Saturday, June 27, 2026
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गंभीर AQI के बीच दिल्ली में सख़्त प्रतिबंध, गैर बीएस-6 वाहनों की एंट्री बंद साथ ही कंस्ट्रक्शन पर रोक

दिल्ली में वायु प्रदूषण संकट: GRAP-4 के तहत सख़्त पाबंदियां लागू, वर्क फ्रॉम होम अनिवार्य

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर संकट के स्तर पर पहुंच गया है। लगातार तीन दिनों तक एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के “गंभीर” श्रेणी में रहने के बाद एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन (CAQM) ने GRAP-4 प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। इसके साथ ही दिल्ली सरकार ने हालात से निपटने के लिए कई कड़े और तत्काल प्रभाव वाले फैसलों की घोषणा की है, जो गुरुवार से लागू हो चुके हैं।

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सरकार ने सभी सरकारी और निजी संस्थानों के लिए वर्क फ्रॉम होम को अनिवार्य कर दिया है। श्रम मंत्री कपिल मिश्रा के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में काम करने वाले निजी कार्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 50 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी फिजिकल रूप से कार्यालय न आएं। शेष कर्मचारियों को घर से काम करना अनिवार्य होगा। हालांकि, अस्पताल, फायर सर्विस, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, ट्रांसपोर्ट और सैनिटेशन जैसी आवश्यक सेवाओं को इस आदेश से छूट दी गई है।

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वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से दिल्ली में गैर बीएस-6 निजी वाहनों के प्रवेश पर भी रोक लगा दी गई है। इसके अलावा, “नो पीयूसी, नो फ्यूल” नियम सख्ती से लागू किया गया है। वैध प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) के बिना किसी भी वाहन को पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जा रहा है। इसे लागू करने के लिए पेट्रोल पंपों पर ऑटोमेटिक नंबर प्लेट रीडर कैमरे, वॉयस अलर्ट सिस्टम और पुलिस की तैनाती की गई है।

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दिल्ली की सीमाओं पर 126 चेकपोस्ट्स पर 580 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। निर्माण सामग्री ले जाने वाले वाहनों और कंस्ट्रक्शन गतिविधियों पर भी पूर्ण रोक लगा दी गई है। इससे प्रभावित निर्माण श्रमिकों को GRAP-4 लागू रहने तक ₹10,000 का मुआवजा दिया जाएगा, जिसके लिए पंजीकरण प्रक्रिया जारी है।

सरकार का कहना है कि ये कदम जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा और दिल्ली वायु प्रदूषण GRAP-4 के प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक हैं।

टैरिफ से निवेश तक: ट्रंप का दावा, अमेरिका फिर बना विनिर्माण महाशक्ति

ट्रंप का राष्ट्र के नाम संबोधन: सीमा सुरक्षा से लेकर वैश्विक शांति तक, उपलब्धियों का दावा

वॉशिंगटन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को (स्थानीय समयानुसार) राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपने मौजूदा कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों को सामने रखा। अपने संबोधन में उन्होंने विदेश नीति, अर्थव्यवस्था, सीमा सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से बात की। इस दौरान उन्होंने अपने उत्तराधिकारी जो बाइडेन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि पिछली सरकार ने अमेरिका को “इतिहास की सबसे खराब सीमा स्थिति” में छोड़ दिया था।

सीमा सुरक्षा पर ट्रंप का बड़ा दावा

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि सत्ता संभालते समय उन्हें एक “अराजक विरासत” मिली, लेकिन कुछ ही महीनों में उन्होंने इसे बदल दिया। उनके शब्दों में,

“हमें दुनिया की सबसे खराब सीमा विरासत में मिली थी और हमने उसे अमेरिका के इतिहास की सबसे मजबूत सीमा में बदल दिया।”

उन्होंने अवैध आव्रजन पर सख्ती, बॉर्डर पेट्रोल की मजबूती और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को पूर्ण समर्थन देने को अपनी नीति की बड़ी सफलता बताया।

वैश्विक मंच पर अमेरिका की भूमिका

अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने 10 महीनों में 8 अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का समाधान कराया। उन्होंने कहा कि अमेरिका की सख्त कूटनीति के कारण ईरान के परमाणु खतरे का अंत हुआ और गाजा में युद्ध समाप्त हुआ। ट्रंप के अनुसार, इससे मध्य पूर्व में हजारों वर्षों बाद शांति का वातावरण बना और बंधकों की रिहाई संभव हुई।

टैरिफ नीति और रिकॉर्ड निवेश

अर्थव्यवस्था पर बोलते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ को अपनी “सबसे प्रभावी नीति” बताया। उन्होंने कहा कि कंपनियों को साफ संदेश दिया गया था कि यदि वे अमेरिका में उत्पादन करेंगी, तो उन पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा।
ट्रंप के अनुसार, इस नीति के चलते अब तक 18 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का निवेश अमेरिका में आया है, जिससे रोजगार, वेतन वृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिली है। उन्होंने कहा कि विनिर्माण इकाइयां रिकॉर्ड स्तर पर अमेरिका लौट रही हैं।

नशे और सांस्कृतिक मुद्दों पर सख्त रुख

राष्ट्रपति ने दावा किया कि उनकी सरकार के प्रयासों से समुद्री मार्गों से आने वाले नशीले पदार्थों में 94 प्रतिशत की कमी आई है। साथ ही उन्होंने कहा कि स्कूलों और संस्थानों में “कट्टरपंथी विचारधाराओं” के प्रभाव को भी समाप्त किया गया है।

समापन में तीखा राजनीतिक संदेश

अपने भाषण के अंत में ट्रंप ने कहा कि पिछली सरकारें अमेरिका के आम नागरिकों के बजाय बाहरी हितों की रक्षा कर रही थीं। उन्होंने खुद को कानून का पालन करने वाले, मेहनतकश अमेरिकियों की आवाज बताते हुए कहा कि अब अमेरिका का नेतृत्व जनता के लिए काम कर रहा है, न कि विदेशी ताकतों के लिए।

मीडिया से दूरी और सीमित मंच: नई कार्यशैली में दिखे मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यक्रमों में बड़ा बदलाव, हिजाब विवाद के बाद बदली सरकारी रणनीति

पटना (राष्ट्र की परम्परा)बिहार की राजनीति और प्रशासनिक गतिविधियों में एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है। 15 दिसंबर को नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम के दौरान महिला डॉक्टर के हिजाब से जुड़े विवाद के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सार्वजनिक कार्यक्रमों की रूपरेखा में स्पष्ट परिवर्तन नजर आया है। विवाद के तूल पकड़ते ही जहां मुख्यमंत्री ने मीडिया से दूरी बनानी शुरू की, वहीं सरकारी आयोजनों की कार्यशैली भी बदली हुई दिखाई दे रही है।

बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बोधगया पहुंचे। उन्होंने महाबोधि मंदिर में भगवान बुद्ध के दर्शन किए, लेकिन कैमरों के सामने आने से पहले ही इशारे में आगे बढ़ गए। इसके बाद गया में बिहार लोक प्रशासन एवं ग्रामीण विकास संस्थान (बिपार्ड) की दो दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। संवाद वाटिका, नक्षत्र वन, ब्रह्मयोनि सरोवर पुनर्जीवन, मोटर ड्राइविंग स्कूल और स्पेस गैलरी का शिलान्यास भी हुआ, लेकिन इन सभी कार्यक्रमों में मीडिया को प्रवेश नहीं दिया गया। सरकार की ओर से बाद में केवल चयनित फोटो और वीडियो जारी किए गए।

इसी तरह ऊर्जा विभाग के तहत बिहार स्टेट पावर (होल्डिंग) कंपनी लिमिटेड में चयनित 2390 अभ्यर्थियों के नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम में भी बड़ा बदलाव दिखा। मुख्यमंत्री ने केवल तीन अभ्यर्थियों को प्रतीकात्मक रूप से नियुक्ति पत्र दिए, जबकि शेष नियुक्तियां अधिकारियों द्वारा की गईं। इसे महज औपचारिक बदलाव नहीं, बल्कि भविष्य की नई सरकारी कार्यशैली के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

हिजाब विवाद के बाद मुख्यमंत्री के लगातार दो कार्यक्रमों में तीन अहम बदलाव साफ दिखे—सीमित भागीदारी और प्रतीकात्मक मंच, मीडिया की नो-एंट्री, और सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग बंद। अब लाइव कवरेज की जगह एडिटेड वीडियो और चयनित तस्वीरें ही साझा की जा रही हैं।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, विवाद की आशंका को कम करने के लिए आने वाले दिनों में भी यही मॉडल अपनाया जाएगा। यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब सरकार अगले पांच साल में एक करोड़ नौकरी-रोजगार देने के दावे को लगातार दोहरा रही है।

