Sunday, June 28, 2026
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मैरवा स्टेशन का पश्चिमी समपार फाटक निर्माण कार्य जारी आवाजाही पर रोक—लोगों से वैकल्पिक मार्ग इस्तेमाल करने की रेलवे की अपील

मैरवा (राष्ट्र की परम्परा)।
मैरवा रेलवे स्टेशन के पश्चिमी समपार फाटक (ढाला) पर रेलवे द्वारा ट्रैक के निर्माण व मरम्मत कार्य तेज़ी से जारी है। निर्माण एजेंसी और रेलवे अधिकारियों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण फाटक पर ट्रैक सुधार और संरचना मजबूतीकरण का काम प्रगति पर है, जिसके कारण आमजन की आवाजाही को अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।

स्थानीय प्रशासन और रेलवे ने लोगों से स्पष्ट अपील की है कि निर्माण अवधि में इस मार्ग से किसी भी प्रकार की आवाजाही न करें। भारी मशीनों, निर्माण सामग्रियों और मजदूरों के लगातार आवागमन के चलते फाटक क्षेत्र में प्रवेश खतरनाक हो सकता है। ऐसे में नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रेलवे ने वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल करने की सलाह दी है, ताकि दुर्घटना की कोई संभावना न रहे।

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि यह कार्य पूरा होने के बाद न केवल ट्रेनों की गति और सुरक्षा में सुधार होगा, बल्कि रोजाना इस रास्ते से गुजरने वाले स्थानीय लोगों को भी सुगम पारगमन सुविधा मिलेगी। निर्माण कार्य को निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए लगातार निगरानी और तकनीकी टीम की तैनाती की गई है।

स्थानीय नागरिकों ने भी रेलवे की इस पहल का स्वागत किया है और सुरक्षित आवागमन के लिए वैकल्पिक रास्तों का उपयोग शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि जल्द ही फाटक पूरी तरह से उपयोग के लिए खोल दिया जाएगा।

कोहरे का कहर: मौसम विभाग ने जारी किया अलर्ट

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। जिले में कड़ाके की ठंड ने दस्तक दे दी है। गुरुवार सुबह से घने कोहरे की शुरुआत हो गई है और आने वाले दिनों में यह स्थिति और गंभीर होगी। कई इलाकों में विजिबिलिटी बेहद कम रहने की संभावना है, जिसे देखते हुए विभाग ने अलर्ट जारी किया है।
घना कोहरा और तापमान में गिरावट की चेतावनी
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश के कई जिलों में आज सुबह से ही घना कोहरा छाया रहेगा, जहां विजिबिलिटी लगभग शून्य तक पहुंच सकती है। विभाग का अनुमान है कि अगले तीन दिनों बाद न्यूनतम तापमान में और गिरावट होगी। हालांकि अधिकतम तापमान में तुरंत कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।
इन जिलों में दिखेगा कोहरे का असर
मौसम विभाग ने पूर्वी यूपी के तराई क्षेत्रों के लिए येलो और ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। जिन जिलों में घना कोहरा रहने की संभावना है। संत कबीर नगर, महराजगंज, कुशीनगर, बहराइच, बस्ती, गोंडा, देवरिया, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर, बलरामपुर, लखीमपुर, श्रावस्ती और सीतापुर के आसपास के क्षेत्र उनमें शामिल है।।
पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव
बीएचयू मौसम इकाई के अनुसार 13 दिसंबर को एक कमजोर पश्चिमी विक्षोभ हिमालयी क्षेत्रों को प्रभावित करेगा, जिसके बाद पछुआ हवाओं का असर बढ़ेगा। इससे प्रदेश में ठंड, गलन और शीतलहर की स्थितियां तीव्र होंगी। 20 दिसंबर के बाद प्रदेश के ज्यादातर जिलों में घना कोहरा और शीतलहर का प्रकोप और बढ़ सकता है।

उप मुख्यमंत्री से मिले अमरेन्द्र मणि, मिठौरा क्षेत्र के विकास कार्यों को मिली नई दिशा

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मिठौरा क्षेत्र और आसपास के ग्रामीण इलाकों में विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाने के उद्देश्य से पूर्व ब्लाक प्रमुख एवं भाजपा के पूर्व जिला महामंत्री अमरेन्द्र मणि ने बुधवार को लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक से मुलाकात की। यह शिष्टाचार भेंट क्षेत्रीय विकास के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसमें कई लंबित परियोजनाओं व जनसुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।

बैठक के दौरान अमरेन्द्र मणि ने उप मुख्यमंत्री के समक्ष मिठौरा व आसपास के गांवों में आधारभूत संरचनाओं को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने सड़कों के चौड़ीकरण, ग्रामीण संपर्क मार्गों के निर्माण, पेयजल व्यवस्था में सुधार, स्वास्थ्य केंद्रों को उन्नत बनाने और विद्यालयों की इमारतों व सुविधाओं में विस्तार की जरूरतों को विस्तार से रखा। इसके साथ ही कृषि, युवाओं में रोजगार सृजन, गरीब परिवारों के सामाजिक सुरक्षा लाभ तथा दूरस्थ इलाकों में सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा की।

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उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने सभी बिंदुओं पर सकारात्मक रुख व्यक्त करते हुए आश्वासन दिया कि मिठौरा क्षेत्र की विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की नीति “सबका साथ, सबका विकास” के अनुसार अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाना सर्वोच्च लक्ष्य है। इसी क्रम में संबंधित विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।

अमरेन्द्र मणि ने क्षेत्रवासियों की ओर से उप मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताया और कहा कि सरकार की नीतियों तथा नेतृत्व की सक्रिय पहल से स्थानीय विकास कार्यों को नई ऊर्जा मिलेगी। राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर इस मुलाकात को मिठौरा के सर्वांगीण विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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कड़ाके की ठंड में CM योगी का रातभर दौरा, बेघरों को बांटे कंबल व भोजन

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश में बढ़ती सर्दी के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार देर रात गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर बने आश्रय केंद्र और झूलेलाल रैन बसेरे का औचक निरीक्षण किया। सीएम ने वहां रह रहे आश्रयहीन नागरिकों से बातचीत कर उनकी समस्याओं और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी ली। उन्होंने कहा कि ठंड के मौसम में कोई भी गरीब व्यक्ति बिना मदद के न रहे, यह सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने जरूरतमंद लोगों को गर्म कंबल और भोजन भी वितरित किया। जिला प्रशासन की ओर से कंबलों का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराया गया है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि राज्य के हर जिले, नगर पंचायत और शहरी क्षेत्र में रैन बसेरों में रोशनी, सुरक्षा, साफ-सफाई, बिस्तर, हीटिंग सिस्टम और भोजन की व्यवस्था 24×7 सुचारू रूप से सुनिश्चित की जाए।

