Saturday, June 13, 2026
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छाता गांव में मंदिर में बड़ी चोरी, ताले तोड़कर मां दुर्गा के गहने और दानपात्र ले गए चोर

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। बलिया जनपद के छाता गांव में शुक्रवार देर रात भजनाश्रम दुर्गा मंदिर में अज्ञात चोरों ने बड़ी चोरी की वारदात को अंजाम दिया। चोरों ने मंदिर का ताला तोड़कर मां दुर्गा के कीमती आभूषण, देवी-देवताओं के चांदी के मुकुट और दानपात्र चोरी कर लिया, जिससे पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है।

मां दुर्गा के सोने-चांदी के गहने चोरी

मंदिर के पुजारी के अनुसार, चोर मां दुर्गा का सोने का मंगलसूत्र, नथिया, टिकुली और चांदी का मुकुट अपने साथ ले गए। इसके अलावा राधे-कृष्ण और गणेश जी के सिर पर विराजमान चांदी के मुकुट भी चोरी कर लिए गए। चोर मंदिर में रखा दानपात्र भी उठा ले गए, जिसमें नगदी होने की संभावना जताई जा रही है।

हजारों से लाखों रुपये की चोरी का अनुमान

चोरी गए आभूषणों और नकदी की अनुमानित कीमत हजारों से लेकर लाखों रुपये तक बताई जा रही है। घटना का पता शनिवार सुबह तब चला, जब पुजारी पूजा-अर्चना के लिए मंदिर पहुंचे और टूटा ताला व बिखरा हुआ सामान देखा।

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गांव में आक्रोश, सुरक्षा पर उठे सवाल

घटना की जानकारी मिलते ही ग्रामीणों की भारी भीड़ मंदिर परिसर में जुट गई। ग्रामीणों ने मंदिर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने पर नाराजगी जताई और कहा कि लापरवाही के चलते चोरों के हौसले बढ़े हैं।

पुलिस और फोरेंसिक टीम जांच में जुटी

सूचना पर छाता पुलिस चौकी और स्थानीय थाना पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण कर आसपास के इलाकों में पूछताछ शुरू कर दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए फोरेंसिक टीम को भी बुलाया गया है।

थाना प्रभारी ने बताया कि चोरों की पहचान के लिए सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल सर्विलांस और तकनीकी साक्ष्यों की जांच की जा रही है और जल्द ही घटना का खुलासा किया जाएगा।

श्रद्धालुओं ने की सुरक्षा बढ़ाने की मांग

ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में सीसीटीवी कैमरे, रात्रि गश्त और चौकीदार की नियुक्ति जैसी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की मांग की है। शुक्रवार रात हुई इस चोरी की घटना से पूरे छाता गांव में भय और आक्रोश का माहौल है। पुलिस जांच जारी है।

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पटना में रिटायर महिला शिक्षिका की गला रेतकर हत्या, आभूषण लूट का शक — शास्त्रीनगर AG कॉलोनी में सनसनी

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) शनिवार को एक दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई, जहां रिटायर महिला शिक्षिका की बेरहमी से गला रेतकर हत्या कर दी गई। मृतका की पहचान माधवी कुमारी (78 वर्ष) के रूप में हुई है। यह घटना शास्त्रीनगर थाना क्षेत्र के AG कॉलोनी पार्क स्थित हाउस नंबर C-71 की है। पुलिस को प्रथम दृष्टया यह मामला लूट के इरादे से की गई हत्या का प्रतीत हो रहा है, क्योंकि मृतका के हाथ से अंगूठी और गले से चेन गायब पाई गई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, माधवी कुमारी के शरीर पर चाकू से किए गए हमले के स्पष्ट निशान मिले हैं। हत्या के बाद सबसे पहले पड़ोस की एक महिला जब घर पहुंची तो उसने अंदर शव पड़ा देखा। घबराई महिला ने तत्काल रिटायर शिक्षिका की बेटी को फोन कर घटना की सूचना दी। इसके बाद पुलिस को जानकारी दी गई।

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सूचना मिलते ही सचिवालय SDPO-2 साकेत कुमार के नेतृत्व में शास्त्रीनगर थाना समेत अन्य थानों की पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की टीम को भी घटनास्थल पर बुलाया गया, जिसने साक्ष्य संकलन की प्रक्रिया पूरी की।
मृतका के पारिवारिक विवरण के अनुसार, उनके पति अमरेंद्र दास AG ऑफिस में अधिकारी थे, जिनका छह वर्ष पूर्व निधन हो चुका है। माधवी कुमारी की एक बेटी और दो बेटे हैं। दोनों बेटे बाहर रहते हैं, जबकि बेटी भी अलग स्थान पर रहती है। मृतका घर में अकेली रहती थीं, जिस कारण वह अपराधियों के लिए आसान निशाना बन गईं।
पुलिस ने इस हत्याकांड की जांच तेज करते हुए घर में काम करने वाले रसोइया और नौकरानी को हिरासत में लिया है। उनसे गहन पूछताछ की जा रही है। पुलिस आसपास के CCTV फुटेज खंगाल रही है और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स की भी जांच की जा रही है।

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सचिवालय SDPO-2 साकेत कुमार ने बताया कि प्रथम दृष्टया मामला हत्या का है और सभी पहलुओं से जांच की जा रही है। जल्द ही घटना का खुलासा किए जाने का दावा किया गया है। इस घटना ने पूरे इलाके में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है, खासकर अकेले रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।

बिना पंजीकरण चल रहे 11 होटलों पर प्रशासन की सख्ती, तत्काल प्रभाव से संचालन बंद

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। बलिया जिले में बिना लाइसेंस और पंजीकरण के संचालित हो रहे होटलों पर प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। नगर मजिस्ट्रेट आसाराम शर्मा के निर्देश पर सराय अधिनियम–1867 की धारा 3 के तहत जिले के 11 होटलों के संचालन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है।

नगर मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया कि बिना वैध लाइसेंस और पंजीकरण के किसी भी होटल या सराय में यात्रियों को ठहराने की अनुमति नहीं है। यह नियम सुरक्षा, निगरानी और यात्रियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है।

कई बार नोटिस के बावजूद नहीं कराया पंजीकरण

प्रशासन के अनुसार, संबंधित होटल संचालकों को लंबे समय से पंजीकरण कराने के लिए नोटिस जारी किए जा रहे थे, लेकिन इसके बावजूद कई होटल निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहे थे। निरीक्षण के दौरान पाया गया कि होटल बिना किसी वैधानिक अनुमति के संचालित हो रहे थे, जो गंभीर अनियमितता की श्रेणी में आता है।

इन 11 होटलों पर लगा प्रतिबंध

प्रशासन द्वारा जिन होटलों को तत्काल बंद करने का आदेश दिया गया है, उनमें शामिल हैं—

• रायल होटल (वार्ड नंबर 5, रसड़ा)
• गिरजा होटल एंड मैरिज हॉल (राजधानी रोड, चंद्रशेखर नगर बहेरी)
• तृप्ति होटल (हैबतपुर माल्देपुर मोड़)
• होटल सुरेश (राजधानी रोड, जलालपुर माल्देपुर)
• रायल होटल (स्टेशन रोड, खरौनी कोठी)
• सेंट्रल होटल (स्टेशन रोड, खरौनी कोठी)
• होटल डायमंड (टाउन हाल रोड)
• आर एंड जी इन (खरौनी कोठी, स्टेशन रोड)
• होटल आनन्दी इन (धर्मशाला रोड, विशुनीपुर)
• पी.एन.एम. होटल – पिज़्ज़ा टाउन (टाउन हाल रोड)
• विक्रम होटल (स्टेशन रोड, खरौनी कोठी)