महंगाई, फिटमेंट फैक्टर और एरियर: आठवें वेतन आयोग से क्या बदलेगा सरकारी कर्मचारियों के लिए

महंगाई दर,स्वास्थ्य और शिक्षा खर्च आवास लागत, शहरीकरण और तकनीकी परिवर्तन बढ़ने से नया वेतन आयोगलागू करना आर्थिक अनिवार्यता बन चुका है- एडवोकेट किशन

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए वेतन आयोग केवल वेतन संशोधन का माध्यम नहीं होते,बल्कि यह सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा, जीवन -स्तर, उपभोग क्षमता और मध्यवर्गीय स्थिरता का सबसे बड़ा आधार होते हैं। सातवें केंद्रीय वेतन आयोग का 10 वर्षीय कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो रहा है,और इसके साथ ही देश का ध्यान स्वाभाविक रूप से आठवें केंद्रीय वेतन आयोग पर केंद्रित हो गया है।यह केवल वेतन वृद्धि का सवाल नहीं है, बल्कि यह प्रश्न भी है कि महंगाई, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, रियल इनकम में गिरावट और भविष्य की आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार अपने कर्मचारियों को किस तरह का संरचनात्मक संरक्षण देती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि भारत में परंपरागत रूप से यह देखा गया है कि किसी भी वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद सरकार उसे लागू करने से पहले तीन से छह महीने तक वित्त मंत्रालय,कार्मिक विभाग और कैबिनेट स्तरपर विचार- विमर्श करती है। इसी कारण यह लगभग तय माना जा रहा है कि आठवां वेतन आयोग जनवरी 2026 से लागू नहीं हो पाएगा।

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साथियों बात अगर हम सातवें वेतन आयोग की समाप्ति और आठवें वेतन आयोग की आवश्यकता को समझने की करें तो,सातवें वेतन आयोग को वर्ष 2016 में लागू किया गया था। तब से लेकर अब तक देश की आर्थिक परिस्थितियों में भारी बदलाव आए हैं। महंगाई दर, स्वास्थ्य और शिक्षा खर्च, आवास लागत,शहरीकरणऔर तकनीकी परिवर्तन इन सभी ने सरकारी कर्मचारियों की वास्तविक आय पर दबाव डाला है।हालाँकि महंगाई भत्ता समय-समय पर बढ़ता रहा, लेकिन वेतन संरचना मूल रूप से वही बनी रही। यही कारण है कि 31 दिसंबर 2025 के बाद नया वेतन आयोग केवल औपचारिकता नहीं बल्कि आर्थिक अनिवार्यता बन चुका है।सरकार द्वारा गठित आठवें केंद्रीय वेतन आयोग की अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति रंजना देसाई कर रही हैं। यह नियुक्ति यह संकेत देती है कि आयोग से न्यायपूर्ण, संतुलित और संवैधानिक दृष्टि से सुदृढ़ सिफारिशों की अपेक्षा की जा रही है।आयोग को निम्नलिखित प्रमुख क्षेत्रों पर सिफारिशें देनी हैं वेतन संरचना क़े साथ फिटमेंट फैक्टर विभिन्न प्रकार के भत्ते, रिटायरमेंट लाभ, पेंशन और पारिवारिक पेंशन,ग्रेच्युटी और अन्य सामाजिक सुरक्षा उपाय।सरकार ने आयोग को लगभग 18 महीने का समय दिया है।टर्म्स ऑफ रेफरेंस और रिपोर्ट की संभावित समयसीमा-आठवें वेतन आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस अक्टूबर 2025 में जारी किए गए हैं। इसके बाद आयोग ने अपना काम औपचारिक रूप से शुरू किया।वर्तमान अनुमानों के अनुसार-(1) आयोग की रिपोर्ट अप्रैल 2027 तक आने की उम्मीद है (2) रिपोर्ट आने के बाद सरकार आमतौर पर 3 से 6 महीने विचार-विमर्श और वित्तीय मूल्यांकन में लगाती है (3) इसका सीधा अर्थ यह है कि जनवरी 2026 में नया वेतन आयोग लागू होना लगभग असंभव है। 

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साथियों बात अगर हम आठवां वेतन आयोग कब लागू हो सकता है? इसको समझने की करें तो वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी स्पष्ट कर चुके हैं कि, आठवें केंद्रीय वेतन आयोग को लागू करने की तारीख और फंडिंग पर फैसला बाद में लिया जाएगा,इस बयान का नीतिगत अर्थ यह है कि सरकार फिलहाल कोई पूर्व-निर्धारित तारीख घोषित नहीं करना चाहती, ताकि राजकोषीय संतुलन और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिया जा सके।विश्लेषकों की आम राय है कि, 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत में आठवां वेतन आयोग लागू हो सकता है।फिटमेंट फैक्टर क्या होता है और इसका महत्व -फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक होता है जिसके माध्यम से पुराने वेतन को नए वेतन ढांचे में बदला जाता है।सातवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.57 था। इसका अर्थ यह था कि,नया मूल वेतन = पुराना मूल वेतन × 2.57 आठवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है, क्योंकि यही कर्मचारियों की सैलरी बढ़ोतरी का आधार बनेगा। 

साथियों बात अगर हम निजी वित्तीय अनुसंधान संस्था एम्बिट कैपिटल का अनुमान को समझने की करें तो आठवें वेतन आयोग में कुल मिलाकर 30 से 34 प्रतिशत तक वेतन और पेंशन में वृद्धि हो सकती है। इस वृद्धि की प्रक्रिया यह होगी कि पहले मौजूदा महंगाई भत्ते को बेसिक सैलरी में मर्ज किया जाएगा और उसके बाद नए फिटमेंट फैक्टर के आधार पर वेतन संरचना लागू की जाएगी।कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में 50 से 54 प्रतिशत तक वेतन वृद्धि की बात भी सामने आई है, लेकिन अधिकांश अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ इस संभावना को कम मानते हैं क्योंकि इतनी बड़ी वृद्धि से केंद्र सरकार के राजकोषीय संतुलन परअत्यधिक दबाव पड़ेगा। यदि व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो आठवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 1.8 से 2.1 के बीच रह सकता है। इसका अर्थ यह होगा कि वास्तविक वेतन वृद्धि लगभग 30 से 34 प्रतिशत के दायरे में सीमित रहेगी, जो सरकार और कर्मचारियों दोनों के लिए एक संतुलित समाधान माना जा सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी कर्मचारी का वर्तमान बेसिक वेतन 18,000 रूपए है और उस पर लगभग 50 प्रतिशत महंगाई भत्ता मिल रहा है, तो कुल प्रभावी वेतन 27,000 रूपए के आसपास होता है। जब इस महंगाई भत्ते को बेसिक में जोड़ दिया जाएगा, तो नया बेसिक 27,000 रूपए माना जाएगा। यदि इस पर 1.9 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया जाता है, तो नया बेसिक वेतन 51,300 रूपए के करीब पहुंच सकता है। यह वृद्धि दिखने में बहुत बड़ी लगती है, लेकिन वास्तव में यह महंगाई भत्ते के समायोजन के बाद की वास्तविक वृद्धि है। 

साथियों बात अगर हम आठवें वेतन आयोग का प्रभाव केवल कार्यरत कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पेंशनभोगियों के लिए भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण होगा, इसको समझने की करें तो,पेंशन आमतौर पर अंतिम बेसिक वेतन का 50 प्रतिशत होती है, इसलिए जब बेसिक वेतन में वृद्धि होगी तो पेंशन में भी समानुपातिक बढ़ोतरी होगी। यदि किसी पेंशनभोगी की मौजूदा पेंशन 20,000 रूपए है और महंगाई भत्ते को जोड़कर यह 30,000 के आसपास पहुंच चुकी है, तो नए वेतन ढांचे में 1.9 फिटमेंट फैक्टर लागू होने पर संशोधित पेंशन लगभग 28,500 से 30,000 रूपए के बीच हो सकती है। यह वृद्धि बुजुर्ग पेंशनरों के लिए जीवन- यापन में बड़ी राहत लेकर आएगी।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि आठवां वेतन आयोग 2028 में लागू होता है तो कर्मचारियों और पेंशनरों को कितना एरियर मिलेगा। यदि यह मान लिया जाए कि आयोग की सिफारिशें जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाएं, लेकिन वास्तविक भुगतान जनवरी 2028 से शुरू हो, तो कुल 24 महीनों का एरियर बनता है। यदि किसी कर्मचारी की मासिक वेतन वृद्धि 15,000 रूपए है,तो दो वर्षों का एरियर 3,60,000रूपए तक हो सकता है। इसी तरह यदि किसी पेंशनभोगी की मासिक पेंशन वृद्धि 6,000 रूपए है, तो उसका एरियर लगभग 1,44,000 रूपए हो सकता है। यह एरियर एकमुश्त दिया जाएगा या किश्तों में, इसका निर्णय सरकार अपनी वित्तीय स्थिति के अनुसार करेगी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि आठवें वेतन आयोग के लागू होने से केंद्र सरकार पर लाखों करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा। इसका प्रभाव केवल केंद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्यों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव आएगा क्योंकि अधिकांश राज्य केंद्र के वेतन आयोग के अनुरूप अपने कर्मचारियों का वेतन संशोधित करते हैं। इसी कारण सरकार अत्यधिक सतर्कता के साथ इस पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है और किसी भी जल्दबाजी से बचना चाहती है।

