भारत की अर्थव्यवस्था का दोहरा इम्तिहान!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

गोंदिया—वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदलते परिदृश्य में शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 का दिन भारत के लिए आर्थिक संभावनाओं और वित्तीय चुनौतियों का एक ऐसा संगम लेकर आया है, जहां एक तरफ विकसित भारत 2047 की आर्थिक उड़ान के सपने हैं, तो दूसरी तरफ शेयर बाजार में लगातार आठ सप्ताह की गिरावट, विदेशी मुद्रा भंडार में 18.34 अरब डॉलर की कमी, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और भारतीय रिजर्व बैंक की संभावित ब्याज दर वृद्धि जैसे संकेत आर्थिक विमर्श को गंभीर बना रहे हैं।
एक ओर भारत मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से दुनिया की लगभग 75 से 80 प्रतिशत अर्थव्यवस्था तक व्यापारिक पहुंच बनाने की महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता 20 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने के लिए निर्धारित है। दूसरी ओर भारतीय शेयर बाजार में लगातार आठ सप्ताह की गिरावट ने लगभग 25 वर्षों बाद इतनी लंबी गिरावट का दौर दिखाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इस अवधि में बाजार पूंजीकरण में 26 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी दर्ज की गई है।
यह परिस्थिति केवल सेंसेक्स और निफ्टी के उतार-चढ़ाव की कहानी नहीं है। इसके भीतर निवेशकों का भरोसा, रुपये की स्थिरता, विदेशी पूंजी का प्रवाह, वैश्विक ब्याज दरें, कच्चे तेल की कीमतें और भारत की आर्थिक सहनशीलता जैसे कई बड़े प्रश्न छिपे हुए हैं।
मौद्रिक नीति समिति की बैठक 5 से 7 अक्टूबर 2026 तक निर्धारित है और 7 अक्टूबर को संभावित नीति निर्णय की तारीख के रूप में देखा जा रहा है। रॉयटर्स की 28 सितंबर की रिपोर्ट में अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण के आधार पर लगभग 60 प्रतिशत प्रतिभागियों ने 25 आधार अंक की वृद्धि की संभावना जताई थी। यह केवल सर्वेक्षण आधारित बाजार अपेक्षा है, आरबीआई का घोषित निर्णय नहीं।
बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज का अनुमान है कि आरबीआई 2027 की पहली छमाही तक रेपो दर में कुल 100 आधार अंक यानी एक प्रतिशत अंक की वृद्धि कर सकता है। उसने अक्टूबर में 25 आधार अंक की संभावित वृद्धि का अनुमान लगाया है और इसके बाद 75 आधार अंक की और वृद्धि की संभावना जताई है। ऐसा होने पर अंतिम रेपो रेट 6.25 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। जाहिर है, बाजार इस समय आंकड़ों से ज्यादा संकेतों को पढ़ने की कोशिश कर रहा है।
साथियों, बात अगर हम वैश्विक व्यापार में भारत की बढ़ती आर्थिक महत्वाकांक्षा की करें तो 3 अक्टूबर 2026 को भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री द्वारा मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी बढ़ाने पर दिया गया जोर आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारत का उद्देश्य केवल वस्तुओं का निर्यात बढ़ाना नहीं, बल्कि भारतीय उद्योगों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों, कृषि प्रसंस्करण, वस्त्र, औषधि और अभियांत्रिकी उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी अवसर उपलब्ध कराना है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगभग 75-80 प्रतिशत तक संभावित व्यापारिक पहुंच का लक्ष्य भारत की आर्थिक कूटनीति का महत्वपूर्ण आयाम है। हालांकि अवसर का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब भारतीय उत्पाद गुणवत्ता, मूल्य, तकनीक और समयबद्ध आपूर्ति के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतरेंगे। मुक्त व्यापार समझौते बाजार खोल सकते हैं, लेकिन घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना भी उतना ही जरूरी है। वरना बाजार खुलेगा और सामान किसी और का बिकेगा—यह आर्थिक व्यंग्य भारत को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
