Sunday, June 21, 2026
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सोशल मीडिया दोस्ती बनी जाल, यूट्यूबर पत्नी ने पति संग रची करोड़ों की ठगी की साजिश

करीमनगर (राष्ट्र की परम्परा)। तेलंगाना में सोशल मीडिया के जरिए पुरुषों को जाल में फंसाकर लाखों-करोड़ों रुपये की ठगी करने वाले पति-पत्नी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी पत्नी एक यूट्यूबर है, जबकि पति इंटीरियर डिजाइनर है। पुलिस के मुताबिक, दोनों लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे और इसी वजह से उन्होंने सुनियोजित तरीके से हनीट्रैप और ब्लैकमेलिंग का रैकेट खड़ा किया।

सोशल मीडिया फॉलोअर्स को ‘बंपर ऑफर’

जांच में सामने आया है कि महिला अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स को सीधे फोन कर आकर्षक ऑफर देती थी। इसके बाद वह उनसे एकांत में मुलाकात करती थी। इसी दौरान पति गुप्त रूप से वीडियो रिकॉर्ड करता था। बाद में दंपति इन वीडियो के जरिए पीड़ितों को ब्लैकमेल कर मोटी रकम वसूलते थे।

करीमनगर में इस ठगी का खुलासा होने पर पुलिस भी हैरान रह गई। छापेमारी के दौरान पुलिस ने बड़ी संख्या में आपत्तिजनक वीडियो, नकदी, मोबाइल फोन और अन्य सामान बरामद किया है।

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सैकड़ों पीड़ित, पेशेवर लोग भी शिकार

पुलिस के अनुसार, इस गिरोह के शिकार लोगों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है। पीड़ितों में अलग-अलग पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं।
डर के कारण अधिकांश लोग चुप रहे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिए जाएंगे।

करीबी रिश्तेदार को भी नहीं छोड़ा

दंपति ने अपने करीबी परिचित को भी निशाना बनाया। उससे बड़ी रकम वसूली गई। हाल ही में जब वह उनसे दूर हो गया, तो आरोपियों ने फोन कर पांच लाख रुपये की मांग की। डर के मारे पीड़ित ने एक लाख रुपये दे दिए। परिजनों की सलाह पर जब पुलिस में शिकायत की गई, तो पूरा मामला उजागर हो गया।

65 लाख का फ्लैट और लग्जरी सामान

पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि इस ठगी के पैसों से दंपति ने 65 लाख रुपये का फ्लैट, महंगी कारें, सोना और अन्य कीमती सामान खरीदा था। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर आगे की जांच शुरू कर दी है।

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देवरिया में बड़ी पुलिस कार्रवाई, इनामी बदमाश दबोचा गया

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा) पुलिस मुठभेड़ में बड़ी सफलता हाथ लगी है। थाना सुरौली और थाना मदनपुर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में 25 हजार रुपये का इनामी अपराधी मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया। यह कार्रवाई 16 जनवरी 2026 की रात पकड़ी बाजार क्षेत्र में संदिग्ध वाहन चेकिंग के दौरान हुई।

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पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि एक कुख्यात बदमाश मोटरसाइकिल से सुकईपुरा की ओर से ठाकुरदेवा पुल की तरफ आ रहा है। सूचना के आधार पर घेराबंदी की गई। पुलिस को देखकर आरोपी भागने लगा, लेकिन फिसलकर गिर पड़ा और पुलिस पर फायरिंग कर दी। जवाबी कार्रवाई में आरोपी के बाएं पैर में गोली लगी, जिसके बाद उसे काबू कर अस्पताल भेजा गया।
गिरफ्तार अभियुक्त की पहचान मन्टू यादव उर्फ अपराधी निवासी थाना मदनपुर, देवरिया के रूप में हुई है। आरोपी के पास से एक नाजायज तमंचा, तीन जिंदा कारतूस, एक खोखा कारतूस और एक मोटरसाइकिल बरामद की गई। अभियुक्त पर देवरिया और आजमगढ़ जनपद में गंभीर धाराओं में कई मुकदमे दर्ज हैं।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, देवरिया पुलिस मुठभेड़ जिले में अपराध नियंत्रण अभियान का अहम हिस्सा है और आगे भी ऐसे अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।

रेलवे अंडरपास में पानी से मिला अज्ञात शव, क्षेत्र में फैली सनसनी

सलेमपुर/देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)देवरिया जिले के सलेमपुर विकास खंड अंतर्गत मईल थाना क्षेत्र में स्थित एक रेलवे अंडरपास से अज्ञात व्यक्ति का शव बरामद होने से इलाके में हड़कंप मच गया। शव पानी में डूबा हुआ मिला, जिससे आसपास के लोगों में दहशत का माहौल बन गया।
घटना सलेमपुर–बरहज रेलखंड पर देवरहा बाबा हॉल्ट के समीप करौता गांव के पास स्थित रेलवे अंडरपास की है। सोमवार सुबह स्थानीय लोग जब शौच के लिए इस मार्ग से गुजर रहे थे, तो उन्हें तेज दुर्गंध महसूस हुई। दुर्गंध के स्रोत की तलाश के दौरान अंडरपास में भरे पानी में एक व्यक्ति का शव तैरता हुआ दिखाई दिया।
सूचना मिलते ही मईल थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पानी से बाहर निकलवाकर कब्जे में ले लिया। समाचार लिखे जाने तक मृतक की पहचान नहीं हो सकी थी। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और पहचान के साथ-साथ मौत के कारणों की जांच की जा रही है।

Cough Syrup Case: हवाला कारोबार की चेन खंगालेगी SIT, वारंट-B पर तीन आरोपी 17 जनवरी को लाए जाएंगे सोनभद्र

सोनभद्र (राष्ट्र की परम्परा)। कफ सिरप तस्करी के बड़े रैकेट पर शिकंजा कसने के बाद अब सोनभद्र पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) इस अवैध कारोबार से जुड़े हवाला नेटवर्क की परतें खोलने में जुट गई है। जांच में सामने आया है कि सोनभद्र में हुई बरामदगी और रांची से दिखाई गई फर्जी सप्लाई के तार वाराणसी और सहारनपुर से जुड़े हुए हैं।
मामले में पकड़े गए तीन आरोपियों को पूछताछ के लिए वारंट-B पर 17 जनवरी को सोनभद्र लाया जाएगा।

पांच राज्यों में फैला कफ सिरप तस्करी रैकेट

यूपी समेत पांच राज्यों में फैले कफ सिरप तस्करी गिरोह पर कार्रवाई के बाद सोनभद्र पुलिस को तस्करी से होने वाले काले धन के हवाला लेन-देन के अहम सुराग मिले हैं।
हाल ही में वाराणसी पुलिस ने हवाला कारोबार में शामिल पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जिनसे पूछताछ में 23 करोड़ रुपये के फर्जी लेन-देन की पुष्टि हुई थी।

शुभम जायसवाल के लिए काम करने की स्वीकारोक्ति

गिरफ्तार आरोपियों में रोहनिया निवासी स्वप्निल केशरी और दिनेश यादव शामिल थे। पूछताछ में पांचों आरोपियों ने शुभम जायसवाल के लिए काम करने की बात स्वीकार की थी।
जांच में यह भी सामने आया कि अवैध लेन-देन के तार बिहार, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश तक जुड़े हुए हैं।

