायत करने पर थाने स्तर पर समझौता करा दिया गया था, लेकिन उत्पीड़न जारी रहा।

थाने ने नहीं की कार्रवाई, एसपी से लगाई गुहार

पीड़िता का कहना है कि 19 जुलाई को उसने थाना कोपागंज में सूचना दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने 1 अगस्त को एसपी मऊ को प्रार्थना पत्र देकर न्याय की मांग की।

एसपी के आदेश पर मामले में छह आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है और जांच की जिम्मेदारी एसआई प्रियंका सिंह को सौंपी गई है।

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चालक की लापरवाही से ट्रक से टकराई बाइक, दो युवकों की मौत; परिवार में मचा कोहराम

मऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। जिले के हलधरपुर थाना क्षेत्र में शनिवार रात लगभग 10:30 बजे हुए सड़क हादसे में दो युवकों की मौत हो गई। डीह तिलक ठाकुर पुलिया के पास आगे चल रहे ट्रक चालक द्वारा अचानक ब्रेक लगाए जाने के कारण पीछे से आ रही बाइक ट्रक से टकरा गई। टक्कर में बाइक पर सवार दोनों युवक गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में अस्पताल में डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया।

यह हादसा राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 128 बी पर हुआ, जहां दुर्घटना के बाद स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस और परिजनों को सूचना दी।

घर लौटते वक्त हुआ हादसा, बाइक के परखच्चे उड़ गए

जानकारी के अनुसार, मृतक आदर्श गुप्ता (18 वर्ष) निवासी मोहम्मदपुर बरहिया ग्राम पंचायत के मुहवां गांव और उसका मित्र आलोक गिरी उर्फ उदित (18 वर्ष) निवासी मेऊड़ी कलां मठिया बाइक से रतनपुरा से घर लौट रहे थे।

दोनों अंशुमान सिंह के रतनपुरा स्थित लिलास होटल में आयोजित बर्थडे पार्टी में शामिल होकर वापस लौट रहे थे। पुलिया के पास ट्रक चालक द्वारा अचानक ब्रेक लगाने पर उनकी बाइक (UP 54 BC 9690) ट्रक से जा टकराई।

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इलाज के दौरान दोनों की मौत, ट्रक कब्जे में

गंभीर रूप से घायल दोनों युवकों को ग्रामीणों की मदद से सीएचसी रतनपुरा ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
पुलिस ने दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया है। दुर्घटना में शामिल ट्रक (UP 45 T 8982) को पुलिस ने कब्जे में ले लिया है।

हादसे से गांव में मातम, एकलौता बेटा था आदर्श

इस दर्दनाक हादसे ने दोनों परिवारों को गहरा सदमा दिया है।

• आदर्श गुप्ता अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र था।

• आलोक गिरी, दो भाइयों में छोटा था।

परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। आसपास के गांवों के लोग दोनों घरों पर पहुंचकर शोक संवेदना व्यक्त कर रहे हैं।

पुलिस कर रही जांच, FIR दर्ज

मृतक आलोक गिरी के पिता राजेश गिरी की तरफ से ट्रक चालक के खिलाफ हलधरपुर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

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गोवा अग्निकांड में 25 की मौत: एक दशक में नाइट क्लबों में लगी आग ने छीनी सैकड़ों जिंदगियां

गोवा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। गोवा के उत्तरी इलाके अरपोरा स्थित बिर्च बाय रोमियो लेन नाइट क्लब में रविवार तड़के भीषण आग लगने से 25 लोगों की मौत हो गई, जबकि 6 लोग घायल हैं। आग लगने के कारणों की जांच के आदेश गोवा सरकार ने जारी कर दिए हैं। अभी तक 18 शवों की पहचान हो चुकी है और बाकी की पहचान की प्रक्रिया जारी है।

यह हादसा दुनिया भर में पिछले एक दशक में नाइट क्लबों में हुई आग की घटनाओं की भयावह यादें ताजा करता है, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। हाल ही में, मार्च 2025 में उत्तरी मैसेडोनिया के एक नाइट क्लब में लगी आग में 62 लोगों की मौत हो गई थी।

पिछले 10 वर्षों में नाइट क्लबों में आग की प्रमुख घटनाएँ

  1. अक्टूबर 2015 – बुखारेस्ट, रोमानिया (64 मौतें)

कोलेक्टिव नाइट क्लब में मेटल बैंड के शो के दौरान आतिशबाजी से लगी आग ने 64 लोगों की जान ले ली। यह यूरोप की सबसे दर्दनाक क्लब आग की घटनाओं में से एक मानी जाती है।

  1. दिसंबर 2016 – ओकलैंड, कैलिफोर्निया (36 मौतें)

‘घोस्ट शिप’ नामक एक गोदाम में डांस पार्टी के दौरान आग लगने से 36 लोगों की जान चली गई। यह ओकलैंड के इतिहास की सबसे घातक आग थी।

  1. जनवरी 2022 – याउंडे, कैमरून (16 मौतें)