साथियों, बात अगर पशुपालन और सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देने की करें तो 3 अक्टूबर 2026 को केंद्रीय सहकारिता एवं गृह मंत्री द्वारा पशुपालन आधारित धनतंत्र के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की अवधारणा समावेशी विकास से जुड़ी दिखाई देती है।
भारत में पशुपालन केवल दूध उत्पादन का साधन नहीं है। यह ग्रामीण परिवारों की अतिरिक्त आय, महिला सशक्तीकरण, सहकारी संस्थाओं, पशु चिकित्सा, चारा उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण और विपणन से जुड़ी एक विस्तृत आर्थिक शृंखला है। यदि दुग्ध सहकारी समितियों को आधुनिक तकनीक, शीत भंडारण, सुलभ ऋण और बेहतर बाजार से जोड़ा जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार तथा स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिल सकती है।
विकसित भारत की सफलता का मूल्यांकन केवल महानगरों के शेयर बाजार और बड़े उद्योगों से नहीं होना चाहिए। असली कसौटी गांव के किसान, पशुपालक, महिला स्वयं सहायता समूह और छोटे उद्यमी की आय में होने वाली वृद्धि है।
पशुपालन को केवल दूध तक सीमित देखने के बजाय इसके व्यापक आर्थिक प्रभाव को समझना होगा। इसमें दुग्ध सहकारी समितियां, पशु चिकित्सा, चारा उत्पादन, नस्ल सुधार, दुग्ध प्रसंस्करण, शीत भंडारण, ग्रामीण ऋण और विपणन शामिल हैं। यह कृषि के अतिरिक्त ग्रामीण परिवारों को आय देता है, महिलाओं की भागीदारी बढ़ाता है, छोटे उद्यमों को जन्म देता है और दूध, मांस, चमड़ा तथा अन्य संबंधित उत्पादों की मूल्य शृंखला को मजबूत करता है।
साथियों, बात अगर पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन और वित्तीय स्थिरता के संदेश की करें तो नई दिल्ली में 3 से 5 अक्टूबर 2026 तक आयोजित पांचवां कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच विशेष महत्व रखता है। इस वर्ष की विषयवस्तु है—“रेसिलिएंस इन एन एज ऑफ फ्लक्स”, अर्थात परिवर्तनशील वैश्विक परिस्थितियों में आर्थिक लचीलापन।
वित्त मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार इसमें लगभग 30 देशों के अर्थशास्त्रियों, नीति निर्माताओं और वित्तीय विशेषज्ञों की भागीदारी निर्धारित है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने वित्तीय जोखिमों के प्रति सतर्कता का संदेश देते हुए संकेत दिया है कि वित्तीय दबाव अचानक उभर सकते हैं, जबकि उन्हें दूर करने में वर्षों लग सकते हैं।
पश्चिम एशिया का संघर्ष, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि, वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल और पूंजी प्रवाह में बदलाव आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। ऐसे माहौल में भारत की सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में अपेक्षाकृत सीमित वृद्धि को वित्तीय और मौद्रिक प्रबंधन के संदर्भ में देखा जा रहा है। संदेश स्पष्ट है—विकास जरूरी है, लेकिन जोखिमों की अनदेखी करके विकास की गाड़ी को तेज दौड़ाना बुद्धिमानी नहीं होगी।
साथियों, बात अगर विदेशी मुद्रा भंडार में 18.34 अरब डॉलर की गिरावट की करें तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने दूसरा महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 25 सितंबर 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 18.34 अरब डॉलर घटकर 747.56 अरब डॉलर रह गया। इससे पहले 4 सितंबर को यह लगभग 785.71 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर था। इस प्रकार तीन सप्ताह में कुल कमी लगभग 38.15 अरब डॉलर रही।
विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में 15.57 अरब डॉलर और स्वर्ण भंडार में लगभग 2.59 अरब डॉलर की कमी दर्ज हुई। इस गिरावट को समझने के लिए रुपये पर दबाव, विदेशी मुद्रा बाजार में केंद्रीय बैंक के संभावित हस्तक्षेप तथा यूरो और येन जैसी मुद्राओं के डॉलर के मुकाबले मूल्यांकन में बदलाव को ध्यान में रखना आवश्यक है।
विदेशी मुद्रा भंडार में कमी को सीधे आर्थिक संकट कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि भारत का भंडार अभी भी व्यापक बाहरी भुगतान क्षमता का मजबूत आधार है। लेकिन लगातार गिरावट नीति निर्माताओं और निवेशकों के लिए निश्चित रूप से निगरानी का विषय है।
