Saturday, June 13, 2026
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कैंट थाना क्षेत्र में चोरी का खुलासा, दो अभियुक्त गिरफ्तार

चोरी की मोटरसाइकिल बरामद, पुलिस की बड़ी कार्रवाई

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद में चोरी की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए चलाए जा रहे पुलिस अभियान के तहत थाना कैंट पुलिस को बड़ी सफलता हाथ लगी है। पुलिस ने चोरी के एक मामले का खुलासा करते हुए दो अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से चोरी की गई मोटरसाइकिल भी बरामद की गई है। बरामदगी के आधार पर मामले में संबंधित धाराओं की बढ़ोत्तरी करते हुए आगे की विधिक कार्रवाई की जा रही है।

पुलिस के अनुसार थाना कैंट पर मु0अ0सं0 17/2026, धारा 303(2) बीएनएस के तहत दर्ज मुकदमे की विवेचना के दौरान अभियुक्तों की संलिप्तता सामने आई। इसके बाद कार्रवाई करते हुए पुलिस टीम ने सतीश निषाद एवं संजय यादव को गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तार अभियुक्त सतीश निषाद थाना कैंट क्षेत्र के मोहद्दीपुर का निवासी है, जबकि संजय यादव थाना पीपीगंज क्षेत्र के ग्राम मेंहदरिया का निवासी बताया गया है।

घटना के संबंध में पुलिस ने बताया कि पीड़ित द्वारा दी गई तहरीर में उल्लेख किया गया था कि 15 जनवरी 2026 को उसकी मोटरसाइकिल अज्ञात चोरों द्वारा चोरी कर ली गई थी। शिकायत के आधार पर थाना कैंट में मुकदमा पंजीकृत कर जांच शुरू की गई। विवेचना के दौरान पुलिस ने आरोपियों की पहचान की और उन्हें गिरफ्तार कर उनकी निशानदेही पर चोरी की गई मोटरसाइकिल बरामद कर ली।

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पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि गिरफ्तार अभियुक्तों में से एक का आपराधिक इतिहास पहले से दर्ज है। अभियुक्तों से पूछताछ की जा रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि कहीं वे अन्य चोरी की घटनाओं में भी शामिल तो नहीं रहे हैं। बरामदगी के आधार पर मुकदमे में धारा 317(2) बीएनएस की बढ़ोत्तरी की गई है।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि जनपद में चोरी, लूट एवं अन्य संपत्ति संबंधी अपराधों के खिलाफ लगातार सघन अभियान चलाया जा रहा है। अपराधियों की पहचान कर उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जा रही है, जिससे आमजन में सुरक्षा की भावना मजबूत हो सके।

पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे अपने वाहनों की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल नजदीकी थाना या पुलिस हेल्पलाइन को दें। पुलिस की इस कार्रवाई से क्षेत्र में चोरी की घटनाओं पर अंकुश लगने की उम्मीद जताई जा रही है।

महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव 2026: बीएमसी में शिवसेना का तीन दशक का किला ढहा, भाजपा सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी

मुंबई (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों ने राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ ला दिया है। करीब तीन दशक तक बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर शासन करने वाली अविभाजित शिवसेना का दबदबा समाप्त हो गया है। शुक्रवार को घोषित नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बीएमसी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसने राज्य के शहरी राजनीति संतुलन को पूरी तरह बदल दिया।
पूरे महाराष्ट्र में 29 नगर निगमों की कुल 2,869 सीटों के नतीजे सामने आए हैं। इनमें भाजपा ने रिकॉर्ड 1,425 सीटों पर जीत दर्ज की। शिवसेना को 399, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को 167 सीटें मिलीं। 227 सदस्यीय बीएमसी में भाजपा ने 89 सीटें, जबकि शिवसेना ने 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बढ़त बनाई। यह परिणाम मुंबई की राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन माना जा रहा है।

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मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दक्षिण मुंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाला महायुति गठबंधन मुंबई सहित 29 में से 25 नगर निगमों में सत्ता बनाने जा रहा है। नगर निकाय चुनाव के लिए 15 जनवरी को मतदान हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर मुंबई की जनता का आभार जताते हुए कहा कि मुंबई देश का गौरव और सपनों का शहर है तथा केंद्र सरकार शहरवासियों को सुशासन और बेहतर जीवन सुविधाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है।
वहीं शिवसेना (उबाठा) नेता संजय राउत ने हार के लिए एकनाथ शिंदे को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने शिंदे पर पार्टी से विश्वासघात का आरोप लगाते हुए कहा कि यदि 2022 में बगावत न होती तो आज मुंबई में भाजपा का महापौर नहीं होता।

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अन्य प्रमुख नगर निगमों में भी भाजपा का दबदबा दिखा। नागपुर में भाजपा ने 151 में से 102 सीटें जीतीं। पुणे में भाजपा को 96 सीटें, पिंपरी-चिंचवड में 84 सीटें मिलीं। हालांकि लातूर नगर निगम में कांग्रेस ने 70 में से 43 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
इस चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी चौंकाने वाला प्रदर्शन किया और राज्यभर में 114 सीटें जीतीं। औसतन 54.77% मतदान दर्ज किया गया, जबकि 19 निर्दलीय उम्मीदवार भी विजयी रहे।
यह परिणाम न केवल शहरी मतदाताओं के बदलते रुझान को दर्शाते हैं, बल्कि 2029 की राजनीति की दिशा भी तय करते नजर आ रहे हैं।

सूचना के बाद भी कार्य नहीं हुआ तो होगा आंदोलन – रवि प्रताप सिंह

बरहज के विकास मुद्दों को लेकर लाजपत भवन में कांग्रेस की बैठक

बरहज/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। नगरपालिका क्षेत्र स्थित लाजपत भवन में शुक्रवार देर शाम कांग्रेस पार्टी द्वारा बरहज विधानसभा क्षेत्र के विकास कार्यों की उपेक्षा को लेकर एक आवश्यक बैठक आयोजित की गई। बैठक का नेतृत्व कांग्रेस प्रवक्ता रवि प्रताप सिंह एवं नगर अध्यक्ष जितेंद्र जायसवाल ने किया।

बैठक को संबोधित करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता रवि प्रताप सिंह ने कहा कि बरहज रेलवे स्टेशन पर पीने के पानी, शौचालय की व्यवस्था तथा वर्षों से अधूरे पड़े मोहन सेतु के निर्माण को लेकर सरकार और प्रशासन को पहले ही सूचना दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि प्रदेश की योगी सरकार, जिला प्रशासन और रेल प्रशासन ने शीघ्र जनहित से जुड़े इन कार्यों को पूरा नहीं कराया, तो फरवरी माह में कांग्रेस पार्टी जनमानस के साथ मिलकर बड़ा आंदोलन करने के लिए मजबूर होगी।