शैंपेन सर्व करने के दौरान जलाए गए पटाखों से आग लगने पर 16 लोगों की मौत हो गई।

  1. जनवरी 2022 – पापुआ, इंडोनेशिया (19 मौतें)

सोरोंग नाइट क्लब के अंदर दो समूहों की झड़प के बाद क्लब में आग लगा दी गई, जिसमें 19 लोगों की जान गई।

  1. अगस्त 2022 – बैंकॉक, थाईलैंड (23 मौतें)

माउंटेन बी नाइट क्लब में शॉर्ट सर्किट की आशंका के बाद लगी आग में 23 लोगों की मौत हो गई।

  1. अक्टूबर 2023 – मर्सिया, स्पेन (13 मौतें)

एक नाइट क्लब परिसर में बिजली संबंधी खराबी के कारण लगी आग में 13 लोग मारे गए।

  1. अप्रैल 2024 – इस्तांबुल, तुर्की (29 मौतें)

मास्करेड नाइट क्लब में नवीनीकरण कार्य के दौरान आग लगी और 29 लोगों की मौत हो गई।

  1. मार्च 2025 – उत्तरी मैसेडोनिया (62 मौतें)

क्लब के अंदर आतिशबाजी की चिंगारी छत से टकराने पर लगी आग ने 62 लोगों की जान ले ली, जो हाल के वर्षों की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है।

गोवा अग्निकांड ने एक बार फिर नाइट क्लबों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार ने तत्काल जांच के आदेश दिए हैं और घायलों का इलाज जारी है। पिछले दशक में नाइट क्लबों में आग से हुई मौतों की श्रृंखला बताती है कि सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है।

बस–कार की सीधी भिड़ंत: मां-बेटे सहित तीन की मौत, तीन गंभीर; शादी से लौटते समय हुआ हादसा

गोंडा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में रविवार सुबह एक दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। वजीरगंज थाना क्षेत्र के अनभुला गांव के पास गोंडा–अयोध्या हाईवे पर कार और बस की आमने-सामने टक्कर हो गई। इस हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि कार में सवार तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मौके पर पहुंची पुलिस ने सभी घायलों को तुरंत गोंडा मेडिकल कॉलेज भेजा और आगे की जांच शुरू कर दी है।

शादी से जा रहे थे घर, रास्ते में ट्रैजेडी

शहर के आवास विकास कॉलोनी निवासी नितिन गोयल की 4 दिसंबर को शादी थी। शादी में शामिल होने रिश्तेदार बेंगलुरु से आए थे। रविवार सुबह नितिन कार से उन्हें अयोध्या एयरपोर्ट छोड़ने जा रहे थे।

अनभुला गांव के पास अचानक अयोध्या की ओर से आ रही उत्तराखंड परिवहन निगम की बस से कार की जोरदार टक्कर हो गई। दुर्घटना इतनी गंभीर थी कि कार में बैठे सभी छह लोग घायल हो गए।

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तीन लोगों की मौत, तीन का चल रहा इलाज

घायलों को तुरंत गोंडा मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद अक्षत (26), आशु (22) और अक्षत की मां नीता अग्रवाल (58) को मृत घोषित कर दिया।
अन्य तीन घायलों की हालत गंभीर बताई जा रही है और उनका उपचार जारी है।

पुलिस कर रही आगे की कार्रवाई

पुलिस ने बस और कार को कब्जे में ले लिया है और दुर्घटना के कारणों की जांच कर रही है। साथ ही, हाईवे पर कुछ समय तक यातायात प्रभावित रहा, जिसे बाद में बहाल कर दिया गया।

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आखिर टूट गया स्मृति–पलाश का रिश्ता, दोनों ने एक साथ सोशल मीडिया पर किया शादी रद्द करने का ऐलान

मनोरंजन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भारतीय महिला क्रिकेट टीम की उपकप्तान स्मृति मंधाना और संगीतकार पलाश मुछाल ने अपनी शादी रद्द करने का आधिकारिक एलान कर दिया है। दोनों ने रविवार दोपहर लगभग एक ही समय पर इंस्टाग्राम पर पोस्ट साझा करते हुए पुष्टि की कि उनका रिश्ता आगे नहीं बढ़ पाएगा।
बता दें कि दोनों की शादी 23 नवंबर को महाराष्ट्र के सांगली में होने वाली थी और उससे दो दिन पहले शादी की रस्में भी शुरू हो चुकी थीं। शादी टलने की चर्चाएँ पहले से थीं, लेकिन 17 दिन बाद दोनों ने चुप्पी तोड़ते हुए सच्चाई सामने रखी।

मंधाना का बयान – “शादी रद्द कर दी गई है, कृपया निजता का सम्मान करें”

स्मृति मंधाना ने रविवार दोपहर 1:08 बजे इंस्टाग्राम स्टोरी के माध्यम से बताया कि शादी रद्द कर दी गई है। इसके बाद उन्होंने विस्तृत पोस्ट लिखते हुए कहा कि पिछले कुछ सप्ताह से उनके निजी जीवन को लेकर कई तरह की अफवाहें फैल रही थीं, इसलिए सच बताना आवश्यक था।