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सीएम योगी ने कहा कि प्रशासन विशेष अभियान चलाकर सड़कों, चौराहों, धार्मिक स्थलों और स्टेशन क्षेत्रों में रहने वाले बेघर लोगों को तुरंत राहत सामग्री उपलब्ध कराए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को तेज सर्दी में खुले में रात बिताने की नौबत नहीं आनी चाहिए।

निरीक्षण के दौरान महापौर, विधायक ग्रामीण, एमएलसी, दोनों पार्षद, एडीजी ज़ोन, डीआईजी रेंज, मंडलायुक्त, जिलाधिकारी, एसएसपी, नगर आयुक्त व अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि जिले के सभी रैन बसेरों की नियमित मॉनिटरिंग हो और लापरवाही पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

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यह पहल सरकार की उन प्राथमिक योजनाओं में शामिल है, जिनका उद्देश्य सर्द मौसम में आश्रयहीन एवं गरीब लोगों को राहत प्रदान करना है।

परंपरा, रोजगार और नवाचार का संगम है अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह

अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह (08-14 दिसंबर): भारतीय कला, कारीगरों और परंपरा का राष्ट्रीय उत्सव

अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह (08–14 दिसंबर) भारत के शिल्पकर्मियों, कलाकारों और परंपरागत हस्तकला विरासत का राष्ट्रीय पर्व है। यह सप्ताह न सिर्फ भारतीय कला की समृद्धि को प्रदर्शित करता है, बल्कि उन लाखों कारीगरों को सम्मान भी देता है, जिनकी मेहनत से देश की पहचान वैश्विक मंच पर मजबूत होती है। हस्तशिल्प भारत की सांस्कृतिक आत्मा है और यह उत्सव उसी विरासत को नई ऊर्जा प्रदान करता है।

भारतीय हस्तशिल्प की महिमा: संस्कृति, कौशल और स्वावलंबन का संगम

अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह के दौरान देशभर में विविध कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और मेलों का आयोजन किया जाता है। इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य भारतीय हस्तकला की विविधताओं—जैसे बनारसी बुनाई, मधुबनी पेंटिंग, पिपली कला, चंदेरी, ब्लू पॉटरी, पत्थर नक्काशी, बिदरी, कांसे का शिल्प, लकड़ी की कारीगरी और सूक्ष्म हाथों से बने लाखों उत्पाद—को प्रोत्साहित करना है।

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इस सप्ताह का केंद्रबिंदु कारीगरों और शिल्पकारों का सशक्तिकरण है, ताकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा के साथ अपनी कला को नई पहचान दिला सकें।

आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सप्ताह

भारत का हस्तशिल्प उद्योग वैश्विक बाजार में मजबूती से खड़ा है और लाखों परिवारों की आजीविका का प्रमुख स्रोत है। अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह घरेलू और विदेशी दोनों बाजारों में उत्पादों की मांग बढ़ाने, निर्यात को मजबूती देने और “वोकल फॉर लोकल” अभियान को गति प्रदान करता है।
सरकार और विभिन्न संस्थाओं की ओर से कारीगरों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, डिजाइन नवाचार, वित्तीय सहयोग और e-commerce प्लेटफॉर्म से जोड़ने के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में हस्तकला उद्योग को बढ़ावा मिलता है।

परंपरा से तकनीक तक: बदलता भारतीय हस्तशिल्प

इस उत्सव का एक बड़ा उद्देश्य युवा पीढ़ी को भारतीय हस्तशिल्प की ओर आकर्षित करना है। आज तकनीक, डिजाइन इनोवेशन और डिजिटल मार्केटिंग से यह क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह आधुनिक उपभोक्ता जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक कला को नए रूप और नए बाजारों से जोड़ने का सुनहरा अवसर बन चुका है।

कारीगरों का सम्मान और नई संभावनाएँ

इस सप्ताह के दौरान कई राज्यों में उत्कृष्ट शिल्पकारों को सम्मानित किया जाता है। पुरस्कार, प्रमाणपत्र और प्रोत्साहन राशि देकर उनकी कला को राष्ट्रीय पहचान दी जाती है। साथ ही, नए उद्यमियों और स्टार्टअप्स को हस्तशिल्प क्षेत्र में निवेश के अवसरों से परिचित कराया जाता है।

हस्तशिल्प सप्ताह क्यों है जरूरी?
भारतीय पारंपरिक कारीगरों की कला को संरक्षित करने के लिए।
हस्तकला उद्योग में रोजगार बढ़ाने हेतु।
वैश्विक बाजारों में भारतीय शिल्प की मांग बढ़ाने के लिए।
“मेक इन इंडिया” और आत्मनिर्भर भारत अभियान को समर्थन देने हेतु।
अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और कारीगरों को सम्मान देने का बड़ा राष्ट्रीय अभियान है।

बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा का वैश्विक संकल्प

यूनीसेफ़ दिवस (विश्व बालकोष दिवस)

हर वर्ष 11 दिसंबर को दुनिया भर में यूनीसेफ़ दिवस (विश्व बालकोष दिवस) मनाया जाता है। यह दिन उन सभी बच्चों के अधिकारों, सुरक्षा और विकास के लिए समर्पित है, जो भविष्य की नींव हैं। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनीसेफ़ (UNICEF) विश्वभर में बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और आपदा राहत सुनिश्चित करने के लिए कार्य करती है। इस विशेष दिवस का उद्देश्य समाज को यह याद दिलाना है कि बच्चों का भविष्य केवल उनका नहीं, बल्कि पूरी मानवता का भविष्य है।

यूनीसेफ़ दिवस क्यों मनाया जाता है?
यूनीसेफ़ की स्थापना 11 दिसंबर 1946 को विश्व युद्ध के बाद बच्चों के पुनर्वास और जीवनरक्षक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। आज, इसका दायरा बढ़कर 190 से अधिक देशों में शिक्षा, स्वच्छ पानी, टीकाकरण, पोषण और बाल संरक्षण जैसे क्षेत्रों में हो चुका है।
यूनीसेफ़ दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य है—समाज में बच्चों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना।विश्व के सभी बच्चों को समान अवसर और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना।
सरकारों और संस्थाओं को नीतिगत सुधार की प्रेरणा देना।
जनसहभागिता बढ़ाकर बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना।
दुनिया में बच्चों की स्थिति: चुनौतियाँ अब भी गंभीर।

