Saturday, June 27, 2026
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थैलेसीमिया पीड़ितों ने जताया सरकार का आभार

रांची (राष्ट्र की परम्परा)
झारखंड राज्यस्तरीय थैलेसीमिया/सिकल सेल पीड़ितों एवं परिजनों के संग झारखंड सरकार का आभार प्रकट बैठक आयोजित हुआ।
झारखंड थैलेसीमिया पीड़ित एसोसिएशन एवं “लहू बोलेगा” रक्तदान संगठन रांची के नेतृत्व में रिसालदार बाबा बैंकेट हॉल,डोरंडा, रांची में झारखंड भर के थैलेसीमिया/सिकल सेल/अप्लास्टिक एनीमिया पीड़ितों/परिजनों की झारखंड राज्यस्तरीय बैठक हुई जिसमें झारखंड सरकार का आभार प्रकट कार्यक्रम हुआ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता “लहू बोलेगा” रक्तदान संगठन रांची,झारखंड थैलेसीमिया पीड़ित एसोसिएशन एवं झारखंड राज्य स्वैच्छिक संगठन कॉर्डिनेशन कमेटी के संस्थापक एवं राज्य कॉर्डिनेटर रक्तवीर नदीम खान ने किया।

झारखंड के इतिहास में पहली बार रक्त विकार रोग थैलेसीमिया/सिकल सेल एनीमिया एवं अप्लास्टिक एनीमिया पीड़ितों पर झारखंड विधानसभा के संरक्षण,झारखंड सरकार के नेतृत्व में झारखंड विधानसभा के पटल पर कांग्रेस विधायक दल के नेता विधायक प्रदीप यादव ने यह मानवीय एवं अति संवेदनशील मामला बेहद मजबूती से उठाया जिससे झारखंड के पीड़ितों/परिजनों के लिए झारखंड सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने सराहनीय पहल करते हुए एक महीनें के अंदर में थैलेसीमिया/सिकल सेल/अप्लास्टिक एनीमिया एवं रक्तदान पर सभी स्तर के हर कार्यों को अंज़ाम दिया जाएगा।
जिसके लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफ़ान अंसारी, झारखंड कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव, झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो, झारखंड विधानसभा के सभी सदस्य, झारखंड सरकार एवं सत्ताधारी पार्टी का आभार प्रकट करते हुए सभी ने एक दूसरे के ख़ुशी में मिठाई खिलाई।

झारखंड थैलेसीमिया/सिकल सेल/अप्लास्टिक एनीमिया पर झारखंड सरकार एवं झारखंड विधानसभा के माननीय, झारखंड के सांसद एवं अन्य को पूर्व के दिए थैलेसीमिया पर दो मेमोरेंडम के 14 एवं 08 सूत्री मांगपत्र एवं झारखंड रक्तदान पर 19 सूत्री मांगपत्र को आभार कार्यक्रम में पढ़ा गया।

आभार प्रकट कार्यक्रम में वहीं दो थैलेसीमिया पीड़ित का जन्मदिन मनाया गया जिसमें 19 वर्षीय थैलेसीमिया पीड़ित स्नातक छात्रा सोनम कुमारी (रातू,रांची) एवं 05 वर्षीय थैलेसीमिया छात्र असद अफ़सर (इरबा,रांची) का केक काटकर सभी ने मिठाई खिलाई।

झारखंड थैलेसीमिया/सिकल सेल पीड़ितों/परिजनों को संगठित कर शुरुआत करने वाले स्वर्गीय हुई थैलेसीमिया पीड़ित के पिता रांची के हॉकर बजरंगी भुंइया (चुटिया,रांची), 55 वर्षीय सिकल सेल पीड़ित गार्ड मो शमशुद्दीन (कडरू,रांची) एवं थैलेसीमिया पीड़ित की गृहणी माँ देवकी देवी (रातू,रांची) को शॉल के उठाकर सम्मानित किया गया।

पूर्वोत्तर रेलवे की बड़ी उपलब्धि: वाराणसी-औंड़िहार खंड पर आरओबी से ट्रैफिक को राहत

गोरखपुर(राष्ट्र क़ी परम्परा)पूर्वोत्तर रेलवे पर संरक्षित रेल परिचालन एवं सड़क यातायात को सुगम बनाने के लिये रेल समपारों को सुनियोजित तरीके से समाप्त किया जा रहा है। इसके लिए योजनाबद्ध रूप में समपारों के स्थान पर सड़क उपागमी पुल एवं सड़क अधोगामी पुल का निर्माण किया जा रहा है। जिससे संरक्षित रेल परिचालन के साथ-साथ सड़क यातायात भी निर्बाध एवं बेहतर हो रहा है। वाराणसी-औंड़िहार खण्ड पर वाराणसी सिटी-सारनाथ रेलवे स्टेशनों के बीच समपार संख्या 23-ए पर राज्य एवं केन्द्र सरकार की सहभागिता से सड़क उपरिगामी पुल का निर्माण पूरा हो गया है। इस सड़क उपरिगामी पुल को सड़क यातायात के लिए खोल दिया गया है, जिससे वाराणसी के नगर वासियों को बहुत सहूलियत हो रही है। समपार संख्या 23-ए का उपयोग वाराणसी से गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, सोनौली, कुशीनगर आदि नगरों को आने-जाने हेतु सड़क वाहनों द्वारा उपयोग किया जाता है। छपरा, बलिया, गाजीपुर, मऊ, देवरिया, गोरखपुर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, लखनऊ, प्रयागराज, मुंबई आदि नगरों के लिए चलने वाली ट्रेनें इस समपार फाटक से गुजरती है।इस परियोजना के अंतर्गत पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा इस समपार पर 45.40 मीटर का धनुष आकार का पुल बनाया गया है। इसके साथ ही समपार फाटक संख्या 23-ए पर छोटे वाहनों के आवागमन हेतु 2.50 मीटर ऊंचाई का अंडर पास का निर्माण भी कराया गया है,जिससे क्षेत्रीय जनता को इसका सीधा लाभ सुविधा के रूप में मिल रहा है।ज्ञातव्य हो कि माननीय प्रधानमंत्री जी के कर कमलों द्वारा इस रोड ओवरब्रिज का शिलान्यास किया गया था। वाराणसी जिले में पूर्वोत्तर रेलवे के समपार सं० 23-ए वाराणसी सिटी सारनाथ स्टेशनों के मध्य कि.मी. 200/9-201/0 पर स्थित है। इस खण्ड पर अत्यधिक रेल परिचालन होने से उक्त समपार बहुधा सड़क यातायात बन्द रहता था, जिससे समपार पर अत्यधिक जाम की स्थिति बनी रहती थी। इस समपार पर रेल उपरिगामी पुल एवं अधोगामी पुल बन जाने से जहां सड़क यातायात निर्बाध और सुविधाजनक तरीके से हो रहा है, वहीं ट्रेनों का संरक्षित परिचालन, रेल एवं सड़क यात्रियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो गई है ।

मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए स्वास्थ्य शिविर का आयोजन

बरहज(राष्ट्र की परम्परा) I एसएनबी।गरीब लोगों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वास्थ्य शिविर का आयोजन ग्रामीण क्षेत्र में किया गया है। शिविर में करीब 650 लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण कर मौसमी बीमारी से बचाव की जानकारी दी गई । सभी मरीजों को निःशुल्क दवा दिया गया । उक्त बाते रविवार को तहसील क्षेत्र के ग्राम परसिया चौबे में आयोजित निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर के आयोजक श्याम सुपर मल्टी हास्पीटल सोनूघाट के चिकित्सक एमडी ड्रा सतीश यादव ने कही । उन्होने कहाकि स्वास्थ्य कैंप लगाने का मकसद है कि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को अच्छे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जा सके । स्वास्थ्य शिविर में बुखार, खांसी, हर्ट की समस्या, घुटनों में दर्द सहित अन्य बीमारियों की जाँच कर उचित परामर्श दी गई । शिविर में ड़ा एस एस सिद्दकी, महिला चिकित्सक ड्रा बेवी यादव, ड्रा आदर्श कुमार, ड्रा नीरज शर्मा तथा ड्रा ओमनाथ विश्वकर्मा ने मरीजों का स्वास्थय परीक्षण किया। शूगर, बीपी सहित अन्य बीमारियों की जांच की गई । बड़ी संख्या में महिला व पुरुष मरीज शिविर में उपस्थित होकर लाभ लिए । ड़ा सतीश यादव ने बताया की सर्दी के मौसम में बीपी के मरीजों को सावधानी बरतने की जरूरत है। शिविर के व्यवस्थापक राधेश्याम यादव ने सभी के प्रति आभार प्रगट किया। इस मौके पर ग्राम प्रधान राजेंद्र यादव, धर्मदेव, सीताराम, मुनीब, उपेंद्रर आदि मौजूद रहे।

शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने के मामले: बदलते सामाजिक मूल्यों और रिश्तों की नई परिभाषा

भारतीय समाज में विवाह को लंबे समय तक एक पवित्र, अटूट और सामाजिक दायित्व से जुड़ी संस्था माना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने का मामला लगातार सुर्खियों में है। यह घटनाएँ केवल सनसनीखेज खबरें नहीं हैं, बल्कि समाज में गहराते उस बदलाव की ओर इशारा करती हैं, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, भावनात्मक संतुष्टि और प्रेम को पारंपरिक सामाजिक बंधनों से ऊपर रखा जा रहा है।

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यह प्रवृत्ति किसी एक राज्य, वर्ग या संस्कृति तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रही ऐसी घटनाएँ यह बताती हैं कि आधुनिक समाज में रिश्तों की परिभाषा तेजी से बदल रही है।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम पारंपरिक विवाह व्यवस्था
आज का युवा विवाह को केवल सामाजिक समझौते के रूप में नहीं देखना चाहता। शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने का मामला इस बात को दर्शाता है कि लोग अब अपनी खुशी और मानसिक संतुलन को प्राथमिकता देने लगे हैं। कई मामलों में विवाह पारिवारिक दबाव, सामाजिक मर्यादा या जल्दबाज़ी में तय कर दिया जाता है, जहाँ भावनात्मक सामंजस्य को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पाता।
जब शादी के बाद यह महसूस होता है कि रिश्ता अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा, तब कुछ लोग अपने पुराने प्रेम संबंध या भावनात्मक सहारे की ओर लौट जाते हैं। यह फैसला भले ही विवादास्पद हो, लेकिन इसके पीछे आत्मनिर्णय की भावना साफ दिखाई देती है।

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प्रेम और भावनात्मक जुड़ाव की बढ़ती अहमियत
आधुनिक समाज में रिश्तों की नींव अब सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव बनती जा रही है। शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने का मामला इस बात का संकेत है कि केवल कानूनी या सामाजिक बंधन किसी रिश्ते को निभाने के लिए पर्याप्त नहीं रह गए हैं।
लोग ऐसे संबंधों की तलाश में हैं जहाँ उन्हें समझा जाए, सम्मान मिले और भावनात्मक सुरक्षा महसूस हो। जब विवाह में यह तत्व कमजोर पड़ता है, तब प्रेम संबंध अधिक मजबूत विकल्प के रूप में उभरने लगते हैं।

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समाज की बदलती सोच और स्वीकार्यता
पहले ऐसे मामलों में सामाजिक बहिष्कार, हिंसा या लंबी कानूनी लड़ाइयाँ आम थीं। लेकिन अब कई घटनाओं में यह भी देखा जा रहा है कि पति या परिवार कानूनी टकराव से बचते हुए आपसी समझ का रास्ता चुन रहे हैं। शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने का मामला अब सिर्फ अपराध या अनैतिकता के चश्मे से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत फैसले के रूप में भी देखा जाने लगा है।
हालाँकि, यह बदलाव समान रूप से हर जगह स्वीकार नहीं किया गया है। ग्रामीण और परंपरागत समाज में आज भी ऐसे फैसलों को सामाजिक मूल्यों के लिए खतरा माना जाता है, जिससे तनाव और टकराव की स्थिति बनती है।