उन्होंने आगे लिखा कि वह हमेशा एक निजी जीवन जीना पसंद करती हैं और चाहती हैं कि यह मामला यहीं समाप्त माना जाए। मंधाना ने सभी लोगों से दोनों परिवारों की निजता का सम्मान करने की अपील की।

साथ ही उन्होंने बताया कि उनका पूरा ध्यान भारत के लिए शीर्ष स्तर पर क्रिकेट खेलने और देश के लिए ट्रॉफियां जीतने पर ही रहेगा।

पलाश मुछाल बोले – “यह जीवन का सबसे कठिन दौर, बेबुनियाद अफवाहों से दर्द”

स्मृति के कुछ ही मिनटों बाद, पलाश मुछाल ने भी पोस्ट साझा करते हुए रिश्ते के खत्म होने की पुष्टि की।
उन्होंने लिखा कि उनके लिए यह समय बेहद कठिन है, क्योंकि सोशल मीडिया पर उनके निजी रिश्ते को लेकर कई आधारहीन बातें फैलाई गईं।

पलाश ने कहा कि वे आगे से अपने निजी रिश्तों से दूरी बनाकर आगे बढ़ने का फैसला कर चुके हैं। उन्होंने उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है जो झूठी और अपमानजनक खबरें फैला रहे हैं।

कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

अपने बयान में पलाश मुछाल ने साफ किया कि उनकी टीम उन सभी व्यक्तियों या पेजों के खिलाफ सख्त लीगल एक्शन लेगी जो बिना पुष्टि के अफवाहें फैलाते हैं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर झूठ फैले तो उसके गंभीर परिणाम होते हैं, इसलिए जिम्मेदारी के साथ राय बनाना सीखना चाहिए।

स्मृति मंधाना और पलाश मुछाल ने अपने रिश्ते को सम्मानपूर्वक समाप्त करते हुए लोगों से अनुरोध किया है कि वे इस निजी मुद्दे को तूल न दें और दोनों परिवारों की निजता का सम्मान करें। दोनों ने स्पष्ट किया कि वे अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने पर ध्यान देंगे।

नई ऊर्जा के साथ संपन्न हुई बी-पैक्स परसिया भगवती मझौवा की वार्षिक आमसभा, अधिकारियों ने रखे महत्वपूर्ण सुझाव

सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)। बहुउद्देशीय प्राथमिक ग्रामीण सहकारी समिति (बी-पैक्स) लिमिटेड परसिया भगवती मझौवा विकास खण्ड सलेमपुर की वार्षिक सामान्य निकाय बैठक समिति प्रांगण में आयोजित हुई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व विधायक एवं सभापति जिला सहकारी बैंक देवरिया रविन्द्र प्रताप मल्ल ने कहा कि सहकार से समृद्धि योजना को धरातल पर उतारने के लिए जिला सहकारी बैंक लगातार ऋण वितरण बढ़ा रहा है। सरकार का उद्देश्य समितियों को बहुउद्देशीय बनाकर किसानों की सभी जरूरतें एक ही स्थान पर पूरी करना है।

उन्होंने किसानों से अपील की कि वे सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाएं और कृषि संबंधी सुविधाओं का समय पर उपयोग करें।

प्रदेश अध्यक्ष सचिव संघ नवनाथ पाण्डेय ने समिति का वार्षिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया और सभी किसानों से ‘फार्मर रजिस्ट्री’ अवश्य करवाने का आग्रह किया, ताकि खाद-बीज व अन्य कृषि सुविधाएं समय से उपलब्ध हो सकें।

ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि अमरेश सिंह बब्लू ने कहा कि किसानों को बैंक शाखाओं व बी-पैक्स से जुड़कर कम ब्याज पर मिलने वाले ऋण एवं अन्य शासकीय योजनाओं का लाभ लेना चाहिए।

पूर्व प्राचार्य जटाशंकर दूबे ने बताया कि समिति का प्रमुख लक्ष्य क्षेत्र के किसानों को अधिक से अधिक आर्थिक लाभ और सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। उन्होंने जोर दिया कि सहकारी समितियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, इसलिए सदस्यों की सक्रिय भागीदारी समिति की प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कार्यक्रम के अंत में समिति अध्यक्ष अजीत मिश्र ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस दौरान कुसुमाकर पाण्डेय, पंचम लाल, सर्वेश कुमार द्विवेदी, भुनेश्वर मिश्र, इंद्रजीत यादव, अरुण कुमार सिंह, सतीश सिंह, रविशंकर मिश्रा, अजय दूबे, विश्वनाथ पाण्डेय, मुक्तिनाथ दूबे समेत अनेक सदस्य उपस्थित रहे।

हर घर नल का वादा अधूरा, भलुअनी ब्लॉक में जमीनी सच्चाई उजागर

देवरिया के भलुअनी ब्लॉक के ठाकुरदेवा गांव की जलजीवन योजना की हकीकत—प्यास से जूझते ग्रामीण, अधिकारी मौन