सोना और हवाला से पहुंचती थी तस्करी की रकम

SIT को मिली जानकारी के अनुसार, कफ सिरप तस्करी से मिलने वाली रकम या तो सोने के रूप में या फिर हवाला के जरिए नोटों की गड्डियों में वाराणसी भेजी जाती थी।
इसी कड़ी में STF लखनऊ ने सहारनपुर निवासी सगे भाई अभिषेक शर्मा और शुभम शर्मा को गिरफ्तार किया था, जो कफ सिरप तस्करी का सिंडिकेट चला रहे थे।

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पूर्व सांसद का करीबी और बर्खास्त सिपाही भी रडार पर

इस गिरोह से पहले ही बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह, अमित टाटा और एक पूर्व सांसद के करीबी का नाम जुड़ चुका है।
जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क वाराणसी के रास्ते पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश तक कफ सिरप की तस्करी करता था। अब वाराणसी और लखनऊ के इन गिरोहों के तार सोनभद्र में दर्ज मामलों से जुड़ते पाए गए हैं।

तीन आरोपियों पर वारंट-B

प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर स्वप्निल केशरी, दिनेश यादव और अभिषेक शर्मा के खिलाफ संबंधित न्यायालय से वारंट-B हासिल कर लिया गया है।
इंस्पेक्टर सदानंद राय की अगुवाई वाली SIT अब आरोपियों को सोनभद्र लाकर गहन पूछताछ की तैयारी कर रही है।

अधिकारियों का बयान

पुलिस अधिकारियों के अनुसार—
“SIT ने वाराणसी में पकड़े गए दो और लखनऊ में गिरफ्तार एक आरोपी के खिलाफ वारंट-B हासिल किया है। कफ सिरप तस्करी और जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के संबंध में विस्तृत पूछताछ की जाएगी।”

बदलेगा पूर्वांचल का पोल्ट्री परिदृश्य

चूजों की सप्लाई में आत्मनिर्भरता की ओर पूर्वांचल, बलिया से शुरू हुई बड़ी पहल

घनश्याम तिवारी की कलम से


बलिया (राष्ट्र की परम्परा )। पूर्वांचल अब पोल्ट्री सेक्टर में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। जनपद के रेवती ब्लॉक स्थित छोटकी बेलहरी गांव में स्थापित ब्रायलर पेरेंट लेयर फार्म पूर्वांचल के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि बनकर सामने आया है। यह फार्म न केवल पूर्वांचल का पहला, बल्कि उत्तर प्रदेश का दूसरा आधुनिक ब्रायलर पेरेंट लेयर फार्म है, जो बड़े पैमाने पर चूजों की सप्लाई की क्षमता रखता है।
इस फार्म में वर्तमान में लगभग 13 हजार पेरेंट (प्रजनक) मुर्गियों का वैज्ञानिक तरीके से पालन किया जा रहा है। इनसे हर महीने करीब 10 लाख उच्च गुणवत्ता वाले ब्रायलर चूजों के उत्पादन की क्षमता विकसित की जा रही है। अभी शुरुआती चरण में ही बलिया और आजमगढ़ जनपदों के पोल्ट्री किसानों को चूजों की आपूर्ति शुरू हो चुकी है।

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दूसरे राज्यों पर निर्भरता होगी खत्म
अब तक उत्तर प्रदेश में ब्रायलर चूजों की मांग को पूरा करने के लिए हरियाणा, दिल्ली और अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता था। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार केवल आजमगढ़ मंडल के तीन जिलों—आजमगढ़, बलिया और मऊ—में हर महीने लगभग 33 लाख चूजों की आवश्यकता होती है।
आजमगढ़ में करीब 20 लाख
बलिया में 5 लाख
मऊ में लगभग 1 लाख चूजों की मासिक मांग है
ब्रायलर पेरेंट लेयर फार्म पूर्वांचल की स्थापना से यह निर्भरता अब धीरे-धीरे खत्म होने जा रही है। फार्म के पूरी क्षमता पर संचालित होने के बाद मऊ, गाजीपुर, वाराणसी, चंदौली, भदोही, जौनपुर, मिर्जापुर और सोनभद्र जैसे जिलों में भी चूजों की नियमित आपूर्ति संभव होगी।
कांट्रेक्ट फार्मिंग को मिलेगा बढ़ावा
आजमगढ़ मंडल में कांट्रेक्ट फार्मिंग के तहत करीब छह लाख ब्रायलर पक्षियों का पालन किया जा रहा है। इसके लिए अब तक लगभग चार लाख चूजे हर महीने गोरखपुर स्थित हैचरी से मंगाए जाते थे। अब वही आपूर्ति बलिया के छोटकी बेलहरी स्थित ब्रायलर पेरेंट लेयर फार्म पूर्वांचल से होने लगी है, जिससे लागत कम होगी और समय की बचत भी होगी।
आधुनिक तकनीक से हो रहा पालन
पेरेंट लेयर फार्म में नर और मादा प्रजनक मुर्गियों का वैज्ञानिक विधि से पालन किया जाता है, ताकि उच्च गुणवत्ता वाले निषेचित अंडे (फर्टाइल एग) प्राप्त किए जा सकें। इन्हीं अंडों से हैचरी में ब्रायलर चूजे निकलते हैं, जिन्हें आगे मांस उत्पादन के लिए पाला जाता है।
फार्म पर बायो-सिक्योरिटी, संतुलित पोषण, तापमान नियंत्रण और स्वास्थ्य निगरानी जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं लागू की गई हैं।
रोजगार के नए अवसर
इस परियोजना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए रास्ते खुले हैं। फार्म के संचालन से लगभग 15 लोगों को स्थायी और 20 लोगों को अस्थायी रोजगार मिला है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट, फीड सप्लाई, हैचरी और पोल्ट्री फार्मिंग से जुड़े सेक्टरों में अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों लोगों को काम मिलने की संभावना है।
अधिकारियों की निगरानी में संचालन
मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस.के. मिश्र के अनुसार ब्रायलर पेरेंट लेयर फार्म पूर्वांचल की नियमित निगरानी की जा रही है। नर-मादा मुर्गियों के स्वास्थ्य, टीकाकरण और प्रबंधन को लेकर समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। लक्ष्य है कि वर्ष के अंत तक पूरे पूर्वांचल में चूजों की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित की जाए।
फार्म संचालक पंकज पांडेय ने बताया कि इकाई का विस्तार कार्य प्रगति पर है और आने वाले समय में उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ाई जाएगी।