आज भी करोड़ों बच्चे भूख, बीमारी, कुपोषण, हिंसा, बाल विवाह, बाल मजदूरी और शिक्षा के अभाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
यूनीसेफ़ की रिपोर्टों के अनुसार—
लाखों बच्चे अब भी टीकाकरण से वंचित हैं।
विश्वभर में कुपोषण बच्चों की मृत्यु का बड़ा कारण है।
अनेक क्षेत्रों में लड़कियों को अभी भी स्कूल जाने का अवसर नहीं मिलता।
संघर्षग्रस्त इलाकों में बच्चे सबसे ज्यादा खतरे में रहते हैं।
इन परिस्थितियों में यूनीसेफ़ का कार्य और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत में यूनीसेफ़ की भूमिका
भारत यूनीसेफ़ की प्राथमिकता वाले देशों में से एक है। यहां संस्था—
नवजात एवं मातृ मृत्यु दर कम करने।
पोषण अभियान।

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जल एवं स्वच्छता (WASH)
डिजिटल शिक्षा
बाल संरक्षण कानूनों के क्रियान्वयन।
बाल विवाह रोकथाम।
जैसे क्षेत्रों में सक्रिय योगदान दे रही है।
यूनीसेफ़ दिवस भारत में बच्चों के लिए चल रही योजनाओं को और व्यापक रूप से समझने का अवसर प्रदान करता है।
यूनीसेफ़ दिवस 2025 की थीम (प्रेरक संदेश)
हालांकि हर वर्ष थीम अलग होती है, लेकिन उद्देश्य एक ही—
“हर बच्चे का अधिकार—उज्ज्वल भविष्य।”
यह संदेश दुनिया को याद दिलाता है कि विकास तभी संभव है जब हर बच्चा सुरक्षित, शिक्षित, स्वस्थ और सशक्त हो।
समाज की भूमिका: हर कदम मायने रखता है
बच्चों का भविष्य संवारने में केवल सरकार या संस्थाएँ ही जिम्मेदार नहीं हैं। समाज का हर व्यक्ति महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है—
बच्चों की शिक्षा को बढ़ावा देना
बाल विवाह और बाल मजदूरी की शिकायत करना।
पोषण और स्वास्थ्य कार्यक्रमों का समर्थन।
समुदाय में जागरूकता अभियान चलाना।
आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की मदद।
हर छोटा कदम एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत बन सकता है।
यूनीसेफ़ दिवस—बच्चों के उज्ज्वल कल की आशा।
यूनीसेफ़ दिवस (विश्व बालकोष दिवस) केवल एक तारीख नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य को सुरक्षित रखने का वचन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि यदि बच्चों को सही देखभाल, शिक्षा, पोषण और संरक्षण मिले, तो आने वाला कल निश्चित रूप से अधिक सुरक्षित, विकासशील और समृद्ध होगा।
मानवता का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब हर बच्चा मुस्कुराए—और यूनीसेफ़ इसी मुस्कान की रक्षा में निरंतर कार्यरत है।

भारत के उत्कृष्ट रत्न जिन्होंने इतिहास में अमिट छाप छोड़ी

11 दिसंबर की अनंत स्मृतियाँ

भारत के सांस्कृतिक, साहित्यिक, दार्शनिक, संगीत और प्रशासनिक इतिहास में 11 दिसंबर की तिथि कई महान विभूतियों के अवसान की साक्षी रही है। आइए, उन महान व्यक्तित्वों को नमन करते हुए उनके जीवन, जन्मस्थल, कार्य, योगदान और भारत निर्माण में उनकी भूमिका पर विस्तार से दृष्टिपात करें।

सुनीता जैन (निधन: 2017)
साहित्य जगत में एक सशक्त पहचान रखने वाली सुनीता जैन का जन्म दिल्ली में हुआ था। वे हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में समान दक्षता रखने वाली दुर्लभ साहित्यकार थीं। कहानी, उपन्यास, निबंध और अनुवाद के क्षेत्र में उन्होंने नए मानक स्थापित किए। उनके साहित्य में स्त्री-चेतना, सामाजिक सरोकार और मानवीय संबंधों की गहरी पड़ताल मिलती है। उन्होंने भारत की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करने में अमूल्य योगदान दिया, जिसके कारण उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। उनके शब्द आज भी पाठकों के हृदय को छूते हैं।

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पंडित रवि शंकर (निधन: 2012)
भारत रत्न से सम्मानित महान सितारवादक पंडित रवि शंकर का जन्म वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई। पाश्चात्य देशों में भारतीय संगीत की लोकप्रियता बढ़ाने में उनकी सबसे प्रमुख भूमिका रही। बीटल्स के जॉर्ज हैरिसन से लेकर विश्व के बड़े मंचों तक, रवि शंकर ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकाया। तीन ग्रैमी पुरस्कार जीतने वाले इस महान कलाकार का जीवन भारतीय कला-धारा का सर्वोच्च प्रतीक है।

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एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी (निधन: 2004)
कर्नाटक संगीत की “भारत कोकिला” कही जाने वाली सुब्बुलक्ष्मी का जन्म मदुरै, तमिलनाडु में हुआ था। अपनी मधुर वाणी, गहन साधना और भक्ति संगीत की अप्रतिम प्रस्तुति के कारण वे 20वीं सदी की सबसे महान गायिकाओं में गिनी जाती हैं। वे भारत रत्न सम्मान पाने वाली पहली गायिका थीं। संगीत, कला और संस्कृति के माध्यम से उन्होंने देश को गौरवान्वित किया। रामायण, भगवद्गीता और वैदिक स्वर-पाठ को उन्होंने जिस दिव्यता के साथ प्रस्तुत किया, वह आज भी मन को भक्ति से भर देता है।

कवि प्रदीप (निधन: 1998)
“ऐ मेरे वतन के लोगों” जैसी अमर देशभक्ति रचना के सर्जक कवि प्रदीप का जन्म मध्य प्रदेश के बड़नगर में हुआ था। उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत और राष्ट्रीय चेतना दोनों को एकसाथ उन्नत किया। दूसरा विश्व युद्ध हो या चीन युद्ध—हर दौर में उनकी कलम देश को एकजुट करने के लिए उठी। सरल शब्दों में गहरी संवेदना भरने की अद्भुत क्षमता उन्हें कालजयी बनाती है। राष्ट्र के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ का दर्जा दिलाया।