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जिले के भलुअनी विकासखंड अंतर्गत ठाकुरदेवा गांव में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जलजीवन योजना आज भी कागजों और फाइलों तक ही सीमित नजर आ रही है। वर्षों पहले “हर घर नल से जल” का सपना दिखाकर शुरू की गई इस योजना से ग्रामीणों को आज तक एक बूंद स्वच्छ पेयजल भी नसीब नहीं हो सका है। परिणामस्वरूप, गांव के सैकड़ों परिवार आज भी हैंडपंप, कुएं और दूर-दराज के तालाबों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं।

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गांव की महिलाएं और बच्चे सुबह-सुबह पानी की तलाश में निकलते हैं। कई बार दो से तीन किलोमीटर दूर जाकर उन्हें पानी भरना पड़ता है। गर्मी के दिनों में हालात और बदतर हो जाते हैं। बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह स्थिति बेहद कष्टदायक बन चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि योजना के तहत नल तो लगाए गए, पाइप लाइनें बिछाईं गईं, लेकिन उनमें आज तक पानी नहीं आया।

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, कई बार इस समस्या की शिकायत ग्राम सभा से लेकर ब्लॉक कार्यालय और जिला प्रशासन तक की जा चुकी है। बावजूद इसके, न तो कोई ठोस कार्यवाही हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर स्थिति की गंभीरता को समझने की कोशिश की। अधिकारियों की चुप्पी और उदासीनता से अब ग्रामीणों का सरकार और सिस्टम से भरोसा टूटता जा रहा है।

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सरकार की मंशा भले ही हर घर को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहती है। देवरिया जलजीवन योजना का यह उदाहरण दर्शाता है कि योजनाओं का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो जल संकट और भी भयावह रूप ले सकता है।

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ग्रामीणों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि जल्द ही पानी की व्यवस्था सुचारू नहीं की गई, तो वे जन आंदोलन के लिए मजबूर होंगे। यह मुद्दा अब सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता का बन चुका है।

हरियाणा में टोल की मार सबसे ऊँची वसूली, सबसे कम दूरी, व्यवस्था पर ठोस सवाल

जब गुजरात जैसा बड़े आकार वाला प्रदेश पीछे रह जाए और छोटा हरियाणा टोल वसूली में सबसे आगे हो—तो यह महज संयोग नहीं, नीतिगत असंतुलन का संकेत है
लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में वह सच सामने आया जिसे हरियाणा के लोग वर्षों से महसूस कर रहे थे—टोल की बढ़ती बोझिल मार, अनियमित ढांचा, और हर कुछ किलोमीटर पर खड़े बैरियर। संसद में दिया गया यह सरकारी डेटा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के कामकाज, प्राथमिकताओं और नीति-निर्माण की मानसिकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि देश में प्रति व्यक्ति सबसे अधिक टोल वसूली हरियाणा में होती है—₹917.1 प्रति नागरिक, जो पूरे भारत में नंबर एक है।

यह तथ्य चौंकाता इसलिए भी है क्योंकि हरियाणा का भौगोलिक आकार, जनसंख्या, मार्ग-लंबाई और औद्योगिक स्थिति गुजरात से कई स्तरों पर छोटी है। गुजरात हरियाणा से तीन गुना बड़ा राज्य है, लेकिन वहाँ टोल वसूली हरियाणा से कम है। यह अंतर सिर्फ क्षेत्रफल का नहीं, बल्कि प्रशासनिक दूरदृष्टि, नीति-व्यवस्थापन और सार्वजनिक हित के मूल्यांकन का अंतर दिखाता है।

जब यह सामने आता है कि गुजरात में कुल 62 टोल प्लाज़ा हैं, वहीं हरियाणा में 75, तो सबसे पहले सवाल यह उठता है कि आखिर छोटे प्रदेश पर इतनी अधिक वसूली का बोझ क्यों? कौन-सी बाध्यताएँ या प्राथमिकताएँ हैं जिनके चलते हरियाणा में टोल प्लाज़ा की घनत्व अन्य राज्यों से कहीं अधिक है? टोल की संख्या अपने आप में समस्या नहीं है; समस्या वहाँ बनती है जहाँ नियमों का पालन न हो, दूरी का मानक तोड़ा जाए, और जनता की जेब से अधिकतम वसूली की कोशिश व्यवस्था के लक्ष्य के रूप में स्थापित हो जाए।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के नियमों के अनुसार, दो टोल प्लाज़ा के बीच न्यूनतम दूरी 60 किलोमीटर होनी चाहिए। यह नियम इसलिए बनाया गया था कि जनता पर अनावश्यक भार न पड़े और सड़क-सुविधाओं का उपयोग न्यायपूर्ण तरीके से हो। लेकिन हरियाणा का मामला बिल्कुल उलट है—यह देश का अकेला प्रदेश है जहाँ 2 टोल के बीच औसत दूरी 45 किलोमीटर है, यानी स्थापित मानक से 25% कम।

यह अंतर कोई छोटा सांख्यिकीय खेल नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक गड़बड़ी की ओर संकेत करता है। हरियाणा में सड़कों का जाल जरूर है, लेकिन हर सड़क पर टोल की रणनीति क्या जनसुविधा के अनुरूप है? या फिर यह योजना आर्थिक वसूली का एक ऐसा मॉडल बन गई है जो जनता की जेब पर निरंतर बोझ डालने का काम कर रही है?