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संस्कृति और सामाजिक ढांचे पर प्रभाव

  1. रिश्तों की नई परिभाषा
    यह घटनाएँ विवाह, प्रेम और परिवार की पारंपरिक अवधारणाओं को चुनौती दे रही हैं। अब रिश्तों को स्थायी बनाने के लिए भावनात्मक संतुष्टि को अनिवार्य माना जाने लगा है।
  2. व्यक्तिगत खुशी को प्राथमिकता
    शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने का मामला यह दिखाता है कि लोग सामाजिक अपेक्षाओं से अधिक अपनी मानसिक शांति और व्यक्तिगत खुशी को महत्व देने लगे हैं।

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  1. कानूनी और सामाजिक चुनौतियाँ
    तलाक, गुज़ारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी और पुनर्विवाह जैसे मुद्दे समाज और कानून दोनों के लिए नई जटिलताएँ खड़ी कर रहे हैं।
    क्या यह सामाजिक विघटन है या बदलाव की स्वाभाविक प्रक्रिया?
    इस सवाल पर समाज बँटा हुआ है। कुछ लोग इसे पारंपरिक मूल्यों के पतन के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे सामाजिक विकास और व्यक्तिगत अधिकारों की स्वाभाविक प्रक्रिया मानते हैं। सच यह है कि शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने का मामला समाज में चल रहे उस बड़े बदलाव का हिस्सा है, जहाँ व्यक्ति केंद्र में आ रहा है और संस्थाएँ पुनर्परिभाषित हो रही हैं।

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शादी के बाद प्रेमी के साथ भागने की घटनाएँ केवल व्यक्तिगत फैसले नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना में हो रहे बदलाव का प्रतिबिंब हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि आधुनिक समाज प्रेम, स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय को नई जगह दे रहा है। हालांकि इससे विवाद और सामाजिक तनाव भी पैदा हो रहे हैं, लेकिन यह तय है कि रिश्तों और विवाह की पारंपरिक समझ अब पहले जैसी नहीं रही।

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कहर, स्मॉग से घुटती सांसें; AQI गंभीर स्तर पर

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण ने एक बार फिर लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बेहद धीमी हवा की रफ्तार और प्रतिकूल मौसम के कारण राजधानी और आसपास के इलाकों में स्मॉग की मोटी परत छाई हुई है। हालात इतने खराब हैं कि कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गया है, जिससे आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और गले में खराश जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।

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सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के प्रमुख इलाकों में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर दर्ज किया गया। सरदार पटेल मार्ग पर AQI 483, पंडित पंत मार्ग पर 417, बाराखंबा रोड पर 474, अक्षरधाम क्षेत्र में 493 और बारापुला फ्लाईओवर पर 433 रिकॉर्ड किया गया। राजधानी की सुबह घने स्मॉग और धुंध के साथ शुरू हुई, जबकि रात के समय भी विजिबिलिटी बेहद कम रही।

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एनसीआर प्रदूषण की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क, प्रमुख सड़कों और मेट्रो स्टेशनों के आसपास दृश्यता काफी कम दर्ज की गई। यमुना एक्सप्रेसवे और दिल्ली-फरीदाबाद मार्ग पर वाहन रेंगते नजर आए। रविवार को दिल्ली का औसत AQI 461 रहा, जबकि नोएडा में 466, गाजियाबाद में 459, ग्रेटर नोएडा में 435 और गुरुग्राम में 291 दर्ज किया गया। फरीदाबाद की हवा तुलनात्मक रूप से बेहतर रही, जहां AQI 218 रहा।

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कोहरे और कम विजिबिलिटी को देखते हुए इंडिगो एयरलाइंस ने यात्रियों के लिए एडवाइजरी जारी की है। विशेषज्ञों के अनुसार, हवा की गति 10 किमी प्रति घंटे से कम होने और पश्चिमी विक्षोभ के असर से प्रदूषण के कण वातावरण में फंसे हुए हैं। सीपीसीबी का अनुमान है कि अगले दो से तीन दिनों तक दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण के हालात बेहद खराब बने रह सकते हैं और फिलहाल राहत की उम्मीद कम है।

बच्चों और युवाओं में पर्यावरणीय संस्कार क्यों जरूरी

आस्था की रोशनी या ज़हरीला धुआँ?—त्योहारों में बढ़ता प्रदूषण और हमारी सामाजिक जिम्मेदारी

भारत को त्योहारों की भूमि कहा जाता है। यहाँ हर पर्व आस्था, परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक होता है। दीपावली की रोशनी, होली के रंग, दुर्गा पूजा की भव्यता और गणेश उत्सव का उल्लास—ये सभी हमारी पहचान हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में त्योहारों में प्रदूषण एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनकर उभरा है। पटाखों से उठता ज़हरीला धुआँ, नदियों में विसर्जन से बढ़ता जल प्रदूषण और तेज़ ध्वनि विस्तारक यंत्रों से होने वाला शोर अब उत्सवों की खुशी पर भारी पड़ने लगा है। सवाल यह नहीं है कि त्योहार मनाए जाएँ या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उन्हें जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ मना सकते हैं?

