Saturday, June 13, 2026
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असम चुनाव में कांग्रेस की जीत के लिए रणनीति तैयार, बंधु तिर्की ने दिल्ली में बैठक की

रांची (राष्ट्र की परम्परा)। असम चुनाव में कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चुनावी रणनीति बनाने का दौर शुरू हो गया है। झारखंड कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बंधु तिर्की को संगठन ने असम चुनाव में सीनियर ऑब्जर्वर के तौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। इस बाबत बंधु तिर्की वर्तमान में दिल्ली दौरे पर हैं।

शनिवार को दिल्ली में कांग्रेस संगठन महासचिव के सी. वेणुगोपाल के साथ बंधु तिर्की की असम चुनाव को लेकर बैठक हुई। बंधु तिर्की ने बताया कि कांग्रेस असम चुनाव में पूरे दमखम के साथ चुनावी समर में उतरने की रणनीति बना चुकी है। असम की हर विधानसभा सीट की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपनी रणनीति तैयार की है।

कांग्रेस संगठन महासचिव सी. वेणुगोपाल के महत्वपूर्ण सुझावों को अमल में लाते हुए असम में नई ऊर्जा के साथ कांग्रेस जनता को गोलबंद करने में सफल रहेगी। विशेष रूप से असम के टी-ट्राइब्स के मुद्दों को कांग्रेस प्रमुखता से उठाएगी, चाहे वह उन्हें ST का दर्जा दिलाने की बात हो या जमीन के पट्टे देने का मामला। साथ ही स्थानीय सवालों और बीजेपी द्वारा समाज को बांटने की कोशिशों के खिलाफ कांग्रेस जनता का समर्थन हासिल करने का प्रयास करेगी।

दिल्ली में बंधु तिर्की ने पश्चिम बंगाल के सीनियर ऑब्जर्वर प्रकाश जोशी, असम पी.सी.सी. अध्यक्ष गौरव गोगई, कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट से भी मुलाकात की। कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं से आगामी चुनाव को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।

सम्मान या डर? बड़े कलाकारों से दूरी की इंडस्ट्री मानसिकता पर बहस

ए.आर. रहमान की ‘सांप्रदायिकता’ टिप्पणी पर जावेद अख्तर की दो टूक: कहा– बयान को गलत समझा गया

भारतीय सिनेमा और संगीत जगत में इन दिनों ए.आर. रहमान और जावेद अख्तर के बयानों को लेकर चर्चा तेज़ है। हाल ही में ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान ने एक इंटरव्यू में यह संकेत दिया था कि पिछले कुछ वर्षों में बॉलीवुड में उन्हें कम काम मिलने की एक वजह इंडस्ट्री का “सांप्रदायिक” या बदला हुआ सत्ता ढांचा हो सकता है। इस टिप्पणी ने बहस को जन्म दिया, जिसके बाद वरिष्ठ गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर की प्रतिक्रिया सामने आई है।
इंडिया टुडे से बातचीत में जावेद अख्तर ने साफ़ शब्दों में कहा कि उन्हें लगता है कि रहमान की बातों को संदर्भ से बाहर निकालकर गलत तरीके से समझा गया है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें संदेह है कि रहमान वास्तव में ऐसा कोई सीधा आरोप लगाएंगे। अख्तर के मुताबिक, ए.आर. रहमान का फिल्म इंडस्ट्री में बेहद सम्मान है, लेकिन उनके बड़े कद और अंतरराष्ट्रीय पहचान की वजह से कई निर्माता और निर्देशक उनसे संपर्क करने में हिचकिचाते हैं।

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जावेद अख्तर ने कहा कि रहमान जैसे महान कलाकार के साथ काम करने को लेकर एक तरह का “डर” या झिझक रहती है। लोगों को लगता है कि वह बहुत बड़े हैं, उन्हें संभालना या उनसे बात करना आसान नहीं होगा। हालांकि, अख्तर ने इसे एक गलत धारणा बताया और कहा कि यह दूरी किसी भेदभाव की वजह से नहीं, बल्कि अत्यधिक सम्मान और भय के कारण बनती है।
दरअसल, बीबीसी एशियन नेटवर्क को दिए गए इंटरव्यू में ए.आर. रहमान से पूछा गया था कि क्या हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में तमिल समुदाय या महाराष्ट्र के बाहर से आने वाले लोगों के साथ भेदभाव होता है। इस पर रहमान ने कहा कि उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कभी भेदभाव महसूस नहीं हुआ, लेकिन इंडस्ट्री में सत्ता संरचना में बदलाव और रचनात्मक लोगों के हाथ से फैसले निकलना एक कारण हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार उन्हें कानाफूसी के ज़रिये पता चलता है कि उन्हें किसी प्रोजेक्ट के लिए चुना गया था, लेकिन बाद में म्यूजिक कंपनियां अपने तयशुदा संगीतकारों के साथ आगे बढ़ जाती हैं।
रहमान ने यह भी स्पष्ट किया कि वह काम की तलाश में नहीं रहते। उनका मानना है कि ईमानदारी से किया गया काम खुद उनके पास आता है और जो उनका हक़ है, वह उन्हें मिलता है। इस बयान से यह संकेत मिलता है कि उन्होंने कभी खुद को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि व्यवस्था में आए बदलाव की ओर इशारा किया।
इसी मुद्दे से जुड़ी बातचीत में जावेद अख्तर ने अपनी कार्यशैली और नैतिकता पर भी बात की। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपने करियर में कई फ़िल्में और प्रोजेक्ट्स बीच में ही छोड़ दिए, क्योंकि वे अपनी नैतिक सीमाओं से समझौता नहीं करते। अख्तर ने साफ़ कहा कि वह किसी भी हाल में अश्लीलता बर्दाश्त नहीं करते और जैसे ही किसी प्रोजेक्ट में ऐसा तत्व दिखता है, वह उससे अलग हो जाते हैं।

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इसके अलावा, उन्होंने खराब भाषा और गलत व्याकरण पर भी सख्त रुख अपनाने की बात कही। उनका कहना है कि सिर्फ़ इसलिए कि सामने वाले को भाषा की समझ नहीं है, वह अपने नाम को घटिया भाषा या गलत ग्रामर वाले गानों से नहीं जोड़ सकते। यही सिद्धांत उन्हें इंडस्ट्री में अलग पहचान देता है।
कुल मिलाकर, यह पूरा मामला इस ओर इशारा करता है कि ए.आर. रहमान की टिप्पणी को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ, वह शायद शब्दों की व्याख्या का परिणाम है। जावेद अख्तर की प्रतिक्रिया ने इस बहस को संतुलन देने का काम किया है और यह स्पष्ट किया है कि सम्मान, कद और इंडस्ट्री की बदलती संरचना को भेदभाव के समान नहीं देखा जाना चाहिए।

सुबह की आदतें जो एसिड रिफ्लक्स को बढ़ा सकती हैं

सर्दियों में एसिडिटी से राहत: सही डाइट अपनाकर पाचन रखें दुरुस्त

सर्दियों के मौसम में पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। ठंड के कारण शरीर में लार का उत्पादन कम होता है, जिससे भोजन ठीक से नहीं पच पाता और एसिड रिफ्लक्स या एसिडिटी की समस्या बढ़ जाती है। इस मौसम में लोग अक्सर भारी, मसालेदार और तले-भुने खाद्य पदार्थों की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं, जो पेट में अतिरिक्त एसिड बनने का कारण बनते हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, सही और संतुलित डाइट अपनाकर सर्दियों में भी एसिडिटी से आसानी से बचा जा सकता है।