टोल प्लाज़ा किसी भी राज्य के लिए दोहरी भूमिका निभाते हैं—आर्थिक संसाधन जुटाना और सड़क निर्माण/रखरखाव में योगदान देना। लेकिन जब टोल से आय इतनी अधिक हो जाए कि लोगों को यात्रा करने से पहले हर 40–50 किलोमीटर पर जेब ढीली करनी पड़े, तब यह व्यवस्था संदेहास्पद लगने लगती है। इस संदर्भ में हरियाणा की तुलना गुजरात से करना नीतिगत विसंगति को और भी उजागर करता है। गुजरात का क्षेत्रफल विशाल है, औद्योगिक गतिविधियाँ अधिक हैं, राजमार्ग कहीं अधिक लंबाई में फैले हैं, फिर भी टोल की संख्या कम है। यह दर्शाता है कि वहाँ योजना संतुलित है, दूरी का औसत मानक के करीब है, और जनता पर अपेक्षाकृत कम दबाव है।

हरियाणा के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं—एक तरफ यात्रा की लागत बढ़ रही है, दूसरी तरफ टोल की आवृत्ति। यही कारण है कि प्रदेश में व्यापारियों, किसानों, निजी वाहन चालकों और दैनिक यात्रियों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली–एनसीआर से जुड़े हर जिले—सोनीपत, झज्जर, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, रोहतक—लगभग हर दिशा में टोल प्लाज़ा की भरमार है। यह स्थिति ऐसी है कि कोई भी व्यक्ति 150–200 किमी की यात्रा में तीन से पाँच टोल पार कर लेता है। यह सिर्फ असुविधा नहीं, एक गहरी वित्तीय क्षति है, जो दीर्घकाल में राज्य की गतिशीलता और आर्थिक दक्षता पर प्रभाव डालती है।

प्रश्न यह भी उठता है कि अंततः इस अधिकतम वसूली का उपयोग कहाँ हो रहा है? क्या हरियाणा की सड़कें, फ्लाईओवर, सुरक्षा और मार्ग-गुणवत्ता उतनी ही बेहतर हैं जितनी वसूली अधिक है? क्या जनता को उसके पैसे का समुचित प्रतिफल मिल रहा है? अक्सर देखने में आता है कि कई रास्ते निर्माणाधीन रहते हैं, कई जगहों पर काम धीमा पड़ जाता है, और अनेक स्थानों पर सुविधा अपेक्षित स्तर से कम होती है। यदि वसूली इतनी अधिक है, तो सुविधाएँ भी उसी स्तर की होनी चाहिए। लेकिन जमीन की वास्तविकता इस दावे की पुष्टि नहीं करती।

टोल वसूली को लेकर एक और गंभीर विमर्श यह है कि हर कुछ किलोमीटर पर टोल होने से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है। जब मालवाहक ट्रकों, कृषि उत्पादों और औद्योगिक सामग्री पर टोल का अतिरिक्त भार पड़ता है, तो उसकी कीमत अंततः आम उपभोक्ता तक पहुँचकर महँगाई को बढ़ाती है। इस प्रकार टोल का बोझ सिर्फ यात्रियों पर ही नहीं, पूरे आर्थिक ढाँचे पर पड़ता है। हरियाणा की पहचान कृषि और उद्योग दोनों में अग्रणी प्रदेश की है। ऐसे में टोल की अधिकतम घनत्व व्यापारिक गतिविधियों की गति को धीमा करता है और प्रदेश की प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमजोर करता है।

यदि देश के बड़े राज्य नीति के अनुसार टोल दूरी का संतुलन बनाए रख सकते हैं, तो हरियाणा क्यों नहीं? यह सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, नियत का है। क्या वाकई नियमों के मुताबिक प्लेसमेंट हुआ? क्या पुनरीक्षण हुआ? क्या राज्य सरकार ने इस पर केंद्र से संवाद किया? क्या स्थानीय जन-प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को नियमित रूप से उठाया? जनता के प्रश्नों का उत्तर तभी मिलेगा जब नीति-निर्माता इस मुद्दे को गंभीरता से लें।

आज जरूरत है कि राज्य और केंद्र मिलकर हरियाणा के टोल ढाँचे का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन करें। जिस प्रदेश में औसत दूरी 45 किमी है, वहाँ नियमों के अनुरूप पुनर्व्यवस्था अनिवार्य है। साथ ही, प्रति व्यक्ति इतनी अधिक वसूली का सीधा अर्थ है कि सिस्टम की प्राथमिकताओं में सुधार की आवश्यकता है। जनता कोई मशीन नहीं जिसे टोल का सिक्का डालकर आगे बढ़ा दिया जाए; वह करदाता है, सुविधा चाहता है, और पारदर्शिता का अधिकार रखता है।