त्योहारों में प्रदूषण: बढ़ता वायु संकट

त्योहारों के दौरान खासकर दीपावली पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई शहरों में खतरनाक या गंभीर श्रेणी में पहुँच जाता है। पटाखों से निकलने वाला धुआँ सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों से हवा को जहरीला बना देता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ घंटों की आतिशबाजी का असर कई दिनों तक बना रहता है। बच्चों में अस्थमा, बुजुर्गों में सांस की तकलीफ और हृदय रोगियों में जटिलताएँ बढ़ जाती हैं। साफ शब्दों में कहें तो त्योहारों में प्रदूषण केवल पर्यावरण का ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी संकट है।

धार्मिक परंपराएँ और जल प्रदूषण

भारत में नदियाँ केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि आस्था की धुरी हैं। मूर्ति विसर्जन सदियों पुरानी परंपरा है, लेकिन बदलते समय के साथ इसमें प्रयुक्त सामग्री पर्यावरण के लिए खतरा बन गई है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियाँ, रासायनिक रंग, थर्माकोल और प्लास्टिक सजावट जलाशयों में घुलकर जलीय जीवन को नष्ट कर देती हैं।
जल प्रदूषण का सीधा असर पीने के पानी, कृषि और जैव विविधता पर पड़ता है। कई नदियाँ, जिन्हें हम पूजा के योग्य मानते हैं, आज खुद संरक्षण की मांग कर रही हैं। यह विरोधाभास हमारे सामाजिक विवेक पर सवाल खड़ा करता है।

ध्वनि प्रदूषण: अनदेखी लेकिन खतरनाक समस्या

त्योहारों में तेज़ डीजे, लाउडस्पीकर और पटाखों की आवाज़ ध्वनि प्रदूषण को चरम पर पहुँचा देती है। इसका असर सिर्फ सुनने की क्षमता पर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को परेशानी होती है, और छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन व भय पैदा होता है। नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन अक्सर औपचारिक बनकर रह जाता है।

आस्था और पर्यावरण: टकराव नहीं, संतुलन जरूरी

पर्यावरण विशेषज्ञ और सामाजिक चिंतक मानते हैं कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इको-फ्रेंडली मूर्तियाँ, मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का उपयोग, सीमित और सामूहिक आतिशबाजी, ग्रीन पटाखे और नियंत्रित ध्वनि स्तर—ये सभी व्यवहारिक विकल्प हैं।
कई शहरों में “ग्रीन फेस्टिवल” की अवधारणा ने यह साबित किया है कि त्योहारों में प्रदूषण को कम करते हुए भी उल्लास और परंपरा को जीवित रखा जा सकता है।

प्रशासन, समाज और नागरिकों की संयुक्त जिम्मेदारी

सरकार नियम बनाती है, लेकिन उनका प्रभाव तभी दिखता है जब समाज उन्हें अपनाए। स्थानीय प्रशासन, धार्मिक समितियाँ, सामाजिक संगठन और मीडिया—सभी की भूमिका अहम है।
स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा, सामुदायिक जागरूकता अभियान और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक उत्सव मॉडल अपनाकर बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। नागरिकों का छोटा-सा निर्णय—जैसे कम पटाखे जलाना या इको-फ्रेंडली विकल्प चुनना—समूह में मिलकर बड़ा असर पैदा करता है।

त्योहार खुशियाँ बाँटने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए होते हैं, न कि जीवन और पर्यावरण को संकट में डालने के लिए। सच्ची आस्था वही है जो प्रकृति, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करे। अगर आज हमने त्योहारों में प्रदूषण को लेकर जिम्मेदारी नहीं दिखाई, तो भविष्य में हमारे उत्सव केवल यादों तक सीमित रह जाएँगे। अब समय आ गया है कि हम रोशनी को ज़हरीले ध

बड़े सियासी खेल में भाजपा का मास्टरस्ट्रोक, विपक्षी दलों की जमीन खिसकी

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। देश की राजनीति में इन दिनों बड़ा सियासी खेल खुलकर सामने आ रहा है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी ने अपने सधे हुए कदमों से विपक्षी दलों को बैकफुट पर ला खड़ा किया है। रणनीति, संगठन और सत्ता-संतुलन के त्रिकोण से भाजपा ने ऐसा दबाव बनाया है कि कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल अस्तित्व की लड़ाई लड़ते नजर आ रहे हैं।
एक के बाद एक राज्यों में भाजपा का राजनीतिक विस्तार और विपक्षी खेमे में बढ़ती टूट-फूट इस सियासी खेल की सबसे बड़ी मिसाल बन चुकी है। मजबूत संगठनात्मक ढांचे, बूथ स्तर तक पकड़ और केंद्रीय नेतृत्व की स्पष्ट रणनीति ने भाजपा की स्थिति को और मजबूत किया है। इसके उलट विपक्षी दल आपसी खींचतान, नेतृत्व संकट और दिशा-विहीन राजनीति से जूझते दिखाई दे रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कई क्षेत्रीय दलों के कद्दावर नेता या तो भाजपा की ओर रुख कर रहे हैं या फिर गठबंधन की मजबूरियों में अपनी स्वतंत्र पहचान खोते जा रहे हैं। इससे न सिर्फ विपक्ष कमजोर हुआ है, बल्कि मतदाताओं के बीच उसका भरोसा भी डगमगाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह मास्टरस्ट्रोक केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक सत्ता और वैचारिक वर्चस्व की रणनीति का हिस्सा है। विपक्ष जहां सत्ता और संसाधनों के दुरुपयोग का आरोप लगा रहा है, वहीं भाजपा इसे जनसमर्थन, विकास और मजबूत नेतृत्व की स्वाभाविक परिणति बता रही है।हालात यह हैं कि कई राज्यों में विपक्ष बिखरा हुआ है और भाजपा या तो अकेले दम पर या फिर कमजोर सहयोगियों के साथ सत्ता के केंद्र में बनी हुई है। आने वाले चुनावों में यह सियासी खेल किस मोड़ पर पहुंचेगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि भाजपा की चालों ने राजनीतिक मैदान में अन्य दलों की जमीन खिसका दी है और उन्हें रक्षात्मक भूमिका में ला खड़ा किया है।

बेहतर जीवन की असली चाबी: जेब में नोट नहीं, साथ में सच्चा हमसफ़र

✍️ डॉ. सतीश पाण्डेय | महाराजगंज

Life Philosophy Article: आधुनिक जीवन की तेज़ रफ्तार में सुख और सफलता की परिभाषा तेजी से बदलती जा रही है। आज खुशहाल जीवन को अक्सर मोटी तनख्वाह, बड़ी गाड़ी और आलीशान मकान से जोड़कर देखा जाता है। समाज में यह धारणा गहराती जा रही है कि जितनी बड़ी जेब होगी, जीवन उतना ही बेहतर होगा। लेकिन अनुभव और समय की कसौटी पर यह सोच अधूरी साबित होती नजर आती है।