विकास के वादे और हकीकत: बरहज में बस स्टेशन अब भी सपना

सड़कों पर खड़ी बसें, मगर बस अड्डा नदारद: विकास की दौड़ में पिछड़ता बरहज

पवन पाण्डेय की कलम से


बरहज /देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। कभी उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक व धार्मिक केंद्र रहा बरहज आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। आधुनिक विकास के दावे तो बहुत किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नगर में आज तक एक व्यवस्थित बस अड्डा नहीं बन सका। नतीजा यह कि बसें सड़कों पर ही खड़ी होती हैं, जिससे आए दिन जाम की स्थिति बनती है और यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बरहज व्यापार का बड़ा केंद्र था। उस समय रेलवे, जल मार्ग और सड़क परिवहन—तीनों माध्यमों से बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। सरयू नदी के जरिए जहाजरानी फल-फूल रही थी, रेलवे व्यापारिक आवागमन का मजबूत साधन था और सड़क परिवहन से आसपास के जिलों से सीधा संपर्क बना रहता था। लेकिन समय के साथ हालात बदले। नदी के जलस्तर में कमी के कारण जल मार्ग बंद हो गया, रेलवे सीमित यात्री सेवाओं तक सिमट गई और सड़क परिवहन बिना किसी ठोस योजना के केवल यात्रियों को ढोने का माध्यम बनकर रह गया।

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सड़क पर खड़ी बसें बनती जाम की वजह
बरहज में बस अड्डा न होने का सबसे बड़ा असर यातायात व्यवस्था पर पड़ रहा है। बसें मुख्य सड़कों पर ही खड़ी होती हैं, जिससे बाजार क्षेत्र और प्रमुख चौराहों पर जाम लगना आम हो गया है। खासकर सुबह और शाम के समय स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। यात्रियों को सड़क किनारे खड़े होकर बसों का इंतजार करना पड़ता है—चाहे धूप हो, बारिश हो या कड़ाके की ठंड।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल असुविधा का नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी बड़ा मुद्दा है। सड़क पर खड़े यात्रियों और रुकती-चलती बसों के कारण दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है।

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जनप्रतिनिधियों पर उठ रहा सवाल
बस अड्डे की मांग बरसों से उठती रही है, लेकिन आज तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। लोगों का आरोप है कि हर चुनाव में विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजा शून्य रहता है। भाकपा जिला सचिव अरविंद कुशवाहा का कहना है कि बरहज का ऐतिहासिक गौरव धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधि विकास के मुद्दों को छोड़कर जाति-पाति की राजनीति में उलझे रहे, जिससे बुनियादी ढांचा मजबूत नहीं हो सका।
उनका यह भी कहना है कि जब उत्तर-दक्षिण को जोड़ने वाला मोहन सेतु वर्षों बाद भी पूरा नहीं हो सका, तो बस अड्डे की उम्मीद करना जनता के लिए सपना ही बन गया है।


बरहज से रोजगार और व्यापार को मिल सकता है बढ़ावा

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता श्रीप्रकाश पाल का मानना है कि अगर बरहज में बस अड्डे का निर्माण होता है तो इससे न केवल यातायात व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। बस अड्डे से दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, ढाबों और ऑटो-टैक्सी चालकों को लाभ मिलेगा। इससे नगर की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है।
यात्रियों की बढ़ती परेशानियां
बरहज निवासी राजेश निषाद बौद्ध बताते हैं कि बस अड्डा न होने से यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ठंड, गर्मी और बरसात—हर मौसम में यात्रियों को खुले में खड़ा रहना पड़ता है। बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है। बावजूद इसके, कोई भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए आगे नहीं आता।
दूर की यात्रा बनी महंगी और मुश्किल
स्थानीय नागरिक आजाद अंसारी का कहना है कि कई दशक बीत जाने के बाद भी बस स्टेशन का निर्माण न होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे बड़े शहरों की यात्रा के लिए लोगों को देवरिया या गोरखपुर जाना पड़ता है, जिससे समय और पैसा—दोनों अधिक खर्च होते हैं। यदि बरहज में बस अड्डा होता, तो सीधी बस सेवाएं शुरू हो सकती थीं और यात्रियों पर आर्थिक बोझ कम पड़ता।
कभी व्यापार का हब, आज उपेक्षा का शिकार
प्रदेश सचिव विनोद सिंह ने कहा कि बरहज कभी व्यापार का बड़ा हब था। अंग्रेजों ने यहां रेलवे और जल मार्ग की सुविधा देकर व्यापार को बढ़ावा दिया था। लेकिन आज हालात यह हैं कि रेल सेवा सीमित है और सड़क परिवहन भी अव्यवस्थित। बरहज, पैना, मईल, लार और सलेमपुर जैसे क्षेत्रों के लिए बस सेवाएं बेहद कम हैं। आजमगढ़, बनारस, प्रयागराज और लखनऊ जैसे बड़े शहरों के लिए शाम के बाद यात्रा करना लगभग असंभव हो जाता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अब भी बस अड्डे और सड़क यातायात की अनदेखी की गई, तो जनता का आक्रोश बढ़ सकता है।
सरकार से मांग
स्थानीय लोगों की एकजुट मांग है कि उत्तर प्रदेश सरकार बरहज में शीघ्र बस अड्डे का निर्माण कराए। इससे न केवल यातायात व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि व्यापार, रोजगार और क्षेत्रीय विकास को भी नई दिशा मिलेगी। जनता का कहना है कि अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई की जरूरत है।

बिन मोल की मिट्टी हुई अनमोल, बुंदेलखंड बदल रहा है विकास की रफ्तार से

बुंदेलखंड (राष्ट्र की परम्परा)। कभी सूखा, पलायन और किसान आत्महत्याओं के लिए पहचाना जाने वाला बुंदेलखंड अब विकास की नई तस्वीर के साथ देश के सामने खड़ा है। खेतों के बीच दौड़ता बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, चौड़े लिंक मार्ग, सोलर प्रोजेक्ट, प्लाटिंग और बढ़ता कारोबार इस बदलाव की गवाही दे रहे हैं। जो इलाका कभी खेती के नुकसान से जूझता था, वहां अब जमीन सोना बन चुकी है।

296 किलोमीटर का एक्सप्रेसवे, बदलती तकदीर

इटावा से चित्रकूट तक करीब 296 किलोमीटर लंबा बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे

• जालौन के 64 गांव
• चित्रकूट के 9 गांव
• बांदा के 28 गांव
• महोबा के 8 गांव
• हमीरपुर के 29 गांव से होकर गुजरता है।

एक्सप्रेसवे के दोनों ओर सोलर प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं। जमीन अधिग्रहण के बदले किसानों को भारी मुआवजा मिला, जिससे पक्के मकान बने, गाड़ियां खरीदी गईं और जीवनशैली बदली।

खदान मजदूर से होटल मालिक तक

चित्रकूट के गोंडा गांव पहुंचे तो दुकानदार विजय शंकर पटेल मिले। पहले पत्थर खदान में काम करते थे, अब उनकी अपनी दुकान है और होटल खोलने की तैयारी चल रही है।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड की बदलती पहचान है।

प्लाटिंग की होड़, लेकिन किसान जमीन बेचने को तैयार नहीं

हमीरपुर के सरीला निवासी देवमणि बताते हैं कि एक्सप्रेसवे के हर टोल प्लाजा के आसपास प्रॉपर्टी डीलरों का जमावड़ा है।
“मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हैं, लेकिन किसान जमीन बेच नहीं रहे।”
खोही क्षेत्र के किसान जय नारायण सिंह बताते हैं कि जो जमीन पहले 2.5–3 लाख रुपये बीघा थी, वह अब 10 से 15 लाख रुपये में भी नहीं मिल रही।