अंततः, व्यवस्था को जनता के हित में काम करना चाहिए, न कि जनता को व्यवस्था के हित में मजबूर करना चाहिए। हरियाणा में टोल का यह असंतुलन सिर्फ आर्थिक मसला नहीं; यह शासन की प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है। अब समय है कि इस असंतुलन को दुरुस्त किया जाए—ताकि सड़कें विकास का माध्यम बनें, बोझ का नहीं।

डॉo सत्यवान सौरभ,
कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

हुमायूं कबीर के बाबरी मस्जिद शिलान्यास पर बजरंग दल का तीखा विरोध, इनाम की घोषणा से बढ़ी हलचल

संत कबीर नगर(राष्ट्र की परम्परा)। पश्चिम बंगाल में निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद का शिलान्यास किए जाने की खबर सामने आते ही संत कबीर नगर सहित कई जिलों में राजनीतिक और सामाजिक माहौल गर्म हो गया है। घटना के विरोध में जिले में शौर्य दिवस कार्यक्रम के दौरान बजरंग दल के जिला संयोजक सौरभ जायसवाल ने कड़ा रुख अपनाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी।
श्री जायसवाल ने संबोधित करते हुए कहा कि विदेशी आक्रांताओं के नाम पर देश में किसी भी तरह की मस्जिद या स्मारक निर्माण की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि यह कदम देश की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है और इससे सामाजिक सौहार्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी दौरान उन्होंने विवादित बयान देते हुए ‘इनाम घोषणा’ कर दी, जिसने स्थानीय स्तर पर तनाव का माहौल और बढ़ा दिया।
जैसे ही यह बयान सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ, जिले भर में हलचल तेज हो गई। कई संगठनों ने इसे भड़काऊ बताते हुए चिंता व्यक्त की। वहीं, कुछ संगठनों ने विधायक के कदम को गलत ठहराते हुए विरोध जारी रखने की बात कही।

दिल्ली में स्मॉग का घना कहर: AQI 305 के साथ हवा ‘बहुत खराब’, ठंड ने बढ़ाई मुश्किलें

नई दिल्ली (राष्ट्की परम्परा डेस्क )राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली एक बार फिर घने स्मॉग की चपेट में है। रविवार को पूरे शहर पर धुंध की मोटी परत छाई रही और दिल्ली की एयर क्वालिटी ‘बहुत खराब’ श्रेणी में बनी रही। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के अनुसार, सुबह 7 बजे दिल्ली का औसत AQI 305 दर्ज किया गया, जो बीते दिन की तुलना में थोड़ा कम था, लेकिन अभी भी यह स्वास्थ्य के लिहाज़ से बेहद चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है।

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सर्द हवाओं के बीच तापमान भी 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे बना रहा, जिससे प्रदूषण की परत और मोटी हो गई। विशेषज्ञों के अनुसार, ठंडी हवा और कम गति की हवाओं के कारण प्रदूषक कण वातावरण में ही फंसे रहते हैं, जिससे स्मॉग की स्थिति बनती है।

दिल्ली के सबसे प्रदूषित इलाके
अलग-अलग इलाकों में दर्ज किए गए AQI आंकड़े स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं। इनमें सबसे अधिक प्रदूषण मुंडका में रिकॉर्ड किया गया, जहां AQI 365 रहा। इसके अलावा बवाना (352), रोहिणी (341), वजीरपुर (337), आर.के. पुरम (326), आनंद विहार (327), अशोक विहार (325), पंजाबी बाग (320), सिरीफोर्ट (318), चांदनी चौक (308) और विवेक विहार (304) जैसे इलाके भी ‘बहुत खराब’ श्रेणी में रहे।

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वहीं ‘खराब’ एयर क्वालिटी वाले क्षेत्रों में अलीपुर (282), आया नगर (263), IGI एयरपोर्ट (227) और मंदिर मार्ग (212) शामिल रहे। दिल्ली के कुल 39 मॉनिटरिंग स्टेशनों में से 26 ने ‘बहुत खराब’ और 13 ने ‘खराब’ श्रेणी दर्ज की है।

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प्रदूषण का मुख्य कारण क्या है?
दिल्ली के एयर क्वालिटी मैनेजमेंट के लिए बने डिसीजन सपोर्ट सिस्टम की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ा योगदान ट्रांसपोर्ट सेक्टर (14.8%) का रहा। इसके बाद दिल्ली और आसपास की इंडस्ट्री (7.3%), रिहायशी क्षेत्र (3.6%) और कंस्ट्रक्शन साइट्स (2%) का सहयोग प्रदूषण बढ़ाने में रहा। NCR के झज्जर जिले से 13.9% और रोहतक से 5.2% प्रदूषण का असर दिल्ली की हवा पर पड़ा।

स्वास्थ्य के लिए चेतावनी
डॉक्टर्स का कहना है कि इस स्तर की वायु गुणवत्ता में लंबे समय तक रहने से सांस की समस्या, आंखों में जलन, सिरदर्द और एलर्जी की शिकायतें बढ़ सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों को खास सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।