अतः अगर हम ऑपरेट पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि आठवां केंद्रीय वेतन आयोग केवल वेतन बढ़ोतरी का दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों की आर्थिक गरिमा,पेंशनभोगियों की सामाजिक सुरक्षा और सरकार की राजकोषीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास होगा। भले ही यह आयोग जनवरी 2026 में लागू न हो पाए, लेकिन 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत में इसके लागू होने की प्रबल संभावना है। उस समय तक कर्मचारियों को न केवल संशोधित वेतन मिलेगा, बल्कि बड़े एरियर के रूप में एकमुश्त आर्थिक राहत भी प्राप्त हो सकती है, जो मौजूदा महंगाई और आर्थिक दबावों के बीच उनके लिए एक महत्वपूर्ण सहारा सिद्ध होगी।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

समर्पित से न करते किनारा…!

किस-किस को दिखाओगे बाहर का रास्ता,

पहले से ही हो रही पार्टी की हालत खस्ता।

वह ‘सत्य की ओर’ ही तो कर रहे थे इशारा,

समर्पित रहें मो. मुकीम से न करते किनारा।

प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया,

पार्टी विरोधी गतिविधियों को ‘चस्पा’ किया।

यह दल आज भी मुश्किल दौर से गुजर रहा,

नए नेतृत्व की जरूरत का आगाज़ कर रहा। 

पार्टी प्रमुख नेता के रूप में आवश्यक मेहनत, 

दौड़-भाग;लोगों से जुड़ाव संभव सब सहमत।

पार्टी में खरगे सलाहकार की भूमिका निभाएं,

वह किसी सक्रिय ‘युवा नेतृत्व’ को आगे लाएं।

(संदर्भ-कांग्रेस ने पूर्व विधायक को निष्कासित किया )

संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

मो. 98260 25986

(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित)

हांसी : इतिहास के केंद्र से हाशिये तक और फिर जिले की दहलीज़ पर

(हांसी : इतिहास ने छीना, वक्त ने लौटाया जिला)

हांसी कभी हरियाणा क्षेत्र की राजधानी रही है। जॉर्ज थॉमस के शासनकाल में यह प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र था। मुगल काल में यहां टकसाल और सैनिक छावनी स्थापित की गई। 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ तीव्र प्रतिरोध के कारण हांसी से जिला दर्जा छीना गया और लगभग 1870–80 के बीच हिसार को जिला बनाया गया। 1966 में हरियाणा गठन के बाद हिसार का कई बार पुनर्गठन हुआ। 2025 में हांसी को पुनः जिला बनाने की घोषणा हुई, जिसे ऐतिहासिक न्याय के रूप में देखा जा रहा है।

  • डॉ. प्रियंका सौरभ

इतिहास कभी अचानक नहीं बदलता, वह धीरे-धीरे करवट लेता है। हरियाणा की प्राचीन नगरी हांसी इसका जीवंत उदाहरण है। एक समय यह नगर सत्ता, प्रशासन, व्यापार और सामरिक दृष्टि से उत्तरी भारत के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता था। आज वही हांसी, जिसने सदियों तक शासन का भार उठाया, लंबे समय तक प्रशासनिक उपेक्षा झेलने के बाद एक बार फिर जिले के रूप में अपनी पहचान पाने की ओर अग्रसर हुई है। वर्ष 2025 में हांसी को नया जिला बनाए जाने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि इतिहास के एक अधूरे अध्याय को पूरा करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

अंग्रेजों के भारत आगमन से बहुत पहले हांसी का गौरव अपने चरम पर था। जॉर्ज थॉमस के दौर में हांसी हरियाणा क्षेत्र की राजधानी के रूप में स्थापित थी। उस समय यह नगर दिल्ली परगना के अधीन उत्तरी भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में शामिल था। हांसी से ही प्रशासनिक आदेश जारी होते थे और आसपास के बड़े भूभाग पर शासन संचालित किया जाता था। यह नगर केवल सत्ता का केंद्र नहीं था, बल्कि व्यापारिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सैनिक रणनीतियों का भी प्रमुख केंद्र था।

मुगल काल में भी हांसी का महत्व कम नहीं हुआ। अकबर के शासनकाल के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और नक्शों में हांसी को एक महत्वपूर्ण मुगल केंद्र के रूप में दर्शाया गया है। यहां एक टकसाल स्थापित थी, जहां सिक्कों का निर्माण होता था। किसी भी नगर में टकसाल का होना उसकी आर्थिक और प्रशासनिक ताकत का प्रतीक माना जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि हांसी केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि उस दौर की अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ था।

हांसी की भौगोलिक स्थिति ने भी इसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया था। दिल्ली, पंजाब और राजस्थान की ओर जाने वाले मार्गों पर स्थित होने के कारण यहां मुगलों ने सैनिक छावनी स्थापित की। बाद में अंग्रेजों ने भी इसी सामरिक महत्ता को समझते हुए यहां अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखी। हांसी की किलेबंदी, प्रशासनिक ढांचा और सैन्य व्यवस्था इसे उत्तरी भारत के सुरक्षित और संगठित नगरों में शामिल करती थी।

लेकिन इतिहास की दिशा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साथ बदल गई। हांसी और आसपास के क्षेत्रों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुलकर विद्रोह किया। यह क्षेत्र उन इलाकों में शामिल था जहां अंग्रेजों को सबसे तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। स्थानीय जनता, सैनिकों और जमींदारों ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। यह विद्रोह अंग्रेजों के लिए केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं था, बल्कि उनकी सत्ता के लिए सीधी चुनौती था।

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने प्रतिशोध की नीति अपनाई। जिन क्षेत्रों ने सबसे अधिक प्रतिरोध किया, उन्हें प्रशासनिक रूप से कमजोर किया गया। हांसी भी इसी नीति का शिकार बना। भले ही हांसी से जिले का दर्जा छीने जाने की कोई सटीक और प्रमाणिक तारीख उपलब्ध नहीं है, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि 1870 से 1880 के बीच अंग्रेजों ने हांसी से जिला मुख्यालय हटाकर हिसार को नया जिला बना दिया। इसके साथ ही हांसी का प्रशासनिक महत्व लगभग समाप्त कर दिया गया।

हिसार को जिला बनाकर अंग्रेजों ने न केवल प्रशासनिक ढांचा बदला, बल्कि हांसी की ऐतिहासिक भूमिका को भी हाशिये पर डाल दिया। फतेहाबाद, सिरसा जैसे इलाकों पर हिसार से शासन चलाया जाने लगा। यह बदलाव केवल सुविधा के नाम पर नहीं था, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र को नियंत्रित करने की रणनीति थी, जिसने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का साहस दिखाया था।

इतिहासकार यह भी बताते हैं कि 1700 ईस्वी के आसपास हरियाणा, पंजाब से अलग एक विशिष्ट भू-राजनीतिक पहचान के साथ नक्शों में मौजूद था। उस दौर के कई नक्शे आज भी उपलब्ध हैं, जिनमें हांसी को हरियाणा की राजधानी के रूप में दर्शाया गया है। जॉर्ज थॉमस ने हांसी को अपना प्रमुख केंद्र बनाकर पूरे इलाके पर शासन किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि हांसी का महत्व किसी एक शासक या काल तक सीमित नहीं था, बल्कि यह लंबे समय तक सत्ता का केंद्र रहा।

स्वतंत्रता के बाद 1966 में जब हरियाणा राज्य का गठन हुआ, तब हिसार प्रदेश का सबसे बड़ा जिला था। उस समय हांसी एक बार फिर उम्मीद कर रहा था कि उसे उसका ऐतिहासिक दर्जा वापस मिलेगा। लेकिन प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक संतुलनों के चलते ऐसा नहीं हो सका। इसके बजाय हिसार जिले का समय-समय पर पुनर्गठन किया गया।