बुंदेलखंड की मिट्टी बनी निवेश का जरिया

चित्रकूट से बांदा तक सफर में जमीन की कीमतों में जबरदस्त उछाल दिखा।
महोखर निवासी आशुतोष बताते हैं कि उनके पिता को दो करोड़ रुपये मुआवजा मिला। अब प्लाटिंग कर रहे हैं।
बेंदा गांव के पूर्व प्रधान विवेक सिंह के अनुसार,
“गिट्टी-मोरंग छोड़कर लोग जमीन के कारोबार में उतर आए हैं।”

स्क्वायर फीट में बिक रही खेती की जमीन

यमुना और बेतवा के फोरलेन हाईवे के किनारे खेती की जमीन अब मकानों और दुकानों में बदल रही है।
जो जमीन 500 रुपये प्रति स्क्वायर फीट थी, वह अब 1500 से 2000 रुपये तक पहुंच चुकी है।

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24 घंटे कारोबार, बढ़ा रोजगार

हमीरपुर-कबरई मार्ग पर होटल संचालक जयाशंकर लोधी बताते हैं कि पहले शाम होते ही सन्नाटा छा जाता था।
अब 24 घंटे यातायात है, इसलिए होटल में तीन शिफ्ट में 30 लोगों को रोजगार दिया जा रहा है।
बांदा-महोबा फोरलेन बनने से जहां कभी क्रेशर की धूल उड़ती थी, वहां अब होटल, बाजार और उद्योग पनप रहे हैं।

सोलर प्लांट और नए उद्योग

महोबा के बारीपुरा निवासी दयाशंकर चौरसिया बताते हैं कि सोलर कंपनियां जमीन किराये पर ले रही हैं।
खाली पड़ी जमीन अब आय का साधन बन चुकी है।
कनेक्टिविटी बढ़ने से कारखाने, होटल और बाजार तेजी से तैयार हो रहे हैं।

नौकरी छोड़ लौट रहे युवा

झांसी में ब्रांडेड शोरूम चला रहे पंकज बताते हैं कि बेहतर सड़कें आने से कारोबार आसान हुआ है।

“पढ़े-लिखे युवाओं ने नए तरीके से व्यापार शुरू किया है। खरीदने की क्षमता बढ़ी है, इसलिए बाहर नौकरी कर रहे लोग भी लौट रहे हैं।”

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सड़क चौड़ीकरण में लापरवाही, खुले कुएं से मंडरा रहा हादसे का खतरा

सड़क किनारे खुला कुआं बना जानलेवा खतरा, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद के बेलहर–लोहरसन मार्ग पर सड़क किनारे खुला कुआं राहगीरों और वाहन चालकों के लिए गंभीर खतरे का कारण बन गया है। गोदमवा सिवान के पास सड़क से सटे इस कुएं को लेकर स्थानीय लोगों में भारी चिंता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस कुएं को सुरक्षित नहीं किया गया, तो किसी दिन यह लापरवाही बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है।
मिली जानकारी के अनुसार लोक निर्माण विभाग द्वारा बेलहर–लोहरसन मार्ग का चौड़ीकरण कार्य कराया जा रहा है। सड़क निर्माण तो तेजी से पूरा कर दिया गया, लेकिन सड़क किनारे मौजूद पुराने कुएं को न तो ढका गया और न ही उसके चारों ओर कोई सुरक्षा घेरा लगाया गया। यह कुआं सड़क से मात्र डेढ़ फुट की दूरी पर खुला हुआ है, जो चलते वाहन चालकों और पैदल राहगीरों के लिए सीधा खतरा बना हुआ है।

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स्थानीय निवासियों का कहना है कि दिन में तो कुआं किसी तरह दिखाई दे जाता है, लेकिन रात के समय या बारिश के दौरान यह कुआं मौत का जाल बन सकता है। खासकर दोपहिया वाहन चालक, साइकिल सवार और बुजुर्ग या बच्चे अनजाने में इसमें गिर सकते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि कोई बड़ा वाहन अचानक संतुलन खो दे, तो बड़ा हादसा टाला नहीं जा सकता।
क्षेत्रवासियों ने लोक निर्माण विभाग और जिला प्रशासन से इस समस्या के तत्काल और स्थायी समाधान की मांग की है। ग्रामीणों का सुझाव है कि कुएं को मजबूत स्लैब से ढककर उसके ऊपर चेतावनी संकेतक लगाए जाएं या फिर चारों ओर पक्की रेलिंग बनाकर उसे पूरी तरह सुरक्षित किया जाए।

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ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो किसी अप्रिय घटना के बाद जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि ग्रामीण सड़कों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
अब देखना यह है कि संबंधित विभाग कब तक इस गंभीर खतरे पर ध्यान देता है और आमजन की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।

World Book Fair 2026: सोशल मीडिया ने बनाई किताबों से दूरी, अब वही ला रहा है पाठकों को पास — यहां लगा ‘आजाद’ पुस्तक मेला

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। कभी किताबों से दूरी बढ़ाने का आरोप झेलने वाला सोशल मीडिया अब पाठकों को वापस साहित्य की दुनिया में ला रहा है। विश्व पुस्तक मेला 2026 (World Book Fair 2026) में उमड़ी भीड़, खासकर Gen Z युवाओं की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि किताबों का आकर्षण आज भी उतना ही गहरा है, बस माध्यम बदल गया है।

‘रेत की मछली’ की तलाश और वायरल किताबें

विश्व पुस्तक मेले के हॉल नंबर-2 में स्टॉल SN-14 पर दो युवतियां एक खास किताब की तलाश में पहुंचीं— ‘रेत की मछली’। बातचीत में पता चला कि यह किताब सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है।
राजकमल प्रकाशन के स्टॉल संचालक के अनुसार,
“सोशल मीडिया ने पहले पाठकों को किताबों से दूर किया, लेकिन अब वही प्लेटफॉर्म उन्हें पुस्तक मेले तक खींच लाया है।”

दरअसल, ‘रेत की मछली’ को ‘गुनाहों का देवता’ का उत्तर माना जा रहा है, इसी कारण युवा पाठक इसे पढ़ने को उत्सुक हैं।

चंदर देवता है या गुनाहगार?

सदी प्रकाशन के संयोजक जितेंद्र जित्यांशु से जब यह सवाल पूछा गया कि ‘गुनाहों के देवता’ का चंदर गुनाहगार है या नहीं, तो उन्होंने जवाब को पाठक पर छोड़ दिया।
सोशल मीडिया पर चल रही बहस— चंदर ने सुधा का त्याग क्यों किया?— इस बार पुस्तक मेले की चर्चाओं का अहम हिस्सा रही।

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Gen Z और किताबों की नई दोस्ती

कभी कहा गया था—
“अजदहा बन के आया मोबाइल, ये किताबें निगल गया कितनी…”
लेकिन World Book Fair 2026 में Gen Z की भारी मौजूदगी ने इस धारणा को तोड़ दिया।

Instagram और Reels पर #WorldBookFair2026 के साथ ‘दीवार में एक खिड़की हुआ करती थी’, ‘रेत की मछली’, ‘गुनाहों का देवता’ और ‘October Junction’ जैसी किताबें ट्रेंड करती रहीं।