भिटौली पुलिस की बड़ी कार्रवाई: 549 बोरी अवैध चाइनीज लहसुन बरामद, डीसीएम टाटा वाहन जप्त

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)।सीमा पर अवैध तस्करी को रोकने के लिए महराजगंज पुलिस द्वारा चलाया जा रहा अभियान लगातार प्रभावी साबित हो रहा है। पुलिस अधीक्षक सोमेन्द्र मीना के निर्देशन एवं अपर पुलिस अधीक्षक के मार्गदर्शन में संचालित सघन चेकिंग अभियान के तहत थाना भिटौली पुलिस ने शनिवार को एक बड़ी सफलता अपने नाम की।
थाना भिटौली की पुलिस टीम द्वारा भैसा पुल के पास वाहनों की नियमित जांच की जा रही थी। इसी दौरान महराजगंज से गोरखपुर की ओर जा रही एक डीसीएम टाटा गाड़ी को रोककर जांच की गई। तलाशी के दौरान वाहन में 549 बोरी अवैध चाइनीज लहसुन भरी पाई गई, जिसके संबंध में चालक कोई वैध कागजात या बिल्टी प्रस्तुत नहीं कर सका।
पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए डीसीएम टाटा वाहन सहित समस्त माल को मौके पर ही जप्त कर लिया और कस्टम एक्ट की संबंधित धाराओं में मुकदमा पंजीकृत कर आगे की विधिक कार्रवाई प्रारंभ कर दी है। महराजगंज की सीमा से अवैध माल की तस्करी को रोकने के लिए एसपी द्वारा चलाया जा रहा अभियान लगातार जारी है,और पुलिस की यह बड़ी सफलता इस अभियान की मजबूती को दर्शाती है।
भिटौली पुलिस की इस कार्रवाई से तस्करों में हड़कंप है, वहीं आम जनता ने भी सीमा सुरक्षा के प्रति पुलिस की सतर्कता की सराहना की है।

स्किन की इन समस्याओं को न करें नजरअंदाज, हो सकती है विटामिन-डी की कमी

त्वचा पर दिखते हैं विटामिन-डी की कमी के संकेत, इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

त्वचा को सेहत का आईना माना जाता है, क्योंकि शरीर में होने वाली किसी भी गड़बड़ी की पहली झलक अक्सर स्किन पर दिखाई देने लगती है। आजकल की जीवनशैली, ऑफिस का बंद माहौल, धूप से दूरी और गलत खानपान के कारण लोगों में विटामिन डी की कमी के लक्षण त्वचा पर तेजी से सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्य से, ज्यादातर लोग इन संकेतों को सामान्य स्किन प्रॉब्लम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो सकती है।

विटामिन-डी की कमी के लक्षण सबसे पहले त्वचा की बनावट और रंग पर असर डालते हैं। त्वचा का रूखा और बेजान दिखना इसका प्रमुख संकेत है। स्किन की प्राकृतिक चमक कम होने लगती है और चेहरा डल दिखाई देने लगता है। कई मामलों में होंठों और आंखों के आसपास की त्वचा काली पड़ने लगती है, जिसे लोग थकान या प्रदूषण का असर समझ लेते हैं।

इसके अलावा, विटामिन डी की कमी से त्वचा पर खुजली और जलन की समस्या भी बढ़ जाती है। स्किन जरूरत से ज्यादा सेंसिटिव हो जाती है और हल्की-सी धूप में भी जलन होने लगती है। कुछ लोगों को बार-बार पिंपल्स, रैशेज या एलर्जी होने लगती है, जो इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर में विटामिन-डी का स्तर सामान्य से कम हो चुका है।

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एक और महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि कटने या चोट लगने पर त्वचा धीरे-धीरे ठीक होती है। यानी शरीर की हीलिंग पावर कमजोर हो जाती है। कई रिसर्च में यह भी पाया गया है कि विटामिन डी की कमी के लक्षण स्किन पर झुर्रियों को जल्दी उभार सकते हैं और उम्र से पहले बुढ़ापे के संकेत दिखने लगते हैं।

इस कमी को पूरा करने के लिए सुबह की हल्की धूप लेना, दूध, अंडा, मशरूम और फोर्टिफाइड फूड्स को डाइट में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। यदि लक्षण ज्यादा गंभीर हों, तो डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना भी जरूरी हो सकता है।

नोट – यह जानकारी सुझाव के रूप में दी जा रही है, प्रयोग करने से पहले जानकार डॉक्टर से अवश्य सलाह लें।

जब लालच आस्था पर भारी पड़ जाए: इंसान की बदलती फितरत की सच्ची तस्वीर

इंसान की फितरत का सच: जब पैसा गिनते हैं तो ध्यान एकाग्र, और जब माला फेरते हैं तो बिखर जाता है मन