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पंजीकरण तक रहेगा प्रतिबंध

नगर मजिस्ट्रेट ने कहा कि जब तक सभी होटल संचालक आवश्यक दस्तावेजों के साथ विधिवत पंजीकरण नहीं करा लेते, तब तक उनके संचालन पर रोक जारी रहेगी। साथ ही, तय समय सीमा के भीतर लाइसेंस के लिए आवेदन करने के निर्देश दिए गए हैं।

आदेश की अवहेलना पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी

प्रशासन ने चेतावनी दी है कि यदि कोई होटल संचालक आदेशों की अनदेखी करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने, जुर्माना लगाने और दीर्घकालिक प्रतिबंध जैसी कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

आम लोगों से अपील

प्रशासन ने आम नागरिकों और यात्रियों से अपील की है कि वे केवल पंजीकृत और लाइसेंस प्राप्त होटलों में ही ठहरें, जिससे उनकी सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी सुनिश्चित हो सके।
प्रशासन की यह कार्रवाई जिले में होटल व्यवसाय को व्यवस्थित करने, सुरक्षा मानकों को मजबूत करने और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

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बाबू गुलाबराय: विचार, विवेक और व्यंग्य की सशक्त परम्परा

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✍️ नवनीत मिश्र

हिंदी साहित्य में बाबू गुलाबराय का स्थान एक ऐसे लेखक के रूप में सुरक्षित है, जिन्होंने निबन्ध और व्यंग्य को बौद्धिक गहराई तथा नैतिक जिम्मेदारी से जोड़ा। वे केवल शब्दों के शिल्पकार नहीं थे, बल्कि समाज और मनुष्य के आचरण पर सूक्ष्म दृष्टि रखने वाले सजग चिंतक थे। उनकी जयंती पर उनका स्मरण करना वस्तुतः उस वैचारिक परम्परा का स्मरण है, जिसमें साहित्य लोकमंगल का साधन माना गया।

बाबू गुलाबराय के निबन्धों में विषय-वस्तु की व्यापकता और प्रस्तुति की सादगी समान रूप से आकर्षित करती है। दर्शन, संस्कृति, समाज और मानव-मूल्यों पर लिखते हुए उन्होंने कहीं भी दुरूहता को स्थान नहीं दिया। उनकी प्रसिद्ध निबन्ध कृतियों में ‘मेरी असफलताएँ’, ‘नारी और पुरुष’, ‘संस्कृति और सभ्यता’, ‘जीवन और साहित्य’ तथा ‘विवेक और विचार’ जैसी रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों में लेखक का आत्मालोचनात्मक स्वर और तार्किक दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

व्यंग्य के क्षेत्र में भी बाबू गुलाबराय का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनका व्यंग्य तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों, बौद्धिक दिखावे और नैतिक पतन पर करारा प्रहार करता है। ‘अधूरे आदर्श’, ‘नकली संस्कार’ और ‘बुद्धिजीवियों की बस्ती’ जैसी रचनाओं में उनका व्यंग्य तीखा होते हुए भी मर्यादित और उद्देश्यपूर्ण है। वे व्यंग्य को केवल हँसी का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का औज़ार मानते थे।

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बाबू गुलाबराय का लेखन भारतीय जीवन-दृष्टि और आधुनिक चिंतन के समन्वय का उदाहरण है। उनकी भाषा में न तो अनावश्यक अलंकारिकता है और न ही बोझिल दार्शनिकता। यही कारण है कि उनकी कृतियाँ आज भी पाठकों को सहज रूप से आकर्षित करती हैं और विचार के स्तर पर समृद्ध करती हैं।

आज के समय में, जब साहित्य में सतहीपन और तात्कालिक प्रभाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है, बाबू गुलाबराय की कृतियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि साहित्य का मूल उद्देश्य समाज को दिशा देना और मनुष्य को विवेकशील बनाना है। उनकी जयंती पर उनके साहित्यिक अवदान को नमन करते हुए यह कहना अनुचित न होगा कि बाबू गुलाबराय हिंदी निबन्ध और व्यंग्य की परम्परा के ऐसे स्तंभ हैं, जिनकी प्रासंगिकता समय के साथ और अधिक गहरी होती चली जा रही है।

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खुशियां मातम में बदलीं: बेटे के जन्म की खुशी लेने गया युवक सड़क हादसे में मरा

मधेपुरा सड़क हादसा: नवजात बेटे को देखकर लौट रहे 4 दोस्तों की दर्दनाक मौत, तेज रफ्तार हाइवा से कार के उड़े परखच्चे

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार के मधेपुरा जिले में शनिवार को एक दिल दहला देने वाला सड़क हादसा हुआ, जिसने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया। सदर थाना क्षेत्र अंतर्गत बिजली कार्यालय के सामने तेज रफ्तार हाइवा और एक कार की आमने-सामने भीषण टक्कर हो गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि कार के परखच्चे उड़ गए और उसमें सवार चारों युवक कार के भीतर ही बुरी तरह फंस गए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हादसे के तुरंत बाद तेज धमाके की आवाज सुनकर स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे और पुलिस व एंबुलेंस को सूचना दी। सदर थाना पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थानीय लोगों की मदद से कार में फंसे युवकों को बाहर निकाला और गंभीर हालत में सभी को सदर अस्पताल भेजा गया। हालांकि डॉक्टरों ने जांच के बाद चारों को मृत घोषित कर दिया।

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मृतकों की पहचान सदर थाना क्षेत्र के गुलजारबाग निवासी सोनू, वार्ड संख्या 13 निवासी साहिल, उदाकिशुनगंज निवासी साजन और सदर थाना क्षेत्र के रूपेश के रूप में हुई है। सभी युवक आपस में गहरे दोस्त थे। पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और परिजनों को सूचना दे दी गई है।

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हादसे से जुड़ा सबसे भावुक पहलू यह है कि सोनू की पत्नी ने शुक्रवार को एक बेटे को जन्म दिया था। शनिवार को सोनू अपने दोस्तों के साथ पत्नी और नवजात बच्चे को देखने अस्पताल गया था। लौटते समय खुशियों से भरी यह यात्रा मातम में बदल गई। घर में जहां नवजात के आगमन की खुशी थी, वहीं अब मातम और सन्नाटा पसरा हुआ है।
पुलिस ने हाइवा को जब्त कर लिया है, जबकि चालक मौके से फरार बताया जा रहा है। उसकी तलाश के लिए छापेमारी की जा रही है। पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जांच में तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाना हादसे की मुख्य वजह प्रतीत हो रही है। पूरे मामले की गहन जांच जारी है।

इंदौर दौरे पर राहुल गांधी, दूषित जल से प्रभावित इलाकों का किया दौरा

पीड़ित परिवारों से मिले, बोले– स्मार्ट सिटी में पीने का पानी नहीं, सरकार जिम्मेदार

इंदौर (राष्ट्र की परम्परा)। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी शनिवार को इंदौर दौरे पर रहे। सबसे पहले उन्होंने निजी क्षेत्र के बॉम्बे हॉस्पिटल पहुंचकर उल्टी-दस्त के प्रकोप से भर्ती चार मरीजों से मुलाकात की और उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली। इसके साथ ही उन्होंने मरीजों के परिजनों से भी बातचीत की। इसके बाद राहुल गांधी दूषित पेयजल से प्रभावित भागीरथपुरा क्षेत्र पहुंचे और वहां पीड़ित परिवारों से मुलाकात की।