रवि प्रताप सिंह ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि एक ओर सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बरहज विधानसभा क्षेत्र अव्यवस्थाओं के अंधकार में डूबता जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि मोहन सेतु का निर्माण समय से पूरा हो गया होता, तो उत्तर और दक्षिण क्षेत्र के विकास को नई दिशा मिलती और आम जनता को आवागमन में बड़ी सुविधा होती।

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उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटिश काल से स्थापित बरहज रेलवे स्टेशन आज बदहाली का शिकार है। यात्रियों के लिए न तो शुद्ध पेयजल की व्यवस्था है और न ही शौचालय। इस संबंध में वाराणसी रेल मंडल को अवगत करा दिया गया है, लेकिन अब तक कोई सुधार नहीं किया गया।

बैठक को संबोधित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चन्द्रभूषण पाण्डेय ने कहा कि भाजपा सरकार देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी और शिक्षा जैसे मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाकर धर्म और जाति की राजनीति की जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में वाराणसी के मणिकर्णिका घाट क्षेत्र में कॉरिडोर निर्माण के नाम पर प्राचीन मंदिरों को तोड़ा जा रहा है, जो भारतीय संस्कृति और आस्था पर आघात है।

इस बैठक में नगर अध्यक्ष जितेंद्र जायसवाल (जीतू), जिला महासचिव भोला तिवारी, डॉ. अमरेश सिंह, डॉ. शैलेंद्र जायसवाल, जैनुल हक अंसारी, हरी प्रताप सिंह, संजय मिश्र छोटू, संजय गुप्ता, प्रहलाद तिवारी, उग्रसेन सिंह, विक्रमादित्य सिंह, अमरजीत यादव सहित अनेक कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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गुरु ही जीवन का पथप्रदर्शक, राम कथा में संत किशोरी शरण जी महाराज का उद्बोधन

मऊ (राष्ट्र की परम्परा)। गुरु के बिना मनुष्य माया रूपी भवसागर से पार नहीं हो सकता। गुरु ही ज्ञान के माध्यम से अज्ञान रूपी अंधकार को समाप्त कर जीवन को सही दिशा देता है। यह विचार अयोध्या से पधारे मानस मर्मज्ञ किशोरी शरण जी महाराज ने मऊ नगर की सिंधी कॉलोनी स्थित दक्षिणेश्वर हनुमान मंदिर में आयोजित राम कथा महायज्ञ के दौरान व्यक्त किए।

राम कथा के अंतर्गत गुरु महिमा पर प्रवचन करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में गुरु का होना सबसे आवश्यक है। जीवन के प्रथम गुरु माता–पिता होते हैं, जो संस्कार और मर्यादा का बीज बोते हैं। शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और परम ब्रह्म परमात्मा के समान माना गया है, क्योंकि गुरु ही मनुष्य को सत्य के मार्ग पर ले जाता है।

कथा के प्रारंभ से पूर्व हनुमत कृपा सेवा समिति के सुंदरकाण्ड पाठ परिवार तथा हनुमान गढ़ी मंदिर समिति के सदस्यों द्वारा संगीतमय सुंदरकाण्ड पाठ का आयोजन किया गया। भक्तिमय वातावरण में श्रोता भजनों पर भाव-विभोर होकर झूमते रहे।

कार्यक्रम में मंदिर के प्रधान सेवक विवेकानंद पाण्डेय और कार्यक्रम व्यवस्थापक छवि श्याम शर्मा ने आगंतुकों को अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। चंद्रशेखर अग्रवाल, कैलाश चंद जायसवाल, रामप्यारे गुप्ता, बबलू शाही, शिवधर यादव सहित अन्य श्रद्धालुओं ने व्यास जी की आरती उतारी।

इस अवसर पर राजकुमार खंडेलवाल, डॉ. रामगोपाल गुप्त, रवि प्रकाश बरनवाल, अरुण कुमार, आर.के. सिंह, सुनील चौबे, रिंकू मिश्रा, अनिल शर्मा, तरुण कुमार, ओम प्रकाश प्रजापति, विजय कुमार, पंकज राजभर, मनोज तिवारी, अनुपम पाण्डेय, अर्जुन राजभर, आशीष सिंह, मोतीलाल विश्वकर्मा, अजय मिश्र, बब्बन सिंह, किशुन जी बरनवाल, देवेंद्र मोहन सिंह सहित सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

राम नाम महामन्त्र

राम नाम के महामंत्र से,
मन का कलुष मिटायेगा,
भवसागर से पार लगेगा,
तन मन निर्मल हो जायेगा।
राम नाम के……

यह तन जो अनमोल मिला है,
प्रभु की कृपा से पाया है,
माया मोह के महाजाल में,
यूँ ही क्यों भरमाया है।
राम नाम के …..

झूठ फ़रेब के अहंकार में,
ख़ुद को ही झुठलाया है,
राम कृपा तो तभी मिलेगी,
नाम के नीर नहाया है।
राम नाम के महामन्त्र से

प्रभू कृपा पायी शबरी ने
मीठे झूठे बेर खिला कर,
ऋषिपत्नी अहिल्या तरगई,
राम चरण की धुली पाकर।
राम नाम के….

गज, गीध, अजामिल औ गणिका
तरे भवसागर प्रभु शरण में जाकर,
आदित्य उबारौ सब जग को तारौ,
तारनहार मिटाओ दुःख के आगर।
राम नाम के महामन्त्र से,
मन का कलुष मिटायेगा,
भव सागर से पार लगेगा
तन मन निर्मल हो जायेगा॥

  • डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’

सहारनपुर: शौचालय विवाद में मां ने दो बच्चों संग दी जान

सहारनपुर/उत्तर प्रदेश (राष्ट्र की परम्परा)। गागलहेड़ी थाना क्षेत्र से दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। बलियाखेड़ी गांव में घरेलू विवाद के बाद एक महिला ने अपने दो मासूम बच्चों को जहर देकर खुद भी आत्महत्या कर ली। घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस ने मृतकों के शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए हैं और मामले की जांच शुरू कर दी है।

शौचालय के इस्तेमाल को लेकर हुआ विवाद

मृतक महिला मनीता (30) का गुरुवार सुबह छत पर बने शौचालय को लेकर ससुराल पक्ष से विवाद हुआ था। बताया जा रहा है कि उस समय छत पर जेठानी का परिवार मौजूद था, जिस कारण मनीता को शौचालय इस्तेमाल करने से रोक दिया गया। मामूली कहासुनी के बाद वह अपने दोनों बच्चों—छह साल की बेटी नित्या और तीन साल के बेटे कार्तिक—को लेकर घर से निकल गई।