1972 में भिवानी को अलग जिला बनाया गया। इसके बाद 1975 में सिरसा और 1997 में फतेहाबाद को जिला का दर्जा मिला। 2016 में भिवानी से अलग होकर चरखी दादरी नया जिला बना। इन सभी विभाजनों ने हिसार के प्रशासनिक नक्शे को लगातार बदला और छोटा किया, लेकिन हांसी हर बार जिले की सूची से बाहर रह गया।

इस उपेक्षा ने धीरे-धीरे हांसी में असंतोष को जन्म दिया। लोगों को लगने लगा कि यह केवल प्रशासनिक अनदेखी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय का विस्तार है। पिछले लगभग दस वर्षों से हांसी को जिला बनाने की मांग ने जोर पकड़ना शुरू किया। स्थानीय सामाजिक संगठनों, व्यापार मंडलों और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को लगातार उठाया। यह मांग धीरे-धीरे एक जन आंदोलन का रूप लेने लगी।

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हांसी के लोग यह तर्क देते रहे कि यह नगर ऐतिहासिक, भौगोलिक और प्रशासनिक—तीनों दृष्टियों से जिला बनने की सभी शर्तें पूरी करता है। यहां पहले से ही कई प्रशासनिक कार्यालय मौजूद हैं। आसपास के क्षेत्रों की दूरी और जनसंख्या दबाव को देखते हुए भी जिला बनना तर्कसंगत माना गया। लेकिन इन सभी दलीलों से ऊपर एक भावनात्मक पहलू भी था—हांसी को उसका खोया हुआ सम्मान लौटाने की आकांक्षा।

2025 में जब हांसी को नया जिला बनाए जाने की घोषणा हुई, तो इसे केवल एक प्रशासनिक खबर के रूप में नहीं देखा गया। यह घोषणा हांसी के इतिहास, संघर्ष और प्रतीक्षा की परिणति मानी गई। लोगों ने इसे उस अन्याय के आंशिक सुधार के रूप में देखा, जो 1857 के बाद अंग्रेजों ने किया था और जिसे स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक अनदेखा किया गया।

हांसी का जिला बनना प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल स्थानीय लोगों को बेहतर प्रशासनिक सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास को भी गति मिलेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा होने की संभावना है। इसके साथ ही यह निर्णय क्षेत्रीय संतुलन को भी मजबूत करेगा।

इतिहास गवाह है कि जिन नगरों को सत्ता के केंद्र से हटाया गया, वे केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी हाशिये पर चले जाते हैं। हांसी भी लंबे समय तक इसी स्थिति से गुजरा। लेकिन अब जिला बनने के साथ ही यह नगर एक बार फिर केंद्र में लौटने की तैयारी कर रहा है।

हांसी की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि इतिहास केवल किताबों में दर्ज घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह वर्तमान की नीतियों और फैसलों को भी प्रभावित करता है। हांसी को जिला बनाना इस बात का प्रमाण है कि इतिहास चाहे देर से ही सही, लेकिन अपनी न्यायपूर्ण दिशा जरूर खोज लेता है।

आज जब हांसी जिले की दहलीज़ पर खड़ा है, तो यह केवल एक प्रशासनिक इकाई का विस्तार नहीं, बल्कि उस नगर की आत्मा की पुनर्स्थापना है, जिसने कभी हरियाणा को राजधानी दी थी, जिसने सत्ता को चुनौती दी थी और जिसने लंबे समय तक उपेक्षा सहकर भी अपनी पहचान नहीं खोई। हांसी का यह नया अध्याय इतिहास के उसी पुराने गौरव से जुड़ता है, जहां से उसकी यात्रा शुरू हुई थी।

हांसी एक नज़र में- प्राचीन पहचान : जॉर्ज थॉमस के शासनकाल में हरियाणा क्षेत्र की राजधानी

मुगल काल : अकबर के समय प्रमुख प्रशासनिक केंद्र, यहां टकसाल स्थापित

सामरिक महत्व : मुगल और अंग्रेजी दौर में सैनिक छावनी

1857 का विद्रोह : अंग्रेजों के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध, प्रशासनिक दंड मिला

जिला दर्जा छीना गया : लगभग 1870–80 के बीच हांसी से जिला मुख्यालय हटाया गया

हिसार जिला बना : हांसी, फतेहाबाद व सिरसा हिसार के अधीन आए

हरियाणा गठन (1966) : हिसार सबसे बड़ा जिला

हिसार का पुनर्गठन :

1972 – भिवानी अलग ,1975 – सिरसा अलग़,1997 – फतेहाबाद अलग़,2016 – चरखी दादरी अलग,2025 : हांसी को नया जिला बनाए जाने की घोषणा,मांग की अवधि : पिछले लगभग 10 वर्षों से निरंतर आंदोलन

प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-

साहित्य, राजनीति और खेल : एक तारीख, अनेक विरासतें

18 दिसंबर : इतिहास की उस शाम, जब दीपक बुझ गए पर प्रकाश अमर हो गया

इतिहास केवल तिथियों का संग्रह नहीं, बल्कि उन महान व्यक्तित्वों की स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज़ है, जिन्होंने अपने कर्म, विचार और योगदान से समाज को दिशा दी। 18 दिसंबर की तारीख भारतीय और वैश्विक इतिहास में इसलिए भी विशेष है क्योंकि इस दिन राजनीति, साहित्य, कला, न्याय और खेल जगत की कई महान विभूतियों ने संसार को अलविदा कहा। उनका देहांत भले ही हुआ हो, पर उनकी विरासत आज भी जीवित है। आइए जानते हैं 18 दिसंबर को हुए महत्वपूर्ण निधन और उन व्यक्तित्वों के जीवन, जन्म-स्थल तथा राष्ट्रहित में योगदान के बारे में विस्तार से।

अदम गोंडवी (निधन : 18 दिसंबर 2011)

अदम गोंडवी आधुनिक हिंदी कविता के सबसे मुखर और जनपक्षधर कवियों में गिने जाते हैं। उनका जन्म गोंडा जिला, उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ था। वे सत्ता, व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के खिलाफ बेबाक आवाज़ के लिए जाने जाते थे। अदम गोंडवी ने अपनी कविताओं में आम आदमी की पीड़ा, भ्रष्टाचार, गरीबी और राजनीतिक पाखंड को अत्यंत सशक्त शब्दों में उकेरा।
उनकी रचनाएँ केवल साहित्य नहीं थीं, बल्कि सामाजिक चेतना की मशाल थीं। “सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं” जैसी पंक्तियाँ आज भी जनमानस में गूंजती हैं। उन्होंने कविता को मंच और आंदोलन दोनों बनाया। उनका योगदान हिंदी साहित्य को जनसंघर्ष से जोड़ने में अमूल्य रहा।

सदानंद बकरे (निधन : 18 दिसंबर 2007)

सदानंद बकरे भारत के प्रसिद्ध शिल्पकार, चित्रकार और मूर्तिकार थे। उनका जन्म महाराष्ट्र राज्य, भारत में हुआ। उन्होंने भारतीय कला को आधुनिक दृष्टिकोण देते हुए अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
बकरे ने पारंपरिक और आधुनिक कला शैलियों का अद्भुत समन्वय किया। उनकी मूर्तियाँ मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक यथार्थ और सौंदर्यबोध को दर्शाती थीं। उन्होंने भारत के बाहर भी भारतीय कला का परचम लहराया और नई पीढ़ी के कलाकारों को वैश्विक सोच के लिए प्रेरित किया। भारतीय कला-जगत में उनका योगदान प्रेरणास्रोत के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा।

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विजय हज़ारे (निधन : 18 दिसंबर 2004)

विजय हज़ारे भारतीय क्रिकेट इतिहास के महानतम खिलाड़ियों में से एक थे। उनका जन्म सांगली जिला, महाराष्ट्र, भारत में हुआ। वे स्वतंत्र भारत के पहले टेस्ट कप्तान रहे और उन्होंने भारतीय क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती दी।
विजय हज़ारे तकनीकी रूप से दक्ष, अनुशासित और संघर्षशील बल्लेबाज थे। रणजी ट्रॉफी में उनका नाम आज भी स्वर्णाक्षरों में दर्ज है, और उनके सम्मान में घरेलू क्रिकेट की प्रतिष्ठित प्रतियोगिता “विजय हज़ारे ट्रॉफी” आयोजित की जाती है। खेल के प्रति उनका समर्पण और नेतृत्व क्षमता भारतीय युवाओं के लिए आदर्श है।