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नागेन्द्र सिंह (निधन: 1988)
भारत के प्रतिष्ठित प्रशासक और मुख्य चुनाव आयुक्त रहे नागेन्द्र सिंह का जन्म राजस्थान में हुआ था। वे कानून, प्रशासन और चुनाव व्यवस्था के विशेषज्ञ माने जाते थे। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में वे भारत की आवाज़ बनकर उभरे। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, न्यायिक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना, तथा चुनाव प्रणाली को निष्पक्ष बनाने में उनका योगदान अनुकरणीय है।

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बिनायक आचार्य (निधन: 1983)
ओडिशा के गंजाम जिले में जन्मे बिनायक आचार्य राज्य के 9वें मुख्यमंत्री थे। राजनीतिक सरलता, ईमानदारी और जनहित के मुद्दों पर उनकी प्रतिबद्धता उन्हें ओडिशा के लोकप्रिय नेताओं में शामिल करती है। उन्होंने ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस कदम उठाए। उनका नेतृत्व ओडिशा की राजनीति में एक शांत, स्थिर और विकासवादी अध्याय के रूप में याद किया जाता है।
मेहरचंद महाजन (निधन: 1967)
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में जन्मे मेहरचंद महाजन भारत के सुप्रीम कोर्ट के तीसरे मुख्य न्यायाधीश थे। 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के महत्वपूर्ण क्षणों में उनकी भूमिका निर्णायक थी। न्यायिक सेवा, प्रशासनिक क्षमता और देशहित में किए गए उनके योगदान आज भी भारतीय न्यायालय प्रणाली के लिए मार्गदर्शक हैं। देश की संवैधानिक संरचना को मजबूत बनाने में उनका विशेष महत्व रहा।

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कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य (निधन: 1949)
भारत के महान दार्शनिक कृष्णचन्द्र भट्टाचार्य का जन्म बंगाल में हुआ। वे भारतीय दर्शन—विशेषकर अद्वैत, वेदांत और भारतीय ज्ञानमीमांसा—के प्रखर अध्येता थे। उन्होंने पश्चिमी दर्शन और भारतीय अध्यात्म के बीच एक सेतु स्थापित किया। उनकी लेखनी ने आधुनिक विचारधारा को भारतीय दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का कार्य किया। वे एक ऐसे विचारक थे जिन्होंने आत्मा, चेतना और सत्य पर गहन मंथन किया।

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जगत नारायण मुल्ला (निधन: 1938)
लखनऊ, उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित वकील जगत नारायण मुल्ला अपने समय के शीर्ष न्यायविद और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने कानूनी सुधार, सामाजिक जागरूकता और जनहित के विषयों पर उल्लेखनीय कार्य किया। शिक्षा, न्यायिक सेवा और समाज-निर्माण में उनका योगदान अमूल्य था। वे अपनी ईमानदारी, मजबूत वाक्चातुर्य और न्यायप्रियता के लिए आज भी सम्मान के साथ याद किए जाते हैं।

गुणवत्ता रहित बीज वितरण पर विवाद, किसान हाईकोर्ट जाने की तैयारी में

महराजगंज में बीज सप्लाई घोटाला उजागर, किसानों की मेहनत पर पानी फिरा

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जिले में राजकीय बीज घोटाला महराजगंज का खुलासा होने के बाद किसानों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। कृषि विभाग द्वारा सप्लाई किए गए घटिया गेहूं बीज ने हजारों किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। खेतों में बीज अंकुरित न होने से किसानों को लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। किसानों ने सीधे तौर पर उप कृषि निदेशक संजीव कुमार और बीजीआई प्रभारी राजन मौर्य पर गंभीर लापरवाही और धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं।

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सूत्रों के अनुसार, हरदोई जिले के संडीला में तैयार गेहूं बीज डीबीडब्ल्यू-187 की बड़ी खेप जिले के कई ब्लॉकों—मिठौरा, परतावल और अन्य क्षेत्रों—में राजकीय बीज भंडारों के माध्यम से भेजी गई थी। सिर्फ मिठौरा ब्लॉक में ही लगभग 600 बोरी बीज की आपूर्ति की गई। लेकिन बुवाई के बाद जब खेतों में अंकुरण नहीं हुआ, तो किसानों में हड़कंप मच गया। कई जगह बीज सड़ गए, तो कई स्थानों पर बिल्कुल नहीं फूटे।

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किसानों ने आरोप लगाया है कि विभागीय अधिकारियों ने बिना गुणवत्ता जांच के ही बीज का वितरण कर दिया। मिठौरा और परतावल के दर्जनों किसानों—राजेश कुमार पटेल, त्रिलोकी, कृष्ण बिहारी पांडेय, सुदामा गुप्ता, मोहम्मद रफी, राजेंद्र प्रसाद सहित कई लोगों—ने संयुक्त रूप से शिकायत दर्ज कर मुआवजा, उच्चस्तरीय जांच, और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

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किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे किसान यूनियन के साथ मिलकर हाईकोर्ट में सामूहिक याचिका दायर करेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय भारी गुस्सा है और किसान आरोपित अधिकारियों को किसी भी कीमत पर छोड़ने के मूड में नहीं हैं।

यह मामला अब एक बड़े राजकीय बीज घोटाले महराजगंज के रूप में सामने आ रहा है, जिसे लेकर किसान न्याय के लिए एकजुट हो चुके हैं।

जानें 1 से 9 तक मूलांक वालों का आज का भाग्यफल

अंक राशिफल 11 दिसंबर 2025: जानें 1 से 9 तक मूलांक वालों का आज का भाग्यफल – पंडित सुधीर तिवारी (अंतिम बाबा)

अंक ज्योतिष के अनुसार 11 दिसंबर, गुरुवार का दिन कई मूलांक वालों के लिए नए अवसर, वित्तीय मजबूती और संबंधों में प्रगति लेकर आ रहा है। जानें सभी क्षेत्रों में आज का शुभ-अशुभ संकेत—

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मूलांक 1 (जन्म तारीख 1, 10, 19, 28)

कैरियर/व्यवसाय:
आज ऑफिस में आपका नेतृत्व चमकेगा। सहकर्मियों की छोटी गलतियों को माफ कर टीमवर्क बढ़ाएंगे।
शिक्षा:
किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में ध्यान और फोकस बढ़ेगा।
कला/संगीत:
क्रिएटिव लोगों को नई पहचान मिल सकती है।
राजनीति/प्रशासन:
सार्वजनिक मंच पर आपकी छवि मजबूत होगी।
आर्थिक स्थिति:
लग्जरी वस्तु खरीदने के लिए धन जुटाने में सफल होंगे।
स्वास्थ्य:
योग–ध्यान का लाभ मिलेगा।
शुभ रंग: सुनहरा
शुभ अंक: 1
शुभ देवता: सूर्य नारायण का अर्ध्य दें।