उर्दू शायरी, डिबेट और नई किताबों का जन्म

पुस्तक मेले में इस बार बायोपिक, इतिहास और कहानियों के साथ-साथ उर्दू शायरी की किताबों ने खास जगह बनाई।
मेले के दौरान—

• साहित्यिक डिबेट
• कविता पाठ
• लेखक संवाद
• पुस्तक विमोचन
जैसे कई कार्यक्रम आयोजित हुए, जिनमें नामचीन साहित्यकारों ने हिस्सा लिया।

भारत मंडपम के बाहर ‘आजाद’ पुस्तक मेला

भारत मंडपम के भीतर चल रहे विश्व पुस्तक मेले से अलग, गेट नंबर-10 के बाहर सड़क पर एक अनोखा दृश्य देखने को मिला— ‘आजाद पुस्तक मेला’।
यहां—

• न गार्ड, न एंट्री टिकट
• 25 से ज्यादा स्टॉल
• किताबें अंदर के मेले से कहीं सस्ती

पाठकों के लिए यह खुला और सहज पुस्तक बाजार आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

विश्व पुस्तक मेले के प्रमुख हॉल

• लेखक मंच: हॉल नंबर 2
• हिंदी व भारतीय भाषाएं: हॉल 2 और 3
• ऑथर्स कॉर्नर / थीम मंडप: हॉल 5
• बाल मंडप: हॉल 6
• विदेशी मंडप: हॉल 4

गोंडा में 21.47 करोड़ का बैंक घोटाला: फर्जी ऋण वितरण से 205 खातों में हेराफेरी, 16 लोगों पर FIR

गोंडा/उत्तर प्रदेश (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में ऋण वितरण के नाम पर एक बड़े बैंकिंग घोटाले का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया है कि 205 खाताधारकों के ऋण खातों और पांच आंतरिक खातों से कुल 21 करोड़ 47 लाख 78 हजार रुपये की भारी वित्तीय अनियमितता की गई। इस मामले में तत्कालीन शाखा प्रबंधक, बैंककर्मी और खाताधारकों सहित 16 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

उत्तर प्रदेश स्टेट कोऑपरेटिव बैंक की बड़गांव शाखा से जुड़ा मामला
यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश स्टेट कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की बड़गांव शाखा से जुड़ा है। बैंक के मुख्य प्रबंधक भुवन चंद्र सती ने इस घोटाले की शिकायत पुलिस अधीक्षक गोंडा विनीत जायसवाल से की थी।
आंतरिक जांच टीम की रिपोर्ट में घोटाले की पुष्टि होने के बाद नगर कोतवाली में एफआईआर दर्ज की गई।

संगठित गिरोह बनाकर किया गया फर्जीवाड़ा

शिकायत और जांच में सामने आया कि आरोपियों ने संगठित गिरोह बनाकर फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर बिना पात्रता और आवश्यक सत्यापन के ऋण स्वीकृत किए।

तत्कालीन शाखा प्रबंधक पवन कुमार पाल पर आरोप है कि उन्होंने स्वयं और अपने परिजनों को तथाकथित “सिंडिकेट” में शामिल कर नियमों को दरकिनार करते हुए ऋण मंजूर किए।

केवाईसी और भौतिक सत्यापन के बिना लोन

जांच में पाया गया कि ऋण स्वीकृति से पहले न तो केवाईसी दस्तावेज पूरे किए गए और न ही खाताधारकों का भौतिक सत्यापन कराया गया। इसके बाद खाताधारकों के खातों से धनराशि निकालकर अपने और करीबी लोगों के खातों में ट्रांसफर कर दी गई।

एनपीए से बचाने के लिए किया गया खेल

आरोप है कि खातों को एनपीए (Non-Performing Asset) घोषित होने से बचाने के लिए अन्य खातों से राशि निकालकर किस्तें जमा कराई गईं, ताकि बैंक मुख्यालय को अनियमितता की जानकारी न हो सके।

इन लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा

नगर कोतवाली पुलिस ने जिन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है, उनमें—
पवन कुमार पाल (तत्कालीन शाखा प्रबंधक), अजय कुमार (तत्कालीन प्रबंधक), सुशील कुमार गौतम (तत्कालीन सहायक कैशियर) सहित खाताधारक सुमित्रा पाल, संजना सिंह, राज प्रताप सिंह, जय प्रताप सिंह, फूल मोहम्मद, राघव राम, शिवाकांत वर्मा, रितेंद्र पाल, गीता देवी वर्मा, दुष्यंत प्रताप सिंह, मोहम्मद असलम और प्रतीक कुमार सिंह शामिल हैं।

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9 लाख के लोन को 31 लाख दिखाने का आरोप

बहलोलपुर निवासी शिवेंद्र दुबे ने आरोप लगाया कि उन्होंने मकान निर्माण के लिए 9 लाख रुपये का होम लोन लिया था और नियमित किस्तें जमा कर रहे थे। बाद में उन्हें पता चला कि उनके खाते में कथित तौर पर 31 लाख रुपये का लोन दर्ज कर दिया गया है।
उनका आरोप है कि 9 लाख के लोन को 3 लाख दिखाकर शेष राशि का गबन कर लिया गया और शिकायत करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई।

जांच क्राइम इंस्पेक्टर को सौंपी गई

नगर कोतवाली गोंडा में दर्ज प्राथमिकी की जांच क्राइम इंस्पेक्टर सभाजीत सिंह को सौंपी गई है। पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान यदि अन्य नाम सामने आते हैं तो उन्हें भी आरोपी बनाया जाएगा।
गौरतलब है कि इसी शाखा से जुड़े 21 करोड़ रुपये के फर्जी लोन मामले में पहले ही मुकदमा दर्ज हो चुका है, जबकि अब एक और केस दर्ज होने से बैंकिंग महकमे में हड़कंप मच गया है।

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अंतरिक्ष में सपनों की उड़ान और अमर विरासत: 16 जनवरी को कल्पना चावला की ऐतिहासिक यात्रा

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा)। भारत के इतिहास में 16 जनवरी एक ऐसी तारीख है, जो देश की साहसी बेटी कल्पना चावला की ऐतिहासिक अंतरिक्ष यात्रा की याद दिलाती है। 16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला ने नासा के स्पेस शटल कोलंबिया से दूसरी बार अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी थी। यह मिशन STS-107 न केवल उनके करियर की ऊंचाई का प्रतीक बना, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अध्याय भी साबित हुआ। हालांकि, यही यात्रा उनकी अंतिम यात्रा भी बनी।

कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में हुआ था। बचपन से ही उन्हें आकाश, सितारों और विमानों के प्रति गहरा लगाव था। इसी जुनून ने उन्हें पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका गईं और वर्ष 1994 में उनका चयन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा में अंतरिक्ष यात्री के रूप में हुआ।

अंतरिक्ष में भारत की पहली महिला

साल 1997 में कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलंबिया के मिशन STS-87 के जरिए पहली बार अंतरिक्ष की यात्रा की। इसके साथ ही वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला बनीं। यह उपलब्धि न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का क्षण थी।

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STS-107 मिशन और दुखद हादसा

16 जनवरी 2003 को कल्पना चावला अपने दूसरे मिशन STS-107 पर रवाना हुईं। यह मिशन 16 दिनों तक चला, जिसके दौरान अंतरिक्ष यान में 80 से अधिक वैज्ञानिक प्रयोग किए गए।