न्यायमूर्ति अमल कुमार सरकार (निधन : 18 दिसंबर 2001)

अमल कुमार सरकार भारत के आठवें मुख्य न्यायाधीश थे। उनका जन्म पश्चिम बंगाल, भारत में हुआ। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका में निष्पक्षता, संवैधानिक मूल्यों और न्यायिक गरिमा को सुदृढ़ किया।
मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनका कार्यकाल विधि के शासन को मजबूत करने वाला रहा। उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों में ऐसे निर्णय दिए जो आज भी भारतीय कानून की नींव माने जाते हैं। उनका जीवन न्याय, ईमानदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित रहा।

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मुकुट बिहारी लाल भार्गव (निधन : 18 दिसंबर 1980)

मुकुट बिहारी लाल भार्गव एक वरिष्ठ भारतीय राजनीतिज्ञ और लोकसभा सदस्य थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ। वे स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेताओं में शामिल थे।
उन्होंने संसद में जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ किया। समाज सेवा, राजनीतिक शुचिता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा उनके जीवन की पहचान रही।

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एलेक्सी कोज़ीगिन (निधन : 18 दिसंबर 1980)

एलेक्सी कोज़ीगिन सोवियत संघ के प्रधानमंत्री थे। उनका जन्म सेंट पीटर्सबर्ग, रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) में हुआ।
उन्होंने शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों को मजबूती दी। भारत-सोवियत संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में भी उनकी भूमिका रही। वैश्विक राजनीति में उनका योगदान अंतरराष्ट्रीय संतुलन और कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

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पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (निधन : 18 दिसंबर 1971)

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार और विचारक थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश, भारत में हुआ।
उन्होंने साहित्य को बौद्धिक गहराई और दार्शनिक दृष्टि प्रदान की। उनके निबंध विचारोत्तेजक, तार्किक और भाषा की दृष्टि से समृद्ध थे। हिंदी गद्य साहित्य को समृद्ध बनाने में उनका योगदान ऐतिहासिक है।

18 दिसंबर: वह तारीख जिसने भारत को संत, कलाकार, न्याय, राजनीति और जनसेवा के अमर हस्ताक्षर दिए

इतिहास की कुछ तिथियाँ केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होतीं, वे राष्ट्र की चेतना को दिशा देने वाले व्यक्तित्वों का स्मरण दिवस बन जाती हैं। 18 दिसंबर भी ऐसी ही एक तिथि है, जिसने भारत को संत परंपरा, लोककला, न्यायपालिका और राजनीति के ऐसे महान स्तंभ दिए, जिनका प्रभाव आज भी समाज, संस्कृति और लोकतंत्र में स्पष्ट दिखाई देता है। आइए, 18 दिसंबर को जन्मे इन विशिष्ट व्यक्तित्वों के जीवन, योगदान और राष्ट्रहित में उनकी भूमिका पर विस्तार से दृष्टि डालते हैं।

संत गुरु घासीदास (जन्म: 18 दिसंबर 1756)

जन्म स्थान: गिरौदपुरी, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़, भारत

संत गुरु घासीदास छत्तीसगढ़ की संत परंपरा के सर्वोच्च महापुरुष माने जाते हैं। उन्होंने समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और सामाजिक असमानता के विरुद्ध आवाज उठाई। उनका मूल संदेश था — “मनखे-मनखे एक समान”, अर्थात सभी मनुष्य समान हैं।
गुरु घासीदास ने सतनाम पंथ की स्थापना कर सत्य, अहिंसा, समानता और नैतिक जीवन का मार्ग दिखाया। उनका आंदोलन सामाजिक सुधार का सशक्त माध्यम बना, जिसने दलित और वंचित वर्ग को आत्मसम्मान और चेतना दी। आज भी छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में उनके विचार सामाजिक समरसता का आधार हैं।

भिखारी ठाकुर (जन्म: 18 दिसंबर 1887)

जन्म स्थान: कुतुबपुर, जिला सारण, बिहार, भारत

भिखारी ठाकुर को भोजपुरी लोकसंस्कृति का शेक्सपियर कहा जाता है। वे केवल कलाकार नहीं, बल्कि समाज सुधारक और जनचेतना के संवाहक थे। उन्होंने अपने नाटकों और गीतों के माध्यम से स्त्री-वेदना, प्रवासी मजदूरों की पीड़ा, दहेज प्रथा और सामाजिक कुरीतियों को मंच पर जीवंत किया।
“बिदेसिया”, “गबरघिचोर” जैसे नाटक आज भी सामाजिक यथार्थ का आईना हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद भिखारी ठाकुर ने लोकभाषा को सम्मान दिलाया और आम जनता की आवाज को कला का स्वरूप दिया। उनका योगदान भारतीय लोकनाट्य इतिहास में अमर है।

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वी. वेंकटसुब्बा रेड्डीयर (जन्म: 18 दिसंबर 1909)

जन्म स्थान: आंध्र प्रदेश, भारत

वी. वेंकटसुब्बा रेड्डीयर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से लेकर स्वतंत्र भारत के राजनीतिक विकास तक उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वे जनसेवा, संगठनात्मक क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे।
उन्होंने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मजबूत किया और सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़े मुद्दों को विधानसभा और जनता के बीच प्रभावी ढंग से उठाया। उनका जीवन राजनीति में सादगी, सिद्धांत और सेवा भावना का उदाहरण है।

ई. एस. वेंकटरमैय्या (जन्म: 18 दिसंबर 1924)

जन्म स्थान: आंध्र प्रदेश, भारत

न्यायपालिका के क्षेत्र में ई. एस. वेंकटरमैय्या का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे भारत के 19वें मुख्य न्यायाधीश रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने न्याय की स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
उनके निर्णयों में विधिक स्पष्टता, मानवीय दृष्टिकोण और संविधान की आत्मा दिखाई देती थी। न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने और न्याय तक आम नागरिक की पहुंच सुनिश्चित करने में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है।

राम मोहन नायडू किंजरापु (जन्म: 18 दिसंबर 1987)

जन्म स्थान: श्रीकाकुलम जिला, आंध्र प्रदेश, भारत

राम मोहन नायडू किंजरापु आधुनिक भारत के युवा और ऊर्जावान नेताओं में शामिल हैं। वे आंध्र प्रदेश से लोकसभा सांसद रह चुके हैं और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
युवा नेतृत्व के प्रतीक के रूप में उन्होंने बुनियादी ढांचे, शिक्षा, डिजिटल विकास और क्षेत्रीय विकास से जुड़े मुद्दों को संसद में मजबूती से उठाया। उनका राजनीतिक सफर नई पीढ़ी की आकांक्षाओं, पारदर्शिता और विकासोन्मुख सोच को दर्शाता है।

18 दिसंबर को जन्मे ये महान व्यक्तित्व संत परंपरा, लोककला, न्याय और राजनीति के विविध आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके जीवन से हमें समानता, सृजनशीलता, न्यायप्रियता और जनसेवा की प्रेरणा मिलती है। यह तिथि भारतीय इतिहास में विचार, संस्कृति और लोकतंत्र की साझा विरासत को सशक्त करती है।

विज्ञान और युद्ध बदलने वाले ऐतिहासिक दिन

18 दिसंबर: इतिहास की वह तारीख जिसने युद्ध, विज्ञान और विश्व राजनीति की दिशा बदल दी

इतिहास केवल अतीत की स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को दिशा देने वाला जीवंत दस्तावेज़ है। 18 दिसंबर ऐसी ही एक ऐतिहासिक तारीख है, जिस दिन विश्व ने युद्ध, कूटनीति, विज्ञान, अंतरिक्ष, खेल और शासन व्यवस्था से जुड़े अनेक निर्णायक क्षणों को साक्षात घटित होते देखा। आइए जानते हैं 18 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएँ, जिनका प्रभाव आज भी वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाता है।

2014 – भारत का सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 सफलतापूर्वक प्रक्षेपित

18 दिसंबर 2014 को भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में ऐतिहासिक छलांग लगाई। इस दिन इसरो ने जीएसएलवी मार्क-3 का सफल प्रक्षेपण किया, जो उस समय तक का भारत का सबसे भारी रॉकेट था। यह मिशन भविष्य में मानव अंतरिक्ष उड़ान (गगनयान) के लिए आधारशिला बना। इस सफलता ने भारत को विश्व के अग्रणी अंतरिक्ष देशों की कतार में ला खड़ा किया।

2017 – राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में भारत का अभूतपूर्व प्रदर्शन