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मूलांक 2 (जन्म तारीख 2, 11, 20, 29)

कैरियर/व्यवसाय:
मेडिकल, इंजीनियरिंग और रिसर्च क्षेत्र वालों को विशेष पहचान।
शिक्षा:
प्रोजेक्ट एवं असाइनमेंट में सफलता।
कला/संगीत:
नई तकनीक व वाद्य सीखने का योग।
राजनीति/प्रशासन:
सीनियर आपका समर्थन करेंगे।
आर्थिक स्थिति:
यात्रा पर खर्च होगा, पर लाभ भी मिलेगा।
स्वास्थ्य:
कोई आपको फिटनेस के लिए प्रेरित करेगा।
शुभ रंग: सफेद
शुभ अंक: 2
शुभ देवता: चंद्र देव की पूजा शुभ।

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मूलांक 3 (जन्म तारीख 3, 12, 21, 30)

कैरियर/व्यवसाय:
मीटिंग और चर्चाओं में आपके सुझाव महत्वपूर्ण रहेंगे।
शिक्षा:
स्टूडेंट्स को मेंटर का मार्गदर्शन मिलेगा।
कला/संगीत:
शो, कार्यक्रम या प्रस्तुति के लिए आमंत्रण मिल सकता है।
राजनीति/प्रशासन:
यात्रा लाभकारी रहेगी।
आर्थिक स्थिति:
लाभकारी यात्रा योग।
स्वास्थ्य:
थकान दूर होगी, ऊर्जा बढ़ेगी।
शुभ रंग: पीला
शुभ अंक: 3
शुभ देवता: भगवान विष्णु।

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मूलांक 4 (जन्म तारीख 4, 13, 22, 31)

कैरियर/व्यवसाय:
नए व्यापार में सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
शिक्षा:
मैथ्स व टेक्निकल विषयों में सुधार।
कला/संगीत:
नए प्रयोग सफल होंगे।
राजनीति/प्रशासन:
जनसंपर्क बढ़ेगा।
आर्थिक स्थिति:
संपत्ति में निवेश का अच्छा योग।
स्वास्थ्य:
नियमित व्यायाम से लाभ।
शुभ रंग: नीला
शुभ अंक: 4
शुभ देवता: हनुमान जी।

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मूलांक 5 (जन्म तारीख 5, 14, 23)

कैरियर/व्यवसाय:
आप खर्च से अधिक कमाने का शानदार योग बना हुआ है।
शिक्षा:
प्रतियोगी परीक्षा वाले लाभान्वित होंगे।
कला/संगीत:
आपके द्वारा किया नया प्रोजेक्ट वायरल हो सकता है।
राजनीति/प्रशासन:
आपकी बातों को गंभीरता से सुना जाएगा।
आर्थिक स्थिति:
फिनांसियल मोर्चे पर बड़ा फायदा।
स्वास्थ्य:
मौसम से सावधानी बरतें।
शुभ रंग: हरा
शुभ अंक: 5
शुभ देवता: गणेश जी।

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मूलांक 6 (जन्म तारीख 6, 15, 24)

कैरियर/व्यवसाय:
विदेश यात्रा या विदेशी कंपनी से फायदा।
शिक्षा:
फैशन, डिजाइनिंग, कला वाले स्टूडेंट्स को लाभ।
कला/संगीत:
नई रचनात्मक सोच पर सराहना।
राजनीति/प्रशासन:
घर–परिवार का सहयोग बढ़ेगा।
आर्थिक स्थिति:
थोड़ी परेशानियां पर स्थिति संभल जाएगी।
स्वास्थ्य:
मूड बेहतर रहेगा।
शुभ रंग: गुलाबी
शुभ अंक: 6
शुभ देवता: माता लक्ष्मी।

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मूलांक 7 (जन्म तारीख 7, 16, 25)

कैरियर/व्यवसाय:
ऑफिस में काम का दबाव होगा।
शिक्षा:
गहन अध्ययन से लाभ।
कला/संगीत:
मेडिटेशन वाले कार्य करियर में मदद करेंगे।
राजनीति/प्रशासन:
जमीन–संपत्ति से लाभ।
आर्थिक स्थिति:
खर्च नियंत्रित रखें।
स्वास्थ्य:
मानसिक शांति आवश्यक।
शुभ रंग: ग्रे
शुभ अंक: 7
शुभ देवता: महादेव।

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मूलांक 8 (जन्म तारीख 8, 17, 26)

कैरियर/व्यवसाय:
नई शुरुआत बड़ा लाभ देगी।
शिक्षा:
कड़ी मेहनत का परिणाम मिलेगा।
कला/संगीत:
नई कला सीखने का उत्तम दिन।
राजनीति/प्रशासन:
अपने प्रभाव से कार्य पूरे कराएंगे।
आर्थिक स्थिति:
अच्छा आर्थिक लाभ।
स्वास्थ्य:
फिटनेस एक्टिविटी से ऊर्जा बढ़ेगी।
शुभ रंग: काला
शुभ अंक: 8
शुभ देवता: शनिदेव।

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मूलांक 9 (जन्म तारीख 9, 18, 27)

कैरियर/व्यवसाय:
आज आपका आत्मविश्वास उच्च रहेगा।
शिक्षा:
स्पोर्ट्स व फिजिकल एक्टिविटी वाले विद्यार्थियों को सफलता।
कला/संगीत:
प्रभावशाली प्रदर्शन का योग।
राजनीति/प्रशासन:
नई योजना पर काम शुरू करेंगे।
आर्थिक स्थिति:
खर्चों पर नियंत्रण जरूरी।
स्वास्थ्य:
पूरी ऊर्जा और ताजगी।
शुभ रंग: लाल
शुभ अंक: 9
शुभ देवता: हनुमान–काली माता।

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विशेष नोट – पंडित सुधीर तिवारी (अंतिम बाबा): यह अंक राशिफल सामान्य आकलन पर आधारित है। राष्ट्र की परम्परा इस ज्योतिष को प्रमाणित नहीं करता। अपनी जन्मकुंडली अवश्य किसी योग्य विशेषज्ञ से दिखाएं।