इस दौरान राहुल गांधी के साथ नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी भी मौजूद रहे।

केंद्र और राज्य सरकार पर राहुल गांधी का हमला

भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के पीड़ित परिवारों से मिलने के बाद राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा,
“हमें स्मार्ट सिटी का वादा किया गया था। यह स्मार्ट सिटी का नया मॉडल है, जहां लोगों को पीने का साफ पानी तक नहीं मिल रहा और आवाज उठाने वालों को धमकाया जा रहा है। इंदौर में दूषित पानी पीने से लोगों की मौत हुई है। यह शहरी विकास का मॉडल सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई शहरों में यही हाल है।”

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सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल: राहुल गांधी

राहुल गांधी ने कहा कि इस मामले में सरकार को जिम्मेदारी लेनी होगी। “इस लापरवाही से जिन लोगों की जान गई है, उनके परिवारों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए। आज भी इंदौर के लोगों को साफ पीने का पानी नहीं मिल रहा। लोग केवल वही मांग रहे हैं, जो सरकार का कर्तव्य है—स्वच्छ और भरोसेमंद पेयजल की व्यवस्था।”
उन्होंने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते जनता की समस्याएं उठाना उनकी जिम्मेदारी है और इसे राजनीति कहा जाए या कुछ और, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।

कांग्रेस का दावा– 24 लोगों की मौत

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दावा किया कि भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से अब तक 24 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 8 से 10 मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है। उन्होंने बताया कि राहुल गांधी ने अस्पताल में भर्ती मरीजों से मुलाकात कर उनका हाल जाना।

सम्मेलन की अनुमति नहीं मिलने का आरोप

जीतू पटवारी ने कहा कि कांग्रेस दूषित पेयजल की समस्या के समाधान पर सकारात्मक चर्चा के लिए राहुल गांधी की मौजूदगी में बुद्धिजीवियों, पर्यावरणविदों और नगर निगम पार्षदों का सम्मेलन आयोजित करना चाहती थी, लेकिन प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी।

उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं है और दूषित पानी लोगों के लिए “धीमा जहर” बन चुका है, जिससे किडनी और अन्य अंगों को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।

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राज्य सरकार की रिपोर्ट में अलग आंकड़े

मृतकों की संख्या को लेकर विरोधाभासी दावों के बीच मध्यप्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में पेश रिपोर्ट में उल्टी-दस्त प्रकोप के दौरान पांच माह के शिशु समेत सात लोगों की मौत का उल्लेख किया है।
वहीं, महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय की ‘डेथ ऑडिट’ रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि 15 मौतें इस प्रकोप से किसी न किसी रूप में जुड़ी हो सकती हैं।

पीड़ित परिवारों को मुआवजा

प्रशासन ने उल्टी-दस्त प्रकोप के बाद जान गंवाने वाले 21 लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये का मुआवजा दिया है। अधिकारियों का कहना है कि कुछ मौतें अन्य बीमारियों के कारण हुईं, फिर भी सभी प्रभावित परिवारों को मानवीय आधार पर सहायता दी जा रही है।

ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन के बीच भारत लौटे नागरिक, बोले– हालात सामान्य

महंगाई और आर्थिक संकट को लेकर विरोध, इंटरनेट बंद लेकिन जनजीवन प्रभावित नहीं

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। ईरान में बीते तीन हफ्तों से जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बीच भारत सरकार द्वारा जारी एडवाइजरी के बाद कई भारतीय नागरिक ईरान से स्वदेश लौट आए हैं। भारत लौटे लोगों का कहना है कि ईरान में प्रदर्शन मुख्य रूप से महंगाई, आर्थिक संकट और मुद्रा अवमूल्यन को लेकर हो रहे हैं, लेकिन हालात उतने गंभीर नहीं हैं, जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दिखाया जा रहा है।

भारत लौटे नागरिकों के अनुसार ईरान के कई शहरों और गांवों में इंटरनल प्रोटेस्ट चल रहे हैं। बड़ी संख्या में प्रदर्शनों को देखते हुए ईरानी सरकार ने इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगा रखा है और अंतरराष्ट्रीय कॉलिंग भी बंद कर दी गई थी। लोगों ने बताया कि लगभग 10 दिनों तक इंटरनेट पूरी तरह ठप रहा, जिससे सही जानकारी मिलना मुश्किल हो गया।

ईरान से लौटे एक व्यक्ति ने बताया कि वे तीन लोग एक भारतीय फार्मा कंपनी के लिए काम करने ईरान गए थे, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए वापस लौट आए।

उन्होंने कहा,
“जहां हम रह रहे थे वहां सब कुछ ठीक था। महंगाई को लेकर प्रदर्शन जरूर हो रहे हैं, लेकिन हालात सामान्य हैं।”

मीडिया रिपोर्ट्स से अलग जमीनी हकीकत: भारतीय नागरिक

भारत लौटे नागरिकों ने कहा कि भारतीय मीडिया में दिखाई जा रही तस्वीरें जमीनी हकीकत से काफी अलग हैं। एक व्यक्ति ने बताया कि उन्होंने खुद तेहरान का दौरा किया और कहीं भी गंभीर अराजकता नहीं देखी।

उन्होंने कहा कि कुछ जगहों पर छोटे स्तर पर तोड़फोड़ जरूर हुई, लेकिन पुलिस की ओर से ज्यादा सख्ती नहीं दिखाई गई और आम लोगों को कोई परेशानी नहीं हुई।
उनका कहना था कि विदेशी नागरिकों, खासकर भारतीयों को वहां किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई। न तो सरकार ने उन्हें जाने के लिए कहा और न ही उनके आवागमन पर कोई रोक थी।

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“वहां कोई परेशानी नहीं हुई” – भारत लौटी युवती

ईरान से भारत लौटी एक युवती जहरा ने बताया कि इंटरनेट बंद होने की वजह से हालात की पूरी जानकारी नहीं मिल पाई, लेकिन जमीनी स्तर पर किसी तरह की परेशानी नहीं दिखी।

एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि वे बाजार गए, देर रात तक बाहर घूमे और उन्हें आने-जाने, खाने-पीने या सुरक्षा से जुड़ी कोई समस्या नहीं हुई।

उन्होंने बताया कि वे 28 दिसंबर को ईरान गए थे और अब लौटे हैं। इस दौरान कुछ समय के लिए प्रदर्शन हुए, लेकिन जल्द ही स्थिति सामान्य हो गई।
उनका कहना था कि तेहरान सहित कई इलाकों में जनजीवन सामान्य है और किसी तरह की सख्त पाबंदी नहीं देखी गई।

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इतिहास के प्रतिशोध के बहाने संघी कुनबे का इतिहास के साथ प्रतिशोध-बादल सरोज