लेकिन 1 फरवरी 2003 को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के समय स्पेस शटल कोलंबिया दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में कल्पना चावला सहित चालक दल के सभी सात सदस्यों की दुखद मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।

प्रेरणा बन चुकी हैं कल्पना चावला

कल्पना चावला का जीवन साहस, संघर्ष और सपनों को साकार करने की मिसाल है। उन्होंने कहा था,
“सपनों में सफलता तक पहुंचने का रास्ता होता है, बस उसे देखने की दृष्टि और उस पर चलने का साहस चाहिए।”

भारत और अमेरिका में उन्हें मरणोपरांत कई सम्मानों से नवाजा गया। आज उनके नाम पर अनेक संस्थान, छात्रवृत्तियां और शैक्षणिक कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। कल्पना चावला भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अमर विरासत और प्रेरणादायक कहानी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा नई ऊंचाइयों तक पहुंचने का हौसला देती रहेगी।

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14 स्थानों पर चेकिंग, सैकड़ों लोग और वाहन जांच के दायरे में

देवरिया में पुलिस का ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान’, सुरक्षा और विश्वास का मजबूत संदेश


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।जनपद में कानून-व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने तथा आम नागरिकों में सुरक्षा और विश्वास की भावना को मजबूत करने के उद्देश्य से देवरिया पुलिस द्वारा शुक्रवार को ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान’ सफलतापूर्वक चलाया गया। यह अभियान पुलिस अधीक्षक देवरिया संजीव सुमन के निर्देशन में 16 जनवरी 2026 को प्रातः 5 बजे से 8 बजे तक जनपद के विभिन्न थाना क्षेत्रों में संचालित किया गया।

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अभियान के दौरान सभी थाना प्रभारी एवं थानाध्यक्ष अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय रहे और सुबह की सैर पर निकले नागरिकों से सीधे संवाद किया। पुलिस अधिकारियों ने आमजन की समस्याओं को सुना, सुझाव लिए और उन्हें यह भरोसा दिलाया कि पुलिस हर समय उनकी सुरक्षा के लिए तत्पर है। इस पहल से पुलिस और जनता के बीच संवाद और विश्वास की दूरी को कम करने में मदद मिली।

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मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देना, छोटे-छोटे विवादों का मौके पर समाधान करना तथा मित्र पुलिसिंग की अवधारणा को मजबूत करना रहा। साथ ही संदिग्ध व्यक्तियों और वाहनों की सघन जांच कर अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने पर विशेष ध्यान दिया गया।
चेकिंग के दौरान पुलिस ने चोरी की गाड़ियों की पहचान, तीन सवारी चलाने वाले वाहन चालकों पर कार्रवाई, मॉडिफाइड साइलेंसर वाले दोपहिया वाहनों के चालान, नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने के मामलों में आवश्यक कानूनी कार्रवाई तथा अवैध असलहा और मादक पदार्थों की जांच की। इससे न केवल यातायात नियमों के पालन को बढ़ावा मिला बल्कि अपराध नियंत्रण की दिशा में भी ठोस कदम उठाया गया।
इस अभियान के अंतर्गत जनपद के 14 प्रमुख स्थानों पर चेकिंग की गई, जिसमें 262 व्यक्तियों और 158 वाहनों की जांच की गई। पुलिस द्वारा चलाए गए इस अभियान की आम नागरिकों ने खुलकर सराहना की और इसे सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम बताया।
जनपदीय पुलिस ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के जनहितकारी और विश्वास-निर्माण वाले अभियान आगे भी नियमित रूप से जारी रहेंगे, ताकि जनपद में शांति, सुरक्षा और कानून व्यवस्था को प्रभावी ढंग से बनाए रखा जा सके।

वेनेजुएला की नेता मारिया माचाडो ने डोनाल्ड ट्रंप को सौंपा नोबेल मेडल, राजनीति में मचा हलचल

वॉशिंगटन (राष्ट्र की परम्परा)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो से नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल मिला है। व्हाइट हाउस में हुई एक अहम मुलाकात के दौरान माचाडो ने यह मेडल ट्रंप को सौंपा। इस घटनाक्रम को वेनेजुएला की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम माचाडो की एक रणनीतिक राजनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि हाल के महीनों में ट्रंप ने वेनेजुएला के सत्ता संघर्ष में माचाडो को लेकर खुला समर्थन नहीं जताया था।

मेडल मिलने पर डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया

व्हाइट हाउस में मुलाकात के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने माचाडो की जमकर सराहना की। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा,

“उन्होंने मुझे अपने नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल दिया, यह मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है।”
ट्रंप ने माचाडो को “बहुत अच्छी महिला” बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया है।

क्या माचाडो नोबेल पुरस्कार दे सकती हैं?

नोबेल संस्थान पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि नोबेल शांति पुरस्कार किसी और को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। ऐसे में ट्रंप को दिया गया यह मेडल केवल प्रतीकात्मक माना जा रहा है।
हालांकि, राजनीतिक नजरिए से इसका महत्व काफी ज्यादा है, क्योंकि ट्रंप लंबे समय से नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इच्छा जताते रहे हैं। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, ट्रंप इस मेडल को अपने पास रख सकते हैं।

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माचाडो का बयान

व्हाइट हाउस से बाहर निकलने के बाद माचाडो ने पत्रकारों से कहा,
“मैंने अमेरिका के राष्ट्रपति को नोबेल शांति पुरस्कार का मेडल दिया है। यह हमारी आज़ादी के लिए उनके योगदान की पहचान है।”
इसके बाद माचाडो संसद भवन कैपिटल हिल के लिए रवाना हो गईं।

वेनेजुएला में चुनाव और लोकतंत्र पर सवाल

हाल के दिनों में ट्रंप ने वेनेजुएला में लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया को लेकर संदेह जताया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि वहां अगला चुनाव कब होगा। ट्रंप का कहना है कि माचाडो को देश के अंदर पूर्ण समर्थन नहीं मिलने के कारण नेतृत्व करना कठिन हो सकता है।

मादुरो के बाद भी माचाडो को झटका

माचाडो की पार्टी के समर्थकों का दावा है कि उन्होंने 2024 का चुनाव जीता था, लेकिन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने नतीजों को मानने से इनकार कर दिया।

इसके बावजूद ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वे मादुरो की करीबी मानी जाने वाली कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रीगेज के साथ काम करने को तैयार हैं, जिससे माचाडो को एक और राजनीतिक झटका लगा है।

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समर्थकों से मिलीं माचाडो

बंद कमरे में हुई बैठक के बाद माचाडो व्हाइट हाउस के बाहर अपने समर्थकों से मिलीं और कई लोगों को गले लगाया। उन्होंने कहा,
“हम राष्ट्रपति ट्रंप पर भरोसा कर सकते हैं।”

इस दौरान समर्थकों ने “थैंक यू ट्रंप” के नारे भी लगाए।

लंबे समय बाद सार्वजनिक रूप से दिखीं माचाडो

वॉशिंगटन आने से पहले माचाडो लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आई थीं। पिछले महीने वह नॉर्वे गई थीं, जहां उनकी बेटी ने उनकी ओर से नोबेल शांति पुरस्कार ग्रहण किया था। इससे पहले माचाडो लगभग 11 महीनों तक वेनेजुएला में छिपकर रह रही थीं।

मतदाता सूची से लोकतंत्र की कटाई: क्या भारत फासीवाद की दहलीज पर है?