उत्तर भारत में ठंड ने पकड़ी रफ्तार, पहाड़ों में बर्फबारी; पंजाब-हरियाणा और दिल्ली में शीतलहर का कहर बढ़ा

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मौसम (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर भारत में ठंड का कहर तेजी से बढ़ता जा रहा है। दिसंबर के दूसरे सप्ताह में पहाड़ी राज्यों—जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड—में ताज़ा बर्फबारी के बाद कई क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान शून्य से नीचे पहुंच गया है। पश्चिमी विक्षोभ और तेज गति से सक्रिय जेट स्ट्रीम के कारण मैदानी इलाकों में शीतलहर का प्रकोप बढ़ रहा है, जबकि दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में घने कोहरे के चलते दृश्यता घटने लगी है।

मौसम विभाग ने उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों—गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज, अयोध्या, बस्ती, सिद्धार्थनगर सहित आसपास के क्षेत्रों—में 10 से 13 दिसंबर तक घने कोहरे का अलर्ट जारी किया है। बढ़ती नमी और गिरते तापमान के कारण सुबह दृश्यता बेहद कम रहने की संभावना है, जिससे सड़क और रेल यातायात प्रभावित हो सकता है।

कश्मीर में रिकॉर्ड ठंड: तालाबों पर जमने लगी बर्फ

कश्मीर घाटी में कड़ाके की ठंड चरम पर है। श्रीनगर में तापमान माइनस 3.7°C, पहलगाम में माइनस 4.8°C और पुलवामा में माइनस 5.1°C दर्ज हुआ। कई जगह तालाबों पर बर्फ जमनी शुरू हो गई है। मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में जम्मू–कश्मीर, लद्दाख और गिलगित-बाल्टिस्तान-मुजफ्फराबाद क्षेत्रों में बर्फबारी की संभावना जताई है।

पंजाब-हरियाणा में शीतलहर का असर तेज

उत्तर-पश्चिम भारत में लगातार पारा गिर रहा है। आदमपुर में न्यूनतम तापमान 2.8°C दर्ज किया गया, जो मैदानी क्षेत्रों में सबसे कम रहा। घना कोहरा और तेज हवाओं ने जनजीवन प्रभावित कर दिया है।

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दिल्ली-NCR में ठिठुरन बढ़ी

राजधानी दिल्ली में 12 दिसंबर तक मौसम शुष्क रहने का अनुमान है। न्यूनतम तापमान 10°C और अधिकतम 25°C के आसपास रहने की संभावना है। सुबह और रात की तेज ठंडी हवाओं के कारण ठिठुरन और बढ़ गई है।

हिमाचल और उत्तराखंड में शीतलहर जारी

हिमाचल प्रदेश के 23 शहरों में न्यूनतम तापमान 10°C से नीचे है। लाहौल-स्पीति में तापमान फिर से शून्य से नीचे गया। उत्तराखंड में देहरादून, हरिद्वार, रुद्रपुर, काशीपुर और ऋषिकेश में 90% तक नमी के कारण दृश्यता प्रभावित हो रही है।

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कोहरे का नया दौर पूर्वोत्तर में भी सक्रिय

असम और मणिपुर में 10 से 14 दिसंबर तक घने कोहरे की चेतावनी जारी की गई है, जिससे हवाई और रेल यातायात पर असर पड़ सकता है।

बालासाहेब देवरस : संगठन, समरसता और राष्ट्रभाव के जीवंत प्रणेता

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✍️ नवनीत मिश्र

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस वह व्यक्तित्व हैं जिन्होंने संघ के कार्य को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया और संगठन को राष्ट्रजीवन की धड़कनों से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनका संपूर्ण जीवन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि संगठन विचारों से जन्म लेता है, परंतु वह व्यवहार, अनुशासन, संवेदनशीलता और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति आत्मीयता से मजबूत बनता है। 11 मार्च 1915 को नागपुर में जन्मे देवरस जी बचपन से ही अध्ययन, अनुशासन और समाजसेवा के भाव से सम्पन्न थे।

डॉ. हेडगेवार और गुरुजी गोलवलकर के निकट सान्निध्य ने उनके भीतर राष्ट्रधर्म की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने उनके जीवन को दिशा और उद्देश्य दोनों प्रदान किए। सरसंघचालक का दायित्व संभालते ही उन्होंने संघ के कार्य को समाज की वास्तविक नब्ज से जोड़ा। वे भलीभाँति जानते थे कि राष्ट्र की मजबूती केवल नीतियों से नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता और समरसता से निर्मित होती है। इसी सोच के साथ उन्होंने संघ को वंचित बस्तियों, ग्रामीण अंचलों और समाज के उपेक्षित वर्गों तक पहुँचाया।

भेदभाव को वे राष्ट्र की कमजोरी और समरसता को उसकी सर्वश्रेष्ठ शक्ति मानते थे। उनके मार्गदर्शन में सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्राम-विकास के क्षेत्र में व्यापक कार्य हुए, जिन्होंने संघ की छवि को अधिक जनोन्मुख बनाया। उनके लिए समरसता कोई नारा नहीं, बल्कि आचरण का विषय थीl जीवन के हर क्षण में दिखाई देने वाला व्यवहार।

आपातकाल के दौर में उनका नेतृत्व विशेष रूप से उभरकर सामने आया। वह समय राजनीतिक अस्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का था, परंतु देवरस जी ने पूरे संगठन को संयम, दृढ़ता और सत्यनिष्ठा के साथ मार्ग दिखाया। उनकी भाषा में कठोरता नहीं, बल्कि राष्ट्रहित की स्पष्टता और लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प था। इस चुनौतीपूर्ण कालखंड में उनका धैर्यपूर्ण नेतृत्व देश के लोकतांत्रिक आंदोलन का आधार साबित हुआ।

देवरस जी की दृष्टि में भारतीय परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं थे। वे संस्कृति की जड़ों से जुड़े रहते हुए विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और आधुनिक साधनों को युग की आवश्यकता मानते थे। उनके भीतर यह गहरा विश्वास था कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक क्षमता के संगम से विश्व को नई दिशा दे सकता है।

व्यक्तित्व की दृष्टि से वे अत्यंत सरल, सहज और आत्मीय थे। उनसे मिलने वाला कोई भी व्यक्ति उनकी विनम्रता और मनुष्यता का अनुभव करता था। संगठन के छोटे से छोटे कार्यकर्ता को भी वे सम्मान और आत्मीयता से सुनते थे। यही सरलता, यही मानवीयता उनके नेतृत्व की वास्तविक शक्ति थी, जिसने असंख्य स्वयंसेवकों को प्रेरित किया।