2017 में आयोजित राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में भारत ने खेल इतिहास रच दिया। भारतीय पहलवानों ने 30 में से 29 स्वर्ण पदक जीतकर अपना दबदबा साबित किया। यह उपलब्धि न केवल खेल प्रतिभा का प्रमाण बनी, बल्कि देश में कुश्ती को नई पहचान और युवाओं को प्रेरणा देने वाली साबित हुई।

2015 – ब्रिटेन की अंतिम कोयला खदान का बंद होना

18 दिसंबर 2015 को ब्रिटेन की केलिंगले कोलियरी बंद कर दी गई, जिससे वहां के कोयला खनन युग का अंत हो गया। यह घटना औद्योगिक क्रांति के एक युग के समाप्त होने का प्रतीक बनी। साथ ही, यह पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान को भी दर्शाती है।

2008 – ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण

भारत ने 18 दिसंबर 2008 को ब्रह्मोस मिसाइल का सफल परीक्षण कर अपनी रक्षा क्षमता को और मजबूत किया। यह विश्व की सबसे तेज़ सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। इस उपलब्धि ने भारत को आधुनिक सैन्य तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

2007 – जापान का इंटरसेप्टर मिसाइल परीक्षण

इस दिन जापान ने अपनी सुरक्षा तैयारियों को सुदृढ़ करते हुए इंटरसेप्टर मिसाइल का परीक्षण किया। यह परीक्षण एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच जापान की रणनीतिक सोच और तकनीकी प्रगति को दर्शाता है।

2006 – मलेशिया में विनाशकारी बाढ़

18 दिसंबर 2006 को मलेशिया में आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। इस प्राकृतिक आपदा में कम से कम 118 लोगों की मृत्यु हुई और चार लाख से अधिक लोग बेघर हो गए। यह घटना जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन की वैश्विक चुनौती को उजागर करती है।

2006 – संयुक्त अरब अमीरात में पहली बार चुनाव

इसी वर्ष 18 दिसंबर को संयुक्त अरब अमीरात में पहली बार चुनाव आयोजित किए गए। यह कदम खाड़ी देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना गया, जिसने राजनीतिक भागीदारी को नया आयाम दिया।

2005 – भूटान के राजा द्वारा गद्दी छोड़ने की घोषणा

भूटान के नरेश जिग्मे सिंग्मे वांगचुक ने 18 दिसंबर 2005 को 2008 में गद्दी त्यागने की घोषणा की। यह निर्णय दक्षिण एशिया में लोकतांत्रिक संक्रमण का दुर्लभ उदाहरण बना, जहां एक राजा ने स्वेच्छा से सत्ता जनता को सौंपने का मार्ग चुना।

2002 – सिपिदान और लिगितान द्वीपों पर मलेशिया का अधिकार

हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने 18 दिसंबर 2002 को दिए फैसले में सिपिदान और लिगितान द्वीपों पर मलेशिया के अधिकार की पुष्टि की। यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सीमा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का महत्वपूर्ण उदाहरण बना।

1999 – श्रीलंका की राष्ट्रपति पर आत्मघाती हमला

18 दिसंबर 1999 को श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा पर जानलेवा हमला हुआ। इस हमले में 25 लोगों की मृत्यु और 100 से अधिक घायल हुए। यह घटना श्रीलंका के गृहयुद्ध और आतंकवाद की भयावहता को दर्शाती है।

1997 – भारत-अमेरिका अंतरिक्ष सहयोग संधि

इस दिन भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष अनुसंधान सहयोग के लिए वाशिंगटन संधि संपन्न हुई। यह समझौता दोनों देशों के वैज्ञानिक संबंधों को मजबूत करने और भविष्य की अंतरिक्ष परियोजनाओं के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

1995 – पुरुलिया हथियार कांड

18 दिसंबर 1995 को एक अज्ञात विमान ने पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में हथियार गिराए। यह घटना भारत के सुरक्षा इतिहास में एक रहस्यमयी और गंभीर प्रकरण के रूप में दर्ज है, जिसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सुनाई दी।

1989 – सचिन तेंदुलकर का पहला वनडे मैच

क्रिकेट प्रेमियों के लिए 18 दिसंबर बेहद खास है। इसी दिन सचिन तेंदुलकर ने पाकिस्तान के खिलाफ अपना पहला एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेला। यहीं से क्रिकेट इतिहास के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक की वनडे यात्रा शुरू हुई।

1973 – इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक की स्थापना

18 दिसंबर 1973 को इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक की स्थापना की गई। यह संस्था इस्लामिक देशों के आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और सहयोग को बढ़ावा देने में आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

1960 – राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली का शुभारंभ

भारत की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के उद्देश्य से 18 दिसंबर 1960 को राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली का उद्घाटन हुआ। यह संग्रहालय आज भारतीय इतिहास, कला और सभ्यता का जीवंत दस्तावेज़ है।

1878 – अल-थानी परिवार का कतर पर शासन

18 दिसंबर 1878 को अल-थानी परिवार कतर पर शासन करने वाला पहला शासक परिवार बना। यह दिन आधुनिक कतर राज्य की नींव रखने वाला ऐतिहासिक क्षण माना जाता है।

1833 – रूस का राष्ट्रीय गान पहली बार गाया गया

इस दिन रूस का राष्ट्रीय गान ‘गॉड सेव द जार’ पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। यह घटना रूसी साम्राज्य की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान को मजबूत करने वाली थी।

1787 – अमेरिकी संविधान को न्यू जर्सी की स्वीकृति

18 दिसंबर 1787 को न्यू जर्सी अमेरिकी संविधान को स्वीकार करने वाला तीसरा राज्य बना। यह कदम आधुनिक अमेरिकी लोकतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

1398 – तैमूर का दिल्ली पर कब्ज़ा

18 दिसंबर 1398 को तैमूर ने सुल्तान नुसरत शाह को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। यह आक्रमण भारतीय इतिहास के सबसे विनाशकारी अध्यायों में से एक माना जाता है।

1271 – युआन वंश की स्थापना

मंगोल शासक कुबलई खान ने 18 दिसंबर 1271 को अपने साम्राज्य का नाम युआन रखा। इसी के साथ चीन और मंगोलिया में युआन वंश की शुरुआत हुई, जिसने एशियाई इतिहास की दिशा बदल दी।

मूलांक 1 से 9 तक का आज का भविष्य

अंक राशिफल 18 दिसंबर 2025: मूलांक 1 से 9 तक का आज का भविष्य | पंडित सुधीर तिवारी (अंतिम बाबा)

अंक ज्योतिष के अनुसार जन्मतिथि से निकला मूलांक व्यक्ति के स्वभाव, भाग्य और दैनिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। 18 दिसंबर 2025 का दिन किस मूलांक के लिए शुभ रहेगा, किसे सावधानी बरतनी चाहिए—आइए जानते हैं कार्य-व्यवसाय, शिक्षा, कला-संगीत, राजनीति, प्रशासन, आर्थिक स्थिति, शुभ रंग-अंक और पूज्य देवता सहित विस्तृत अंक राशिफल।

मूलांक 1 (जन्म तिथि 1, 10, 19, 28)
आज आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता प्रबल रहेगी।
कार्य/व्यवसाय: नए प्रोजेक्ट, प्रमोशन या जिम्मेदारी के योग।
शिक्षा: प्रतियोगी परीक्षा व उच्च शिक्षा में सकारात्मक परिणाम।
कला-संगीत: रचनात्मकता में निखार, मंच से सराहना।
राजनीति/प्रशासन: नेतृत्वकारी भूमिका उभरेगी।
आर्थिक स्थिति: आय में सुधार, खर्च पर नियंत्रण रखें।
शुभ रंग: लाल | शुभ अंक: 1
पूज्य देवता: भगवान सूर्य

मूलांक 2 (जन्म तिथि 2, 11, 20, 29)
भावनात्मक संतुलन जरूरी।
कार्य/व्यवसाय: साझेदारी में लाभ, धैर्य से काम लें।
शिक्षा: अध्ययन में एकाग्रता बढ़ेगी।
कला-संगीत: भावप्रधान रचनाओं में सफलता।
राजनीति/प्रशासन: संवाद से काम बनेगा।
आर्थिक स्थिति: सामान्य, अनावश्यक खर्च से बचें।
शुभ रंग: सफेद | शुभ अंक: 2
पूज्य देवता: देवी पार्वती / चंद्रदेव

मूलांक 3 (जन्म तिथि 3, 12, 21, 30)
भाग्य का साथ मिलेगा।
कार्य/व्यवसाय: रुके काम पूरे होंगे।
शिक्षा: विद्यार्थियों के लिए सफलता का दिन।
कला-संगीत: गुरुजनों से मार्गदर्शन।
राजनीति/प्रशासन: मान-सम्मान बढ़ेगा।
आर्थिक स्थिति: निवेश के लिए अनुकूल।
शुभ रंग: पीला | शुभ अंक: 3
पूज्य देवता: भगवान बृहस्पति