तर्क, विवेक और वैज्ञानिक चेतना पर आधारित आगे की ओर बढ़ते राष्ट्र, आधिकारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में विश्वास करने वाले देश की कसौटी फिलहाल न भी लगाएं तब भी, किसी भी संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य के हिसाब से भी पिछले सप्ताह में नजर आये वे दृश्य – विजुअल्स – भयावह हैं, जिनमें सत्ता और विधायिका का कार्यकारी प्रमुख फैंसी ड्रेस पहने प्रमुदित और बालसुलभ कौतुक में डमरू बजाता हुआ दिखाई देता है। वे बोलवचन डरावने हैं, जिन्हें देश के सर्व-प्रमुख पदों में से एक – राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार – के पद पर बैठा व्यक्ति बोलता है और सार्वजनिक रूप से उकसाने और भडक़ाने वाला ऐसा बयान देता है, जिसे देने की हिम्मत अभी तक हाशिये पर बताये जाने वाले कट्टर और उन्मादी भी कम ही कर पाते थे। चूंकि दोनों ही काम एक दूसरे की संगति, सुर और ताल में हैं, इसलिए इसे महज संयोग या आलाप को मद्धम से उच्च होते हुए उच्चतर तक ले जाने की एक और कोशिश भर मानकर खारिज नहीं किया जा सकता है। रामलीला में पहने जाने वाले वस्त्रों से प्रधानमंत्री का अभिषेक, उनकी परिधानप्रियता के एक और शौक के पूरा हो जाने का अतिरेक मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता है। ये स्वांग और उसके साथ बोले गये संवाद दिखे से कहीं आगे, कहे और लिखे से कहीं अधिक सांघातिक अर्थ वाले हैं और उस आशंका की पड़ताल की दरकार रखते हैं, जिसे इस बार दिखावे के लिए भी छुपाने की कोशिश नहीं की गयी।
 
इस बार शुरुआत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार – एनएसए – अजित डोभाल ने की। शनिवार को ‘‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग- 2026’’ में मौजूद युवा दर्शकों से मंच से उन्होंने खुलेआम ‘इतिहास का प्रतिशोध लेने’ का आह्वान किया। ऐसा नहीं है कि भाषण की रौ में बहकर वे ऐसा बोल गए थे। उन्हें अच्छी तरह पता था कि वे क्या बोल रहे हैं। यह बात उन्होंने स्वयं भी स्वीकार की कि ‘प्रतिशोध शब्द अच्छा तो नहीं है, लेकिन प्रतिशोध भी अपने आप में बड़ी भारी शक्ति होती है। हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है।’ प्रतिशोध किस बात का लेना है, इसे भी स्पष्ट करते हुए उन्होने एक नए तरीके का शोध प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘हमारे गांव जले, हमारी सभ्यता को समाप्त किया गया, हमारे मंदिरों को लूटा गया। हम मूक दर्शक की तरह असहाय होकर देखते रहे। ये इतिहास हमें चुनौती देता है।’ अपने इस हिंसक आह्वान का औचित्य साबित करने और स्वीकार्य बनाने के लिए, देने को तो डोभाल ने भगत सिंह की फांसी, सुभाष चन्द्र बोस के संघर्ष और महात्मा गांधी के सत्याग्रह के हवाले भी दिए, मगर असल में यह प्रतिशोध किस तरह का होगा, इसे उन्होंने अपनी ‘आस्थाओं’ के आधार पर एक महान भारत का निर्माण करने के आह्वान और उसी के साथ सेंट पीटर्सबर्ग के एक बूढ़े रब्बी और बिशप की कहानी के उदाहरण से साफ़ कर दिया। कथित कहानी में वर्णित रब्बी के यहूदियों के साथ दो हजार साल से लंबे अत्याचार में बचाकर रखी गयी बदले की आग के भाव को, डोभाल ने बड़ा पावरफुल सेंटीमेंट बताया और कहा कि हमें उस सेंटीमेंट से ही प्रेरित होना चाहिए। ध्यान रहे, यह वह कहानी है, जिसकी टेक पर इस्राइली यहूदीवाद टिका हुआ है और वह अपने कथित इतिहास का प्रतिशोध किस तरह ले रहा है, यह बात फिलिस्तीन के नरसंहार के रूप में दुनिया देख-समझ रही है।
 
जो बात शनिवार को डोभाल इशारों में कह रहे थे, उसे अगले ही दिन रविवार को शिव के नाम पर न जाने किसका वेश धारे परिधान मंत्री ने सीधे-सीधे बोल दिया। सोमनाथ मन्दिर से डमरू बजाकर निकलते हुए उन्होंने इस मंदिर के बहाने निशाने साधे। मौका, 1026 में महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के 1,000 वर्ष और 1951 में इसके ऐतिहासिक पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ बताया गया। इसके समापन समारोह में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के ध्वंस और उसके पुनर्निर्माण को लेकर झूठे कथनों, असत्य वचनों की बौछार-सी करके, संघ की शाखाओं में सुनाई जाने वाली कहानियों को ही इतिहास बताने में अपनी पूरी वाक् चतुराई को झोंक दिया। सोमनाथ पर हमलों को लेकर तथ्यों के आधार पर दर्ज अब तक के पूरे इतिहास को ही उन्होंने खारिज कर दिया और ऐसा करने वाले इतिहासकारों को धिक्कारते हुए कहा कि, ‘‘कुछ लोगों ने हमलावरों के कृत्यों पर पर्दा डालने की कोशिश की। किताबों में इन हमलों को केवल सामान्य ‘लूट’ बताकर खारिज कर दिया गया।’’ वे बोले कि  ‘‘सोमनाथ पर एक बार नहीं, बल्कि बार-बार हमले हुए। अगर मकसद सिर्फ धन लूटना होता, तो वे एक बार लूटकर रुक जाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मंदिर के स्वरूप को बदलने के लगातार प्रयास किए गए। नफरत, अत्याचार और आतंक के उस असली इतिहास को हमसे छिपाया गया।’’ अपने लक्ष्य को और साफ़ करते हुए मोदी ने कहा कि गजनवी से लेकर औरंगजेब तक, हमलावरों ने सोचा कि उन्होंने तलवार के दम पर सनातन सोमनाथ को हरा दिया है। उन्हें पता था कि लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि संघ और मोदी की भाजपा हमेशा सिर्फ ध्वंस और विध्वंस की ही याद क्यों करते हैं, कभी कोई बदलाव करने वाली सर्जनात्मक उपलब्धि उन्हें याद क्यों नहीं आती — स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त से भी ज्यादा जोर-शोर से 14 अगस्त के विभाजन विभीषिका दिवस क्यों मनाते हैं। इसलिए, अपने संबोधन की शुरुआत में ही उन्होंने कह दिया कि यह आयोजन केवल विध्वंस की याद नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति के लचीलेपन और देश के स्वाभिमान का उत्सव है। अब लचीलेपन से उनका क्या आशय था, ये तो शायद उन्हें भी नहीं पता होगा, मगर जिसे वह स्वाभिमान बताकर उसका उत्सव मनाने की बात कर रहे थे, उसके पीछे का इरादा एकदम स्पष्ट था। इसके लिए उन्होंने अपने ही देश के नागरिकों को चिन्हांकित करते हुए दावा किया कि दुर्भाग्य से आज भी देश में ऐसे लोग हैं, जो सोमनाथ के पुनर्निर्माण के खिलाफ थे, वे इन्हें विभाजनकारी बताने तक जा पहुंचे। यह भी कहा कि आज उनकी साजिशों में तलवारों की जगह दूसरे हथियारों ने ले ली है।