उनका चिंतन राष्ट्र के भविष्य से गहराई से जुड़ा था। वे मानते थे कि सत्ता परिवर्तन राष्ट्रनिर्माण का आधार नहीं होता; राष्ट्र निर्माण विश्वास, मूल्य, नैतिक आचरण और अनुशासन से होता है। इसलिए उन्होंने जीवनभर चरित्र निर्माण को समाज निर्माण का मूल मंत्र बताया।

बालासाहेब देवरस का जीवन एक सतत प्रवाहित धारा की भाँति हैlजिसमें सेवा, समरसता, संगठन और राष्ट्रभाव का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। उनका योगदान केवल संघ के इतिहास तक सीमित नहीं, वह पूरे भारतीय समाज की चेतना को स्पर्श करने वाला है। उनकी सोच, उनका व्यवहार और उनका मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।

देश की आत्मा को स्वर देने वाले जनकवि- कवि प्रदीप

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✍️ पुनीत मिश्र

जब भी भारत में देशभक्ति की धुनें गूंजती हैं, जब भी किसी समारोह में राष्ट्रप्रेम की भाव-लहर उठती है और जब भी लोगों की आंखें वीरों के स्मरण में नम होती हैंl वहाँ एक नाम अनायास ही स्मरण हो जाता है; कवि प्रदीप का। उनकी कलम ने ऐसे अमर गीत रचे, जिन्होंने पूरे राष्ट्र को एक भाव, एक स्वर और एक संकल्प में पिरो दिया।
‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ की पहली ही पंक्तियाँ सुनते ही आज भी हर भारतीय का मन शहीदों के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है। यह गीत केवल संगीत नहींl बल्कि राष्ट्र के वीरों को सामूहिक नमन है। यह वह भाव-लहर है, जिसने पीढ़ियों से भारतीयों के मन में देशप्रेम की ज्योति को जीवित रखा है।

इसी तरह ‘साबरमती के संत…’ के माध्यम से कवि प्रदीप ने गांधीजी के आदर्शों को अत्यंत सरल, सहज और भावपूर्ण शैली में देश के हर व्यक्ति तक पहुँचाया। उनकी भाषा लोकभाषा की तरह सरल, लेकिन भावों में अत्यंत गहरी थीl यही कारण है कि उनका लिखा हर गीत सीधे दिल में उतर जाता है।

कवि प्रदीप की लेखनी में न दिखावा था, न जटिलता। वे जीवन, समाज और राष्ट्र की धड़कनों को सुनते थे और फिर उन्हें शब्दों के उस संगीत में ढालते थे, जिसमें संवेदना भी होती थी और चेतना भी। वे वास्तव में जनकवि थेl जो जनता की भाषा में जनता की भावना को व्यक्त करते थे।
उनके गीतों ने समय-समय पर देश को न केवल प्रेरणा दी, बल्कि कठिन परिस्थितियों में मनोबल भी बढ़ाया। युद्धकाल में उनका काव्य सैनिकों के साहस को सम्बल देता था, तो आज भी राष्ट्रीय पर्वों, विद्यालयों और बड़े सांस्कृतिक आयोजनों तक उनकी रचनाएँ पूरे गर्व और भावुकता के साथ गाई जाती हैं।

कवि प्रदीप केवल एक गीतकार नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रभाव के सबसे प्रखर और जीवंत स्वर थे। उनकी रचनाएँ समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर पीढ़ी में नई ऊर्जा के साथ फिर से जीवित हो उठती हैं। यही कारण है कि आज भी जब राष्ट्रभक्ति की बात आती है, तो कवि प्रदीप की आवाज़ मन के किसी कोने में अनायास गूंज उठती है-
“देशभक्ति कोई क्षणिक भावना नहीं,
वह हमारे जीवन का सदैव जलता दीपक है।”

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संस्कारों की गिरती दीवारें: बदलते समय में समाजिक चरित्र पर गहराता संकट

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। कभी भारतीय समाज की पहचान माने जाने वाले संस्कार आज कमजोर होते दिखाई दे रहे हैं। परिवार, शिक्षा, परंपरा और नैतिकता जैसे मूल स्तंभ, जिन्होंने पीढ़ियों को दिशा दी, अब समय की तेज रफ्तार और बदलती जीवनशैली की वजह से दरकते दिख रहे हैं। यही कारण है कि समाज अपने मूल्यों से दूर होकर नई खाई की ओर बढ़ता महसूस हो रहा है।

बदलते परिवेश में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि संस्कार क्यों बदले, बल्कि यह है कि इन्हें बचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा? भौतिकवाद की बढ़ती होड़ ने चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता और अनुशासन जैसे मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। बच्चों की पहली पाठशाला जहां पहले घर हुआ करती थी, अब उसकी जगह मोबाइल, सोशल मीडिया और उपभोक्तावादी संस्कृति ले रही है। इस बदलाव से पीढ़ियों के बीच संवाद की दूरी बढ़ रही है और मूल्य केवल पुस्तकों तक सिमटते जा रहे हैं।

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एक समय था जब शिक्षा का उद्देश्य संस्कारवान नागरिक तैयार करना था, लेकिन आज शिक्षा का केंद्र केवल नौकरी और प्रतिस्पर्धा बन गया है। सफलता की दौड़ में नैतिकता पीछे छूट रही है। यही कारण है कि समाज में असहिष्णुता, भ्रष्टाचार और हिंसा जैसी प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। चिंताजनक बात यह है कि समाज इस गिरावट को देखकर भी मौन है। हर कोई जिम्मेदारी दूसरों पर डालता है, लेकिन आत्मचिंतन से बचता है।

अब समय है कि समाज दोबारा संस्कारों को जीवन की नींव के रूप में स्थापित करे। बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने की जरूरत है। आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही समाज को गिरती दीवारों से बचा सकता है, वरना अराजकता का खतरा और गहरा हो जाएगा।

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शादी का बोझ या सामाजिक शान? दिखावे की दौड़ में परिवार क्यों हो रहे कर्ज़ के गुलाम