मूलांक 4 (जन्म तिथि 4, 13, 22, 31)
दिन चुनौतीपूर्ण लेकिन संभालने योग्य।
कार्य/व्यवसाय: योजनाओं में बदलाव संभव।
शिक्षा: तकनीकी व प्रबंधन क्षेत्र में लाभ।
कला-संगीत: अभ्यास से सफलता।
राजनीति/प्रशासन: नियमों का पालन जरूरी।
आर्थिक स्थिति: खर्च नियंत्रित रखें।
शुभ रंग: नीला | शुभ अंक: 4
पूज्य देवता: भगवान गणेश

मूलांक 5 (जन्म तिथि 5, 14, 23)
तेजी और चतुराई का दिन।
कार्य/व्यवसाय: मार्केटिंग, मीडिया, व्यापार में लाभ।
शिक्षा: संचार व लेखन से जुड़े छात्रों को सफलता।
कला-संगीत: नए प्रयोग लाभ देंगे।
राजनीति/प्रशासन: वक्तृत्व से प्रभाव।
आर्थिक स्थिति: धन आगमन के योग।
शुभ रंग: हरा | शुभ अंक: 5
पूज्य देवता: भगवान विष्णु / बुधदेव

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मूलांक 6 (जन्म तिथि 6, 15, 24)
सुख-सौंदर्य और संबंधों का दिन।
कार्य/व्यवसाय: फैशन, होटल, कला क्षेत्र में लाभ।
शिक्षा: रचनात्मक विषयों में प्रगति।
कला-संगीत: प्रशंसा और अवसर।
राजनीति/प्रशासन: जनसंपर्क मजबूत होगा।
आर्थिक स्थिति: आरामदायक, विलास पर खर्च संभव।
शुभ रंग: गुलाबी | शुभ अंक: 6
पूज्य देवता: देवी लक्ष्मी

मूलांक 7 (जन्म तिथि 7, 16, 25)
आत्मचिंतन और आध्यात्मिक रुझान।
कार्य/व्यवसाय: बड़े फैसले टालें।
शिक्षा: शोध व विश्लेषण में सफलता।
कला-संगीत: साधना से लाभ।
राजनीति/प्रशासन: पर्दे के पीछे की भूमिका।
आर्थिक स्थिति: स्थिर, जोखिम न लें।
शुभ रंग: बैंगनी | शुभ अंक: 7
पूज्य देवता: भगवान शिव

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मूलांक 8 (जन्म तिथि 8, 17, 26)
मेहनत का फल मिलेगा।
कार्य/व्यवसाय: करियर में स्थिरता।
शिक्षा: अनुशासन से सफलता।
कला-संगीत: धैर्य से पहचान।
राजनीति/प्रशासन: अधिकार बढ़ेंगे।
आर्थिक स्थिति: पुराने निवेश से लाभ।
शुभ रंग: काला | शुभ अंक: 8
पूज्य देवता: शनि देव

मूलांक 9 (जन्म तिथि 9, 18, 27)
ऊर्जा और साहस से भरपूर दिन।
कार्य/व्यवसाय: नई शुरुआत शुभ।
शिक्षा: खेल व रक्षा क्षेत्र के छात्रों को लाभ।
कला-संगीत: जोशपूर्ण प्रस्तुति।
राजनीति/प्रशासन: प्रभावशाली निर्णय।
आर्थिक स्थिति: आय में वृद्धि।
शुभ रंग: केसरिया | शुभ अंक: 9
पूज्य देवता: भगवान हनुमान।

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डिस्क्लेमर: यह अंक राशिफल पंडित सुधीर तिवारी (अंतिम बाबा) द्वारा अंक ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है। राष्ट्र की परम्परा इस ज्योतिष को प्रमाणित नहीं करती। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पूर्व अपनी जन्मकुंडली किसी योग्य विशेषज्ञ को अवश्य दिखाएं।

गुरु घासीदास: सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध चेतना की अलख, सद्भावना का संदेश

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जयंती विशेष | नवनीत मिश्र

भारतीय समाज में समता, सत्य और मानव गरिमा की चेतना को जन-जन तक पहुंचाने वाले सतनाम पंथ के संस्थापक गुरु घासीदास केवल एक संत नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार के अग्रदूत थे। उनकी जयंती सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष, सत्य के आग्रह और आपसी सद्भाव के संदेश को स्मरण करने का अवसर है। उन्होंने ऐसे समय में समाज को नई दिशा दी, जब जाति, छुआछूत और अंधविश्वास ने मानवता को जकड़ रखा था। गुरु घासीदास ने उस दौर में जन्म लिया, जब समाज ऊंच-नीच, भेदभाव और पाखंड से ग्रस्त था। वंचित वर्ग के लिए सम्मान और समान अवसर की कल्पना भी कठिन थी। उन्होंने इन परिस्थितियों को स्वीकार करने के बजाय सामाजिक अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण वैचारिक संघर्ष का मार्ग चुना। उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक परिवर्तन आत्मशुद्धि और सत्याचरण से ही संभव है। उन्होंने सतनाम पंथ के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि ईश्वर सत्य में है और सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है। कर्मकांड, दिखावे और बाहरी आडंबरों से परे जाकर उन्होंने सरल जीवन, सदाचार और मानव सेवा को धर्म का आधार बताया। सतनाम पंथ का दर्शन जाति, वर्ग और भेदभाव से मुक्त समाज की अवधारणा प्रस्तुत करता है। गुरु घासीदास ने अपने उपदेशों और आचरण से समाज में व्याप्त अनेक बुराइयों का विरोध किया। उन्होंने छुआछूत, नशाखोरी, हिंसा और अनैतिक जीवनशैली से दूर रहने का संदेश दिया। श्रम की गरिमा और आत्मसम्मान को उन्होंने जीवन का मूल मंत्र बनाया। उनका कहना था कि मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से होती है। उनका उद्देश्य केवल विरोध नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना था। वे प्रेम, करुणा और भाईचारे पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के पक्षधर थे। उनके विचारों ने समाज के कमजोर वर्ग को आत्मविश्वास दिया और समानता की भावना को मजबूती प्रदान की। वर्तमान समय में जब समाज विभाजन, असहिष्णुता और नैतिक संकट से गुजर रहा है, गुरु घासीदास का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो गया है। सत्य, समता और सद्भाव के उनके विचार आज भी सामाजिक एकता का मजबूत आधार बन सकते हैं। बाबा गुरु घासीदास की जयंती केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करने का संकल्प लेने का अवसर है। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष, सत्य का अनुसरण और मानवता के प्रति समर्पण, यही उनके जीवन और दर्शन का सार है। उनके बताए मार्ग पर चलकर ही एक न्यायपूर्ण, समरस और सद्भावनापूर्ण समाज का निर्माण संभव है।

भोजपुरी के ‘शेक्सपियर’ स्व. भिखारी ठाकुर : लोकसंस्कृति, सामाजिक चेतना और सामाजिक सुधार के महान स्वर

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जयंती विशेष पुनीत मिश्र

भोजपुरी लोकसंस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाले, भोजपुरी के ‘शेक्सपियर’ कहे जाने वाले स्व. भिखारी ठाकुर केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि कुशल निर्देशक, समाज सुधारक, संस्कृति के सजग प्रहरी और महान लोक कलाकार थे। उनकी जयंती भोजपुरी भाषा, लोककला और सामाजिक चेतना के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।
स्व. भिखारी ठाकुर ने उस दौर में कलम और मंच को अपना माध्यम बनाया, जब समाज रूढ़ियों, कुरीतियों और अशिक्षा से जूझ रहा था। उन्होंने नाटक, गीत और लोकप्रसंगों के माध्यम से आम जन की पीड़ा, स्त्री-विमर्श, प्रवासी मजदूरों का दर्द, जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय को प्रभावी स्वर दिया। उनकी रचनाओं में मनोरंजन के साथ-साथ सशक्त सामाजिक संदेश निहित रहता था, जो सीधे जनमानस को झकझोरता था।
भिखारी ठाकुर की रचनाएं जनजीवन की सजीव तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। ‘बिदेसिया’, ‘बेटी बेचवा’, ‘गबरघिचोर’, ‘बिधवा विलाप’ जैसे नाटक आज भी सामाजिक यथार्थ के जीवंत दस्तावेज माने जाते हैं। उन्होंने नारी शोषण, विवाह में व्याप्त कुरीतियों, प्रवास की पीड़ा और पारिवारिक विघटन जैसे विषयों को लोकभाषा में प्रस्तुत कर समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। यही कारण है कि उन्हें भोजपुरी का ‘शेक्सपियर’ कहा गया।
वे केवल लेखक नहीं थे, बल्कि मंच के कुशल निर्देशक और प्रभावशाली अभिनेता भी थे। लोकनाट्य को उन्होंने गांव-गांव तक पहुंचाया और इसे सामाजिक सुधार का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी भाषा सरल, सहज और प्रभावी थी, जिससे सामान्य और अशिक्षित वर्ग भी उनके संदेश को आसानी से समझ सका।
स्व. भिखारी ठाकुर लोकसंस्कृति के सच्चे प्रहरी थे। उन्होंने भोजपुरी भाषा और लोकपरंपराओं को सम्मान दिलाया और यह सिद्ध किया कि लोककला भी समाज परिवर्तन की अपार शक्ति रखती है। उनका संपूर्ण जीवन समाज के वंचित, शोषित और उपेक्षित वर्ग की आवाज बनने में समर्पित रहा।
उनकी जयंती पर यह स्मरण आवश्यक है कि भिखारी ठाकुर की विरासत केवल साहित्य या रंगमंच तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना की जीवंत धरोहर है। आज भी उनके विचार, रचनाएं और संदेश उतने ही प्रासंगिक हैं। लोकसंस्कृति, सामाजिक न्याय और मानवीय संवेदना के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें सदैव अमर बनाए रखेगी।