पहले डोभाल और फिर स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा एक के बाद एक करके रचे, गढ़े और आगे बढ़ाए गए ये दोनों आख्यान न सिर्फ शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के संविधान विरोधी आचरण के उदाहरण हैं, बल्कि यह इतने बड़े पदों पर होने के बावजूद कथित ध्वंस के कपोल कल्पित इतिहास के जरिये असली इतिहास का ही ध्वंस भी है । यह इतिहास का प्रतिशोध नहीं, बल्कि इतिहास के साथ ही प्रतिशोध है। जिन मंदिरों को धार्मिक आधार पर तोड़े जाने का दावा किया जा रहा है, वे भारतीय इतिहास में — अगर हैं भी तो — सिर्फ अपवाद में हैं। नियम मंदिरों में जमा धन-दौलत और संपत्ति को अपने कब्जे में लेने के लिए या उससे जुड़े राज्य पर अपनी प्रभुता प्रदर्शित करने के लिए, उन पर धावे बोलने का ही रहा था और इतिहास बताता है कि यह काम धर्म या मजहब के आधार पर नहीं किया गया। यह सिर्फ मुसलमान शासकों या बाहर से आये आक्रान्ताओं, हमलावरों ने नहीं किया था।
 
उस समय मंदिर धन और संपत्ति के बड़े केंद्र थे, जहां सोने, चांदी और बहुमूल्य रत्नों से बनी मूर्तियां व अन्य संपत्ति जमा होती थी। राजा इस विराट धन संपदा को राज्य की आमदनी का बड़ा स्रोत मानते थे और एक निश्चित अंतराल के बाद मंदिरों पर धावा बोलते और रकम बटोरते थे। इसके लिए बाकायदा विभाग बनाए जाते थे, मंत्री नियुक्त किये जाते थे। संस्कृत के कवि कल्हण अपनी प्रसिद्घ रचना राजतरंगिणी – जिसे कश्मीर के  प्रामाणिक इतिहास का दर्जा दिया जाता है – में दर्ज करते हैं कि किस तरह वहां के राजा हर्ष देव ने अपने राज्य में धन की कमी को पूरा करने के लिए कई हिंदू मंदिरों को लूटा और नष्ट कर दिया। मंदिरों की मूर्तियों को पिघलवाकर उनसे सिक्के बनवाए और इस काम के लिए एक अलग विभाग भी बनाया था। राजा हर्षदेव अकेले नहीं थे — सातवीं शताब्दी के पल्लव और चालुक्य, नौवीं शताब्दी के पांड्य और सिंहल, दसवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट और प्रतिहार राजाओं, ग्यारहवीं शताब्दी के चोल राजा राजेन्द्र प्रथम द्वारा लूट के लिए मंदिरों पर हमले करने की अनेक घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं। यह भी दर्ज है कि 12वीं सदी के अंत में परमार राजा सुभटवर्मन ने, जिस गुजरात में सोमनाथ है, उसी गुजरात के अनहिलवाड़ा पर आक्रमण के दौरान जैन और हिंदू मंदिरों को लूटा था। ये बड़े साम्राज्यों के उदाहरण हैं — छोटे और मझोले राजे-रजवाड़े भी अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए ऐसा ही किया करते थे। बारहवीं शताब्दी में हुए कल्हण — जो पक्के से वामपंथी तो नहीं ही थे — सहित सभी प्राचीन और आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि मन्दिरों की इस लूट-पाट का मुख्य उद्देश्य पूरी तरह से आर्थिक था, इसका धर्म-वर्म से दूर तक का रिश्ता नहीं था। खुद हर्षदेव ने हिंदू और बौद्ध दोनों मंदिरों को लूटा। वह सूअर का मांस खाता था, जो इस कुतर्क का खंडन करता है कि मुस्लिम प्रभाव में आकर वह यह लूट-पाट करता था। यही स्थिति सोमनाथ के साथ थी, जिसे कुल जमा 17 बार लूटा गया, हर बार गजऩी का महमूद नहीं आया था ; जो भी आया था, वह धर्मध्वज उठाये मूर्ति तोडऩे नहीं आया था, देश के सबसे समृद्ध और धनी मंदिर की संपदा लूटने आया था। इनमें से ज्यादातर हमलों के बाद हमलावर राज करने के लिए रुके नहीं, मालमत्ता लूटकर चलते बने।
 
वास्तव में धार्मिक आधार पर तोड़े और मिटा दिए गए पूजा स्थलों में बौद्ध मठ और विहार, जैन धर्मानुयायियों के जिनालय सबसे अधिक संख्या में हैं और इनका ध्वंस किसी गजऩी वाले महमूद या हिन्दू मां के बेटे औरंगजेब ने नहीं, उन्हीं ने किया था, जिनके ध्वज को धारण किये मोदी चुनिन्दा शासकों को निशाना बनाकर संघ का विभाजनकारी एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे और डोभाल प्रतिशोध की यलगार कर रहे थे।
 
ऐसा ही झूठ सोमनाथ के पुनर्निर्माण के प्रसंग को लेकर बोला गया। दावा किया गया कि सरदार पटेल चाहते थे, मगर उन्हें तब के प्रधानमंत्री नेहरू ने रोक दिया था। असलियत यह है कि जब स्वयं को सनातनी हिन्दू बताने वाले महात्मा गांधी को यह पता चला कि सौराष्ट्र की सरकार सोमनाथ मंदिर बनाने के लिए पांच लाख रुपया दे रही है, तब 28 नवम्बर 1947 को, दिल्ली में अपनी प्रार्थना सभा में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जूनागढ़ की सरकार, सरकारी खज़़ाने से सोमनाथ मंदिर का निर्माण नहीं कर सकती। गांधी द्वारा दरियाफ्त किये जाने पर स्वयं सरदार पटेल ने कहा था कि ‘जब तक मैं जिंदा हूं, सरकारी खज़़ाने से एक पैसा सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए नहीं दिया जाएगा। हिन्दू समाज चाहे, तो चंदा करके मंदिर का निर्माण कर सकता है।’ यह संवैधानिक स्थिति थी और ऐसा सिर्फ सोमनाथ के समय ही नहीं हुआ। हाल में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर दिए, अन्यथा अस्पष्ट फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट रूप से कहा था कि एक ट्रस्ट बनाकर सार्वजनिक चंदे से निर्माण किया जाना चाहिए। यही बात तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री के बीच हुए पत्राचार में है, जिसमें नेहरू उनसे कहते हैं कि राष्ट्रपति के नाते उनका जाना उचित नहीं होगा। हालांकि इसके बाद भी राजेंद्र बाबू गए। मोदी शायद जानबूझकर भूल गए कि राम मन्दिर के शिलान्यास और उदघाटन के समय तो नेहरू नहीं थे, मगर दोनों समय के राष्ट्रपति इन कार्यक्रमों में नहीं दिखे!!  