अंदर ही अंदर टूट चुकी थी मनीता

परिजनों को लगा कि मनीता मायके चली गई होगी, क्योंकि वह पहले भी ऐसा कर चुकी थी। दिन भर किसी ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन मनीता मानसिक रूप से अंदर ही अंदर टूट चुकी थी। देर शाम गांव के बाहर जाहरवीर महाड़ी स्थल के पास मनीता और उसके दोनों बच्चे बेसुध हालत में पड़े मिले।

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सल्फास का खाली पैकेट मिला

ग्रामीणों ने जब तीनों को देखा तो तत्काल परिजनों को सूचना दी। मौके से सल्फास का खाली पैकेट बरामद हुआ। तीनों को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

भाई ने ससुरालियों पर लगाया गंभीर आरोप

मनीता के भाई जसबीर (निवासी मोहद्दीनपुर) ने ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मनीता के साथ पति और ससुराल के लोग अक्सर मारपीट करते थे। गुरुवार को भी झगड़े के बाद उसे घर से निकाल दिया गया था। जसबीर का आरोप है कि शाम को ससुराल पहुंचने पर मनीता और उसके बच्चों को जहर दिया गया।

पति, ससुर और जेठ-जेठानी पर केस दर्ज

जसबीर की तहरीर पर पुलिस ने मनीता के पति नीटू, ससुर, जेठ और जेठानी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया है। पुलिस ने पति और जेठ को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है।

पुलिस का बयान

पुलिस के अनुसार प्रथम दृष्टया मामला घरेलू विवाद के कारण आत्महत्या का प्रतीत होता है।

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महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव: AIMIM की बड़ी जीत, मुंबई में सेंध

। महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई समेत 29 नगर निगम चुनावों के नतीजे घोषित किए जा रहे हैं। शुरुआती रुझानों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को सबसे ज्यादा सीटें मिलती दिख रही हैं, लेकिन इन चुनावों की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की मजबूत सेंध है।

29 में से 13 नगर निगमों में AIMIM की जीत

महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में से 13 नगर निगमों में AIMIM के 95 उम्मीदवार विजयी हुए हैं। पार्टी ने न सिर्फ परंपरागत इलाकों में, बल्कि मुंबई जैसे बड़े महानगर में भी ज़ोरदार प्रदर्शन किया है।

मुंबई में AIMIM की ज़ोरदार एंट्री

AIMIM ने मुंबई में समाजवादी पार्टी के गढ़ मानखुर्द में बड़ी जीत दर्ज की है, जिसे अबू आज़मी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। AIMIM की इस सफलता ने मुंबई की सियासत में नए समीकरण खड़े कर दिए हैं।

मुंबई में AIMIM के विजयी उम्मीदवार

• वार्ड 134: मेहजबीन खान
• वार्ड 136: जमीर कुरैशी
• वार्ड 137: समीर पटेल
• वार्ड 138: रोशन शेख
• वार्ड 139: शबाना शेख
• वार्ड 145: खैरुनिशा हुसैन

छत्रपति संभाजीनगर और मालेगांव में मजबूत पकड़

छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम चुनाव में AIMIM दूसरे स्थान पर रही और यहां पार्टी ने 24 सीटों पर जीत दर्ज की। मालेगांव में AIMIM के 20 उम्मीदवार विजयी हुए, जो पार्टी की मजबूत जमीनी पकड़ को दर्शाता है।

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अन्य शहरों में भी AIMIM का प्रभाव

• सोलापुर, धुले और नांदेड़: 8-8 सीटें
• अमरावती: 6 पार्षद
• ठाणे: 5 पार्षद
• नागपुर: 4 पार्षद
• चंद्रपुर: पहली बार जीत का खाता

इन नतीजों से साफ है कि AIMIM ने कई जगहों पर समाजवादी पार्टी को पीछे छोड़ते हुए अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत कर ली है।

ओवैसी की रैलियों का दिखा असर

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने नगर निगम चुनावों से पहले पूरे महाराष्ट्र में रैलियां और बैठकें की थीं। चुनाव प्रचार के दौरान अकोला में हंगामा और छत्रपति संभाजीनगर में इम्तियाज जलील पर हमले की कोशिश जैसे विवाद भी सामने आए, लेकिन इसके बावजूद AIMIM को राज्य में बड़ी चुनावी सफलता मिली।

समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका

मुंबई के मानखुर्द में AIMIM की जीत को समाजवादी पार्टी और अबू आज़मी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में AIMIM अब एक मजबूत राजनीतिक खिलाड़ी बनकर उभरी है।

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242 अवैध सट्टेबाजी वेबसाइट ब्लॉक, सरकार की सख्त कार्रवाई

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। केंद्र सरकार ने युवाओं को ऑनलाइन सट्टेबाजी और गैंबलिंग की लत से बचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 242 अवैध सट्टेबाजी और गैंबलिंग से जुड़ी वेबसाइट लिंक को ब्लॉक कर दिया है। इसके साथ ही इनसे जुड़े अवैध मोबाइल ऐप्स पर भी पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। सरकार का कहना है कि बड़ी संख्या में देश के युवा इन गैरकानूनी गतिविधियों में फंस रहे थे, जिससे सामाजिक और आर्थिक नुकसान बढ़ रहा था।

अब तक 7,800 से ज्यादा वेबसाइट और ऐप बंद

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक 7,800 से अधिक अवैध सट्टेबाजी और गैंबलिंग वेबसाइट व ऐप्स को बंद किया जा चुका है। ऑनलाइन गेमिंग एक्ट लागू होने के बाद इस तरह की कार्रवाई में तेजी आई है। यह कानून अवैध ऑनलाइन पैसे वाले खेलों पर नकेल कसने के लिए लाया गया है।

ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 को मिली मंजूरी

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 (Promotion and Regulation) को मंजूरी दी थी। यह बिल पिछले साल अगस्त में संसद से पास हुआ था। सरकार का मानना है कि यह कानून नागरिकों को ऑनलाइन पैसे वाले खेलों के जोखिम से बचाने और वैध व सुरक्षित ऑनलाइन गेमिंग को बढ़ावा देने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

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सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गए थे सट्टेबाजी ऐप

सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 में स्पष्ट किया था कि यह कानून उन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ है, जो झूठे वादों के जरिए मुनाफा कमाते हैं और लोगों को लत, वित्तीय बर्बादी व सामाजिक समस्याओं की ओर धकेलते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्म परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन चुके थे।

WHO ने भी माना है गेमिंग डिसऑर्डर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस तरह की लत को Gaming Disorder के रूप में वर्गीकृत किया है। सरकार के मुताबिक, ऑनलाइन पैसे वाले गेमिंग प्लेटफॉर्म्स के कारण कई परिवारों की जीवनभर की बचत खत्म हो गई, युवा इसकी लत के शिकार हो गए और कुछ मामलों में आत्महत्या जैसी घटनाएं भी सामने आईं।

युवाओं और परिवारों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता

सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई युवाओं, परिवारों और डिजिटल इकोनॉमी की सुरक्षा के लिए की गई है। आने वाले समय में अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी और गैंबलिंग के खिलाफ और सख्त कदम उठाए जाएंगे।

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ईरान में सामूहिक फांसी रद्द होने पर ट्रंप ने जताया आभार, कहा– यह एक अहम और सकारात्मक कदम

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ईरान के नेतृत्व का धन्यवाद करते हुए कहा कि सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों को दी जाने वाली प्रस्तावित सामूहिक फांसी को रद्द कर दिया गया है। ट्रंप ने इसे एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक फैसला करार दिया है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब ईरान में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन जारी हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय हालात पर करीबी नजर बनाए हुए है।

ट्रुथ सोशल पर ट्रंप का बयान

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि उन्हें यह जानकर बहुत सम्मान और संतोष हुआ है कि ईरान में तय की गई सभी फांसियों को रद्द कर दिया गया है। ट्रंप के मुताबिक, करीब 800 प्रदर्शनकारियों को फांसी दिए जाने की योजना थी, जिसे अब टाल दिया गया है।

ईरान में 1979 के बाद सबसे बड़े प्रदर्शन

ईरान में पिछले कई हफ्तों से बड़े स्तर पर सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। इन्हें 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन बताया जा रहा है। कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं, जिसमें भारी संख्या में लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं।

हिंसा में कमी का ट्रंप का दावा

इस हफ्ते की शुरुआत में ट्रंप ने कहा था कि ईरान में प्रदर्शनों से जुड़ी हिंसा में अब कमी देखी जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि फिलहाल बड़े पैमाने पर फांसी देने की कोई योजना है। हालांकि, ट्रंप ने चेतावनी दी कि हालात बिगड़ने पर अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।

मौतों के आंकड़ों को लेकर विरोधाभास

ईरानी अधिकारियों का दावा है कि प्रदर्शनों की शुरुआत से अब तक 2,000 से अधिक लोगों की मौत हुई है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने यह आंकड़ा 3,500 से ज्यादा बताया है। कुछ रिपोर्ट्स में मृतकों की संख्या 20,000 तक होने का दावा भी किया गया है, जिससे आंकड़ों को लेकर गंभीर मतभेद बने हुए हैं।

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ईरान ने आरोपों को बताया गलत

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी चैनल फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि मौतों की संख्या ‘सैकड़ों’ में है। उन्होंने विदेशी मीडिया और मानवाधिकार संगठनों पर आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया।

हमले के दबाव से ट्रंप का इनकार

ट्रंप ने खाड़ी देशों के अधिकारियों के उस दावे को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि सऊदी अरब, कतर और ओमान ने उन्हें ईरान पर हमला न करने के लिए मनाया। ट्रंप ने साफ कहा कि किसी ने उन्हें नहीं रोका, बल्कि ईरान के फैसले ने ही उनकी सोच बदली।

ट्रंप बोले— फैसला पूरी तरह मेरा था

व्हाइट हाउस से फ्लोरिडा रवाना होते समय ट्रंप ने कहा,
“किसी ने मुझे नहीं मनाया। मैंने खुद फैसला लिया। उन्होंने किसी को फांसी नहीं दी और फांसियां रद्द कर दीं। इसका मुझ पर बड़ा असर पड़ा।”

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श्मशान में भी धर्म का दीपक: शनि और राजा हरिश्चंद्र की भावनात्मक गाथा

“न्याय, सत्य और शनि की महापरीक्षा: जब राजा हरिश्चंद्र ने शनि देव की कठोर परीक्षा में भी नहीं छोड़ा सत्य का मार्ग”

✨ भारतीय सनातन परंपरा में राजा हरिश्चंद्र का नाम सत्य, त्याग, धर्म और नैतिक दृढ़ता का पर्याय माना जाता है। वहीं शनि देव को कर्मफल दाता, न्यायाधीश और तपस्या की अग्नि में परखने वाले देव के रूप में जाना जाता है।
शनि और राजा हरिश्चंद्र की शास्त्रोक्त कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए एक शाश्वत संदेश है—कि सत्य का मार्ग चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, अंततः वही विजय दिलाता है।
यह कथा मार्कण्डेय पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण में विभिन्न प्रसंगों के साथ वर्णित है।
जिसमें शनि देव द्वारा ली गई राजा हरिश्चंद्र की महापरीक्षा का शास्त्रोक्त, भावनात्मक और विस्तृत वर्णन किया गया है।

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📜 शास्त्रोक्त कथा : शनि और राजा हरिश्चंद्र
👑 सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र
अयोध्या के सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र, महाराज त्रिशंकु के पुत्र थे। वे बचपन से ही सत्यव्रत, दानशील और धर्मपरायण थे। उनके राज्य में कोई भूखा नहीं सोता था, कोई अन्याय नहीं होता था।
उनकी सबसे बड़ी प्रतिज्ञा थी—“प्राण जाएँ पर वचन न जाए।”
उनकी सत्यनिष्ठा की कीर्ति देव लोक तक पहुँची। देवताओं में भी यह चर्चा होने लगी कि पृथ्वी पर यदि कोई राजा है जो सत्य का साक्षात् स्वरूप है, तो वह हरिश्चंद्र ही है।
🪐 शनि देव का आगमन
शनि देव, जो कर्मों के अनुसार फल देने वाले देवता हैं, ने यह विचार किया—
“यदि यह राजा वास्तव में सत्य का पालन करता है, तो इसे कठिनतम परिस्थितियों में परखा जाए।”
शनि देव ने राजा हरिश्चंद्र की साढ़ेसाती का प्रारंभ किया। शास्त्रों में वर्णित है कि शनि की परीक्षा केवल दंड नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का मार्ग होती है।