  1. ओट्स और साबुत अनाज खाएं
    ओट्स और साबुत अनाज में मौजूद घुलनशील फाइबर पेट के अतिरिक्त एसिड को सोख लेता है। ओट्स में पाया जाने वाला बीटा-ग्लूकन भोजन नली में एक सुरक्षात्मक परत बनाता है, जिससे एसिड रिफ्लक्स की समस्या कम होती है। नाश्ते में ओटमील के साथ केला या सेब लेना बेहतर विकल्प है।
    • हर्बल चाय को बनाएं दिनचर्या का हिस्सा
      सर्दियों में हाइड्रेशन बेहद जरूरी है। सौंफ, अदरक और कैमोमाइल जैसी हर्बल चाय पेट में बनने वाले अतिरिक्त एसिड को नियंत्रित करती हैं। ये पाचन तंत्र को शांत रखती हैं और गैस व जलन से राहत देती हैं। कैफीन, चॉकलेट और डीप फ्राइड फूड से दूरी बनाना फायदेमंद रहता है।
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  3. कम एसिड वाले फल चुनें
    सर्दियों में पपीता, नाशपाती और खरबूजा जैसे फल पाचन के लिए फायदेमंद होते हैं। पपीते में मौजूद पपैन एंजाइम प्रोटीन को तोड़ने में मदद करता है और एसिड जमा नहीं होने देता। संतरा और अनानास जैसे ज्यादा एसिड वाले फलों से बचना चाहिए।
  4. सर्दियों की सब्जियों को दें प्राथमिकता
    गाजर, पालक, ब्रोकली और शकरकंद जैसी सब्जियां मैग्नीशियम और पोटैशियम से भरपूर होती हैं। ये पेट के पीएच लेवल को संतुलित रखती हैं और एसिडिटी से राहत दिलाती हैं। शकरकंद को उबालकर या भूनकर खाना अधिक लाभकारी होता है।
  5. लीन प्रोटीन का सही चुनाव
    ग्रिल्ड चिकन, मछली और टोफू जैसे लीन प्रोटीन पेट पर ज्यादा दबाव नहीं डालते। भोजन के बाद सौंफ चबाने से पाचन क्रिया सुधरती है और पेट की मांसपेशियों को आराम मिलता है।

डेजर्ट सफारी से लेकर सोनार किले तक, जैसलमेर का पूरा ट्रैवल गाइड

सर्दियों में घूमने के लिए परफेक्ट डेस्टिनेशन

इस समय देश के कई राज्यों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। ऐसे में सर्दियों के मौसम में लोग उन जगहों पर घूमना पसंद करते हैं, जहां गुनगुनी धूप के साथ एडवेंचर का भी भरपूर आनंद मिले। अगर आप भी कुछ अलग और यादगार ट्रिप की तलाश में हैं, तो राजस्थान की गोल्डन सिटी जैसलमेर आपके लिए बेहतरीन विकल्प है।
सर्दियों में जैसलमेर का मौसम घूमने के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। यहां आपको दुबई जैसी फीलिंग देने वाली डेजर्ट सफारी, रेत के सुनहरे टीले और साफ आसमान में टिमटिमाते सितारे देखने का मौका मिलता है।

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दिल्ली से जैसलमेर पहुंचना भी काफी आसान है। अगर आप सेफ्टी और बजट दोनों का ध्यान रखते हैं, तो ट्रेन सबसे अच्छा विकल्प है। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से जैसलमेर के लिए कई ट्रेनें उपलब्ध हैं। करीब 15 घंटे का सफर तय कर शाम 6 बजे चलने वाली ट्रेन आपको सुबह 9 बजे जैसलमेर पहुंचा देती है। टिकट पहले से बुक करना बेहतर रहेगा। चाहें तो फ्लाइट से भी सीधे जैसलमेर एयरपोर्ट पहुंच सकते हैं।
जैसलमेर में घूमने वाली प्रमुख जगहें
यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल सोनार किला
जैसलमेर का सोनार किला दूर से ही अपनी सुनहरी आभा से आकर्षित करता है। इस किले के अंदर पतली रंगीन गलियां, खूबसूरत हवेलियां, मंदिर, तोपें और म्यूजियम हैं। खास बात यह है कि यह किला आज भी एक जीवंत शहर की तरह है, जहां लोग रहते हैं।

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सम सैंड ड्यून्स: डेजर्ट सफारी का असली मज़ा
अगर आप रेगिस्तान को उसके असली रूप में देखना चाहते हैं, तो सम सैंड ड्यून्स जरूर जाएं। यह जगह जैसलमेर से लगभग 40 किमी दूर है। यहां पहुंचने के लिए प्राइवेट कैब, टैक्सी या बाइक सही विकल्प है।
यहां आपको ये अनुभव मिलेंगे—
जीप सफारी (दुबई जैसी फीलिंग)
ऊंट सफारी
लोकगीत और पारंपरिक राजस्थानी नृत्य
डिनर, ब्रेकफास्ट और डेजर्ट कैंपिंग
ध्यान रखें, कैंप बुकिंग मौके पर जाकर करें। ऑनलाइन बुकिंग में फ्रॉड का खतरा हो सकता है।
तनोट माता मंदिर और लोंगेवाला वॉर म्यूजियम
पाकिस्तान सीमा के पास स्थित तनोट माता मंदिर आस्था और इतिहास दोनों के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को भारतीय सेना ने विकसित किया है। यहां तक जाने के लिए राजस्थान रोडवेज की बसें भी उपलब्ध हैं। मंदिर से करीब एक घंटे की दूरी पर लोंगेवाला वॉर म्यूजियम है, जहां 1971 के युद्ध की गाथा देखने को मिलती है।
पटवों की हवेली
जैसलमेर की सबसे प्रसिद्ध हवेलियों में शामिल पटवों की हवेली विदेशी पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। नक्काशीदार पत्थरों से बनी यह हवेली राजस्थानी स्थापत्य कला का शानदार उदाहरण है।
आप चाहें तो दो रात और तीन दिन में जैसलमेर की खूबसूरती, एडवेंचर और संस्कृति का पूरा आनंद लेकर वापस लौट सकते हैं। अगर आप भी सर्दियों में घूमने का प्लान बना रही हैं, तो जैसलमेर एक परफेक्ट डेस्टिनेशन साबित हो सकती है।

काशी कैसे बनी भारत की अर्थव्यवस्था में 1.3 लाख करोड़ का योगदान देने वाली आध्यात्मिक राजधानी-योगी

काशी का अभूतपूर्व पुनरुत्थान: पीएम मोदी के नेतृत्व में 55,000 करोड़ की योजनाओं से वैश्विक धरोहर बनी शाश्वत नगरी

वाराणसी (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 से 11.5 वर्षों में काशी ने अभूतपूर्व पुनरुत्थान देखा है। उन्होंने कहा कि काशी केवल एक नगर नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की आस्था, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का शाश्वत केंद्र है।
मुख्यमंत्री योगी ने बताया कि काशी की प्राचीन आध्यात्मिक पहचान को संरक्षित रखते हुए इसे एक आधुनिक वैश्विक धरोहर शहर के रूप में विकसित करने के लिए 55,000 करोड़ रुपये से अधिक की व्यापक विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इन योजनाओं का उद्देश्य बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करना, श्रद्धालुओं की सुविधाओं को बढ़ाना और काशी की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
उन्होंने कहा कि इन विकास कार्यों का सीधा प्रभाव यह पड़ा है कि श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। काशी आज धार्मिक पर्यटन का वैश्विक केंद्र बन चुकी है, जिससे राष्ट्रीय जीडीपी में लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये का महत्वपूर्ण योगदान हो रहा है। यह न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था के लिए गर्व की बात है।

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योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट किया कि काशी “अविनाशी” है और इसकी आत्मा को छेड़ा नहीं गया, बल्कि उसे और सशक्त किया गया है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत में काशी को जिस स्तर का सम्मान और विकास मिलना चाहिए था, वह लंबे समय तक नहीं मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व काशी को मिलना सौभाग्य की बात है, क्योंकि उन्होंने शुरू से ही कहा कि काशी के प्राचीन स्वरूप को संरक्षित रखते हुए इसे विश्व के सामने नए रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि एआई वीडियो के माध्यम से दुष्प्रचार कर लोगों को गुमराह किया जा रहा है और सनातन की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उन्होंने मणिकर्णिका घाट से जुड़े मंदिरों को लेकर स्पष्ट किया कि सभी मंदिर परियोजना के संरक्षण का हिस्सा हैं और घाट निर्माण के बाद वे और अधिक सुरक्षित होंगे।