कहने की जरूरत नहीं कि इस सारी कवायद के पीछे असली मकसद नाकामियों, नाकाबिलियतों और उन चौतरफा गिरावटों पर पर्दा डालना है, जिनके चलते देश और उसमें रहने वाली जनता की मुश्किलें बढ़ी हैं और दूर-दूर तक सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। लोगों की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं कि उन्हें याद ही न हो कि जो डोभाल शूरवीरता का बखान और आह्वान कर रहे हैं, उनके रहते पुलवामा, पहलगाम और गलवान और सिन्दूर आदि-आदि दर्जन भर मामलों में क्या-क्या नहीं हुआ है। जो मोदी हजार-ग्यारह सौ वर्ष के गौरव की कहानी सुनाकर लोगों को बहला रहे हैं, उनके 11 वर्षों में भारत दुनिया की नजऱों से लेकर अपनी आर्थिक सामर्थ्य तक में कितना नीचे आ गया है। यही सब छुपाना है, इसलिए कभी इस, तो कभी उस बहाने उन्माद को भडक़ाना है।
 
सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजऩवी के हमले के समय की एक कथा है कि महमूद गजनवी के सैनिकों ने जब रस्सियों से परकोटे पर चढ़कर हमला किया, तो उसके जवाब में मंदिर के पुजारियों और रक्षकों ने जोर-जोर से मंत्र-तंत्र का जाप करके, शंख और घंटी बजाकर, प्रतिरोध किया। उसके बाद क्या हुआ, यह इतिहास है। ठीक यही कहानी आज विडम्बना के रूप में दोहराई जा रही है। डोनाल्ड ट्रम्प बांहें मरोड़े जा रहा है — उद्योग-धंधे, खेती-किसानी, रोजगार और जीवन सहित सारा देश उसके हमलों से आहत और प्रभावित हो रहा है और बजाय उससे निबटने के, सोमनाथ में डमरू और घंटा-घड़ियाल बजाया जा रहा है। इतिहास से सबक लेने की बजाय इतिहास से प्रतिशोध की बातें हो रही हैं। जिस समय जनता की एकता सबसे ज्यादा जरूरी है, ठीक उसी समय उसे कमजोर और विभाजित करने के नए-नए तरीके ढूंढे जा रहे हैं। संघ की शताब्दी वर्ष में ऐसा करके क्या हासिल किया जाना है, यह बताते हुए संघ प्रमुख शहर-शहर घूम रहे हैं। गांव-गांव में हिन्दू सम्मेलनों का ताम-झाम करके नफरती जहर की होम डिलीवरी की जा रही है। गांधीनगर में दूषित पानी से सौ से अधिक लोगों का बीमार होना और इंदौर में गंदे पानी से डेढ़ दर्जन बच्चों की मौत बताती है कि जहरीला असर किस कदर जानलेवा होता है। फिर यह तो नफरती जहर है, जो सिर्फ मनुष्यों की नहीं सभ्यताओं की भी जान लेने की क्षमता रखता है।

निस्संदेह सब कुछ चिंताजनक है। इसे रोकने के लिए सचेत हस्तक्षेप जरूरी है। आमतौर से नागरिक समाज को, खासतौर से मेहनतकश अवाम को यह जिम्मा उठाना होगा। जिन असफलताओं और अपराधों से ध्यान बंटाने के लिए यह सब किया जा रहा है, उन्हें जोर-शोर से सामने लाना होगा। जो झूठ वे बोल रहे हैं, उसका पर्दाफाश करना होगा। बड़ी-बड़ी लामबंदियां करनी होंगी। अगले महीने 12 फरवरी को मजदूर-किसानों की राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल, इसी तरह की लामबंदी है। ऐसी और पहलों की जरूरत है।     

हिन्दी के शेक्सपियर ‘रांगेय राघव’: यथार्थ, संघर्ष और सृजन की अमिट विरासत

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पुनीत मिश्र

हिन्दी साहित्य में जिन रचनाकारों ने अपने समय की सामाजिक विडम्बनाओं, मानवीय संघर्षों और ऐतिहासिक चेतना को गहन कलात्मकता के साथ स्वर दिया, उनमें डॉ. तिरूमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य ‘रांगेय राघव’ का स्थान विशिष्ट है। उन्हें ‘हिन्दी का शेक्सपियर’ कहा जाना मात्र उपमा नहीं, बल्कि उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की व्यापकता और गहराई का प्रमाण है। जयंती के अवसर पर उनका स्मरण हमें हिन्दी साहित्य की उस परम्परा से जोड़ता है, जहाँ साहित्य केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि समाज की आत्मा की अभिव्यक्ति बन जाता है।
रांगेय राघव का रचनाकर्म असाधारण बहुआयामी है। उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता, आलोचना सभी विधाओं में उन्होंने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। उनके उपन्यासों में इतिहास और यथार्थ का जो सजीव संयोजन मिलता है, वह हिन्दी साहित्य को नई दृष्टि देता है। ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘सीधा सादा रास्ता’ और ‘उपनिवेशवाद’ जैसे उपन्यासों में सामाजिक अन्याय, वर्ग-संघर्ष और मनुष्य की पीड़ा अत्यंत मार्मिक रूप में उभरती है।
उनकी रचनाओं का मूल स्वर यथार्थवाद है, पर यह यथार्थ शुष्क नहीं, बल्कि संवेदनशील और मानवीय है। रांगेय राघव के पात्र किसी काल्पनिक लोक के नहीं, बल्कि हमारे आस-पास के जीवन से उठे हुए जीवंत मनुष्य हैं। वे पीड़ा सहते हैं, संघर्ष करते हैं और प्रश्न पूछते हैं व्यवस्था से, परम्पराओं से और स्वयं से। यही प्रश्नशीलता उन्हें आधुनिक चेतना का प्रतिनिधि बनाती है।
इतिहास के प्रति रांगेय राघव का दृष्टिकोण भी उल्लेखनीय है। वे इतिहास को केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं मानते, बल्कि वर्तमान की समझ का माध्यम बनाते हैं। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में सत्ता, समाज और संस्कृति की टकराहट स्पष्ट दिखती है। इस दृष्टि से वे साहित्य को सामाजिक विमर्श का सशक्त औज़ार बना देते हैं।
भाषा और शिल्प के स्तर पर भी रांगेय राघव अद्वितीय हैं। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठता और लोक-भाषा का संतुलन दिखाई देता है। संवाद सजीव हैं, वर्णन चित्रात्मक है और कथ्य में तीव्रता है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पाठक को बाँध लेती हैं और लंबे समय तक मन में बनी रहती हैं।
डॉ. रांगेय राघव का साहित्य हमें यह सिखाता है कि लेखक का दायित्व केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के सच को निर्भीकता से सामने लाना भी है। जयंती के इस अवसर पर उनका स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस साहित्यिक चेतना को पुनः जाग्रत करने का संकल्प है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं और यही किसी महान साहित्यकार की सच्ची पहचान है।

जी राम जी योजना से ग्रामीण रोजगार को मिलेगी नई दिशा-मनीष जायसवाल

रांची/हजारीबाग (राष्ट्र की परम्परा) हजारीबाग के प्रोवेश रिसॉर्ट में आयोजित प्रेस वार्ता में सांसद मनीष जायसवाल ने वीबी–जी राम जी (विकसित भारत रोजगार गारंटी आजीविका मिशन) को ग्रामीण भारत के लिए एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी पहल बताया। उन्होंने कहा कि यह प्रस्तावित कानून मनरेगा का उन्नत विकल्प होगा, जिसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष 125 दिनों का वैधानिक रोजगार, मजबूत बुनियादी ढांचा और आत्मनिर्भरता प्रदान करना है।
सांसद ने बताया कि योजना के तहत सड़क निर्माण, जल संरक्षण, ग्रामीण अवसंरचना, कृषि व आजीविका संसाधनों के विकास पर विशेष जोर दिया जाएगा। मजदूरी भुगतान साप्ताहिक या अधिकतम 15 दिनों में अनिवार्य होगा, देरी पर मुआवजे का प्रावधान रहेगा। कृषि मौसम को ध्यान में रखते हुए 60 दिनों की विराम अवधि का विकल्प भी राज्यों को दिया गया है। केंद्र–राज्य भागीदारी 60:40 (पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों के लिए 90:10) होगी और प्रशासनिक व्यय सीमा 9% तक बढ़ाई गई है।
उन्होंने मनरेगा में भ्रष्टाचार, नकली जॉब कार्ड और भुगतान संबंधी खामियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वीबी–जी राम जी अधिनियम 2025 तकनीक आधारित पारदर्शिता, उच्च गुणवत्ता की ग्रामीण परिसंपत्तियों के सृजन और बेहतर आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। किसान कल्याण हेतु कृषि, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, खाद्य प्रसंस्करण, ऊर्जा, सहकारिता और कुटीर उद्योगों के माध्यम से समन्वित प्रयास किए जाएंगे।
प्रेस वार्ता में बरही विधायक मनोज कुमार यादव, बड़कागांव विधायक रोशन लाल चौधरी सहित कई जनप्रतिनिधि और पार्टी पदाधिकारी उपस्थित रहे।