राजेन्द्र शर्मा


नये साल, 2026 में फासीवाद के आगमन की रफ्तार और तेज होती लगती है। कम से कम नये साल के पहले दस-बारह दिनों को देखकर, तो आसार ऐसे ही नजर आ रहे हैं।

सब सेे पहले सर (एसआइआर) यानी मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण की सुर्खियों से शुरू कर सकते हैं। सर ही सबसे पहले इसलिए कि इसका सीधा संबंध मताधिकार से, बल्कि ठीक-ठीक कहें, तो मताधिकार के छीने जाने की हद और उसके स्वरूप से है। और मताधिकार गायब, तो चुनाव भी गायब। और चुनाव ही तो वह आखिरी पर्दा है, जो फासीवादी चेहरे को खुलकर सामने आने से रोकता है।

और सर के सिलसिले में नये साल की सबसे बड़ी सुर्खी तो यही है कि उत्तर प्रदेश में ही मसौदा मतदाता सूची में पूरे 2 करोड़ 89 लाख मतदाताओं के नाम कट चुके हैं। यह संख्या उन मतदाताओं की है, जिनके नाम पिछले ही साल इसी राज्य में और इसी चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशन में संशोधित की गयी मतदाता सूचियों में मौजूद थे और जो 2024 के आम चुनाव में भी मतदाता था, जिसके नतीजे से नरेंद्र मोदी तीसरे कार्यकाल में सरकार चला रहे हैं।

वैसे तो उत्तर प्रदेश का मामला अन्य दसेक राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से खास अलग भी नहीं है, जहां भी अब तक सर नाम की इस प्रक्रिया के पांव पड़े हैं। जैसाकि योगेंद्र यादव समेत इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए अधिकांश विश्लेषणकर्ता शुरूआत से ही कहते आ रहे हैं, इस प्रक्रिया को गढ़ा ही इस प्रकार गया है कि यह मतदाताओं की छंटनी का ही काम करती है। वास्तव में ठीक ऐसा ही होने के डर से, अपवादस्वरूप असम को सर की प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखते हुए, वहां मतदाता सूचियों में सामान्य सुधार ही काफी समझा गया है, क्योंकि वही सत्ताधारी भाजपा के राजनीतिक हित में बैठता है। यह दिलचस्प है कि असम को सर प्रक्रिया के लिए अपवाद बनाए जाने के लिए, वहां कुछ ही वर्ष पहले जो एनआरसी या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर प्रक्रिया हो चुकी होने की दलील दी गयी है, वर्तमान एसआइआर पर उसी प्रक्रिया का आवरण होने के इल्जाम लगते रहे हैं।
वैसे दिलचस्प यह भी है कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया से बहुत बड़ी संख्या में कथित बांग्लादेशी पकड़े जाने की उम्मीद में, इस बहुत महंगी तथा आम लोगों के लिए बहुत ही तकलीफदेह प्रक्रिया का जोर-शोर से समर्थन करने वाले, भाजपायी राज्य सरकार समेत आरएसएस विचार-परिवार के तमाम संगठनों को तब सांप सूंघ गया, जब इस प्रक्रिया के नतीजे सामने आये। बेशक, एनआरसी की प्रक्रिया में लगभग 20 लाख लोगों को ”पराया” बताया गया था, लेकिन संघ-भाजपा की उम्मीदों के विपरीत, उनमें प्रचंड बहुमत हिंदुओं का था, जिनमें बांग्लादेश से आए हिंदुओं के अलावा एक बड़ी संख्या देश के दूसरे हिस्सों से आकर पिछले अनेक वर्षों में असम में बस गए हिंदुओं की थी। नतीजा यह कि नरेंद्र मोदी के डबल इंजन राज में असम में, एनआरसी की उक्त कसरत के नतीजों को कई वर्ष बाद भी अंतिम रूप देकर प्रकाशित किया ही नहीं जा सका है।

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बिहार का, जहां सर की प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पूरी करा ली गयी गयी थी और अन्य करीब दस राज्यों का इस प्रक्रिया का अब तक का अनुभव इसका गवाह है कि असम की एनआरसी की तरह, सर प्रक्रिया भी कथित विदेशी घुसपैठियों की पहचान करने में बुरी तरह से विफल ही रही है। और यह वर्तमान सरकार तथा उसके संचालक संघ परिवार के प्रयासों में किसी कमी की वजह से नहीं है। यह सबसे बढ़कर इसलिए है कि घुसपैठ और खासतौर पर बांग्लादेशियों की घुसपैठ, संघ परिवार द्वारा निरंतर प्रचार के जरिए गढ़ा गया एक सांप्रदायिक मिथक है। अशांति के दौरों को छोड़कर, अवैध रूप से सीमा पार कर के भारतीय इलाकों में बसने की कोई आम प्रवृत्ति, कम से कम पिछले अनेक वर्षों से देखने में नहीं आयी है।

लेकिन, ”घुसपैठियों” के खतरे का मिथक, संघ-भाजपा के राजनीतिक तरकश का इतना महत्वपूर्ण तीर है कि किसी भी जांच के नतीजे उन्हें यह झूठा हौवा खड़ा करने से रोक नहीं सकते हैं। तभी तो हालांकि, बिहार में एसआइआर में, भाजपा तथा संघ परिवार ही नहीं, खुद चुनाव आयोग के सारे प्रचार के बावजूद, अंतत: विदेशी होने के लिए मतदाता सूची से काटे गए नामों की संख्या सैकड़ों छोड़, दर्जनों में भी नहीं निकली थी। इसके बावजूद, खुद मोदी-शाह की जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा ने घुसपैठियों के खतरे का बेइंतिहा शोर मचाया था और अपने विरोधियों को, घुसपैठियों का सरपरस्त साबित करने के लिए पूरा जोर लगाया था।

वैसे इसका कारण समझना भी मुश्किल नहीं है। संघ-भाजपा की शब्दावली में, जब ”घुसपैठिया” शब्द का प्रयोग किया जाता है, तो निशाना मुसलमानों पर होता है। और जब अपने विरोधियों को घुसपैठियों का संरक्षक कहा जाता है, तो वास्तव में बहुसंख्यक समुदाय को यह संदेश दिया जा रहा होता है कि भाजपा के विरोधी, मुसलमानों के साथ हैं।

हैरानी की बात नहीं है कि खासतौर पर प. बंगाल तथा असम के, आगामी चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले के सघन दौरों में, मोदी-शाह की जोड़ी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अपने प्रमुख हथियार के तौर पर, ”घुसपैठियों के खतरे” और उससे लड़ने की झूठी मुद्राओं का जमकर इस्तेमाल करना शुरू भी कर चुकी है। यहां तक कि गृहमंत्री शाह तो, खुद जिन पर सीमाओं पर घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी आती है, प. बंगाल में यह बेतुका दावा करने की हद तक चले गए कि उनके राज ने, एक प. बंगाल को छोड़कर बाकी पूरे देश में विदेशी घुसपैठ पूरी तरह से रोक दी है। यह दूसरी बात है कि उन्हीं केंद्रीय गृहमंत्री की मौजूदगी में, असम में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री, अपने राज्य से घुसपैठियों को उखाड़ने और भगाने की अपनी करनियों का, बढ़-चढ़कर बखान कर रहे थे। और उन्हीं की पार्टी के त्रिपुरा के मुख्यमंत्री, असम के अपने बड़े भाई का अनुसरण करने की कोशिश कर रहे थे।