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🔥 विश्वामित्र का यज्ञ और पहला संकट
शनि देव ने महर्षि विश्वामित्र को प्रेरित किया। विश्वामित्र ने एक महायज्ञ आरंभ किया और राजा हरिश्चंद्र से संपूर्ण राज्य, कोष और वैभव दान में माँग लिया।
राजा ने बिना किसी हिचक के कहा—
“राजन, जो माँगेंगे वह दूँगा, क्योंकि दान देना मेरा धर्म है।”
उन्होंने राज्य, सोना, रत्न, महल—सब कुछ दान कर दिया।
💔 वचन पालन की भीषण परीक्षा
दान के पश्चात भी विश्वामित्र ने दक्षिणा शेष बता दी। अब राजा के पास कुछ भी नहीं बचा।
तब शनि की माया से विवश होकर राजा ने—
स्वयं को
पत्नी रानी तारामती को
पुत्र रोहिताश्व को
दास के रूप में बेच दिया।
यह दृश्य शास्त्रों में अत्यंत करुण बताया गया है। एक चक्रवर्ती सम्राट का दास बन जाना—यह केवल बाह्य पतन नहीं, बल्कि आत्मा की अग्नि परीक्षा थी।

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⚰️ श्मशान का भयावह दृश्य
शनि देव की परीक्षा यहीं समाप्त नहीं हुई। राजा हरिश्चंद्र को काशी के श्मशान में चांडाल के यहाँ कर वसूलने का कार्य मिला।
वहीं रानी तारामती अपने पुत्र के साथ जीवन यापन कर रही थीं। दुर्भाग्यवश, रोहिताश्व का सर्पदंश से निधन हो गया।
शोकाकुल रानी पुत्र का शव लेकर श्मशान पहुँचीं।
राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें पहचाना, परंतु धर्म से विचलित नहीं हुए।
उन्होंने कहा—
“माता, श्मशान का कर देना होगा। मैं धर्म से बंधा हूँ।”

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😭 सत्य की चरम सीमा
रानी तारामती के पास कर देने को कुछ नहीं था। तब उन्होंने अपने आंचल का आधा भाग फाड़कर कर के रूप में दिया।
यह दृश्य देखकर—
देवता काँप उठे
पृथ्वी रो पड़ी
स्वयं शनि देव की आँखें भर आईं
राजा हरिश्चंद्र ने पत्नी-पुत्र के सामने भी धर्म और सत्य का त्याग नहीं किया।

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🌟 शनि देव का प्राकट्य और सत्य की विजय
तभी आकाश से दिव्य प्रकाश हुआ।
शनि देव, इंद्र देव और अन्य देवगण प्रकट हुए।
शनि देव ने कहा—
“राजन, तुमने सिद्ध कर दिया कि सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं। यह परीक्षा तुम्हें दंड देने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हें अमर बनाने के लिए थी।”
पुत्र रोहिताश्व जीवित हो गए, राज्य वापस मिला और राजा हरिश्चंद्र को स्वर्ग लोक का अधिकारी घोषित किया गया।
🕉️ शास्त्रों का संदेश
शनि और राजा हरिश्चंद्र की कथा हमें सिखाती है।शनि देव अन्यायी नहीं, न्यायप्रिय हैं
संकट आत्मशुद्धि का मार्ग होते हैं
सत्य कभी पराजित नहीं होता
धर्म का पालन ही जीवन का परम उद्देश्य है

जेल की सुरक्षा पर सवाल, कैसे पहुंचा धमकी भरा पत्र बैरक तक

जेल में बंद पूर्व अधिकारियों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत?


देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) जेल में बंद पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को जान से मारने की धमकी मिलने का गंभीर मामला सामने आया है। प्लाट आवंटन में धोखाधड़ी के आरोप में निरुद्ध अमिताभ ठाकुर की बैरक के सामने एक धमकी भरा पत्र मिलने के बाद जेल प्रशासन और परिजनों में हड़कंप मच गया है। यह पत्र कंप्यूटर से टाइप किया हुआ बताया जा रहा है, जिसे उनकी बैरक के सामने एक पत्थर के नीचे दबाकर रखा गया था। पत्र में न केवल जान से मारने की धमकी दी गई है, बल्कि आपत्तिजनक और अश्लील भाषा का भी प्रयोग किया गया है।

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अमिताभ ठाकुर ने इस घटना की जानकारी तुरंत अपने अधिवक्ता प्रवीण द्विवेदी और जेल अधीक्षक को दी। अधिवक्ता के अनुसार, धमकी मिलने के बाद अमिताभ ठाकुर अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं। जेल के अंदर इस तरह की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की जानकारी मिलने के बाद जेल प्रशासन ने आंतरिक स्तर पर जांच शुरू करने की बात कही है, हालांकि आधिकारिक बयान अभी सामने नहीं आया है।
पूर्व आईपीएस अमिताभ ठाकुर की शनिवार को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) न्यायालय देवरिया में पेशी प्रस्तावित है। इसी सिलसिले में शुक्रवार को उनके अधिवक्ता उनसे मुलाकात के लिए जेल गए थे, जहां अमिताभ ठाकुर ने धमकी पत्र के बारे में पूरी जानकारी साझा की। अधिवक्ता ने बताया कि पत्र मिलने के बाद ठाकुर मानसिक रूप से असहज और भयभीत हैं।
गौरतलब है कि अमिताभ ठाकुर वर्ष 1999 में देवरिया जिले में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात थे। उस दौरान देवरिया औद्योगिक स्टेट में उनकी पत्नी नूतन ठाकुर के नाम एक प्लाट का आवंटन हुआ था। आरोप है कि प्लाट आवंटन प्रक्रिया में नामों में गड़बड़ी और नियमों के उल्लंघन के जरिए धोखाधड़ी की गई। इसी मामले में बीते सितंबर माह में लखनऊ के तालकटोरा थाने में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। 8 दिसंबर को दिल्ली जाते समय शाहजहांपुर के पास ट्रेन से उन्हें गिरफ्तार कर देवरिया लाया गया, जहां अदालत ने उन्हें जेल भेज दिया।

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जेल में रहते हुए अमिताभ ठाकुर ने अपनी गिरफ्तारी से जुड़े सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की मांग को लेकर आमरण अनशन भी किया था, जिसे बाद में न्यायालय के आश्वासन पर स्थगित कर दिया गया। पेशी के दौरान उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कफ सिरप मामले से जुड़े बड़े खुलासों और प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता का दावा किया था। उनका आरोप रहा है कि सरकार नहीं चाहती कि वे इस मामले में आगे बढ़ें, इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया।