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उद्घाटन समारोह के दौरान योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री मोदी की खेल संस्कृति को बढ़ावा देने वाली पहलों की भी सराहना की और कहा कि इससे युवाओं को नई दिशा और ऊर्जा मिल रही है।

आक्रामक कुत्ते से दहशत, कई हमले और मौतों के बाद भी स्वामी पर कार्रवाई शून्य

आईजीआरएस शिकायत के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं? सिस्टम की खामियां उजागर

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जनपद के बनकटा थाना क्षेत्र में एक पालतू लेकिन आक्रामक कुत्ते द्वारा लगातार मानव और पशुओं पर हमले की घटनाओं ने ग्रामीणों में भय का माहौल बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर पशु नियंत्रण, जनसुरक्षा और जिम्मेदार स्वामित्व पर संज्ञान लेने के बावजूद, स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक निष्क्रियता सवालों के घेरे में है।
मामला बैदौली बुजुर्ग गांव का है, जहां बीते रविवार सुबह खेत की ओर जाते समय गांव निवासी रविभूषण द्विवेदी को गांव का पालतू कुत्ते ने काट लिया। ग्रामीणों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है। करीब एक वर्ष पूर्व इसी कुत्ते ने सेवानिवृत्त शिक्षक श्याम बिहारी दुबे को टहलते समय काटा था। इसके बाद कुछ महीनों के भीतर अरजानी अंसारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जिसे ग्रामीण रेबिज संक्रमण से जोड़कर देख रहे हैं।

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ग्रामीणों का आरोप है कि उक्त कुत्ता बार-बार बकरियों के बच्चों को उठा ले जाता है, जिससे गरीब बकरी पालकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, राम बिहारी गोंड़ की गाय की मौत भी रेबिज से पीड़ित होने के बाद हुई, जिसका संबंध इसी कुत्ते के हमले से बताया जा रहा है। रेबिज एक घातक बीमारी है, जिसका समय पर इलाज न होने पर परिणाम जानलेवा हो सकता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते।
पीड़ितों और ग्रामीणों द्वारा आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई गई है और संबंधित थाने में लिखित तहरीर भी दी गई, बावजूद इसके अब तक न तो कुत्ते को अलग किया गया और न ही उसके स्वामी पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। इससे ग्रामीणों में यह आशंका गहराती जा रही है कि प्रशासन किसी बड़ी वारदात का इंतजार कर रहा है।

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ग्रामीणों की मांग है कि आक्रामक कुत्ते को तत्काल नियंत्रित कर पशु चिकित्सकीय जांच कराई जाए, रेबिज की पुष्टि होने पर नियमानुसार कार्रवाई हो, और लापरवाह स्वामी के विरुद्ध कानूनी कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में किसी निर्दोष की जान न जाए और गांव में सुरक्षा बहाल हो सके।

युवा कलाकारों के हाथों जीवंत होती पारंपरिक कोहबर कला

लोक में कोहबर कला: गोरखपुर के राजकीय बौद्ध संग्रहालय में दो दिवसीय कार्यशाला का भव्य शुभारंभ

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। लोक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर में शनिवार को “लोक में कोहबर कला” विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। इस कार्यशाला का उद्देश्य पूर्वांचल की पारंपरिक कोहबर कला को संरक्षित करना, उसका दस्तावेजीकरण करना और युवा पीढ़ी को इस समृद्ध लोक विरासत से जोड़ना है।
कार्यशाला में पूर्वांचल के छह जनपदों—गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, संतकबीर नगर और सिद्धार्थनगर—से आए कुल 30 युवा कलाकार प्रतिभाग कर रहे हैं, जिन्हें कोहबर कला की तकनीकी, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक बारीकियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान, लखनऊ की सदस्य डॉ. कुमुद सिंह मुख्य अतिथि रहीं। वे इस कार्यशाला की मुख्य प्रशिक्षक भी हैं। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पूर्वांचल क्षेत्र लोक चित्रकला की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। कोहबर कला, जो सनातन विवाह संस्कार से जुड़ी एक अमूल्य लोक धरोहर है, आज संरक्षण की मांग कर रही है। इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना और इसके सांस्कृतिक संदेश को समझाना समय की आवश्यकता है।

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बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय, आगरा के ललित कला विभाग की सहायक आचार्य डॉ. विनीता गुप्ता ने कहा कि कोहबर कला के माध्यम से प्रतिभागी विभिन्न मंगलिक प्रतीकों, प्राकृतिक तत्वों और लोक विश्वासों को समझ सकेंगे। उन्होंने प्रतिभागियों द्वारा पारिवारिक स्मृतियों और लोक ज्ञान के आधार पर बनाए गए चित्रों की सराहना की और इसे लोक परंपरा के जीवंत उदाहरण बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजकीय बौद्ध संग्रहालय के उप निदेशक डॉ. यशवंत सिंह राठौड़ ने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं। कोहबर कला का अध्ययन युवाओं को पूर्वांचल की प्राचीन लोक परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से परिचित कराता है।
कार्यशाला के संयोजक एवं संचालक प्रेमनाथ ने बताया कि प्रतिभागी कलाकार कैनवास पर कोहबर कला का सृजन कर रहे हैं, जिससे यह परंपरा आधुनिक संदर्भ में भी जीवंत बनी रहे।

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कार्यशाला का समापन रविवार सायं 4 बजे होगा। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए जाएंगे तथा कार्यशाला में सृजित चित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया जाएगा। इस अवसर पर गोरखपुर के महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।

इतिहास के पन्नों में दर्ज महान व्यक्तियों के महत्वपूर्ण निधन

18 जनवरी के निधन

हरिवंश राय बच्चन (2003)
हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के स्तंभ माने जाते हैं। उनका जन्म 1907 में प्रयागराज में हुआ। ‘मधुशाला’ ने उन्हें जन-जन का कवि बनाया और हिंदी कविता को नई लोकप्रियता दी। उनकी रचनाओं में जीवन, दर्शन, प्रेम और सामाजिक यथार्थ का गहरा समन्वय दिखाई देता है। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। 18 जनवरी 2003 को उनका निधन हुआ, जिससे हिंदी साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई।

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एन. टी. रामाराव (1996)
नंदमुरी तारक रामाराव दक्षिण भारतीय सिनेमा के महान अभिनेता और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री थे। उन्होंने पौराणिक फिल्मों में भगवान कृष्ण और राम जैसे पात्रों को अमर बना दिया। 1982 में उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना की और क्षेत्रीय अस्मिता को राष्ट्रीय राजनीति में नई पहचान दी। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने गरीबों के लिए कई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। 18 जनवरी 1996 को उनके निधन से सिनेमा और राजनीति दोनों क्षेत्रों में शून्य पैदा हो गया।
सआदत हसन मंटो (1955)
सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य के सबसे बेबाक और यथार्थवादी कहानीकारों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 1912 में हुआ था। ‘टोबा टेक सिंह’, ‘ठंडा गोश्त’ और ‘खोल दो’ जैसी कहानियों ने विभाजन की त्रासदी और मानव मन की जटिलताओं को निर्भीकता से उजागर किया। उन पर कई बार अश्लीलता के मुकदमे चले, लेकिन वे सच लिखने से कभी पीछे नहीं हटे। 18 जनवरी 1955 को उनका निधन हुआ, पर उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं।

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कुंदन लाल सहगल (1947)
कुंदन लाल सहगल भारतीय सिनेमा और संगीत के शुरुआती दौर के महान गायक-अभिनेता थे। उनका जन्म 1904 में जम्मू में हुआ। ‘देवदास’ और ‘तानसेन’ जैसी फिल्मों में उनके गीतों ने अमरता पाई। उनकी भावपूर्ण आवाज़ ने फिल्मी संगीत की दिशा तय की और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया। उन्होंने शास्त्रीय और लोक संगीत को लोकप्रिय सिनेमा से जोड़ा। 18 जनवरी 1947 को जालंधर में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी गायकी आज भी जीवित है।
रुडयार्ड किपलिंग (1936)
रुडयार्ड किपलिंग ब्रिटिश लेखक और कवि थे, जिन्हें 1907 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उनका जन्म भारत में हुआ और भारतीय जीवन का प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखता है। ‘द जंगल बुक’ और ‘किम’ उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं। उनकी लेखनी में साहस, साम्राज्यवाद और मानवीय संघर्ष के विषय प्रमुख रहे। अंग्रेजी साहित्य में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 18 जनवरी 1936 को उनके निधन से विश्व साहित्य ने एक बड़ा लेखक खो दिया।
भीम सेन सच्चर (1978)
भीम सेन सच्चर भारत के स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ थे। वे पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सक्रिय भूमिका निभाई। प्रशासनिक क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें विशिष्ट बनाती है। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और सादगी का उदाहरण प्रस्तुत किया। 18 जनवरी 1978 को उनका निधन हुआ।
ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफ़िर (1976)
ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफ़िर पंजाबी साहित्य के प्रमुख कवि और स्वतंत्रता सेनानी थे। वे पंजाब के मुख्यमंत्री भी रहे। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाएं प्रमुख हैं। उन्होंने साहित्य और राजनीति दोनों क्षेत्रों में संतुलित योगदान दिया। पंजाबी भाषा को समृद्ध करने में उनका विशेष स्थान है। 18 जनवरी 1976 को उनका निधन हुआ।

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बद्रीनाथ प्रसाद (1966)
बद्रीनाथ प्रसाद भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। उन्होंने गणित के जटिल सिद्धांतों को सरल रूप में प्रस्तुत किया और शैक्षणिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके शोध और शिक्षण कार्य ने अनेक छात्रों को प्रेरित किया। भारतीय गणित परंपरा को आधुनिक स्वरूप देने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। 18 जनवरी 1966 को उनका निधन हुआ।
लक्ष्मी नारायण साहू (1963)
लक्ष्मी नारायण साहू उड़ीसा के समाजसेवी और सार्वजनिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने सामाजिक सुधार, शिक्षा और जनकल्याण के लिए जीवन समर्पित किया। ग्रामीण विकास और जनजागरण में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे सादगी और सेवा भावना के प्रतीक माने जाते थे। 18 जनवरी 1963 को उनका निधन हुआ।
दुलारी (2013)
दुलारी भारतीय सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री थीं। उन्होंने 1940–50 के दशक में कई लोकप्रिय फिल्मों में अभिनय किया। उनके अभिनय में सहजता और भावनात्मक गहराई देखने को मिलती थी। वे सहायक और चरित्र भूमिकाओं में विशेष रूप से सराही गईं। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर का वे अहम हिस्सा रहीं। 18 जनवरी 2013 को उनके निधन से फिल्म जगत ने एक अनुभवी कलाकार खो दी।

समाज, न्याय और खेल: 18 जनवरी को जन्मे महान व्यक्तित्व

18 जनवरी को जन्मे प्रसिद्ध व्यक्ति: इतिहास, उपलब्धियाँ और निधन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

18 जनवरी भारतीय और विश्व इतिहास में कई महान व्यक्तित्वों का जन्मदिवस है। राजनीति, न्याय, खेल, संगीत और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में इन लोगों ने स्थायी छाप छोड़ी। नीचे 18 जनवरी को जन्मे प्रमुख व्यक्तियों का संक्षिप्त परिचय और जिनका निधन हो चुका है, उनके जीवन-योगदान व ऐतिहासिक महत्व पर लगभग 100 शब्दों में जानकारी दी जा रही है, ताकि छात्र, शोधार्थी और सामान्य पाठक प्रामाणिक संदर्भ के रूप में इसका उपयोग कर सकें।

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मुहम्मद अली (1942–2016) – विश्वप्रसिद्ध मुक्केबाज़
मुहम्मद अली केवल एक महान मुक्केबाज़ नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार आंदोलन की वैश्विक आवाज़ थे। तीन बार हैवीवेट विश्व चैंपियन रहे अली ने खेल जगत में साहस, आत्मविश्वास और सामाजिक चेतना का नया मानक स्थापित किया। वियतनाम युद्ध में जाने से इनकार कर उन्होंने अपने करियर को जोखिम में डाला, पर सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। पार्किंसन रोग से लंबे संघर्ष के बाद 2016 में उनका निधन हुआ। उनका जीवन खेल, राजनीति और मानवाधिकारों के संगम का प्रतीक माना जाता है।
वीर बहादुर सिंह (1935–1989) – उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री
वीर बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी विचारधारा के मजबूत स्तंभ थे। वे 1985 से 1988 तक मुख्यमंत्री रहे और प्रशासनिक सादगी, ईमानदारी तथा ग्रामीण विकास के लिए जाने गए। अपने अल्प लेकिन प्रभावशाली कार्यकाल में उन्होंने सामाजिक संतुलन और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया। 1989 में उनका निधन हो गया। आज भी उन्हें सिद्धांतवादी राजनीति और जनसेवा के लिए स्मरण किया जाता है।

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जगदीश शरण वर्मा (1933–2013) – भारत के 27वें मुख्य न्यायाधीश
न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा भारतीय न्यायपालिका के सबसे प्रगतिशील मुख्य न्यायाधीशों में गिने जाते हैं। मानवाधिकार, लैंगिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा में उनका योगदान ऐतिहासिक है। विशाखा दिशा-निर्देशों के माध्यम से उन्होंने कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को कानूनी आधार दिया। 2013 में उनके निधन के बाद भी उनके फैसले भारतीय न्याय व्यवस्था के मील के पत्थर बने हुए हैं।
सुन्दरम बालचंद्रन (1927–1990) – महान वीणा वादक
सुन्दरम बालचंद्रन कर्नाटक संगीत के अग्रणी वीणा वादकों में से एक थे। उन्होंने पारंपरिक वीणा वादन में नवाचार कर उसे नई पहचान दी। उनकी साधना, तकनीक और संगीतबोध ने आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों को गहराई से प्रभावित किया। 1990 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी रिकॉर्डिंग्स और शिष्य परंपरा के माध्यम से उनका संगीत आज भी जीवित है।
महादेव गोविन्द रानाडे (1841–1901) – समाज सुधारक और विद्वान
महादेव गोविन्द रानाडे 19वीं सदी के महान समाज सुधारक, न्यायाधीश और विचारक थे। वे प्रार्थना समाज के प्रमुख स्तंभ रहे और विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा तथा सामाजिक सुधारों के प्रबल समर्थक थे। भारतीय सामाजिक पुनर्जागरण में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है। 1901 में उनके निधन के बाद भी उनके विचार आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना को दिशा देते रहे।

एक तारीख, अनेक क्रांतियाँ: 18 जनवरी का वैश्विक प्रभाव

18 जनवरी का इतिहास: भारत और विश्व की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ

2020 – झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भारतीय तीरंदाजी संघ (AAI) के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने बीवीपी राव को 34–18 मतों से हराया। इससे भारतीय तीरंदाजी प्रशासन में नेतृत्व परिवर्तन और नई नीतिगत दिशा की उम्मीद बनी।
2009 – द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपीं, जिनका उद्देश्य शासन को पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित बनाना था। इसी वर्ष सौरभ गांगुली को बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन ने स्वर्ण बैट से सम्मानित किया।

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2008 – हॉलीवुड अभिनेता जॉर्ज क्लूनी संयुक्त राष्ट्र के शांतिदूत नियुक्त हुए। भारत में मायावती सरकार ने निजी विश्वविद्यालयों के लिए दिशानिर्देश मंजूर किए। पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में उग्रवाद बढ़ा, जबकि कोलंबिया में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ।
2007 – विश्व की सबसे वृद्ध महिला जूली विनफ्रेड बर्टरंड का कनाडा में निधन हुआ, जो मानव आयु और दीर्घजीवन पर वैश्विक चर्चा का विषय बना।
2006 – अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु (Physician-Assisted Suicide) पर कानूनी मुहर लगाई, जिससे चिकित्सा नैतिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय बहस तेज हुई।
2005 – भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों को पेट्रोल पंप आवंटन न करने की सिफारिश की। त्रिनिदाद-टोबैगो, ग्रेनेडा और सेंट विंसेंट व ग्रेनेडाइंस ने राजनीतिक एकीकरण का प्रस्ताव रखा।
2004 – भारत ने ऑस्ट्रेलिया को एकदिवसीय क्रिकेट श्रृंखला में 19 रन से हराया, जो भारतीय क्रिकेट के आत्मविश्वास और घरेलू प्रदर्शन का प्रतीक बना।
2003 – लीबिया संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त हुआ, जिससे वैश्विक मानवाधिकार राजनीति में नया समीकरण उभरा।
2002 – अमेरिका भारत को उन्नत हथियार देने पर सहमत हुआ। कॉलिन पावेल ने पाकिस्तान से आतंकवाद पर कार्रवाई की शर्त पर भारत-पाक वार्ता की बात कही। सिएरा लियोन का गृहयुद्ध समाप्त हुआ।
2001 – कांगो में राष्ट्रपति लॉरेंट कबीला की हत्या के बाद उनके पुत्र ने सत्ता संभाली, जिससे अफ्रीकी राजनीति में अस्थिरता का नया चरण शुरू हुआ।
1997 – नफीसा जोसेफ मिस इंडिया बनीं, जिन्होंने भारतीय फैशन और सौंदर्य प्रतियोगिताओं में नई पहचान बनाई।
1989 – चेकोस्लोवाकिया में लाखों लोगों ने आज़ादी, सच्चाई और मानवाधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन किया, जो लोकतांत्रिक आंदोलनों का अहम अध्याय बना।
1987 – लंदन में 40 देशों के मीडिया प्रतिनिधियों ने सेंसरशिप के खिलाफ एकजुट संघर्ष की घोषणा की, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को वैश्विक बल मिला।
1986 – दक्षिण यमन की राजधानी अदन में भीषण संघर्ष शुरू हुआ, जिसके कारण विदेशी नागरिकों का पलायन हुआ और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी।
1976 – फ्रांस ने जासूसी के आरोप में 40 सोवियत अधिकारियों को निष्कासित किया, जो शीत युद्ध की कूटनीतिक तनातनी का संकेत था।
1974 – इज़रायल और मिस्र के बीच हथियारों से जुड़ा समझौता हुआ, जिसने मध्य-पूर्व शांति प्रक्रिया को आंशिक गति दी।
1973 – अमेरिका और उत्तर वियतनाम ने शांति समझौते के मसौदे पर वार्ता की घोषणा की, जो वियतनाम युद्ध के अंत की दिशा में कदम था।
1968 – अमेरिका और सोवियत संघ परमाणु हथियार नियंत्रण संधि के प्रारूप पर सहमत हुए। उसी वर्ष सोवियत संघ ने पूर्वी कज़ाखस्तान में परमाणु परीक्षण किया।
1963 – फ्रांस ने यूरोपीय साझा बाज़ार से ब्रिटेन को बाहर रखने की वकालत की, जिससे यूरोपीय राजनीति में मतभेद उजागर हुए।
1960 – अमेरिका और जापान के बीच संयुक्त रक्षा समझौता हुआ, जिसने एशिया-प्रशांत सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया।
1959 – महात्मा गांधी की सहयोगी मीरा बेन (मैडलिन स्लैड) ने भारत छोड़ा, उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा।

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1945 – सोवियत सेना पोलैंड के क्राकोव पहुंची और जर्मन सेनाओं को पीछे हटने पर मजबूर किया, जो द्वितीय विश्व युद्ध में निर्णायक क्षण था।
1930 – रवींद्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम का दौरा किया, जो भारतीय बौद्धिक और स्वतंत्रता आंदोलन का ऐतिहासिक मिलन था।
1919 – बेंटले मोटर्स लिमिटेड की स्थापना हुई, जिसने लग्ज़री ऑटोमोबाइल उद्योग में वैश्विक पहचान बनाई।
1896 – एक्स-रे मशीन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ, जिसने चिकित्सा विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव लाया।
1778 – जेम्स कुक हवाई द्वीपसमूह पहुंचने वाले पहले यूरोपीय बने और इसे सैंडविच आइलैंड नाम दिया।

आज का दिन: शुभ योग और सावधानियों का संपूर्ण संकेत

18 जनवरी 2026 का दैनिक राशिफल | सभी 12 राशियों का भविष्यफल


पंडित सत्य प्रकाश पाण्डेय

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की चाल से 18 जनवरी 2026, रविवार का दिन कई राशियों के लिए लाभदायक सिद्ध होगा, वहीं कुछ राशि वालों को सतर्क रहने की आवश्यकता है।


♈ मेष (Aries)
आज मेहनत का पूरा फल मिलेगा। घर और कार्यस्थल पर मिली जिम्मेदारियों को समझदारी से निभाएं। नए लोगों पर भरोसा करने में जल्दबाजी न करें। भावनाओं के बजाय तर्क से निर्णय लें। स्मार्ट वर्किंग अपनाने से अपेक्षित परिणाम मिलेंगे।
वृषभ (Taurus)
उत्साह और आत्मविश्वास से भरा दिन रहेगा। नौकरी में बदलाव और तरक्की के संकेत हैं। आय में वृद्धि संभव है। यात्रा और मित्रों के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा, हालांकि मन थोड़ा विचलित रह सकता है।
मिथुन (Gemini)
परिवार के साथ संबंध मजबूत होंगे। आर्थिक मामलों में विशेषज्ञों की सलाह लाभ देगी। सोशल नेटवर्क से निजी रिश्ते सुधरेंगे। रचनात्मक कार्यों में सफलता और प्रोफेशनल उपलब्धियां मिलेंगी।
कर्क (Cancer)
आज महत्वपूर्ण लक्ष्य पूरे होंगे। व्यापार में आत्मविश्वास बढ़ेगा और नेतृत्व क्षमता निखरेगी। प्रतिस्पर्धा में सफलता मिलेगी। मन में उतार-चढ़ाव रह सकते हैं, पर परिणाम आपके पक्ष में रहेंगे।
सिंह (Leo)
आत्मविश्वास में कमी महसूस हो सकती है। जरूरी कार्य सुबह के समय निपटाने का प्रयास करें। परिवार की सलाह लाभदायक रहेगी। निजी मामलों में सतर्क रहें। रिश्तेदारों का सहयोग मिलेगा।
कन्या (Virgo)
सामाजिक गतिविधियां बढ़ेंगी। संवाद और चर्चाओं में प्रभाव बनेगा। जिम्मेदार लोगों की सलाह से आत्मविश्वास बढ़ेगा। धन-संपत्ति और बचत के मामलों में सकारात्मक प्रगति होगी।
तुला (Libra)
अप्रत्याशित घटनाएं हो सकती हैं, इसलिए सतर्क रहें। अपनों का सहयोग मिलेगा। लेन-देन में धैर्य रखें। मित्र के सहयोग से नया व्यवसाय शुरू हो सकता है, जिससे लाभ के अवसर मिलेंगे।
वृश्चिक (Scorpio)
आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। अच्छे प्रस्ताव मिल सकते हैं। बैठकों में सफलता और प्रभावी संवाद रहेगा। मेहमानों का आगमन संभव है। योजनाएं सही दिशा में आगे बढ़ेंगी।
धनु (Sagittarius)
समय अनुकूल रहेगा। मित्रों से संबंध मजबूत होंगे। करियर और व्यापार में प्रभाव बढ़ेगा। पार्टनरशिप बिजनेस में सुधार होगा और लाभ में वृद्धि के योग हैं।
मकर (Capricorn)
मिल रहे अवसरों का पूरा लाभ उठाएं। वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। परिवार से मनोबल बढ़ेगा। आत्मविश्वास और प्रसन्नता बनी रहेगी। माता-पिता का सहयोग प्राप्त होगा।
कुम्भ (Aquarius)
करियर और व्यापार में व्यस्तता रहेगी। प्रोफेशनल तालमेल बेहतर होगा। शत्रुओं की साजिशों से सावधान रहें। जल्दबाजी में निर्णय न लें, विवेक और विनम्रता बनाए रखें।
मीन (Pisces)
जानकारी और संवाद का दायरा बढ़ेगा। सहयोगात्मक कार्यों में सफलता मिलेगी। भाई-बहनों से संबंध मजबूत होंगे। काम-व्यापार उम्मीद के अनुसार चलेगा।
नोट: राशिफल फल में किसी भी त्रुटि के लिए राष्ट्र की परंपरा जिम्मेदार नहीं है। कृपया योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य लें।

करियर, प्रेम और धन पर मूलांक का प्रभाव: अंक ज्योतिष का संपूर्ण ज्ञान

अंक राशिफल से जानें कल का भविष्य


अंक ज्योतिष में व्यक्ति के जन्मांक यानी मूलांक के आधार पर उसके स्वभाव, सोच, ऊर्जा और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र की तरह ही अंकशास्त्र भी जीवन के विभिन्न पहलुओं—करियर, स्वास्थ्य, रिश्ते, धन और मानसिक स्थिति—पर गहरा प्रभाव डालता है।
यदि आपका जन्म किसी भी महीने की 1 से 9 तारीख के बीच हुआ है, तो वही आपका मूलांक माना जाता है। नीचे जानिए 18 जनवरी 2026, रविवार का दिन मूलांक 1 से 9 वालों के लिए कैसा रहने वाला है।

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मूलांक 1 (जन्म तारीख 1,10,19,28)
18 जनवरी को मूलांक 1 वाले जातक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से भरपूर रहेंगे। कार्यक्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका निभाने का अवसर मिल सकता है। लोग आपकी बातों को गंभीरता से लेंगे। ध्यान रखें कि आत्मविश्वास अहंकार में न बदले। संवाद में विनम्रता रखें। स्वास्थ्य के लिहाज से बाहर के भोजन से परहेज करें। सिरदर्द या थकान की समस्या हो सकती है।
मूलांक 2 (जन्म तारीख 2,11,20,29)
आज भावनात्मक उतार-चढ़ाव रह सकता है। किसी पुराने रिश्ते या याद से मन विचलित हो सकता है। भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना आपके लिए लाभकारी रहेगा। काम में मन कम लग सकता है। कोई भी फैसला भावनाओं में न लें। नींद और खानपान का विशेष ध्यान रखें।
मूलांक 3 (जन्म तारीख 3,12,21,30)
आज भाग्य आपका साथ देगा। कोर्ट-कचहरी या सरकारी मामलों में सफलता मिल सकती है। वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलेगा। आत्मविश्वास बढ़ेगा और सामाजिक सम्मान में वृद्धि होगी। अब समय है कि आप अपने जीवन की दिनचर्या को व्यवस्थित करें।
मूलांक 4 (जन्म तारीख 4,13,22,31)
दिन थोड़ा अस्थिर रह सकता है। अचानक योजना बदलने से मन परेशान हो सकता है। किसी विषय को लेकर भ्रम की स्थिति बनेगी। जिद छोड़कर परिस्थितियों के अनुसार चलना आपके हित में रहेगा। आज कोई नया और मौलिक विचार भविष्य में लाभ देगा। तनाव से दूरी बनाए रखें।
मूलांक 5 (जन्म तारीख 5,14,23)
आज आप बेहद सक्रिय रहेंगे। मीटिंग, कॉल या बातचीत से लाभ की संभावना है। लंबे समय से अटका कार्य पूरा हो सकता है। खर्चों पर नियंत्रण रखें और बचत पर ध्यान दें। दिनचर्या में व्यायाम शामिल करें। पाचन तंत्र कमजोर रह सकता है।
मूलांक 6 (जन्म तारीख 6,15,24)
भावनात्मक रूप से संवेदनशील रहेंगे लेकिन प्रेम जीवन में मिठास बनी रहेगी। कोई आपकी प्रशंसा कर सकता है जिससे मन प्रसन्न रहेगा। रचनात्मक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। कला, फैशन और डिजाइन से जुड़े लोगों के लिए दिन अनुकूल है। उम्मीदें जरूरत से ज्यादा न बढ़ाएं। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा।
मूलांक 7 (जन्म तारीख 7,16,25)
आज आप खुद के साथ समय बिताना पसंद करेंगे। किसी विषय पर गहन चिंतन करेंगे और आत्मविश्लेषण होगा। मानसिक रूप से स्वयं को बेहतर समझ पाएंगे। शाम तक मानसिक थकान महसूस हो सकती है। समय पर सोना आवश्यक रहेगा।
मूलांक 8 (जन्म तारीख 8,17,26)
आज जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं। काम में देरी या बाधाएं महसूस होंगी लेकिन धैर्य बनाए रखें। आपकी मेहनत का फल अवश्य मिलेगा। दिन की शुरुआत ध्यान और मेडिटेशन से करें, इससे मानसिक संतुलन बना रहेगा।

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मूलांक 9 (जन्म तारीख 9,18,27)
ऊर्जा का स्तर ऊँचा रहेगा। कोई पुराना विवाद या समस्या सुलझ सकती है। क्रोध पर नियंत्रण रखना जरूरी है। अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाएं। चिड़चिड़ापन संभव है, इसलिए खुद का विशेष ध्यान रखें।
डिस्क्लेमर:
इस आलेख में दी गई जानकारी अंक ज्योतिष पर आधारित सामान्य भविष्यवाणी है। हम यह दावा नहीं करते कि यह पूर्णतः सत्य या सटीक है। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले संबंधित क्षेत्र के योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।
नोट: अंक ज्योतिष में किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए राष्ट्र की परम्परा जिम्मेदार नहीं होगी।

राहुकाल व चौघड़िया का सही उपयोग: आज क्या करें, क्या न करें

पंचांग 18 जनवरी 2026 | माघ अमावस्या, मौनी अमावस्या, शुभ-अशुभ मुहूर्त, राहुकाल, चौघड़िया


दिनांक: 18/01/2026, रविवार
संवत्सर: विक्रम संवत 2082 (कालयुक्त) | शक संवत 1947 (विश्वावसु)
अयन: उत्तरायण | द्रिक ऋतु: शिशिर | वैदिक ऋतु: हेमंत
चंद्र मास: अमांत–पौष | पूर्णिमांत–माघ
राष्ट्रीय पंचांग: पौष 28, 1947
तिथि
कृष्ण पक्ष अमावस्या: 18 जनवरी 12:04 AM से 19 जनवरी 01:21 AM तक
शुक्ल पक्ष प्रतिपदा: 19 जनवरी 01:21 AM से 20 जनवरी 02:14 AM तक
नक्षत्र
पूर्वाषाढ़ा: 17 जनवरी 08:12 AM से 18 जनवरी 10:14 AM तक
उत्तराषाढ़ा: 18 जनवरी 10:14 AM से 19 जनवरी 11:52 AM तक
योग
हर्षण: 17 जनवरी 09:17 PM से 18 जनवरी 09:10 PM तक
वज्र: 18 जनवरी 09:10 PM से 19 जनवरी 08:45 PM तक
करण
चतुष्पद: 18 जनवरी 12:04 AM – 12:46 PM
नाग: 18 जनवरी 12:46 PM – 19 जनवरी 01:21 AM
किस्तुघन: 19 जनवरी 01:22 AM – 01:51 PM
वार: रविवार
त्योहार एवं व्रत
अमावस्या | मौनी अमावस्या
सूर्य-चंद्र समय
सूर्योदय: 07:14 AM
सूर्यास्त: 06:00 PM
चन्द्रोदय: 06:50 AM
चन्द्रास्त: 05:38 PM
राशि स्थिति
सूर्य: मकर राशि
चन्द्रमा: 18 जनवरी 04:40 PM तक धनु, तत्पश्चात मकर

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अशुभ काल
राहुकाल: 04:39 PM – 06:00 PM
यमगण्ड: 12:37 PM – 01:57 PM
कुलिक: 03:18 PM – 04:39 PM
दुर्मुहूर्त: 04:33 PM – 05:17 PM
वर्ज्यम्: 06:47 PM – 08:30 PM
शुभ काल
ब्रह्म मुहूर्त: 05:37 AM – 06:25 AM
अमृत काल: 05:01 AM – 06:43 AM
अभिजीत मुहूर्त: 12:15 PM – 12:58 PM
विशेष योग
सर्वार्थसिद्धि योग: 18 जनवरी 10:14 AM से 19 जनवरी 07:14 AM तक (उत्तराषाढ़ा व रविवार)
आनन्दादि योग: शुभ (10:14 AM तक), उसके बाद अमृत
दिन का चौघड़िया
उद्बेग 07:14–08:35
चर 08:35–09:55
लाभ 09:55–11:16
अमृत 11:16–12:37
काल 12:37–13:57
शुभ 13:57–15:18
रोग 15:18–16:39
उद्बेग 16:39–18:00
रात का चौघड़िया
शुभ 18:00–19:39
अमृत 19:39–21:18
चर 21:18–22:57
रोग 22:57–00:37
काल 00:37–02:16
लाभ 02:16–03:55
उद्बेग 03:55–05:34
शुभ 05:34–07:14
चंद्रबल (राशि)
18/01/26 04:40 PM तक: मिथुन, कर्क, तुला, धनु, कुंभ, मीन
उपरांत 19/01/26 07:14 AM तक: मेष, कर्क, सिंह, वृश्चिक, मकर, मीन

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ताराबल (नक्षत्र)
18/01/26 10:14 AM तक: अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, आद्रा, पुष्य, मघा, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, शतभिषा, उत्तरभाद्रपदा
उपरांत 19/01/26 07:14 AM तक: भरणी, रोहिणी, मृगशीर्षा, पुनर्वसु, आश्लेषा, पूर्व फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, पूर्वभाद्रपदा, रेवती
नोट: पंचांग में किसी त्रुटि के लिए राष्ट्र की परम्परा जिम्मेदार नहीं है।कृपया योग्य ज्योतिषाचार्य से परामर्श अवश्य लें।

प्रेम, नियंत्रण और मौन: आधुनिक रिश्तों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

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रिश्तों में संतुलन का संकट: भावनाओं के शोषण की सामाजिक सच्चाई
डॉ. प्रियंका सौरभ


मनुष्य का जीवन रिश्तों के ताने-बाने से ही आकार लेता है। परिवार, मित्रता, प्रेम, सहयोग और सामाजिक संबंध—ये सभी हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करते हैं। किंतु आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रिश्तों में संवेदनशीलता की जगह स्वार्थ ने ले ली है और भावनाओं को कमजोरी समझा जाने लगा है। जो व्यक्ति दिल से निभाने का प्रयास करता है, वही अक्सर सबसे अधिक आहत और ठगा हुआ दिखाई देता है।
जब कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता है, सामने वाले की सहूलियतों का ध्यान रखता है, उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करता है और स्वयं को बार-बार पीछे कर लेता है, तो यह त्याग हर बार सम्मान नहीं पाता। कई बार सामने वाला इस व्यवहार को प्रेम या अपनापन नहीं, बल्कि मूर्खता मान लेता है। यहीं से रिश्तों में असंतुलन की प्रक्रिया शुरू होती है।

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कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों की भावनाओं पर टिककर अपने अहंकार को बड़ा करते हैं। वे धीरे-धीरे स्वयं को अत्यधिक महत्वपूर्ण समझने लगते हैं। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि वही रिश्ते का केंद्र हैं, वही निर्णय लेने वाले हैं और सामने वाला व्यक्ति उनके बिना अधूरा है। इसी मानसिकता के चलते वे अनावश्यक उपदेश देने लगते हैं, हर विषय पर अपनी राय को अंतिम सत्य घोषित करते हैं और लगातार बोलते रहने को ज्ञान का प्रमाण मान लेते हैं।
समस्या सलाह देने में नहीं है, समस्या तब पैदा होती है जब सलाह सम्मान के बजाय नियंत्रण का माध्यम बन जाए। जब संवाद बराबरी का न रहकर वर्चस्व स्थापित करने का साधन बन जाए। ऐसे लोग प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनाओं की भाषा नहीं समझते। वे हर रिश्ते को लाभ और हानि के तराजू पर तौलते हैं। उनके लिए रिश्ता एक साधन मात्र होता है, लक्ष्य नहीं।
ऐसे स्वभाव के लोग अक्सर इस भ्रम में जीते हैं कि सामने वाला व्यक्ति उन पर निर्भर है। उसकी विनम्रता, सहनशीलता और समझदारी उन्हें मजबूरी प्रतीत होती है। वे मान लेते हैं कि यह व्यक्ति उन्हें छोड़ नहीं सकता, उनसे प्रश्न नहीं कर सकता और उनका विरोध करने का साहस नहीं रखता। यहीं से भावनात्मक शोषण की प्रक्रिया शुरू होती है, जो धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का रूप ले लेती है।
परंतु हर सहनशीलता की एक सीमा होती है। जब सामने वाला व्यक्ति सजग होता है, आत्मचिंतन करता है और यह समझने लगता है कि उसका अस्तित्व केवल उपयोग की वस्तु बनकर रह गया है, तब वह स्वयं को बचाने का प्रयास करता है। यही क्षण स्वार्थी व्यक्ति को सबसे अधिक असहज करता है, क्योंकि अब उसका नियंत्रण खतरे में पड़ जाता है।

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जैसे ही वह देखता है कि दूसरा व्यक्ति सवाल पूछने लगा है, अपनी बात रखने लगा है या मानसिक दूरी बना रहा है, वैसे ही वह नया तरीका अपनाता है—आरोप लगाने का। अब वही व्यक्ति, जो स्वयं को अत्यंत समझदार और ज्ञानी बताता था, चरित्र पर आक्षेप लगाने लगता है। वह बाहरी लोगों के सामने रिश्ते की कहानी को अपने पक्ष में इस तरह प्रस्तुत करता है कि स्वयं को पीड़ित और सामने वाले को दोषी सिद्ध किया जा सके।
यहीं से रिश्ते का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। संवाद का स्थान आरोप ले लेते हैं। समझ और धैर्य की जगह कटुता और वैमनस्य आ जाता है। हर बातचीत में यह सुनने को मिलता है—“तुम बदल गए हो”, “पहले ऐसे नहीं थे”, “अब तुम घमंडी हो गए हो”। वास्तविकता यह होती है कि यह परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मबोध होता है, जिसे स्वार्थी व्यक्ति स्वीकार नहीं कर पाता।
धीरे-धीरे रिश्ते कुरुक्षेत्र के मैदान में बदल जाते हैं, जहाँ उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि जीत हासिल करना होता है। एक पक्ष चुप रहकर स्वयं को बचाने का प्रयास करता है, जबकि दूसरा पक्ष शोर मचाकर सहानुभूति बटोरने में लगा रहता है। ऐसे लोग सहानुभूति अर्जित करने में अत्यंत कुशल होते हैं। वे अपनी बात को इस प्रकार गढ़ते हैं कि सुनने वाला सहज ही उनके पक्ष में खड़ा हो जाता है।
इन परिस्थितियों में सामान्य, संवेदनशील और नैतिक व्यक्ति सबसे अधिक मानसिक पीड़ा झेलता है। वह जानता है कि हर आरोप का उत्तर देना संभव नहीं है। हर झूठ को सार्वजनिक रूप से काटना उसके स्वभाव और संस्कारों के विरुद्ध है। परिणामस्वरूप वह मौन को अपना हथियार बनाता है, किंतु यही मौन कई बार उसकी कमजोरी समझ लिया जाता है।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि गलती किसकी है? क्या संवेदनशील होना अपराध है? क्या रिश्तों में त्याग करना मूर्खता है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। गलती संवेदनशीलता में नहीं, बल्कि असंतुलन में है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब रिश्ते एकतरफा हो जाते हैं, जब देने वाला ही देता रह जाता है और पाने वाला केवल लेता रहता है।
इसी कारण रिश्तों की शुरुआत में ही संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। प्रेम, मित्रता या सहयोग—किसी भी संबंध में स्वयं को पूरी तरह खो देना विवेकपूर्ण नहीं है। दूसरे को प्रसन्न रखने के लिए अपनी सीमाओं को बार-बार तोड़ना अंततः आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाता है।
आत्ममूल्यांकन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि क्या यह रिश्ता हमें मानसिक शांति दे रहा है या केवल थकान और पीड़ा? क्या हमारी बातों को सुना जा रहा है या केवल सहन किया जा रहा है? क्या हमारी भावनाओं का सम्मान है या केवल उनका उपयोग किया जा रहा है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो वहाँ रुक जाना ही सबसे बड़ी भूल है। ऐसे में स्वयं को दोषी ठहराने के बजाय ख़ामोशी से दूरी बना लेना अधिक समझदारी भरा निर्णय होता है। दूरी हमेशा द्वेष का प्रतीक नहीं होती, कई बार यह आत्मरक्षा का सबसे सशक्त उपाय होती है।
समाज को भी यह समझने की आवश्यकता है कि हर कहानी के दो पक्ष होते हैं। जो व्यक्ति सबसे अधिक बोलता है, वही हमेशा सत्य बोल रहा हो, यह आवश्यक नहीं। और जो मौन है, वह दोषी हो—यह भी अनिवार्य नहीं। आज का समय कहानी गढ़ने वालों और उसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वालों का हो गया है, जहाँ सत्य से अधिक उसकी प्रस्तुति महत्त्वपूर्ण हो गई है।
ऐसे दौर में आत्मसम्मान की रक्षा ही सबसे बड़ा धर्म है। यदि रिश्ते बोझ बन जाएँ, यदि उनमें भय, अपराधबोध और हीन भावना भर जाए, तो उन्हें निभाना कोई नैतिकता नहीं है। नैतिकता वहाँ है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे के अस्तित्व और गरिमा को स्वीकार करें।
अंततः यही कहा जा सकता है कि रिश्ते तभी सुंदर और स्थायी होते हैं, जब वे बराबरी और सम्मान पर टिके हों। जहाँ प्रेम हो, वहाँ आदर भी हो। जहाँ अपनापन हो, वहाँ स्वतंत्रता भी हो। और जहाँ यह सब न हो, वहाँ दूरी कोई पराजय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की विजय होती है।
– डॉ. प्रियंका सौरभ
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

इतिहास की आड़ में वर्तमान की विफलताओं पर पर्दा

🔴 इतिहास के प्रतिशोध के बहाने इतिहास से ही प्रतिशोध

✍️ बादल सरोज



तर्क, विवेक और वैज्ञानिक चेतना पर आधारित भविष्य की ओर बढ़ते किसी भी संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य में, बीते सप्ताह सामने आए दृश्य गहरी चिंता पैदा करते हैं। सत्ता और विधायिका के सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों का धार्मिक वेश में सार्वजनिक मंचों से उन्मादी संकेत देना और इतिहास के नाम पर प्रतिशोध का आह्वान करना, केवल प्रतीकात्मक आचरण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना पर सीधा प्रहार है।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल द्वारा “इतिहास का प्रतिशोध लेने” का सार्वजनिक आह्वान और उसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री द्वारा सोमनाथ मंदिर के मंच से दिए गए भाषण, एक ही वैचारिक लय में गढ़े गए प्रतीत होते हैं। यह कोई आकस्मिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सुनियोजित वैचारिक आक्रमण है, जिसमें इतिहास को तोड़-मरोड़कर वर्तमान राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति की जा रही है।

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डोभाल ने ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग-2026’ में प्रतिशोध को “पावरफुल सेंटीमेंट” बताते हुए यहूदियों के कथित ऐतिहासिक प्रतिशोध की कहानी का उल्लेख किया। यह वही कथा है, जिसके सहारे इज़राइली यहूदीवाद फिलिस्तीन में नरसंहार को वैध ठहराता रहा है। इस उदाहरण का भारतीय संदर्भ में प्रयोग, अपने आप में गंभीर चेतावनी है।
इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री का सोमनाथ मंदिर से डमरू बजाते हुए निकलना और मंदिर विध्वंस को एकांगी धार्मिक हमले के रूप में प्रस्तुत करना, संघ की वर्षों पुरानी शाखा-कथाओं को सरकारी इतिहास में बदलने की कोशिश है। तथ्य यह है कि भारतीय इतिहास में मंदिरों पर हमले मुख्यतः आर्थिक और राजनीतिक कारणों से हुए, न कि धर्म के नाम पर।
इतिहासकार कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ से लेकर आधुनिक शोध तक यह प्रमाणित है कि हिंदू राजाओं ने भी आर्थिक संकट के समय मंदिरों को लूटा, मूर्तियाँ पिघलवाईं और उनसे सिक्के बनवाए। पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल और परमार शासकों द्वारा मंदिरों पर हमले इतिहास में दर्ज हैं। सोमनाथ भी अपवाद नहीं था — उसे कुल 17 बार लूटा गया, हर बार महमूद गजनवी द्वारा नहीं, और अधिकतर बार लूट के बाद हमलावर लौट गए।

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सबसे अधिक धार्मिक ध्वंस यदि किसी पर हुआ, तो वह बौद्ध विहारों और जैन जिनालयों पर हुआ — और वह भी उन्हीं शासकों द्वारा, जिन्हें आज ‘सनातन संस्कृति के रक्षक’ बताया जा रहा है।
सोमनाथ के पुनर्निर्माण को लेकर भी इतिहास को झूठे ढंग से प्रस्तुत किया गया। महात्मा गांधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू — तीनों का स्पष्ट मत था कि सरकारी धन से किसी धार्मिक स्थल का निर्माण नहीं होना चाहिए। यही संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का आधार है, जिसे आज सुविधानुसार भुला दिया गया है।
इस पूरे वैचारिक अभियान का असली उद्देश्य साफ़ है —
देश की आर्थिक गिरावट, बेरोज़गारी, महंगाई, सामाजिक असुरक्षा और विदेश नीति की विफलताओं से ध्यान हटाना। पुलवामा, गलवान, पहलगाम और आंतरिक सुरक्षा की असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए इतिहास की कब्र खोदी जा रही है।
जब देश की जनता को एकजुट होने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, तब उसे धर्म और अतीत के नाम पर बांटने की कोशिश हो रही है। यह नफरत का वही ज़हर है, जो सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि सभ्यताओं को भी नष्ट कर देता है।
इस स्थिति में नागरिक समाज, मेहनतकश वर्ग और लोकतांत्रिक शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वे सच को सामने लाएं, झूठ का पर्दाफाश करें और संगठित प्रतिरोध खड़ा करें।
12 फरवरी को मजदूर-किसानों की प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे प्रयासों को और व्यापक बनाने की आवश्यकता है।