सोमनाथ मिश्रा की रिपोर्ट | राष्ट्र की परम्परा

भारत में विवाह को लेकर बदलते सामाजिक परिवेश ने एक नई चिंता को जन्म दिया है—शादी का बोझ। आधुनिकता और डिजिटल युग के बीच जहाँ रिश्तों को सरल होना चाहिए था, वहीं शादी का खर्च पहले से कहीं अधिक बढ़कर परिवारों के लिए भारी आर्थिक दबाव बनता जा रहा है। परंपराओं, प्रतिष्ठा और दिखावे की प्रतिस्पर्धा ने विवाह जैसे पवित्र संस्कार को एक महँगे सामाजिक आयोजन में तब्दील कर दिया है।1. बदलता जमाना, लेकिन सोच वही—दिखावे की संस्कृति में बढ़ता शादी का बोझसमाज आधुनिक जरूर हुआ है, लेकिन विवाह के नाम पर अनावश्यक खर्च करने की प्रवृत्ति कम होने के बजाय और अधिक तेज़ हो चुकी है। “दहेज” का पारंपरिक रूप अब स्टेटस, इमेज और सोशल प्रेशर के नए रूप में सामने आ रहा है।आज शादियों में खर्च सिर्फ रस्मों पर नहीं, बल्कि उन चीज़ों पर होता है जो “लोग क्या कहेंगे” मानसिकता को पोषित करती हैं।डेस्टिनेशन वेडिंग,ड्रोन व 4K शूट,लक्ज़री बैंक्वेटथीम-बेस्ड डेकोरेशन,प्री-वेडिंग फिल्मये सब मिलकर विवाह को एक भव्य शो में बदल रहे हैं। नतीजतन परिवार अपनी क्षमता से कहीं अधिक खर्च करने को मजबूर हो रहे हैं।2. दहेज का आधुनिक रूप—गिफ्ट के नाम पर बढ़ता आर्थिक दबावआज दहेज सीधे नहीं मांगा जाता, बल्कि “गिफ्ट”, “रिवाज”, “सम्मान” और “परंपरा” का नाम देकर इसे वैधता प्रदान कर दी जाती है।परिवार निम्नलिखित चीज़ों को “जरूरी” मानने लगे हैं—ब्रांडेड कार,महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स,सोने के सेट,लक्ज़री फर्नीचर,नकद राशियह आधुनिक दहेज कई परिवारों को कर्ज़ के जाल में धकेल रहा है। खासकर मध्यम और निम्न आय वर्ग पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।3. सोशल मीडिया का प्रभाव—शादी नहीं, ‘इवेंट’ बन चुकी हैआज विवाह दो परिवारों का मिलन कम और सोशल मीडिया पर इमेज बनाने का प्रोजेक्ट ज्यादा हो गया है।इंस्टाग्राम रील, वायरल वीडियो, और थीम फोटोशूट की होड़ ने विवाह की लागत को कई गुना बढ़ा दिया है।इसका परिणाम—जमा पूंजी खत्म,परिवारों में तनाव,जमीन/गहने बेचने की मजबूरी,शादी के बाद भी बरसों तक EMI का बोझयही कारण है कि कई परिवार बेटियों के विवाह को “आर्थिक आपदा” मानने लगे हैं।4. समाधान: सामाजिक सोच बदले बिना शादी का बोझ नहीं हटेगायदि समाज वास्तविक बदलाव चाहता है, तो जरूरी है कि—दिखावे और फिजूल खर्च को खुलकर ‘ना’ कहा जाए।विवाह को सरल, पारंपरिक और सादगीपूर्ण बनाया जाए।दहेज मांगने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए।बेटियों को अधिकार और सम्मान दिया जाए, बोझ नहीं माना जाए।जब तक परिवार “लोग क्या कहेंगे” से ऊपर उठकर “हम सही क्या कर रहे हैं” पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक विवाह का बोझ बढ़ता ही रहेगा।

रूढ़िवादिता की जकड़न में दम तोड़ते संस्कार

✍️ कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। संस्कार समाज की आत्मा होते हैं। यही वे मूल्य हैं जो पीढ़ियों को जोड़ते, आचरण को दिशा देते और मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं। लेकिन आज इन्हीं संस्कारों का सबसे बड़ा दुश्मन बनकर खड़ी है—रूढ़िवादिता। विडंबना यह है कि रूढ़िवादिता को अक्सर संस्कारों की ढाल पहना कर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि सच्चाई ठीक इसके उलटा है। रूढ़िवादिता वह जड़ता है जो सोच को बांध देती है। सवाल करना, तर्क करना और समय के साथ बदलाव स्वीकार करना जब परंपरा के खिलाफ मान लिया जाता है, तब संस्कार धीरे-धीरे घुटने लगते हैं।

समाज में कई कुप्रथाएं आज भी केवल इसलिए जीवित हैं, क्योंकि उन्हें संस्कार का नाम दे दिया गया है—चाहे वह स्त्री की आजादी पर पाबंदी हो, जातिगत भेदभाव हो या पीढ़ियों से चले आ रहे अन्याय पूर्ण नियम।
संस्कार सिखाते हैं सम्मान, करुणा, न्याय और समानता। वे मनुष्य को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाते हैं इसके विपरीत रूढ़िवादिता डर पैदा करती है—बदलाव का डर, सवालों का डर और भविष्य का डर। जब डर संस्कारों की जगह ले लेता है, तब समाज नैतिक रूप से कमजोर होने लगता है।

आज का युवा इस द्वंद्व को सबसे अधिक महसूस कर रहा है। एक ओर उससे आधुनिक सोच, शिक्षा और प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा की जाती है, तो दूसरी ओर रूढ़िवादी बेड़ियों में उसे जकड़कर रखने की कोशिश होती है। परिणामस्वरूप युवा या तो विद्रोही हो जाता है या भीतर ही भीतर टूट जाता है। दोनों स्थितियां समाज के लिए घातक हैं।

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सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब रूढ़िवादिता के खिलाफ बोलने वालों को संस्कारहीन करार दे दिया जाता है। इससे संवाद की गुंजाइश समाप्त हो जाती है,और समाज सुधार की प्रक्रिया रुक जाती है। इतिहास गवाह है कि हर प्रगति संघर्ष के बाद ही संभव हुई है, और हर सुधार को पहले परंपरा- विरोधी कहा गया है।

जरूरत इस बात की है कि संस्कार और रूढ़िवादिता के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। संस्कार जीवित और समय-सापेक्ष होते हैं, जबकि रूढ़िवादिता जड़ और परिवर्तन -विरोधी। अगर समाज को आगे बढ़ना है तो संस्कारों को रूढ़ियों की जकड़न से मुक्त करना होगा।संस्कार तब तक जीवित रहेंगे, जब तक वे मानव मूल्यों की रक्षा करते रहेंगे। वरना रूढ़िवादिता की गिरफ्त में फंसे संस्कार दम तोड़ते रहेंगे—और उनके साथ समाज की संवेदनशीलता भी।

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