भारतीय न्याय की अनूठी पहचान: परंपरा, संविधान और विधवा बहू का अधिकार

भारतीय न्याय,सांस्कृतिक नैतिकता और विधवा बहू का अधिकार-मनुस्मृति से संविधान तक एक समावेशी न्यायिक यात्रा क़ा समग्र विश्लेषण

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत केवल एक भौगोलिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है,जिसकी चेतना में धर्म नैतिकता, आस्था, परंपरा और न्याय एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।भारतीय समाज में बड़े- बुजुर्गों की सीख,शास्त्रों में वर्णित जीवन-मूल्य और लोक-स्मृति में बसे संस्कार केवल निजी आचरण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सदियों तक सामाजिक और विधिक व्यवस्था को भी दिशा दी है। यही कारण है कि भारत जैसे विशाल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राष्ट्र में शास्त्रों, पुराणों और स्मृतियों में कही गई बातों का उल्लेख साधारण व्यक्ति से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक में उदाहरण स्वरूप किया जाता रहा है। यह तथ्य अपने आप में भारतीय न्याय प्रणाली की विशिष्टता को रेखांकित करता है, जहाँ आधुनिक संवैधानिक ढांचे के भीतर भी सांस्कृतिक नैतिकता को पूरी तरह नकारा नहीं जाता, बल्कि उसे न्याय की संवेदनशील व्याख्या का माध्यम बनाया जाता है।13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय ने इसी भारतीय न्यायिक परंपरा को एक बार फिर वैश्विक मंच पर स्थापित किया। यह फैसला केवल एक विधवा बहू के भरण-पोषण के अधिकार से जुड़ा मामला नहीं था, बल्कि यह उस गहरे दर्शन को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें कानून, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि अदालत द्वारा मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ लेना यह स्पष्ट करता है कि भारतीय न्याय प्रणाली आधुनिकता और परंपरा के बीच टकराव नहीं,बल्कि संवाद में विश्वास करती है।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति के उस श्लोक का उल्लेख किया जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि माता, पिता, पत्नी और पुत्र को कभी नहीं त्यागना चाहिए, और जो व्यक्ति ऐसा करता है,उसे दंडित किया जाना चाहिए।यह श्लोक केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का एक मूलभूत सिद्धांत प्रस्तुत करता है। अदालत ने इस श्लोक को केवल सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में नहीं,बल्कि नैतिक आधार के रूप में उद्धृत किया, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि भरण- पोषण का दायित्व भारतीय समाज में केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय भी है।सुप्रीम कोर्ट की तीन माननीय जजों  की पीठ ने यह रेखांकित किया कि किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति केवल उत्तराधिकारियों की निजी संपत्ति नहीं होती, बल्कि उस पर उन सभी निर्भर व्यक्तियों का नैतिक और कानूनी अधिकार होता है, जिनकी देखभाल मृतक के जीवनकाल में उसकी जिम्मेदारी थी। यह दृष्टिकोण भारतीय पारिवारिक संरचना की उस अवधारणा को मजबूत करता है, जिसमें परिवार को केवल रक्त-संबंधों का समूह नहीं, बल्कि परस्पर उत्तरदायित्वों की इकाई माना गया है। 

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साथियों बात अगर हम 13 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के तीन माननीय न्यायमूर्तियों की पीठ ने दिए गए निर्णय की करें तो,इस मामले का मूल विवाद अत्यंत तकनीकी प्रतीत हो सकता है,लेकिन इसके निहितार्थ अत्यंत व्यापक हैं। प्रश्न यह था कि यदि किसी विवाहित महिला के पति की मृत्यु उसके ससुर के जीवनकाल में हो जाती है, तो उसे भरण- पोषण का अधिकार मिलता है, लेकिन यदि पति की मृत्यु ससुर की मृत्यु के बाद होती है, तो क्या वह इस अधिकार से वंचित हो जाएगी?याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि ससुर की मृत्यु के बाद विधवा बहू का उनके परिवार की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं बचता। यह तर्क भारतीय समाज की उस संकीर्ण व्याख्या को दर्शाता है,जिसमें रिश्तों को केवल जीवनकाल की घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है, न कि उनके नैतिक दायित्वों से।सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच भेदभाव करना न केवल तर्कहीन है,बल्कि यह संवैधानिक समानता के सिद्धांत के भी विरुद्ध है।अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी किसी भी व्याख्या का कोई संवैधानिक या तार्किक आधार नहीं हो सकता, जो समान परिस्थितियों में मौजूद महिलाओं के बीच भेदभाव उत्पन्न करे। यह टिप्पणी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार की एक सशक्त पुनर्पुष्टि है। 

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साथियों बात अगर हम अदालत ने अपने निर्णय में हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम 1956 की धारा 22 का विशेष उल्लेख किया, इसको समझने की करें तो यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि मृतक हिंदू की संपत्ति से उसके सभी उत्तराधिकारियों पर यह दायित्व बनता है कि वे उसके निर्भर व्यक्तियों का भरण-पोषण करें। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए कहा कि विधवा बहू भी निर्भर व्यक्तियों की श्रेणी में आती है, बशर्ते वह स्वयं या मृत पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से अपना निर्वाह करने में असमर्थ हो।यह निर्णय इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि इसमें अदालत ने कानूनी दायित्व और नैतिक दायित्व के बीच कृत्रिम विभाजन को अस्वीकार किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय पारिवारिक कानून की आत्मा केवल विधिक प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक नैतिकता की गहरी छाप है। जब कानून नैतिकता से कट जाता है, तब वह केवल नियमों का संकलन बनकर रह जाता है, लेकिन जब वह नैतिक मूल्यों से जुड़ता है, तब वह न्याय का माध्यम बनता है।मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख करते हुए अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राचीन ग्रंथों का संदर्भ लेना किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य के सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है, जब तक कि उसका उपयोग सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतों को समझाने के लिए किया जा रहा हो। यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय न्यायिक विमर्श में भी महत्वपूर्ण है, जहाँ सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय नैतिकता को न्यायिक निर्णयों में स्थान देने की आवश्यकता पर लगातार चर्चा होती रही है। 

साथियों बात अगर हम इस निर्णय कोवैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखनें की करें तो यह फैसला केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनियाँ भर में पारिवारिक कानूनों में यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या विधवा महिलाओं को केवल उनके पति की संपत्ति तक सीमित रखा जाए, या उन्हें परिवार की सामूहिक संपत्ति से भी संरक्षण दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय उन सभी समाजों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो पारंपरिक पारिवारिक संरचनाओं और आधुनिक मानवाधिकारों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।यह फैसला विशेष रूप से पितृसत्तात्मक समाजों के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है कि महिलाओं के अधिकार किसी पुरुष रिश्तेदार के जीवनकाल या मृत्यु की तकनीकी घटनाओं पर निर्भर नहीं हो सकते। 