अक्सर जीवन की छोटी-सी सच्चाई हमारे पूरे व्यक्तित्व का आईना बन जाती है। “अजीब है कि इंसान जब पैसे गिनता है तब, किसी ओर जगह पर ध्यान नहीं देता, मगर जब माला फेरता है तब हर जगह ध्यान देता है।” — यह पंक्ति केवल एक व्यंग्य नहीं, बल्कि इंसान की फितरत का सटीक विश्लेषण है। यही फितरत हमें भीतर से पहचानने और समाज को समझने का अवसर देती है।

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आज के समय में मनुष्य की प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं। धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों की दौड़ में वह इतना उलझ चुका है कि आत्मिक शांति और संतुलन जैसे शब्द अब केवल किताबों और प्रवचनों तक सीमित होकर रह गए हैं। पैसा गिनते समय जब हम पूरी तरह सजग रहते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि हमारा मन भौतिकता के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो चुका है। वहीं माला फेरते समय, जब मन भटकता है, तो यह दर्शाता है कि आत्मिक अनुशासन की जड़ें हमारे भीतर कमजोर हो चुकी हैं।

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इच्छाएँ, सपने और उम्मीदें: बढ़ती हैं तो बनता है बोझ

इंसान की फितरत है कि वह हमेशा कुछ-न-कुछ चाहता ही रहता है। इच्छाएँ, सपने, उम्मीदें — ये सभी जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन जब इनकी कोई सीमा नहीं होती, तब यही बातें दुःख का कारण बन जाती हैं। ठीक वैसे ही जैसे नाखून अगर समय पर न काटे जाएँ, तो वे परेशानी उत्पन्न करते हैं, वैसे ही अगर इच्छाओं और अपेक्षाओं पर नियंत्रण न रखा जाए, तो वे हमें मानसिक रूप से बीमार कर देती हैं।

आज अधिकांश तनाव, अवसाद और असंतोष का मूल कारण यही है कि हम अपनी सीमा भूल जाते हैं। हमें जो मिला है, हम उससे खुश नहीं होते, बल्कि जो नहीं मिला, उसी का भार ढोते रहते हैं। इंसान की फितरत यही है — जो पास है, उसकी कद्र कम और जो दूर है, उसका मोह अधिक।

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ध्यान और अनुशासन का द्वंद्व

माला फेरना ध्यान और साधना का प्रतीक है। यह मन को केंद्रित करने का माध्यम है, लेकिन विडंबना यह है कि माला फेरते समय भी हमारा मन बाजार, रिश्तों, समस्याओं और भविष्य की चिंताओं में उलझा रहता है। इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि हमारा आत्मिक जीवन कितना कमजोर हो गया है?

धन के मामले में हम गिनती में गलती न हो जाए, इसलिए पूरा ध्यान लगाते हैं, किंतु जब बात अपनी आत्मा को गिनने-तोलने की आती है, तब लापरवाही दिखाते हैं। यही विरोधाभास इंसान की फितरत को प्रश्नों के घेरे में खड़ा करता है।

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समाज का नया आईना

आज समाज में अधिकतर रिश्ते अर्थ पर आधारित हो गए हैं। जिसकी जेब भरी है, वही महत्वपूर्ण है। चरित्र, संस्कार और संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही हैं। इस स्थिति में यह जरूरी हो गया है कि हम खुद से यह सवाल पूछें—क्या हम इंसान बन रहे हैं या सिर्फ एक मशीन बनकर रह गए हैं?

अगर समय रहते हमने इच्छाओं, अपेक्षाओं और भौतिक लालसाओं को नियंत्रित नहीं किया, तो यही चीजें हमें भीतर से खोखला कर देंगी। जितना आवश्यक धन है, उतना ही आवश्यक ध्यान भी है। लेकिन सही दिशा में।

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समाधान क्या है?

इंसान की फितरत को बदलना आसान नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान आवश्यक है:संतोष का अभ्यास करें – जो है, उसमें खुश रहने का प्रयास करें।नियमित ध्यान और साधना – माला केवल घूमाने के लिए नहीं, स्वयं को जोड़ने के लिए फेरी जानी चाहिए।इच्छाओं की सीमा तय करें – हर इच्छा को पूरा करना आवश्यक नहीं।

वर्तमान में जीना सीखें – भविष्य की चिंता और अतीत के पछतावे से बाहर आएँ।
जब इंसान अपनी फितरत को समझ लेता है, तब वही इंसान बदलने की ओर पहला कदम बढ़ाता है।
“इच्छाएँ, सपने, उम्मीदें और नाखून – इन्हें समय-समय पर काटते रहें, अन्यथा ये दुख का कारण बनते हैं।” यह पंक्ति केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन का सूत्र है। अगर इंसान इसे समझ ले, तो उसका जीवन बोझ नहीं, बल्कि एक सुंदर यात्रा बन सकता है।
आज जरूरत है आत्म-मंथन की, स्वयं को पहचानने की और अपनी फितरत को सही दिशा देने की। तभी समाज, मन और आत्मा—तीनों में संतुलन संभव है।

नोट -यह कमेंट करती कहानी है इसे किसी धर्म या व्यक्ति से न जोड़ा जाए।