सच यह है कि बेहतर जीवन की असली चाबी जेब में रखे नोट नहीं, बल्कि वह सच्चा हमसफ़र होता है, जो हर परिस्थिति में साथ निभाए। धन से सुविधाएं मिलती हैं—आरामदायक घर, बेहतर इलाज और आधुनिक साधन—लेकिन ये सुविधाएं जीवन को संपूर्ण नहीं बना पातीं।

जब पैसा भी साथ नहीं देता

जब मन थक जाता है, आत्मविश्वास डगमगाता है या उपलब्धियों के बीच भी खालीपन महसूस होता है, तब पैसा कोई सहारा नहीं बन पाता। ऐसे समय में सच्चा हमसफ़र ही जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनता है।
यहां हमसफ़र का अर्थ केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि वे सभी रिश्ते हैं जिनमें विश्वास, समझ और अपनापन हो।

रिश्ते जो जीवन को अर्थ देते हैं

माता-पिता का स्नेह, मित्र की निस्वार्थ सलाह, भाई-बहन का संबल और जीवनसाथी का भरोसा—यही रिश्ते जीवन को अर्थ देते हैं। इनके साथ से छोटी-छोटी खुशियां भी बड़े उत्सव में बदल जाती हैं।

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बढ़ता अकेलापन, गहराती सच्चाई

आज समाज में बढ़ता अकेलापन इस बात का प्रमाण है कि धन की प्रचुरता के बावजूद लोग भीतर से खाली होते जा रहे हैं। ऊंची इमारतों में रहने वाले कई लोग भावनात्मक रूप से बेघर हैं। यह स्थिति याद दिलाती है कि रिश्ते कोई विलासिता नहीं, बल्कि जीवन की मूल आवश्यकता हैं।

संतुलन ही जीवन की सफलता

निस्संदेह धन कमाना जरूरी है, लेकिन जब पैसा रिश्तों से ऊपर आ जाता है, तो परिवार टूटते हैं और जीवन बोझ बन जाता है। इसके विपरीत, जहां रिश्तों को प्राथमिकता दी जाती है, वहां सीमित साधनों में भी संतोष और आनंद मिलता है।

अंततः जीवन की सफलता का असली पैमाना बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि कठिन समय में भी चेहरे पर बनी मुस्कान है—और यह मुस्कान सच्चे हमसफ़र से ही मिलती है।

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राष्ट्र निर्माण में आध्यात्मिक शक्ति

कैलाश सिंह

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। किसी भी राष्ट्र की मजबूती केवल उसकी आर्थिक प्रगति, सैन्य क्षमता या भौतिक संसाधनों से नहीं आंकी जाती, बल्कि उसकी आत्मा—उसके नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता से तय होती है। भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश के लिए आध्यात्मिक शक्ति कोई अमूर्त अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला रही है। जब-जब भारत ने आत्मिक चेतना को अपनाया, तब-तब उसने विश्व को दिशा दी।
आध्यात्मिक शक्ति व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। यह आत्मसंयम, विवेक और कर्तव्य बोध का विकास करती है। एक ऐसा नागरिक जो नैतिक रूप से जागरूक हो, वही समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार बनता है। भ्रष्टाचार, हिंसा, असहिष्णुता और स्वार्थ जैसी समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं नैतिक पतन में छिपी है। आध्यात्मिक चेतना इन विकृतियों पर अंकुश लगाने का कार्य करती है।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन इसका सशक्त उदाहरण है। अहिंसा, सत्य और त्याग जैसे आध्यात्मिक मूल्यों ने जन-आंदोलन को शक्ति दी,और साधारण नागरिकों को असाधारण साहस से भर दिया। यह स्पष्ट करता है कि आध्यात्मिक शक्ति केवल ध्यान और साधना तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक ऊर्जा है।
आज के आधुनिक और तकनीकी युग में भी आध्यात्मिक शक्ति की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। तेज विकास के साथ बढ़ता तनाव, सामाजिक विघटन और मूल्यहीन प्रतिस्पर्धा यह संकेत देते हैं कि भौतिक उन्नति अकेले पर्याप्त नहीं। जब तक विकास के साथ विवेक नहीं जुड़ता, तब तक प्रगति अधूरी रहती है। आध्यात्मिकता इसी विवेक का स्रोत है।
राष्ट्र निर्माण के लिए केवल योजनाएं और कानून पर्याप्त नहीं, उन्हें लागू करने वाले चरित्रवान नागरिक भी चाहिए। आध्यात्मिक शिक्षा व्यक्ति को न केवल अपने अधिकारों का बोध कराती है, बल्कि कर्तव्यों की याद भी दिलाती है। यही संतुलन किसी भी लोकतंत्र को स्थायी बनाता है।सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, सेवा भाव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा—ये सभी आध्यात्मिक चेतना से ही पुष्ट होते हैं। जब नागरिक मैं से ऊपर उठकर हम की भावना अपनाते हैं, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।
अतः समय की मांग है कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में आध्यात्मिक शक्ति को हाशिये पर न रखा जाए, बल्कि उसे मूल में स्थान दिया जाए। शिक्षा, नीति और सामाजिक जीवन में नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश ही एक सशक्त, संतुलित और समृद्ध राष्ट्र की नींव रख सकता है।
अंततः मजबूत इमारतें और तेज अर्थव्यवस्था राष्ट्र की पहचान हो सकती हैं,लेकिन उसकी आत्मा आध्यात्मिक शक्ति से ही जीवित रहती है।

वेब सीरीज ‘फर्जी’ का सहायक कलाकार हेरोइन तस्करी में गिरफ्तार, 12 महीने बाद ANTF को मिली सफलता

आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। वेब सीरीज ‘फर्जी’ और फिल्म कुलदीप पटवाल में सहायक भूमिका निभा चुका कलाकार मान सिंह हेरोइन तस्करी के एक बड़े नेटवर्क में शामिल पाया गया है। एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) और आगरा पुलिस ने 12 महीने की तलाश के बाद आरोपी को मुंबई से गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमांड पर आगरा लाया, जहां कोर्ट में पेश करने के बाद उसे जेल भेज दिया गया।

1 किलो से ज्यादा हेरोइन के साथ पकड़ा गया था गिरोह

ANTF के सीओ उमेश पंवार के अनुसार, 4 अक्टूबर 2024 को थाना न्यू आगरा पुलिस और ANTF की संयुक्त टीम ने बाइक से हेरोइन की तस्करी कर रहे दो आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
गिरफ्तार तस्करों की पहचान शैलेंद्र कुमार उर्फ शैलू पंडित (अलीगढ़), हरिओम धाकरे (डौकी, आगरा) के रूप में हुई थी। इनके पास से 1.070 किलोग्राम हेरोइन बरामद की गई थी।

पूछताछ में सामने आया मान सिंह का नाम

पूछताछ के दौरान शैलेंद्र राणा और तौहीद समेत अन्य आरोपियों के नाम सामने आए, जिन्हें जनवरी 2025 में जेल भेज दिया गया। इसी कड़ी में मान सिंह का नाम उजागर हुआ, जो दिल्ली की जेजे कॉलोनी, इंद्रपुरी का निवासी है।
पुलिस जब उसके पते पर पहुंची तो वह फरार मिला। सर्विलांस के जरिए उसकी लोकेशन ट्रेस की गई और पता चला कि वह मुंबई में रह रहा है।

मुंबई से गिरफ्तारी, ट्रांजिट रिमांड पर आगरा लाया गया

ANTF की टीम ने 11 दिसंबर को मान सिंह को मालवानी, मुंबई स्थित मरीना एंक्लेव से गिरफ्तार किया। कोर्ट में पेशी के बाद उसे ट्रांजिट रिमांड पर आगरा लाया गया, जहां उसे जेल भेज दिया गया।

फिल्मों से तस्करी तक का सफर

पुलिस पूछताछ में मान सिंह ने बताया कि वह आठवीं फेल है और 17 साल की उम्र में, वर्ष 2008 में मुंबई चला गया था। फिल्मों में काम करने के लिए उसने संघर्ष किया और कई फिल्मों व वेब सीरीज में छोटे रोल किए।
उसने स्वीकार किया कि फिल्मों में स्थायी पहचान न बना पाने और पैसों की जरूरत के चलते वह नशे की तस्करी में शामिल हो गया।

ट्रेन से माल, फ्लाइट से वापसी

मान सिंह ट्रेन से हेरोइन की डिलीवरी करता था और बदले में उसे 10 से 15 हजार रुपये मिलते थे। वापसी में वह हवाई यात्रा करता था ताकि शक न हो।

करोड़ों की हेरोइन, कई राज्यों में सप्लाई

जांच में सामने आया कि बरामद हेरोइन की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करीब 2 करोड़ रुपये थी। गिरोह महाराष्ट्र से दिल्ली और फिर उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश तक सप्लाई करता था।
आगरा के होटलों, रेस्तरां और हुक्का बार में भी हेरोइन की सप्लाई की जानकारी पुलिस को मिली है।

सरगना पर कई केस दर्ज

गिरोह के सरगना शैलेंद्र राणा के खिलाफ अलीगढ़, सैंया और मिर्जापुर में 7 मुकदमे दर्ज हैं। वहीं अन्य आरोपियों पर भी अलग-अलग राज्यों में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

बिहार शिक्षक अंतर-जिला स्थानांतरण: 27,171 शिक्षकों को मिला प्रखंड आवंटन, 31 दिसंबर तक पूरा होगा तबादला

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार के सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए एक बड़ी और बहुप्रतीक्षित प्रशासनिक प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच गई है। बिहार शिक्षक अंतर-जिला स्थानांतरण के तहत कुल 27,171 शिक्षकों को उनके नए प्रखंड आवंटित कर दिए गए हैं। शिक्षा विभाग द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इन शिक्षकों का संबंधित प्रखंडों के विद्यालयों में स्थानांतरण 16 दिसंबर से 31 दिसंबर 2025 के बीच पूरा किया जाएगा।

शिक्षा विभाग ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए पहले ही स्पष्ट समय-सीमा तय कर दी थी, ताकि किसी तरह की असमंजस या देरी न हो। प्रखंड आवंटन की प्रक्रिया के अंतर्गत अंतर-जिला स्थानांतरित शिक्षकों से ई-शिक्षाकोष पोर्टल पर पांच प्रखंडों के विकल्प मांगे गए थे। इसके लिए शिक्षकों को 24 नवंबर से 5 दिसंबर तक का समय दिया गया, जबकि 10 से 15 दिसंबर के बीच प्रखंड आवंटन की प्रक्रिया पूरी की गई।

शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. बी. राजेंद्र द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, जिन शिक्षकों को उनके चुने गए पांच प्रखंडों में रिक्त पद उपलब्ध नहीं हो सके, उन्हें उसी जिले के अन्य प्रखंडों में उपलब्ध पदों के आधार पर विद्यालय आवंटित किए गए हैं। वहीं, जिन शिक्षकों ने तय समय-सीमा में प्रखंड का विकल्प नहीं भरा, उनका जिला आवंटन स्वतः निरस्त कर दिया गया।

निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि किसी प्रखंड या विद्यालय में विषयवार रिक्तियां सीमित होंगी, तो नियमित शिक्षकों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके बाद क्रमशः विशिष्ट शिक्षक और फिर विद्यालय अध्यापकों को अवसर मिलेगा।
आवंटन प्रक्रिया में दिव्यांग महिला शिक्षकों को सर्वोच्च प्राथमिकता, उसके बाद दिव्यांग पुरुष, सामान्य महिला और सामान्य पुरुष शिक्षकों को वरीयता दी गई है। साथ ही, अधिक आयु वाले शिक्षकों को भी प्राथमिकता सूची में ऊपर रखा गया है। विद्यालय आवंटन विषय और कक्षा के अनुसार उपलब्ध रिक्तियों को ध्यान में रखकर किया गया है।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव से पहले प्रारंभिक से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों से अंतर-जिला स्थानांतरण के लिए आवेदन मांगे गए थे। कुल 41,684 शिक्षकों ने तीन-तीन जिलों के विकल्प दिए थे, जिनमें से 24,732 शिक्षकों को उनकी पसंद के अनुसार जिला मिला। शेष शिक्षकों से दोबारा विकल्प मांगे गए, जिसमें 9,849 शिक्षकों ने आवेदन किया और उनमें से 2,439 शिक्षकों को जिला आवंटन प्रदान किया गया।

यह पूरी प्रक्रिया बिहार में शिक्षा व्यवस्था को संतुलित और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

राम मंदिर ट्रस्ट जाएगा सुप्रीम कोर्ट, ऐतिहासिक सबूतों और दस्तावेजों की सर्टिफाइड कॉपी मांगेगा


अयोध्या (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अयोध्या राम मंदिर से जुड़े अहम घटनाक्रम में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट का रुख करने जा रहा है। ट्रस्ट शीर्ष अदालत से उन ऐतिहासिक सबूतों और दस्तावेजों तक पहुंच की मांग करेगा, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 में अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।

ट्रस्ट से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, यह कदम राम मंदिर मामले से संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड को औपचारिक रूप से प्राप्त करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में औपचारिक अनुरोध करेगा ट्रस्ट

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने बताया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट में एक औपचारिक अनुरोध दाखिल करेगा। इस अनुरोध के जरिए ट्रस्ट उन सभी दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों की सर्टिफाइड कॉपी मांगेगा, जिन पर अदालत ने अपने फैसले में भरोसा किया था।

उन्होंने कहा कि ये सभी सामग्री न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा थीं और वर्षों तक चले मुकदमे की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई थीं।

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पत्र लिखकर करेगा दस्तावेज जारी करने का आग्रह

नृपेंद्र मिश्रा के मुताबिक, ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट को एक औपचारिक पत्र लिखकर राम मंदिर मामले से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का आग्रह करेगा। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक दस्तावेजों को संरक्षित करना और भविष्य के लिए आधिकारिक रूप से संकलित करना है।

2019 के फैसले से खुला था राम मंदिर निर्माण का रास्ता

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 में दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को राम मंदिर निर्माण के लिए सौंपने का आदेश दिया था।
इस फैसले के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ और 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई।

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नितिन नबीन बने भाजपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष

संगठनात्मक भरोसे से शीर्ष भूमिका तक का सफर

त्वरित टिप्पणी: नवनीत मिश्र

भारतीय जनता पार्टी ने अहम फैसला लेते हुए बिहार सरकार के मंत्री नितिन नबीन को पार्टी का कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया है। यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी। संगठनात्मक आदेश को राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने जारी किया हैं। जिसकी जानकारी सभी राष्ट्रीय पदाधिकारियों, प्रदेश प्रभारियों, प्रदेश अध्यक्षों और प्रदेश संगठन महामंत्रियों को दी गई है।
नव नियुक्त कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का राजनीतिक सफर वर्ष 2006 में उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचने से शुरू हुआ। तब से वे लगातार बांकीपुर विधानसभा सीट से विजयी होते आ रहे हैं। वर्ष 2008 से पहले इस सीट को पटना वेस्ट विधानसभा के नाम से जाना जाता था। राजनीति उन्हें विरासत में मिली। उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक नेताओं में शामिल थे और 1995 से 2006 तक पटना वेस्ट से विधायक रहे। उनके निधन के बाद महज 26 वर्ष की उम्र में नितिन नबीन ने राजनीतिक जिम्मेदारी संभाली।
युवा राजनीति में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है और वे भाजपा युवा मोर्चा के बिहार अध्यक्ष रह चुके हैं। वर्ष 2020 में भाजपा-जदयू गठबंधन की सरकार बनने पर उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। मौजूदा सरकार में भी वे मंत्री पद पर हैं। समर्थकों का कहना है कि उनके कार्यकाल में सड़कों और बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिली।
संगठनात्मक जिम्मेदारियों के तहत नितिन नबीन को छत्तीसगढ़ का प्रभारी भी बनाया गया था। उनके नेतृत्व में वर्ष 2023 में भाजपा ने वहां सरकार बनाने में सफलता हासिल की। भले ही उन्हें जनसभाओं का प्रभावशाली वक्ता नहीं माना जाता, लेकिन संगठन के भीतर उनकी रणनीतिक समझ और नेतृत्व क्षमता को लगातार महत्व मिला है।
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में उनकी स्वीकार्यता इस नियुक्ति से स्पष्ट होती है। यदि भविष्य में उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलती है, तो वे इस पद तक पहुंचने वाले बिहार के पहले भाजपा नेता होंगे। मौजूदा नियुक्ति को संगठन में उनके बढ़ते कद और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे के तौर पर देखा जा रहा है।

ISRO के 7 बड़े प्रक्षेपण मिशन: मार्च 2026 तक मानवरहित गगनयान समेत कई अहम लॉन्च करेगा इसरो

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) मार्च 2026 तक कुल सात अहम प्रक्षेपण मिशन पूरा करने की तैयारी में है। इनमें गगनयान परियोजना का पहला मानवरहित मिशन, स्वदेशी इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम का प्रदर्शन और क्वांटम डिस्ट्रीब्यूशन तकनीक से जुड़े प्रयोग शामिल हैं। इन सात मिशनों में से पहला प्रक्षेपण अगले सप्ताह होने की संभावना है।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने संसद को यह जानकारी दी और बताया कि आने वाले महीनों में इसरो के कई मिशन भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को नई ऊंचाई देंगे।