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साथियों बात अगर हम विधवा बहू को परिवार से बाहर मानने की मानसिकता को समझने की करें तो अदालत ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। यह निर्णय भारतीय समाज में विधवाओं के प्रति लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा और असुरक्षा की भावना को चुनौती देता है अदालत ने यह भी कहा कि पुत्र की मृत्यु के बाद पिता की यह धार्मिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह अपनी बहू का भरण-पोषण करे, यदि वह स्वयं अपने निर्वाह में असमर्थ है।यह टिप्पणी भारतीय परिवार की उस अवधारणा को पुनर्जीवित करती है, जिसमें बुजुर्ग केवल अधिकारों के धारक नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वों के संरक्षक भी होते हैं।यह दृष्टिकोण बुजुर्गों के सम्मान औरसामाजिक सुरक्षा को भी एक नया अर्थ देता है।इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह न्यायिक सक्रियता और संवेदनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।अदालत ने कानून की संकीर्ण व्याख्या करने के बजाय उसके उद्देश्य और आत्मा को समझने का प्रयास किया। यह वही दृष्टिकोण है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरपज़िव इंटरप्रिटेशन के रूप में जाना जाता है, और जिसे आधुनिक न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है। 

साथियों बात अगर हम भारतीय संविधान और प्राचीन भारतीय ग्रंथों के बीच की स्थिति को समझने की करें तो  यह संवाद यह दर्शाता है कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। संविधान ने जिन मूल्यों,समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय को स्थापित किया है,उनके बीजभारतीय सांस्कृतिक परंपरा में पहले से मौजूद रहे हैं।सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस ऐतिहासिक निरंतरता को रेखांकित करता है।

अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह निर्णय केवल एक विधवा बहू के अधिकारों की रक्षा नहीं करता,बल्कि यह भारतीय समाज को यह याद दिलाता है कि न्याय केवल अदालतों में नहीं, बल्कि परिवारों और समाज में भी स्थापित होना चाहिए।जब कानून परिवार की सबसे कमजोर कड़ी को संरक्षण देता है तब वह केवल कानूनी दस्तावेज नहीं,बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बन जाता है।इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय न्याय प्रणाली न तो अंधी परंपरा की गुलाम है, और न ही सांस्कृतिक जड़ों से कटे हुए आधुनिकतावाद की। वह दोनों के बीच एक संतुलित मार्ग अपनाती है,जहाँ मनुस्मृति जैसे ग्रंथ नैतिक संदर्भ प्रदान करते हैं,और संविधान उस नैतिकता को कानूनी अधिकारों मेंपरिवर्तित करता है। यही भारतीय न्याय की वह विशिष्ट पहचान है, जो उसे वैश्विक मंच पर अलग स्थान प्रदान करती है।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

लार थाना क्षेत्र में लगातार विवाद, पुलिस व्यवस्था पर उठे सवाल

लार/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।देवरिया जनपद के लार थाना क्षेत्र अंतर्गत धनगड़ा गांव में हुई एक गंभीर मारपीट की घटना से इलाके में सनसनी फैल गई है। इस घटना में आदर्श नगर पिंडी निवासी विशाल यादव गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। बताया जा रहा है कि विशाल यादव का अभय दुबे से किसी बात को लेकर विवाद हुआ था, जो कुछ ही देर में हिंसक झगड़े में तब्दील हो गया।

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प्राप्त जानकारी के अनुसार विवाद के दौरान विशाल यादव पर एक से अधिक लोगों ने एक साथ हमला किया। घायल का आरोप है कि हमलावर हथियारों से लैस थे और उन्होंने जानलेवा नीयत से हमला किया। मारपीट के दौरान विशाल को सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं, जिससे वह मौके पर ही गिर पड़े। घटना के बाद गांव में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
सूचना मिलते ही लार थाना पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची और घटना स्थल का निरीक्षण किया। स्थानीय ग्रामीणों की मदद से घायल विशाल यादव को पहले लार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद उनकी हालत को नाजुक बताया। अस्पताल सूत्रों के अनुसार घायल फिलहाल बयान देने की स्थिति में नहीं है और डॉक्टरों की टीम उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।

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पुलिस का कहना है कि घटना के मुख्य आरोपियों की पहचान अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है। चूंकि घायल का बयान दर्ज नहीं हो पाया है, इसलिए प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय लोगों से पूछताछ की जा रही है। पुलिस आसपास के क्षेत्रों में लगे संभावित सीसीटीवी कैमरों की भी जांच कर रही है, ताकि हमलावरों की पहचान सुनिश्चित की जा सके।
इस घटना के बाद धनगड़ा गांव और आसपास के इलाकों में तनाव का माहौल है। ग्रामीणों ने पुलिस से आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी और पीड़ित को न्याय दिलाने की मांग की है। वहीं पुलिस प्रशासन का दावा है कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी विवादों के हिंसक रूप लेने की चिंता को उजागर किया है। पुलिस ने लोगों से शांति बनाए रखने और किसी भी प्रकार की अफवाहों से दूर रहने की अपील की है।

एफआईआर से लेकर न्यायालय तक: जानिए आपके कानूनी अधिकार

विधिक जागरूकता सभी के लिए अनिवार्य: ग्रामीणों के अधिकारों को सशक्त करता विधिक साक्षरता शिविर


संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद न्यायाधीश मोहन लाल विश्वकर्मा के निर्देशन एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में शुक्रवार को महुली थाना क्षेत्र के बघाड़ी उर्फ परसादीपुर गांव में विधिक साक्षरता शिविर का आयोजन किया गया। इस शिविर का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को उनके न्यायिक अधिकारों, कानूनी प्रक्रियाओं और निःशुल्क विधिक सहायता की जानकारी देकर उन्हें सशक्त बनाना था।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव एवं अपर जिला जज देवेंद्र नाथ गोस्वामी ने कहा कि विधिक जागरूकता हर नागरिक के लिए आवश्यक है। कानून की जानकारी के अभाव में लोग अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने बताया कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा स्थायी लोक अदालत, प्री-लिटिगेशन, मेडिएशन तथा लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम (एलएडीसीएस) के माध्यम से आम जनता को सरल, त्वरित और निःशुल्क न्याय उपलब्ध कराया जाता है।