संविधान से व्यवस्था, परमात्मा से नैतिकता

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कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान वह मजबूत आधार है, जिस पर शासन, अधिकार और कर्तव्यों की पूरी संरचना टिकी होती है। संविधान मानव द्वारा बनाए गए नियमों और कानूनों का सुव्यवस्थित संग्रह है, जिसका उद्देश्य समाज में व्यवस्था, समानता और न्याय स्थापित करना है। इसके अनुच्छेद यह तय करते हैं कि देश कैसे चलेगा, नागरिकों के अधिकार क्या होंगे और सत्ता की सीमाएं कहां तक होंगी। संविधान राज्य और नागरिकों के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य करता है। यह बताता है कि सरकार को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, साथ ही नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार और कर्तव्य प्राप्त हैं। कानून का डर समाज में अनुशासन बनाए रखने में सहायक होता है, जिससे अराजकता पर नियंत्रण रहता है। वहीं दूसरी ओर परमात्मा किसी लिखित ग्रंथ या अनुच्छेद में सीमित नहीं हैं। वे मानव जीवन में नैतिकता और आत्मबोध का शाश्वत स्रोत माने जाते हैं। सत्य, अहिंसा, दया, परोपकार और सह-अस्तित्व जैसे मूल्य किसी कानून के भय से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की प्रेरणा से जन्म लेते हैं। नैतिकता मनुष्य को गलत कार्य करने से पहले ही रोकती है।संविधान यह सिखाता है कि क्या करना अनिवार्य है और क्या निषिद्ध, जबकि परमात्मा यह बोध कराते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। कानून अक्सर अपराध होने के बाद दंड देता है, लेकिन नैतिकता अपराध की संभावना को पहले ही समाप्त कर देती है। यही दोनों के बीच मूल अंतर और आपसी पूरकता है। एक आदर्श समाज वही होता है, जहां संविधान का पालन केवल दंड के डर से नहीं, बल्कि नैतिक चेतना से किया जाए। जब कानून और नैतिकता साथ-साथ चलते हैं, तभी लोकतंत्र मजबूत बनता है। संविधान समाज को अनुशासित करता है और परमात्मा उसे संवेदनशील बनाते हैं। दोनों का संतुलन ही मानवता की सच्ची पहचान और मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला है।

दोहरीकरण परियोजना से पूर्वी उत्तर प्रदेश की रेल कनेक्टिविटी को नई रफ्तार

रेल संरक्षा आयुक्त ने दुल्लहपुर–मऊ दोहरीकरण खंड का किया विस्तृत संरक्षा निरीक्षण

वाराणसी (राष्ट्र की परम्परा)।पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी मंडल में रेल अधोसंरचना के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। भटनी–औंड़िहार रेलखंड पर दुल्लहपुर–मऊ (करीब 21 किलोमीटर) रेलखंड के दोहरीकरण एवं विद्युतीकरण कार्य के पूर्ण होने के बाद 17 दिसंबर 2025 को रेल संरक्षा आयुक्त, उत्तर पूर्व सर्किल प्रणजीव सक्सेना द्वारा गहन संरक्षा निरीक्षण किया गया। यह निरीक्षण रेलवे संचालन की सुरक्षा, गुणवत्ता और मानकों की कसौटी पर परियोजना को परखने के उद्देश्य से किया गया।

निरीक्षण के दौरान रेल संरक्षा आयुक्त ने दुल्लहपुर स्टेशन से लेकर पिपरीडीह और मऊ स्टेशन तक विभिन्न तकनीकी एवं संरक्षा पहलुओं का जायजा लिया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली, स्टेशन यार्ड का विस्तार, समपार फाटकों का दोहरीकरण, प्लेटफॉर्म एवं पैदल उपरिगामी पुलों की क्लियरेंस, ओवरहेड ट्रैक्शन लाइन, पुल–पुलियाओं की स्थिति और लॉन्ग वेल्डेड रेल की जांच शामिल रही। मोटर ट्रॉली के माध्यम से पूरे खंड का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए उन्होंने रेलवे इंजीनियरिंग मानकों के अनुपालन की पुष्टि की।

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मऊ रेलवे स्टेशन पर यार्ड रिमॉडलिंग, पश्चिम केबिन के वी.डी.यू. पैनल, रिले रूम तथा संरक्षा उपकरणों में किए गए बदलावों का निरीक्षण कर अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा की गई। अधिकारियों ने परियोजना की प्रगति और तकनीकी विशेषताओं की जानकारी दी।

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, भटनी–औंड़िहार दोहरीकरण परियोजना उत्तर पूर्वी रेलवे के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके पूर्ण होने से इस व्यस्त मार्ग पर ट्रेनों की क्षमता बढ़ेगी, परिचालन सुचारु होगा और यात्रियों को तेज, सुरक्षित व सुविधाजनक रेल सेवा मिलेगी। साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में कनेक्टिविटी बेहतर होने से क्षेत्रीय आर्थिक विकास को भी बल मिलेगा।

18 दिसंबर 2025 को मऊ–खुरहट खंड का संरक्षा निरीक्षण एवं इसके बाद दुल्लहपुर–मऊ और मऊ–खुरहट रेलखंड पर अधिकतम गति से स्पीड ट्रायल प्रस्तावित है। रेलवे प्रशासन ने आमजन से अपील की है कि निरीक्षण व स्पीड ट्रायल के दौरान रेलपथ से दूर रहें और सुरक्षा में सहयोग करें।

संविधान नियमों का संग्रह, परमात्मा नैतिकता का स्रोत

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डॉ. सतीश पाण्डेय

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान वह आधार है, जिस पर शासन, अधिकार और कर्तव्यों की पूरी इमारत खड़ी होती है। संविधान मानव द्वारा रचित नियमों का सुव्यवस्थित संग्रह है, जो समाज में व्यवस्था,समानता और न्याय सुनिश्चित करता है। इसके अनुच्छेद हमें बताते हैं कि राज्य कैसे चलेगा, नागरिकों के अधिकार क्या होंगे और सत्ता की सीमाएं कहां तक होंगी। वहीं दूसरी ओर परमात्मा किसी लिखित ग्रंथ या अनुच्छेद में सीमित नहीं हैं। परमात्मा नैतिकता का वह शाश्वत स्रोत हैं, जो मानव के विवेक, करुणा और आत्मबोध को दिशा देता है। सत्य, अहिंसा,दया, परोपकार और सह-अस्तित्व जैसे मूल्य किसी कानून के डर से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की पुकार से जन्म लेते हैं।
संविधान हमें यह सिखाता है कि क्या करना अनिवार्य है और क्या निषिद्ध, जबकि परमात्मा यह बोध कराते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। कानून अपराध के बाद दंड देता है, लेकिन नैतिकता अपराध से पहले ही मनुष्य को रोक लेती है। यही दोनों के बीच मूल अंतर और पूरकता है।
एक आदर्श समाज वही होता है जहां संविधान का पालन भय से नहीं, बल्कि नैतिक चेतना से किया जाए। जब कानून और नैतिकता साथ चलते हैं, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। संविधान समाज को अनुशासित करता है और परमात्मा उसे संवेदनशील बनाते हैं। दोनों का संतुलन ही मानवता की सच्ची कसौटी है।