वास्तव में ”घुसपैठियों के खतरे” के प्रचार और इस खतरे से बचाने के अपने स्वांग पर, भाजपा की राजनीतिक निर्भरता अब उस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां मुंबई नगर निगम के चुनाव भाजपा सबसे बढ़कर, ”घुसपैठियों को बाहर निकालने” के वादे के आधार पर लड़ रही है। यह दूसरी बात है कि महाराष्ट्र के भाजपायी मुख्यमंत्री, देवेंद्र फडनवीस इस तरह से मुस्लिम विरोधी इशारों से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश तक ही सीमित नहीं रहते हैं। एक कदम और आगे बढ़कर, वह बाकायदा इसका एलान करते हैं कि नगर निगम का उनका नेता ‘मराठी होगा, हिंदू होगा…।’ यह साफ तौर पर भाजपा के उच्च नेतृत्व के सीधे ”हिंदू राज” पर पहुंच जाने को दिखाता है, जो फासीवाद की ओर एक बड़ी छलांग को दिखाता है, क्योंकि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में, ”हिंदू राज” का मतलब, फासीवाद के बाकायदा आ धमकने के सिवा और कुछ नहीं है।

खैर! उत्तर प्रदेश में सर प्रक्रिया तक लौटें। तीन करोड़ से कुछ ही कम यानी करीब बीस फीसद मतदाताओं के नाम काटे जाना, बेशक वर्तमान सर प्रक्रिया के हिसाब से भी असाधारण है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में सर का मामला एक और लिहाज से भी असाधारण है। राज्य के भाजपायी मुख्यमंत्री ने ड्राफ्ट सूचियां पूरी होने से ठीक-ठाक पहले ही इसकी चिंतित चेतावनी दे दी थी कि, इस प्रकार की कैंची के नीचे राज्य के करीब चार करोड़ मतदाता आने वाले हैं। इसके बाद, जब दो अवधि विस्तारों के बाद, चुनाव आयोग ने अंतत: ड्राफ्ट सूची जारी की, जैसाकि हम बता चुके हैं, हरेक पांचवां मतदाता सूची से बाहर किया जा चुका था।

लेकिन, यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। इस सूची के आने के बाद, भाजपायी राज्य सरकार और संघ-भाजपा तंत्र ने जो करना तय किया है, वह मोदीशाही में और जाहिर है कि चुनाव आयोग के पूर्ण सहयोग से, चुनाव मात्र के एक मजाक बनाकर रख दिए जाने की ओर बहुत बड़ा कदम होगा। तय यह किया गया है कि यह सत्ताधारी तंत्र, आपत्तियों तथा नये नाम जुड़वाने के दौर में, हरेक मतदान केंद्र पर 200 वोट जुड़वाएगा। उत्तर प्रदेश में, जहां 9,879 की बढ़ोतरी के साथ, मतदान केंद्रों की कुल संख्या 1,74,879 हो गयी है, संघ परिवार के इस संकल्प का अर्थ करीब साढ़े तीन करोड़ वोट जुड़वाना है यानी काटे गए कुल वोटों से भी ज्यादा। यह संख्या 2024 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिले कुल वोट के आस-पास ही बैठेगी।

कहने की जरूरत नहीं है कि इतनी बड़ी संख्या में वोट जुड़वाने का मकसद, सिर्फ उत्तर प्रदेश के उन मतदाताओं के मताधिकार की रक्षा करना नहीं है, जिनके नाम सर की इस प्रक्रिया में मतदाता सूचियों के शुद्घीकरण के नाम पर काट दिए गए हैं। उल्टे इनका मकसद तो एक प्रकार से सत्ताधारी तंत्र की मर्जी की मतदाता सूचियां ही तैयार कराना है। यह सिर्फ सर की पूरी प्रक्रिया को ही निरर्थक नहीं साबित कर देता है, चुनाव की प्रक्रिया को ही निरर्थक बना देता है। सत्ताधारियों के अपने लिए एक नयी जनता ही चुन लेने के रास्ते, चुनाव को निरर्थक बनाने का आधा काम चुनाव आयोग ने करीब तीन करोड़ मतदाताओं के नाम काटने के जरिए कर दिया है और बाकी आधा काम संघ-परिवार साढ़े तीन करोड़ मतदाता जोड़ने के जरिए करने का इरादा रखता है। यह वोट चोरी के सीधे-सीधे चुनाव की चोरी की ओर बढ़ने का इशारा है।

मकर संक्रांति पर खुशी में जहर: चीनी मांझे से पुलिसकर्मी तक घायल

मिर्जापुर–वाराणसी में चीनी मांझे का कहर: गले से लेकर आंख तक कटे, कई घायल, प्रशासन पर उठे सवाल

वाराणसी (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)मिर्जापुर और वाराणसी में मकर संक्रांति के दौरान पतंगबाजी लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। प्रतिबंध के बावजूद खुलेआम बिक रहे चीनी मांझे ने कई परिवारों को दहशत में डाल दिया है। ताजा घटनाओं में बाइक सवार युवक का गला कट गया, बच्चों के चेहरे और हाथ जख्मी हुए और ड्यूटी पर जा रहे पुलिसकर्मी तक घायल हो गए।
मिर्जापुर के जमालपुर थाना क्षेत्र के मठना गांव निवासी विनोद पटेल (35) सुबह बाइक से वाराणसी से लौट रहे थे। रामनगर किले के पास अचानक चीनी मांझा उनके गले में उलझ गया। जब तक वह संभलते, धारदार मांझे से गला गहराई तक कट गया। लहूलुहान हालत में उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां नौ टांके लगाए गए।
इसी जिले के कौड़िया कला गांव में 10 वर्षीय सत्यम पतंग की रील पकड़ते समय मांझे से हाथ कटवा बैठा। वहीं देहात कोतवाली क्षेत्र के जसोवर गांव में छत पर पतंग उड़ा रहा 7 साल का अमन संतुलन बिगड़ने से नीचे गिर गया और घायल हो गया।

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चीवाराणसी में हालात और गंभीर दिखे। रामनगर, लोहता, लहरतारा, कज्जाकपुरा और सोनारपुरा इलाकों में कम से कम 15 लोग चीनी मांझे की चपेट में आए। लहरतारा में 6 साल के बच्चे के चेहरे पर 10 टांके लगे, जबकि जैतपुरा में डायल 112 से जा रहे पुलिसकर्मी की नाक कट गई।
इन घटनाओं के बाद सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। अस्सी घाट पर छात्रों ने “मांझा हटाओ–जीवन बचाओ” अभियान चलाया, वहीं भाजपा नेताओं ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चीनी मांझे की बिक्री पर तत्काल और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी मांझा केवल इंसानों ही नहीं, पक्षियों और पशुओं के लिए भी घातक है।