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एलएडीसीएस के चीफ अंजय कुमार श्रीवास्तव ने थाने पर एफआईआर दर्ज कराने से जुड़े अधिकारों की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यदि पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, तो पीड़ित व्यक्ति न्यायालय की शरण लेकर उचित कानूनी उपचार प्राप्त कर सकता है। साथ ही उन्होंने नालसा द्वारा संचालित टोल फ्री नंबर 15100 के माध्यम से मिलने वाली निःशुल्क विधिक सेवाओं की प्रक्रिया भी समझाई।
शिविर में उपस्थित ग्रामीणों को घरेलू विवाद, भूमि विवाद, पारिवारिक मामले, महिला एवं बाल संरक्षण, वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार तथा सरकारी योजनाओं से जुड़े कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी गई। कार्यक्रम में ग्राम प्रधान प्रतिनिधि ओमप्रकाश यादव, राहुल यादव, मोतीलाल, पीएलवी त्रिलोकी सिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। शिविर के माध्यम से ग्रामीणों में कानून के प्रति जागरूकता बढ़ी और उन्होंने इसे उपयोगी बताया।

जिनके बिना अधूरा है भारतीय इतिहास: 17 जनवरी विशेष

17 जनवरी: इतिहास में दर्ज महान विभूतियों के महत्वपूर्ण निधन

पंडित बिरजू महाराज (निधन: 17 जनवरी 2022)
पंडित बिरजू महाराज भारतीय शास्त्रीय नृत्य की कथक शैली के विश्वप्रसिद्ध कलाकार थे। उनका जन्म लखनऊ घराने में हुआ और उन्होंने कथक को पारंपरिक सीमाओं से निकालकर वैश्विक मंच तक पहुँचाया। उनकी नृत्य शैली में भाव, लय और अभिनय का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था। वे गुरु, कोरियोग्राफर और कथक के संवाहक के रूप में जीवनभर सक्रिय रहे। पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित बिरजू महाराज ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दी। उनका निधन कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जाता है।

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उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान (निधन: 17 जनवरी 2021)
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक और संगीत शिक्षक थे। वे रामपुर-सहसवान घराने के प्रमुख स्तंभ माने जाते थे। उनकी गायकी में शुद्ध रागदारी, गंभीरता और परंपरा की गहरी समझ झलकती थी। उन्होंने कई पीढ़ियों को संगीत की शिक्षा दी और भारतीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। पद्म विभूषण से सम्मानित उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान का योगदान केवल मंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे गुरु-शिष्य परंपरा के सशक्त उदाहरण थे। उनका निधन भारतीय संगीत के स्वर्ण अध्याय का अंत माना जाता है।
बापू नादकर्णी (निधन: 17 जनवरी 2020)
बापू नादकर्णी भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे अनुशासित गेंदबाजों में गिने जाते हैं। वे अपनी बेहद कसी हुई गेंदबाजी और रन रोकने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने लंबे ओवर फेंककर बल्लेबाजों को बांधे रखा। उनके खेल में धैर्य, रणनीति और अनुशासन का अद्भुत मेल था। बापू नादकर्णी ने भारतीय क्रिकेट को तकनीकी मजबूती दी और टीम के लिए विश्वसनीय खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाई। उनका निधन भारतीय खेल इतिहास में एक शांत लेकिन प्रभावशाली युग की समाप्ति माना जाता है।
ज्योति बसु (निधन: 17 जनवरी 2010)
ज्योति बसु भारत के प्रमुख मार्क्सवादी राजनीतिज्ञ और पश्चिम बंगाल के लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। वे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के मजबूत स्तंभ माने जाते थे। उनके नेतृत्व में बंगाल में भूमि सुधार और पंचायत व्यवस्था को नई दिशा मिली। सादगीपूर्ण जीवन और स्पष्ट विचारधारा उनकी पहचान थी। उन्होंने लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर वामपंथी राजनीति को मजबूती दी। ज्योति बसु का निधन भारतीय राजनीति में वैचारिक दृढ़ता और प्रतिबद्ध नेतृत्व के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत था।
सुचित्रा सेन (निधन: 17 जनवरी 2014)
सुचित्रा सेन हिंदी और बंगाली सिनेमा की कालजयी अभिनेत्री थीं। उनकी अदाकारी में गरिमा, भावनात्मक गहराई और रहस्यमय आकर्षण दिखाई देता था। उन्होंने कम फिल्मों में काम किया, लेकिन हर भूमिका अमर बन गई। ‘देवदास’ और ‘आंधी’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को आज भी याद किया जाता है। निजी जीवन में सादगी और फिल्मी दुनिया से दूरी बनाए रखने के कारण वे एक रहस्यमयी व्यक्तित्व बनी रहीं। उनका निधन भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग की एक चमकती रोशनी के बुझने जैसा था।
ज्योति प्रसाद अग्रवाल (निधन: 17 जनवरी 1951)
ज्योति प्रसाद अग्रवाल असम के महान साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी और फिल्म निर्माता थे। वे असमिया सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रमुख सूत्रधार माने जाते हैं। उन्होंने साहित्य, संगीत और रंगमंच के माध्यम से सामाजिक चेतना को जागृत किया। असमिया सिनेमा के विकास में उनका योगदान ऐतिहासिक है। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले ज्योति प्रसाद अग्रवाल ने कला को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनका निधन असमिया साहित्य और संस्कृति के लिए गहरी क्षति सिद्ध हुआ।
गौहर जान (निधन: 17 जनवरी 1930)
गौहर जान भारत की पहली रिकॉर्डेड गायिका और प्रसिद्ध नर्तकी थीं। उन्होंने ग्रामोफोन रिकॉर्ड के माध्यम से भारतीय संगीत को नई तकनीकी पहचान दिलाई। उनकी आवाज़ और प्रस्तुति शैली ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। वे शास्त्रीय और अर्ध-शास्त्रीय संगीत में निपुण थीं। गौहर जान ने महिला कलाकारों के लिए नए रास्ते खोले और संगीत को दरबारों से निकालकर आम जन तक पहुँचाया। उनका निधन भारतीय संगीत के प्रारंभिक आधुनिक युग के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत था।

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बेगा बेगम (निधन: 17 जनवरी 1582)
बेगा बेगम मुग़ल बादशाह हुमायूँ की पत्नी और अकबर की सोतेली माँ थीं। वे मुग़ल स्थापत्य और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हुमायूँ के मकबरे के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बाद में ताजमहल की प्रेरणा बना। धार्मिक, दानशील और दूरदर्शी व्यक्तित्व के रूप में उनका सम्मान था। बेगा बेगम का निधन मुग़ल इतिहास में एक सशक्त महिला संरक्षक और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षक के रूप में स्मरणीय है।