सीमा क्षेत्र के सिविलियन विद्यालय में चोरी, सीसीटीवी व इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ले उड़े चोर

नवाबगंज थाना क्षेत्र के गंगापुर गुलरिया विद्यालय में स्टोर रूम का ताला तोड़कर वारदात

बहराइच (राष्ट्र की परम्परा)। थाना नवाबगंज क्षेत्र के भारत-नेपाल सीमा से सटे गंगापुर गुलरिया स्थित सिविलियन विद्यालय में चोरी की बड़ी घटना सामने आई है। अज्ञात चोरों ने विद्यालय के स्टोर रूम का दरवाजा और जंजीर तोड़कर सीसीटीवी कैमरा, एलसीडी, हार्ड डिस्क सहित कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य सामग्री पर हाथ साफ कर दिया। घटना की जानकारी मिलते ही सीमावर्ती क्षेत्र के गांवों में हड़कंप मच गया।

विद्यालय के प्रधानाध्यापक राम सूरत यादव ने चोरी की सूचना देते हुए अज्ञात चोरों के खिलाफ सतंलिया पुलिस चौकी में तहरीर दी है और पुलिस से मामले के शीघ्र खुलासे की मांग की है। विद्यालय भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है और सतंलिया पुलिस चौकी से इसकी दूरी आधा किलोमीटर से भी कम बताई जा रही है।

प्रधानाध्यापक राम सूरत यादव ने बताया कि चोरों ने स्टोर रूम की जंजीर तोड़कर सीसीटीवी कैमरे, एलसीडी, हार्ड डिस्क और अलमारी का ताला तोड़कर उसमें रखी अन्य सामग्री चोरी कर ली। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चोरी हो जाने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होगी, जिससे बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

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उन्होंने प्रशासन से मांग की कि पुलिस जल्द से जल्द चोरी की घटना का खुलासा कर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बरामदगी कराए, ताकि शैक्षणिक कार्य बाधित न हो।

इस संबंध में क्षेत्राधिकारी नानपारा ने बताया कि उन्हें चोरी की सूचना प्राप्त हुई है और वे इस विषय में नवाबगंज इंस्पेक्टर से बात कर रहे हैं। वहीं सतंलिया चौकी प्रभारी शैलेन्द्र कुमार सोनकर ने कहा कि प्रधानाध्यापक की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज किया जाएगा और पुलिस चोरी की घटना की गहन छानबीन कर रही है।

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33 फुट शिवलिंग: कैसे बना महाबलीपुरम से चंपारण तक का दिव्य सफर

विश्व का सबसे ऊंचा 33 फुट शिवलिंग आज बिहार के विराट रामायण मंदिर में स्थापित, ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनेगा चंपारण

पूर्वी चम्पारण (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के चकिया स्थित विराट रामायण मंदिर आज एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उपलब्धि का साक्षी बनने जा रहा है। यहां विश्व के सबसे ऊंचे 33 फुट शिवलिंग की विधिवत स्थापना की जा रही है। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि स्थापत्य, संस्कृति और पर्यटन के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
शिवलिंग स्थापना से पूर्व समस्तीपुर की सांसद शांभवी चौधरी और उनके पति शायन कुणाल ने विधिवत पूजा-पाठ किया। वाराणसी, अयोध्या राम मंदिर, काशी विश्वनाथ, गुजरात, हरिद्वार, महाराष्ट्र और महावीर मंदिर पटना से आए कुल सात से अधिक विद्वान पंडितों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अनुष्ठान संपन्न कराया। सहस्त्र लिंगम स्थापना के अवसर पर चारों वेदों के विद्वानों द्वारा भव्य यज्ञ भी किया जा रहा है।

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इस महाआयोजन के लिए कंबोडिया और कोलकाता से विशेष फूल मंगाए गए हैं। मंदिर परिसर में एक ट्रक से अधिक फूल पहुंच चुके हैं, जिनमें गुलाब, गेंदा, गुलदाउदी प्रमुख हैं। शिवलिंग पर अर्पण के लिए 18 फुट लंबी विशेष माला तैयार की गई है, जिसमें फूलों के साथ भांग, धतूरा और बेलपत्र सम्मिलित हैं।
33 फुट ऊंचे और 210 मीट्रिक टन वजनी इस शिवलिंग को स्थापित करने के लिए राजस्थान और भोपाल से 750-750 टन क्षमता की दो विशाल क्रेन मंगाई गई हैं। स्थापना से पूर्व इन क्रेनों का ट्रायल रन भी सफलतापूर्वक किया गया। पूरी तकनीकी मॉनिटरिंग टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज (TCS) द्वारा की जा रही है।
शिवलिंग के अभिषेक हेतु कैलाश मानसरोवर, गंगोत्री, यमुनोत्री, हरिद्वार, प्रयागराज, गंगासागर, सोनपुर और रामेश्वरम से गंगाजल मंगाया गया है। इसके अतिरिक्त सिंधु, नर्मदा, नारायणी, कावेरी और गंडक नदियों के जल से भी अभिषेक किया जाएगा। आज माघ कृष्ण चतुर्दशी तिथि है, जिसे शिवलिंग उत्पत्ति का दिन माना जाता है, इसलिए यह दिन विशेष रूप से चुना गया है।

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, दोनों उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान सहित कई मंत्री, सांसद और विधायक इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बनेंगे। लाइव दर्शन के लिए मंदिर परिसर में चार बड़े LED स्क्रीन लगाए गए हैं।
यह विशाल शिवलिंग तमिलनाडु के महाबलीपुरम में एक ही ग्रेनाइट पत्थर से तैयार किया गया है। इसके निर्माता विनायक वेंकटरमण के अनुसार, इस पर करीब 3 करोड़ रुपये की लागत आई है और इसे भूकंपरोधी तकनीक से बनाया गया है, ताकि यह सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रहे। मुख्य शिल्पकार लोकनाथ और उनकी टीम ने इसे दस वर्षों में तराशा।

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विराट रामायण मंदिर, आचार्य किशोर कुणाल का ड्रीम प्रोजेक्ट है। इसके पूर्ण होने पर यह विश्व का सबसे बड़ा शिव मंदिर होगा। शिवलिंग स्थापना के बाद कैथवलिया और मोतिहारी वैश्विक धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर उभरेंगे, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती मिलेगी।

यूपी दिवस को भव्य रूप से मनाने की तैयारियां तेज

24 जनवरी को गरिमामय आयोजन के लिए विकास भवन में हुई समीक्षा बैठक

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। उत्तर प्रदेश दिवस को 24 जनवरी को भव्य, गरिमामय और जनभागीदारी के साथ मनाने के उद्देश्य से शुक्रवार को विकास भवन सभागार में एक महत्वपूर्ण तैयारी बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता जिलाधिकारी दीपक मीणा ने की। बैठक में यूपी दिवस आयोजन की रूपरेखा, विभागीय जिम्मेदारियों, सुरक्षा, स्वच्छता, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर विस्तार से चर्चा की गई।