साथियों, बात अगर शेयर बाजार की आठ सप्ताह की गिरावट की करें तो भारतीय शेयर बाजार ने हाल के वर्षों की सबसे लंबी लगातार साप्ताहिक गिरावटों में से एक दर्ज की है। सेंसेक्स और निफ्टी लगातार आठ सप्ताह नीचे बंद हुए, जिसे लगभग 25 वर्षों की सबसे लंबी ऐसी अवधि बताया जा रहा है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि, रुपये की कमजोरी और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है। 2 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार केवल तीन कारोबारी दिनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से लगभग 29,613 करोड़ रुपये की शुद्ध निकासी की।
अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड प्रतिफल में वृद्धि और कच्चे तेल की कीमतों का 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहना निवेशकों की चिंता के प्रमुख कारणों में शामिल रहा। आठ सप्ताह में निवेशकों की संपत्ति में 45 लाख करोड़ रुपये की कमी का दावा करने से पहले आंकड़ों के आधार की पुष्टि आवश्यक है। उपलब्ध रिपोर्टों में इसी अवधि में बाजार पूंजीकरण में 26 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी का आंकड़ा सामने आया है।
साथियों, बात अगर आरबीआई की संभावित ब्याज दर वृद्धि और आम आदमी पर उसके प्रभाव की करें तो बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज का अनुमान इस समय चर्चा में है। उसके अनुसार आरबीआई 2027 की पहली छमाही तक रेपो दर में कुल 100 आधार अंक यानी एक प्रतिशत अंक की वृद्धि कर सकता है। इसमें अक्टूबर की मौद्रिक नीति बैठक में 25 आधार अंक की संभावित वृद्धि और उसके बाद अतिरिक्त 75 आधार अंक की वृद्धि का अनुमान शामिल है।
यदि यह अनुमान वास्तविकता में बदलता है और रेपो रेट 6.25 प्रतिशत तक पहुंचता है तो गृह ऋण, वाहन ऋण और कारोबार के लिए उधारी की लागत प्रभावित हो सकती है। हालांकि दूसरी तरफ मौद्रिक सख्ती महंगाई के दबाव को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है। इसलिए आरबीआई के सामने आर्थिक विकास, महंगाई और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन साधने की चुनौती होगी।
साथियों, बात अगर 5 अक्टूबर से बाजार की दिशा की करें तो सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को भारतीय शेयर बाजार खुलने पर निवेशकों की निगाहें वैश्विक बाजारों, कच्चे तेल, डॉलर-रुपये की चाल, विदेशी निवेशकों की गतिविधियों और आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक पर रहेंगी।
बाजार में राहत की संभावना वैश्विक तनाव में कमी और विदेशी खरीदारी की वापसी से जुड़ी होगी, जबकि ऊंचे बॉन्ड प्रतिफल, महंगा तेल और लगातार विदेशी बिकवाली अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है। इसलिए आगामी बाजार की दिशा को निश्चित उछाल या गिरावट के रूप में देखने के बजाय बदलते आर्थिक संकेतों के आधार पर समझना अधिक उचित होगा।
अंततः भारत की अर्थव्यवस्था इस समय विरोधाभासों के बीच खड़ी दिखाई दे रही है। एक तरफ मुक्त व्यापार समझौतों से वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाने की महत्वाकांक्षा है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पशुपालन और सहकारिता से मजबूत करने की कोशिश है और विकसित भारत 2047 का बड़ा लक्ष्य है। दूसरी तरफ शेयर बाजार की ऐतिहासिक गिरावट, विदेशी पूंजी की निकासी, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, महंगे कच्चे तेल और संभावित ब्याज दर वृद्धि जैसी चुनौतियां हैं।
इसलिए वर्तमान आर्थिक स्थिति को न तो केवल संकट की तस्वीर मानना उचित होगा और न ही केवल विकास की चमकदार कहानी। असली परीक्षा यही है कि भारत वैश्विक आर्थिक तूफानों के बीच अपनी विकास गति, रुपये की स्थिरता, निवेशकों का भरोसा और आम नागरिक की क्रय शक्ति कितनी मजबूती से बचा पाता है।
विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमकार, सीए (एटीसी), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र।