अगले साल की शुरुआत में गगनयान का मानवरहित मिशन

मंत्री ने बताया कि भारत का सबसे भारी प्रक्षेपण यान एलवीएम-3 (LVM3) अमेरिकी कंपनी AST SpaceMobile के BlueBird-6 संचार उपग्रह को कक्षा में स्थापित करेगा। यह मिशन इसरो की व्यावसायिक शाखा न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के माध्यम से किया जाएगा।

एलवीएम-3 रॉकेट 2026 की शुरुआत में गगनयान परियोजना के पहले मानवरहित मिशन के लिए भी इस्तेमाल किया जाएगा। इस मिशन में ‘व्योममित्रा’ नामक रोबोट को क्रू मॉड्यूल में भेजा जाएगा। इसके बाद 2026 में एक और मानवरहित मिशन प्रस्तावित है, जबकि 2027 में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को लो अर्थ ऑर्बिट में भेजने की योजना है।

गगनयान मिशन का उद्देश्य

पहला मानवरहित गगनयान मिशन पूरी मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रक्रिया का प्रदर्शन करेगा। इसमें मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान की एयरोडायनामिक जांच , ऑर्बिटल मॉड्यूल का संचालन, क्रू मॉड्यूल का पुनः प्रवेश, सुरक्षित रिकवरी प्रक्रिया जैसे अहम चरण शामिल होंगे।

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भारत निर्मित पहला PSLV भी होगा लॉन्च

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि अगले वर्ष इसरो पूरी तरह भारत में निर्मित पहला PSLV भी प्रक्षेपित करेगा। इस मिशन के तहत ओशियनसैट उपग्रह, इंडो-मॉरीशस संयुक्त उपग्रह, और ध्रुव स्पेस का LEAP-2 उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया जाएगा।

अंतरिक्ष तकनीक में भारत की मजबूत होती पकड़

इन सात प्रस्तावित मिशनों के जरिए भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान, व्यावसायिक लॉन्च सेवाओं, स्वदेशी तकनीक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग—चारों क्षेत्रों में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा। गगनयान मिशन भारत को मानव अंतरिक्ष उड़ान करने वाले चुनिंदा देशों की सूची में शामिल करने की दिशा में निर्णायक कदम माना जा रहा है।

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फार्मा से केमिकल तक भारत की बड़ी छलांग, रूस के बाजार में 300 उत्पादों के निर्यात से खुलेगा नया अवसर

India Russia Trade News: भारत और रूस के बीच व्यापारिक रिश्तों को नई ऊंचाई तक पहुंचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। रूस के बाजार में भारतीय निर्यात बढ़ाने के लिए करीब 300 उत्पादों की पहचान की गई है, जिनमें इंजीनियरिंग सामान, फार्मा, कृषि, केमिकल और प्लास्टिक जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इन उत्पादों की रूस में भारी मांग है, लेकिन मौजूदा आपूर्ति जरूरत से काफी कम है।

दोनों देश 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। ऐसे में यह पहल भारतीय निर्यातकों के लिए बड़े अवसर खोल सकती है।

निर्यात में बड़ा अंतर, भारत के लिए मौका

फिलहाल भारत का इन चिन्हित उत्पादों का रूस को निर्यात केवल 1.7 अरब डॉलर है, जबकि रूस का कुल आयात 37.4 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। यह अंतर दर्शाता है कि भारतीय कंपनियों के पास रूस के बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की जबरदस्त संभावना मौजूद है।

सरकार का मानना है कि इन 300 उत्पादों पर फोकस करके न केवल निर्यात बढ़ाया जा सकता है, बल्कि रूस के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

व्यापार घाटा घटाने की रणनीति

एक सरकारी अधिकारी के अनुसार, भारत और रूस के बीच मौजूदा व्यापार घाटा करीब 59 अरब डॉलर का है। वाणिज्य मंत्रालय ने रूस की आयात जरूरतों और भारत की आपूर्ति क्षमता का विस्तृत विश्लेषण कर इन उत्पादों की सूची तैयार की है। इसका उद्देश्य भारतीय निर्यातकों को स्पष्ट रणनीतिक दिशा देना और रूसी बाजार में उनकी मौजूदगी मजबूत करना है।

रूस से आयात में तेज बढ़ोतरी

पिछले कुछ वर्षों में रूस से भारत का आयात तेजी से बढ़ा है।

• 2020: 5.94 अरब डॉलर

• 2024: 64.24 अरब डॉलर

चार वर्षों में यह आयात दस गुना से भी अधिक बढ़ गया है, जिससे व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में कमजोर हुआ है। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

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केमिकल और फार्मा सेक्टर में बड़ी संभावना

केमिकल और प्लास्टिक सेक्टर में रूस की कुल मांग करीब 2.06 अरब डॉलर की है, जबकि भारत की हिस्सेदारी महज 13.5 करोड़ डॉलर है।
फार्मा सेक्टर में भी भारत के लिए बड़ा अवसर मौजूद है। भारत फिलहाल रूस को 54.6 करोड़ डॉलर की दवाइयां निर्यात करता है, जबकि रूस का कुल फार्मा आयात 9.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
जेनेरिक दवाइयों और API (एक्टिव फार्मा इंग्रेडिएंट्स) में भारत रूस का अहम सप्लायर बन सकता है।

श्रम प्रधान उद्योगों को भी मिलेगा लाभ

उच्च मूल्य वाले उत्पादों के साथ-साथ भारत के श्रम प्रधान उद्योगों के लिए भी रूस का बाजार बेहद अहम है। वस्त्र, परिधान, चमड़े के सामान, हस्तशिल्प, प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद और हल्का इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों में भारत की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता उसे मजबूत बढ़त दिला सकती है। सरकार का मानना है कि सही नीतियों और निर्यात प्रोत्साहन के जरिए भारतीय कंपनियां रूस के बाजार में तेजी से अपनी पकड़ बना सकती हैं।

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