जिलाधिकारी दीपक मीणा ने सभी विभागीय अधिकारियों को निर्देशित करते हुए कहा कि यूपी दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की गौरवशाली विरासत, सांस्कृतिक पहचान और विकास यात्रा को आमजन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने कहा कि आयोजन में विकास, निवेश, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, युवा, किसान और गरीब कल्याण से जुड़ी योजनाओं को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए।

डीएम ने निर्देश दिया कि यूपी दिवस के अवसर पर विकास प्रदर्शनी, लोक संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम, स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी तथा विभागीय स्टॉल लगाए जाएं, ताकि नागरिकों को सरकारी योजनाओं की जानकारी सीधे प्राप्त हो सके। साथ ही कार्यक्रम स्थल पर स्वच्छता, पेयजल, विद्युत, यातायात और सुरक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने के भी निर्देश दिए गए।

बैठक में मुख्य विकास अधिकारी शाश्वत त्रिपुरारी ने विभागीय समन्वय पर जोर देते हुए कहा कि सभी विभाग आपसी तालमेल के साथ कार्य करें, जिससे आयोजन समयबद्ध और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सके।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेश झा को स्वास्थ्य सेवाओं, प्राथमिक उपचार और एंबुलेंस की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

जिला विकास अधिकारी सतीश कुमार सिंह एवं परियोजना निदेशक दीपक सिंह को विकास योजनाओं और ग्रामीण विकास से संबंधित प्रदर्शनी व जनजागरूकता कार्यक्रमों की जिम्मेदारी सौंपी गई।
जिला विद्यालय निरीक्षक अमरकांत सिंह को विद्यालयों और महाविद्यालयों की सहभागिता, छात्र-छात्राओं की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और प्रतियोगिताओं के आयोजन के निर्देश दिए गए।

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वहीं जिला पंचायत राज अधिकारी निलेश सिंह को स्वच्छता, साफ-सफाई और ग्रामीण क्षेत्रों से सहभागिता सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए। बैठक में एसीएम द्वितीय राजू कुमार भी उपस्थित रहे।

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि यूपी दिवस के अवसर पर जिले के विभिन्न स्थानों पर प्रभात फेरी, जागरूकता कार्यक्रम, भाषण व निबंध प्रतियोगिता, सांस्कृतिक संध्या और सम्मान समारोह आयोजित किए जाएंगे। जिलाधिकारी ने कहा कि इन कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों, युवाओं और स्वयं सहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

अंत में जिलाधिकारी दीपक मीणा ने सभी अधिकारियों से अपेक्षा जताई कि यूपी दिवस का आयोजन जिले की सकारात्मक छवि को प्रदर्शित करने वाला, अनुशासित और यादगार होना चाहिए।

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बिहार बन रहा है भारत का नया सिनेमा हब: कैमरे की रोशनी में उभरती सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जिस बिहार को अब तक उसकी प्राचीन संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहरों और धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता था, वही बिहार आज कैमरे की नजर में भारत का नया सिनेमा हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य की गलियां, घाट, पहाड़ियां और ऐतिहासिक स्थल अब फिल्मों की कहानियों का जीवंत कैनवास बनते जा रहे हैं। बिहार धीरे-धीरे मुंबई के बाद देश के एक बड़े फिल्म डेस्टिनेशन के रूप में अपनी पहचान गढ़ रहा है।
बिहार अब केवल भोजपुरी या क्षेत्रीय सिनेमा तक सीमित नहीं रहा है। राज्य सरकार द्वारा लागू की गई बिहार फिल्म प्रोत्साहन नीति ने फिल्म निर्माताओं के लिए एक भरोसेमंद और सुविधाजनक माहौल तैयार किया है। इस नीति के तहत अब तक 40 फिल्मों को शूटिंग की अनुमति दी जा चुकी है, जिनमें से 33 फिल्मों का निर्माण कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। यह आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्मकारों का भरोसा बिहार पर लगातार बढ़ रहा है।

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पटना, राजगीर, नालंदा, गया, भागलपुर और मोतिहारी जैसे शहर अब शूटिंग लोकेशन के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। राजगीर की पहाड़ियां, नालंदा का ऐतिहासिक वैभव, गया के धार्मिक घाट, भागलपुर की प्राकृतिक सुंदरता और मोतिहारी की साहित्यिक विरासत फिल्मों को एक अलग और प्रभावशाली दृश्यात्मक पहचान दे रही हैं। इन लोकेशनों के माध्यम से बिहार की सकारात्मक छवि देश-दुनिया तक पहुंच रही है।
राज्य में अब भोजपुरी और मगही फिल्मों के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी फिल्मों की शूटिंग भी बढ़ रही है। इससे स्पष्ट है कि बिहार का सिनेमा क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़कर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच की ओर अग्रसर है। फिल्म शूटिंग से होटल, कैटरिंग, ट्रांसपोर्ट, लाइटिंग, सेट डिजाइन और स्थानीय तकनीशियनों को बड़ा लाभ मिल रहा है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और सिनेमा बिहार की अर्थव्यवस्था का मजबूत इंजन बनता जा रहा है।

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बिहार राज्य फिल्म विकास निगम द्वारा युवाओं के लिए वर्कशॉप और मास्टर क्लास आयोजित की जा रही हैं, जिनमें कैमरा ऑपरेशन, साउंड रिकॉर्डिंग, एडिटिंग और फिल्म प्रोडक्शन की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। कला एवं संस्कृति विभाग के मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने मार्च-अप्रैल में मुंबई में बड़े फिल्म निर्माताओं के साथ बैठक कर बिहार को एक सशक्त फिल्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करने के निर्देश दिए हैं।
बिहार अब केवल इतिहास की धरती नहीं, बल्कि सिनेमा की नई प्रयोगशाला बनता जा रहा है, जो आने वाले समय में भारतीय फिल्म उद्योग का एक बड़ा चेहरा बन सकता है।

अंधेरे का साया: अंबेडकर पार्क में तीन महीने से बंद हाईमास्ट लाइट

मऊ (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद के रानीपुर ब्लॉक अंतर्गत ग्राम फतेहपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर पार्क में लगी हाईमास्ट लाइट बीते तीन महीनों से खराब पड़ी है। प्रकाश व्यवस्था ठप होने से पार्क और आसपास का इलाका शाम होते ही अंधेरे में डूब जाता है, जिससे स्थानीय ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
पार्क ब्लॉक प्रमुख कोटा से सटे क्षेत्र में स्थित है। यहां रोशनी न होने के कारण सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि अंधेरा होने के बाद महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को आवागमन में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
रोशनी के अभाव में ठोकर लगने, गिरने और अन्य दुर्घटनाओं की आशंका लगातार बनी हुई है। विशेष रूप से बुजुर्गों और महिलाओं को पार्क के आसपास से गुजरने में डर लगता है। इसके साथ ही अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक तत्वों की गतिविधियां बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है, जिससे इलाके में असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है।
ग्रामीणों ने संबंधित विभाग और ग्राम पंचायत से जल्द से जल्द हाईमास्ट लाइट को दुरुस्त कराने की मांग की है। चेतावनी दी गई है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे