
व्यंग्य-लेखक: संजय एम. तराणेकर (कवि, लेखक एवं समीक्षक)

पहले गरबा माता की आराधना का माध्यम हुआ करता था। लोग श्रद्धा के साथ कुछ कदम थिरकते, प्रसाद ग्रहण करते और घर लौट जाते थे। लेकिन अब गरबा राष्ट्रीय स्तर का आयोजन बन चुका है, जहां भक्ति से ज्यादा ड्रेस, डांस, फोटो और सोशल मीडिया की रीलों का महत्व बढ़ गया है। गरबे में जोड़ीदार एक-दूसरे को “म्हारा सोणा रे…” गाकर मस्त हो जाते हैं और माता की आरती पांच मिनट में समाप्त! माता रानी भी सोचती होंगी—”मेरे भक्तों, मेरी पूजा कर रहे हो या फॉलोअर्स बढ़ाने आए हो?” शायद मन ही मन कहती हों—”बेटा, दर्शन करने आए हो या ऑडिशन देने!”
नौ दिनों तक गरबा खेलने का जुनून ऐसा कि दिन में ऑफिस की फाइलें और रात में कमर नाचती है। “नगाड़े संग ढोल बाजे” की थाप सुनते ही पैरों में बिजली दौड़ने लगती है। उम्र भले ही चालीस पार हो, मगर मन कहता है—”अभी तो मैं जवान हूं!” वहीं शरीर बेचारा कराहता है—”मालिक, जवानी अपनी जगह, लेकिन घुटनों की भी कोई उम्र होती है!”
गरबे के मैदान में कोई नागिन डांस कर रहा है, तो कोई हेलीकॉप्टर की तरह घूम रहा है। कुछ के स्टेप देखकर लगता है कि फिजियोथेरेपिस्ट की फीस भी गरबे के साथ बढ़ने वाली है। उत्साह में लोग इतने चक्कर लगा लेते हैं कि घर लौटते समय जूती-चप्पल पहनने तक का होश नहीं रहता। साथी से कहते हैं—”भाई, मुझे गाड़ी में बैठा दे और तू ही चला ले, मैं तो पूरी तरह पंचर हो गया हूं!”
सबसे मजेदार दृश्य तब होता है, जब नौ दिन तक सोफे पर बैठकर टीवी देखने वाला व्यक्ति गरबे की पहली रात खुद को डांस का सुपरस्टार समझने लगता है। दो घंटे लगातार घूमने के बाद जब कमर जवाब दे देती है, तब समझ आता है कि शरीर कोई रिचार्ज होने वाला मोबाइल नहीं है, जिसे सुबह चार्ज करके रातभर चलाया जा सके।
अस्पतालों में भी गरबे का असर दिखाई देने लगता है। किसी की कमर में दर्द, किसी की पिंडली में खिंचाव, तो किसी के घुटनों में शिकायत! डॉक्टर पूछते हैं—”कितनी देर गरबा किया?” मरीज गर्व से जवाब देता है—”डॉक्टर साहब, पूरे चार घंटे!” डॉक्टर कहते हैं—”बहुत खूब! अब अगले चार दिन आराम कीजिए।” मरीज तुरंत पूछता है—”लेकिन डॉक्टर साहब, कल फाइनल राउंड है!” डॉक्टर माथा पकड़ लेते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि परेशानी शरीर में ज्यादा है या गरबे के जुनून में!
असल समस्या गरबा नहीं, बल्कि जोश में होश खो देना है। शरीर की क्षमता को नजरअंदाज करके घंटों लगातार नाचना समझदारी नहीं है। माता रानी भी यही चाहेंगी कि भक्त नौ दिन आनंद और श्रद्धा के साथ गरबा करें और दसवें दिन स्वस्थ रहकर विजयादशमी मनाएं। ऐसा न हो कि रावण दहन देखने के बजाय अपनी अकड़ी हुई कमर का इलाज कराना पड़े!
इसलिए हे भक्तों, गरबा जरूर खेलिए, जमकर खेलिए, लेकिन अपनी सेहत का भी ध्यान रखिए। बीच-बीच में आराम कीजिए, पानी पीजिए और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही नृत्य कीजिए। उत्साह ऐसा हो कि मन झूम उठे, मगर शरीर अगले दिन बिस्तर पर पड़े-पड़े यह न कहे—”बस मालिक, अब अगले नवरात्रि में ही मिलेंगे!”
लेखक परिचय: संजय एम. तराणेकर कवि, लेखक एवं समीक्षक हैं। वे संजय नगर, इंदौर-452011, मध्य प्रदेश के निवासी हैं।
